अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने कहा, अगर पश्चिमी संस्कृति नहीं छोड़ी, तो हमें उन्हें मारना होगा-बीबीसी एक्सक्लूसिव

- Author, सिकंदर किरमानी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बल्ख़, अफ़ग़ानिस्तान
हम जिन तालिबान लड़ाकों से मिले, वे अफ़ग़ानिस्तान के सबसे बड़े शहरों में से एक मज़ार-ए-शरीफ़ से सिर्फ़ 30 मिनट की दूरी पर मौजूद हैं.
युद्ध में जीती गई कुछ चीज़ें, जो वे हमें दिखाते हैं, उनमें शामिल है एक सैनिक वाहन (हमवी), दो पिक अप वैन्स और कई शक्तिशाली मशीन गन. ऐनुद्दीन पहले मदरसा के छात्र थे लेकिन अब वे स्थानीय सैन्य कमांडर हैं. बिना कोई भाव वाला चेहरा लिए वे हथियारबंद भीड़ के बीच में खड़े हैं.
अंतरराष्ट्रीय सैनिकों की वापसी के बाद से तालिबान हर दिन नए क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर रहे हैं. लेकिन इन सबके बीच जो लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, वो है यहाँ की आम जनता, जो काफ़ी डरी हुई है.
हाल के सप्ताहों में लाखों आम अफ़ग़ानियों ने अपना घर छोड़ दिया है. सैकड़ों लोग या तो मारे गए हैं या घायल हुए हैं.
मैंने ऐनुद्दीन ने पूछा कैसे वे हिंसा को सही ठहराएँगे ख़ासकर उस स्थिति में जब वे उन लोगों की लड़ाई लड़ने का दावा कर रहे हैं, जो इतनी पीड़ा झेल रहे हैं.
वे जवाब देते हैं, "ये लड़ाई है, इसलिए लोग मर रहे हैं." उन्होंने कहा कि तालिबान की कोशिश यही है कि किसी आम नागरिक को नुक़सान न पहुँचे.

'काबुल में कठपुतली सरकार'
मैंने उन्हें ये बताया कि ये लड़ाई तो तालिबान ने ही शुरू की है, इस पर वे कहते हैं, "नहीं. हमारी सरकार थी, लेकिन उसे उखाड़ फेंका गया. उन्होंने (अमेरिका) ये लड़ाई शुरू की थी."
ऐनुद्दीन और बाक़ी तालिबान का ये मानना है कि हवा उनके साथ है और 2001 में अमेरिकी हमलों के बाद सत्ता से हटाए गए तालिबान का प्रभाव अब लौटने ही वाला है.
वे काबुल की सरकार को कठपुतली सरकार मानते हैं और कहते हैं, "वे पश्चिमी संस्कृति को नहीं छोड़ रहे हैं, इसलिए हमें उनको मारना पड़ रहा है."
हमारी बातचीत ख़त्म होने के कुछ देर बाद हमें हेलिकॉप्टरों की आवाज़ सुनाई देती है. तालिबान लड़ाके सैनिक वाहन को लेकर तितर-बितर हो जाते हैं. ये इस बात की चेतावनी है कि अफ़ग़ानिस्तान की वायु सेना अब भी तालिबान के लिए ख़तरा पैदा कर रही है और युद्ध अभी ख़त्म नहीं हुआ है.
हम बल्ख़ में हैं. इस शहर का प्राचीनकालीन इतिहास है. माना जाता है कि इस्लाम के सबसे मशहूर रहस्यवादी कवियों में से एक जलालुद्दीन रूमी का जन्मस्थान यही है.
इस साल के शुरू में ही हम यहाँ से गुज़रे थे, लेकिन उस समय यहाँ सरकार का नियंत्रण था, लेकिन बाहरी गाँवों पर तालिबान का कब्ज़ा था. लेकिन अब ये शहर उन 200 ज़िलों में शामिल है, जिस पर तालिबान ने कब्ज़ा कर लिया है.

कितना बदला बल्ख़?
तालिबान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सोच-समझकर ही उत्तर में ध्यान केंद्रित किया गया है. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि ये इलाक़ा पारंपरिक रूप से तालिबान विरोधी मज़बूत प्रतिरोध के रूप में देखा जाता है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि ये इलाक़ा ज़्यादा विविधता वाला है.
तालिबान के नेतृत्व में पश्तून समुदाय के लोगों का ज़्यादा प्रतिनिधित्व दिखता है, लेकिन इस अधिकारी का कहना है कि तालिबान अन्य समुदाय के लोगों को भी शामिल करने पर ज़ोर दे रहा है.
स्थानीय तालिबान नेता हाजी हिकमत बल्ख़ में हमारे मेज़बान हैं और वे हमें ये दिखाने को उत्सुक हैं कि कैसे यहाँ जीवन समान्य रूप से चल रहा हैं.
लड़कियाँ सड़कों पर आते-जाते दिख जाती हैं (हालाँकि कई जगह से ऐसी रिपोर्टें हैं कि लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी गई है), बाज़ार में भीड़ भाड़ दिख रही है. बाज़ार में महिलाएँ और पुरुष दोनों दिख रहे हैं.

हमें स्थानीय सूत्रों ने बताया कि महिलाओं को किसी पुरुष के साथ ही बाहर निकलने की अनुमति है लेकिन हमें ऐसा कहीं नहीं लगा. अन्य जगहों के बारे में ऐसी रिपोर्टें हैं कि तालिबान कमांडर काफ़ी सख़्त हैं.
लेकिन यहाँ हमने जिन महिलाओं को देखा, वे सभी चेहरा और सर ढँकने वाला बुरक़ा पहने हुई थी.
हाजी हिकमत ज़ोर देकर कहते हैं कि किसी पर दबाव नहीं है और तालिबान सिर्फ़ ये बता रहे हैं कि महिलाओं को इस तरह से कपड़े पहनने चाहिए.
हालाँकि मुझे ये बताया गया कि टैक्सी ड्राइवर्स को ये निर्देश है कि वे किसी भी महिला को उस समय तक अपनी गाड़ी में न बैठाएँ, जब तक उसने बुरक़ा न पहना हो.

निशाने पर बड़े शहर
हमारे वहाँ से जाने के बाद ये रिपोर्ट आई कि पोशाक के कारण एक युवती की हत्या कर दी गई. हालाँकि हाजी हिकमत इससे इनकार करते हैं कि तालिबान इसके लिए ज़िम्मेदार है.
बाज़ार में कई लोग तालिबान के प्रति अपना समर्थन जताते हैं. वे सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए उनके प्रति आभार भी व्यक्त करते हैं. लेकिन उस समय उनके साथ तालिबान लड़ाके भी मौजूद थे, इसलिए ये कहना मुश्किल है कि वहाँ के लोग वाक़ई क्या सोचते हैं?
तालिबान की कट्टरपंथी विचारधारा ज़्यादा रूढ़िवादी अफ़ग़ानियों के अनुरूप होती है. अब तालिबान लड़ाके बड़े शहरों पर नियंत्रण की कोशिश कर रहे हैं.

मज़ार-ए-शरीफ़ शहर पर अब भी सरकार का नियंत्रण है. जितने भी लोगों से मैंने बातचीत की, उन्होंने इस बात को लेकर चिंता व्यक्त की कि तालिबान के फिर उदय का उनके लिए क्या मतलब है ख़ासकर युवा पीढ़ी की आज़ादी को लेकर, जो इसके साथ पले-बढ़े हैं.
लेकिन बल्ख़ ज़िले में तालिबान अपनी सरकार को औपचारिक रूप दे रहे हैं. तालिबान ने शहर की क़रीब-क़रीब सभी सरकारी इमारतों पर कब्ज़ा कर लिया है. एक पुलिस परिसर ख़ाली पड़ा है. ये पहले स्थानीय पुलिस प्रमुख का मुख्यालय हुआ करता था. इलाक़े पर नियंत्रण के लिए हुई लड़ाई के दौरान आत्मघाती हमले में ये इमारत आंशिक रूप से नष्ट हो गई.
हमले की बात करते समय तालिबान के ज़िला गवर्नर अब्दुल्लाह मंज़ूर के चेहरे पर चमक आ जाती है, जबकि उनके साथी हँसने लगते हैं. अफ़ग़ानिस्तान के अन्य इलाक़ों की तरह यहाँ की लड़ाई भी व्यक्तिगत होने के साथ-साथ वैचारिक भी है.
क्या नहीं बदला?
तालिबान के नियंत्रण के बाद एक चीज़ जो नहीं बदली है, वो हैं नारंगी रंग के कपड़े पहने सड़कों और गलियों की सफ़ाई करने वाले. ये अब भी काम पर आ रहे हैं. साथ ही कई नौकरशाह भी ड्यूटी कर रहे हैं. इनकी निगरानी करते हैं हाल ही में नियुक्त तालिबान के मेयर, जो एक कोने में लगे "इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान" के एक छोटे से सफेद झंडे के साथ एक चौड़ी लकड़ी की मेज़ पर बैठे हैं.
पहले वे गोला-बारूद की आपूर्ति के प्रभारी थे, लेकिन अब टैक्स की ज़िम्मेदारी उन पर है. वे मुझे गर्व से बताते हैं कि उनका ग्रुप व्यापार करने वाले लोगों से सरकार की तुलना में कम टैक्स लेता है.
सेना के जीवन से आम ज़िंदगी को अपनाना एक ऐसा काम है, जो प्रगति पर है. हमारे इंटरव्यू के दौरान एक तालिबान लड़ाका बंदूक लिए मेयर के पीछे खड़ा है, लेकिन वहाँ मौजूद कुछ सीनियर लोग उसे वहाँ से हटा देते हैं.
हालाँकि अन्य जगहों पर विद्रोहियों की इस्लामी धर्मग्रंथों की कट्टर व्याख्या ज़्यादा दिखती है. स्थानीय रेडियो स्टेशन पर पहले इस्लामिक संगीत और हिट हुए सामान्य गानों को बजाया जाता था, लेकिन अब रेडियो पर सिर्फ़ धार्मिक गीत बजते हैं.
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हाजी हिकमत कहते हैं कि उन्होंने अश्लीलता को बढ़ाने वाले संगीत को सार्वजनिक रूप से बजाने पर रोक लगा दी है, लेकिन वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि लोग व्यक्तिगत रूप से अपने पसंद के गाने सुन सकते हैं.
हालाँकि मुझे ये बताया गया कि एक स्थानीय व्यक्ति को बाज़ार में म्यूजिक सुनते पकड़ लिया गया था. इस कारण सज़ा के रूप में तालिबान लड़ाकों ने चिलचिलाती धूप में उसे नंगे पाँव उस समय तक चलाया, जब तक कि वो बेहोश न हो गया.
लेकिन हाजी हिकमत का दावा है कि ऐसी चीज़ें नहीं होती. जब हम वहाँ से निकलने लगे, तो वहाँ काम कर रहे कुछ युवकों की ओर इशारा करते हुए हाजी हिकमत कहते हैं- देखिए इनकी दाढ़ी नहीं है.
वे मुस्कुराते हुए कहते हैं, "देखिए हमने किसी को मजबूर नहीं किया है."
ये साफ़ दिखता है कि तालिबान दुनिया के सामने अपनी नरम छवि पेश करना चाहता है. लेकिन ऐसी रिपोर्टें हैं कि देश के अन्य हिस्सों में तालिबान का रवैया काफ़ी सख़्त है. इनके व्यवहार में अंतर स्थानीय कमांडरों के रवैए पर निर्भर करता है.

कठोर सज़ा
तालिबान ने जिन इलाक़ों पर अधिकार हासिल किया है, वहां से बदले के लिए हत्याएं किए जाने और मानवाधिकारों के उल्लंघन की रिपोर्ट मिली हैं. पश्चिमी देशों के अधिकारियों ने तालिबान को आगाह किया है कि अगर वो ताक़त के दम पर अधिकार हासिल करने की कोशिश करेंगे तो अलग-थलग पड़ जाएंगे.
तालिबान इसके पहले जब सत्ता में थे, उस दौर को शरीया क़ानून के मुताबिक दी जाने वाली कठोर सज़ाओं से जोड़कर देखा जाता है.
बीते महीने दक्षिणी राज्य हेलमंड में तालिबान ने बच्चे का अपहरण करने के आरोप में घिरे दो लोगों को पुल से लटका दिया. तालिबान ने दोनों को दोषी बताते हुए इस सज़ा को सही ठहराया.
बल्ख़ में हमने जिस दिन तालिबान की अदालत का कामकाज देखा, उस दिन वहां सारे केस ज़मीन विवाद से जुड़े थे. एक तरफ कई लोग तालिबान के न्याय देने के तरीके को लेकर डरे हुए हैं, वहीं कई लोग ऐसे भी हैं जो जिन्हें सरकार के भ्रष्ट सिस्टम के मुक़ाबले यहां जल्दी समाधान की संभावना दिखती है.
केस के सिलसिले में आए एक व्यक्ति ने कहा, "पहले मुझे काफी रिश्वत देनी पड़ती थी. "
तालिबानी जज हाजी बदरुद्दीन ने बताया कि वो चार महीने से कुर्सी पर हैं और उन्होंने अभी तक किसी को शारीरिक दंड नहीं दिया है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि अगर किसी को कड़ी सज़ा दी जाती है तो तालिबान की कोर्ट में अपील का भी प्रावधान है.
लेकिन वो कठोर सज़ा की हिमायत करते हैं. वो कहते हैं, "हमारी शरिया में ये साफ़ है कि जो बिना शादी के सेक्स करते हैं, चाहे वो कोई लड़की हो या फिर लड़का, उसे सार्वजनिक तौर पर 100 कोड़े लगाए जाएंगे. "
"लेकिन अगर कोई शादीशुदा है तो उनकी पत्थर मार-मार के जान ले ली जाएगी... जो चोरी करते हैं और अगर उनका अपराध साबित हो जाता है तो उनके हाथ काट दिए जाने चाहिए."
आधुनिक दुनिया से ये सज़ाएं मेल नहीं खातीं, इस तरह की आलोचनाओं को वो ख़ारिज करते हैं.
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वो कहते हैं, "लोगों के बच्चों का अपहरण किया जा रहा है. क्या ये बेहतर है? या फिर ये बेहतर है कि एक व्यक्ति के हाथ काट दिए जाएं और समाज में स्थिरता बहाल कर दी जाए?"
तालिबान तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं लेकिन फिलहाल अफ़ग़ानिस्तान के सबसे बड़े शहर पर सरकार का अधिकार है. आने वाले महीनों में दोनों पक्षों में अधिकार के लिए संघर्ष होगा तो हिंसा बढ़ने की आशंका है.
मैंने हाजी हिकमत से पूछा कि क्या वो यकीन करते हैं कि तालिबान सेना के दम पर जीत हासिल कर लेंगे? उनका जवाब था, "हां"
उन्होंने कहा, "अगर शांति वार्ता कामयाब नहीं हुई तो इंशाअल्लाह, हम जीतेंगे."
ये बातचीत अभी बंद है. तालिबान बार-बार 'इस्लामिक सरकार' के गठन की मांग कर रहे हैं और ये विरोधियों से सरेंडर की मांग की तरह लगता है.
हाजी हिकमत कहते हैं, "हमने दोनों विदेशियों को मात दे दी है और अब हमारे अंदरूनी दुश्मनों की बारी है. "
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