क्या पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को मान्यता देने की जल्दी में है?

इमरान ख़ान और अशरफ़ ग़नी की मुलाक़ात की फाइल फोटो

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इमेज कैप्शन, इमरान ख़ान और अशरफ़ ग़नी की मुलाक़ात की फाइल फोटो
    • Author, सचिन गोगोई
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग

पाकिस्तान की सरकार ने हाल के दिनों में सार्वजनिक रूप से जो कहा है, जिसे देश के मुख्यधारा के मीडिया ने प्रमुखता से जगह दी है, उससे संकेत मिलता है कि पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान में उभरते तालिबान को जल्द से जल्द मान्यता देने की कोशिश कर रहा है.

पाकिस्तान के शीर्ष नेताओं के बयानों से ये प्रतीत होता है कि वो चाहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में कम अफ़रा-तफ़री के साथ जल्द से जल्द सत्ता का हस्तांतरण तालिबान के हाथों में हो जाए. उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की इस बात के लिए आलोचना की है कि वो 'बाधा' बन रहे हैं, साथ ही अमेरिका को कोस रहे हैं कि उनकी वजह से अफ़ग़ानिस्तान में 'एकदम अव्यवस्था' की स्थिति बन गई है.

पाकिस्तान की सरकार और वहां का मीडिया भारत को भी आड़े हाथों ले रहा है और आरोप लगा रहा है कि अशरफ़ ग़नी सरकार को समर्थन देकर भारत अफ़ग़ानिस्तान के सुरक्षा हालात को और जटिल बना रहा है.

हालांकि पाकिस्तानी विशेषज्ञों का एक समूह ऐसा भी है जो पाकिस्तान का ध्यान इस ओर दिला रहा है कि पड़ोस में तालिबान का शासन होने पर पाकिस्तान के लिए कौन से ख़तरे पैदा हो सकते हैं.

पाकिस्तान का रुख़ तालिबान की ओर

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प्रधानमंत्री इमरान ख़ान समेत देश के शीर्ष नेतृत्व के बयान ये संकेत दे रहे हैं कि पाकिस्तान अब अफ़ग़ानिस्तान में जल्द से जल्द तालिबान का नियंत्रण या अफ़ग़ानिस्तान पर शासन में तालिबान की भूमिका देखना चाहता है ताकि लंबे समय से चला आ रहे टकराव से बचा जा सके.

अमेरिकी प्रसारक पीबीएस को जुलाई में दिए एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा था कि ''तालिबान कोई सैन्य संगठन नहीं है. वो आम नागरिक हैं.''

इमरान ख़ान ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि पड़ोसी देश में 'दीर्घकालीन गृहयुद्ध' सबसे बुरी स्थिति होगी क्योंकि इससे पाकिस्तान के लिए शरणार्थियों और सुरक्षा संबंधी समस्याएं पैदा होंगी.

वैसे तो पाकिस्तान बार-बार कहता रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में उनका कोई 'पंसदीदा' नहीं है और इसी बात को पाकिस्तानी विदेशमंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने नौ अगस्त को संवाददाता सम्मेलन में दोहराया. लेकिन उनके कई आधिकारिक बयानों से ये प्रतीत होता है कि वो निर्वाचित राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की सरकार पर तालिबान को तवज्जो देते हैं.

पाकिस्तानी विदेशमंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने नौ अगस्त को संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान के नेतृत्व को लंबे गृहयुद्ध और ख़ून-ख़राबे को रोकने के लिए मौका देखकर काम करना चाहिए. हालांकि उन्होंने तालिबान की ज़िम्मेदारियों पर ज़्यादा बात नहीं की थी.

उज़्बेकिस्तान के ताशकंद में जुलाई में आयोजित सेंट्रल एंड साउथ एशिया समिट में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा था, ''तालिबान समझौता क्यों करेगा जबकि (अमरीकी बलों की) वापसी की तारीख दे दी गई है. और अब जबकि कुछ हज़ार अमरीकी सैनिक बचे हैं, वो हमारी क्यों सुनेंगे, वो भी तब जब तालिबान को लग रहा है कि जीत मिल रही है.''

तालिबान का उदय यानी भारत की पराजय

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पाकिस्तान के सैन्य और असैन्य प्रतिष्ठान लंबे वक्त से ये आरोप लगाते रहे हैं कि भारत, अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान विरोधी चरमपंथी समूहों का समर्थन कर रहा है जो अफ़ग़ानिस्तान की धरती से काम कर रहे हैं.

पश्तो भाषा के दैनिक पख़्तून पोस्ट में 10 अगस्त को प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के सूचना और प्रसारण मंत्री चौधरी फ़वाद हुसैन ने आरोप लगाया कि भारत लंबे समय से अफ़ग़ानिस्तान की धरती का इस्तेमाल पाकिस्तान के ख़िलाफ़ चरमपंथ के लिए करता रहा है. इसी तरह, पाकिस्तान की सेना के इंटर-सर्विसेज़ पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) के महानिदेशक मेजर जनरल बाबर इफ़्तिख़ार ने भी बीते जुलाई महीने में कहा था कि पाकिस्तान में हिंसा की हालिया घटनाओं में अफ़ग़ानिस्तान स्थित भारत समर्थित चरमपंथी नेटवर्क्स का हाथ है.

इसी तरह, संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि, राजदूत मुनीर अकरम ने आठ अगस्त को पीटीवी न्यूज़ चैनल पर आरोप लगाया कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत ''शांति नहीं चाहता है और खेल बिगाड़ने वाली भूमिका निभा रहा है.''

मुनीर अकरम ने ये भी कहा कि ''भारत को भय है कि यदि तालिबान सत्ता में आ गया तो अफ़ग़ानिस्तान में उसका प्रभाव ख़त्म हो जाएगा.''

पाकिस्तान का अधिकतर मीडिया इसी बात को आगे बढ़ाता हुआ नज़र आया कि तालिबान का दबदबा बढ़ने की वजह से भारत 'बैकफुट पर' आ रहा है.

भारत पर अफ़ग़ान बलों की सैन्य मदद का आरोप

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अफ़ग़ानिस्तान और भारत जहां पाकिस्तान पर ये आरोप लगाते रहे हैं कि वो तालिबान की मदद करता है, वहीं पाकिस्तान सरकार और वहां का मीडिया ये आरोप लगाते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में अशांति का माहौल बनाए रखने के लिए भारत साज़िश रचता रहा है.

इसी साल जुलाई में पाकिस्तान के मुख्यधारा के मीडिया ने आरोप लगाया कि युद्ध प्रभावित देश से अपने राजनयिकों को निकालने के लिए गए भारतीय विमान ने अफ़ग़ान बलों के लिए भारी हथियार भी पहुंचाए.

पाकिस्तान के एक प्रमुख उर्दू अख़बार नवा-ए-वक़्त ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारतीय सेना के विशेष विमान 'अफ़ग़ानिस्तान से अपने राजनयिकों को निकालने के बहाने काबुल और कंधार पहुंचे और उन्होंने अशरफ़ ग़नी सरकार को भारी हथियार और गोला-बारूद मुहैया कराया.'

इस ख़बर में ये भी कहा गया कि भारत एक तरफ़ तालिबान के साथ बातचीत करके और दूसरी तरफ़ सरकारी बलों को हथियार पहुंचाकर 'डबल गेम' खेल रहा है.

अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर भारत-पाकिस्तान की प्रतिद्वंद्विता में ताज़ा घटनाक्रम हाल ही में तब जुड़ गया, जब भारत की अध्यक्षता में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अफ़ग़ानिस्तान पर चर्चा के लिए बैठक में पाकिस्तान को शामिल नहीं करने का फ़ैसला किया गया.

पाकिस्तानी विदेशमंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने आरोप लगाया कि अफ़ग़ानिस्तान से संबंधित चर्चा में पाकिस्तान को शामिल नहीं करके 'भारत ज़िम्मेदार व्यवहार करने में नाकाम' हुआ है.

पाकिस्तान के मीडिया ने भी इसके लिए भारत की आलोचना की. जानीमानी पत्रकार और एंकर आयशा ऐहतेशाम ने नियो टीवी पर कहा कि 'पाकिस्तान के प्रति भारत के रवैये ने संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं.'

तालिबान का शासन पाकिस्तान के लिए चुनौती

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पाकिस्तानी मीडिया के एक हिस्से को अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान शासन में भले ही 'मेरिट' नज़र आती है, लेकिन मीडिया का एक हिस्सा और कुछ विश्लेषक ऐसे भी हैं जो ये मानते हैं कि गृहयुद्ध और तालिबान के हाथ में सत्ता आने से असल चुनौती पाकिस्तान के लिए पैदा होगी.

पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक अयाज़ अमीर ने दुनिया टीवी के एक टॉक शो के दौरान चेताया कि 'तालिबान की जीत दीवार पर लिखी स्पष्ट इबारत है.' उन्होंने कहा कि तालिबान जब काबुल पर कब्जा करेगा, तो ऐसे तत्व जिनका झुकाव चरमपंथ की ओर है, जिन्होंने बाक़ायदा ट्रेनिंग ली है, फिर वो चाहें पाकिस्तान में हो या अफ़ग़ानिस्तान में, उनका मनोबल बढ़ेगा.'

पाकिस्तान के एक अन्य प्रमुख अख़बार उर्दू डेली एक्सप्रेस ने अपने संपादकीय में चेताया है कि अफ़ग़ानिस्तान के प्रमुख शहरों में तालिबान के बढ़ते कदमों की वजह से 'बड़ी संख्या में शरणार्थी' पाकिस्तान में दाख़िल होंगे. साथ ही लिखा है कि 'हमारे समाज के कुछ हिस्सों में अच्छे और बुरे तालिबान की धारणा है जिसे ख़ारिज़ करने की ज़रूरत है.'

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