पाकिस्तान को लेकर अफ़ग़ानिस्तान में ग़ुस्सा, सोशल मीडिया पर उठी पाक पर प्रतिबंधों की मांग

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अमेरिकी सेना की वापसी की तारीख़ की घोषणा के बाद से ही अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान लड़ाकों और सरकारी सैनिकों के बीच संघर्ष तेज़ हो गया था.
लेकिन बीते कुछ हफ़्तों में जिस गति से तालिबान आगे बढ़ रहे हैं उससे अफ़ग़ानिस्तान के भीतर कई सवाल उठाए जा रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि क्या तालिबान को मिल रही जीत के पीछे किसी बाहरी ताक़त की सैन्य मदद का हाथ है?
अफ़ग़ानिस्तान हमेशा से ही कहता रहा है कि तालिबान को पाकिस्तान की शह है और वो इसका इस्तेमाल अपने रणनीतिक फ़ायदे के लिए करता है.
अब अफ़ग़ान लोग सोशल मीडिया पर अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की बढ़त के लिए पाकिस्तान के समर्थन को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं.

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सोशल मीडिया पर ग़ुस्सा
लोगों का कहना है कि बिना पाकिस्तान की मदद के, तालिबान इस तेज़ गति से सरकारी सेना का सामना करने की काबिलियत नहीं रखता.
बीते कुछ दिनों से क़रीब चार लाख से अधिक ट्वीट #SanctionPakistan हैशटेग के साथ किए गए हैं. फ़ेसबुक पर भी करीब तीन लाख पोस्ट इसी विषय पर हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के उप राष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह ने इसी हैशटेग के साथ ट्वीट करते हुए लिखा कि वे संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों से तालिबान के ख़िलाफ़ जंग में मदद की गुहार कर हैं.
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सालेह पाकिस्तान के प्रति अपने आक्रामक रुख़ के लिए जाने जाते हैं और वे पहले भी सीधे-सीधे पाकिस्तान की भूमिका पर टिप्पणियाँ करते रहे हैं.
अफ़ग़ानिस्तान की नेशनल सिक्यूरिटी काउंसिल से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी रहमतुल्ला अंदार ने भी पाकिस्तान पर आरोप लगाए हैं.
पश्तो में ट्वीट में अंदार ने पाकिस्तान को सारे फ़साद की जड़ बताया है.
अंदार ने सवाल जवाब के अंदाज़ लिखा, " बिन लादेन कहाँ मिला? पाकिस्तान में,असली कहानी कहाँ घट रही है? पाकिस्तान में. अमेरिका लादेन की खोज में कहाँ गया? पाकिस्तान. उसका ठिकाना कहाँ था? पाकिस्तान."
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पाकिस्तान पर प्रतिबंध की मांग
इसके अलावा कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी और मंत्री इसी हैशटेग के ज़रिए पाकिस्तान पर निशाना साध रहे हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के पत्रकार और ओरबांद न्यूज़ के संस्थापक हबीब ख़ान लिखते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान के छदम युद्ध के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ. इस ट्रेंड को आगे बढ़ाएँ. दस लाख तक ट्वीट करें.अफ़ग़ानिस्तान ज़िंदाबाद."
हबीब ने इस हैशटेग से कई ट्वीट किए हैं. एक अन्य ट्वीट में वे लिखते हैं, "आप जहाँ मुमकिन हो, अफ़ग़ानिस्तान के लिए आवाज़ उठाएँ. हमारा देश जल रहा है. तीन करोड़ 70 लाख लोगों का देश पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का शिकार हो रहा है."
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एक अन्य यूज़र ने नूर पश्तून नाम के एक ट्वीटर हैंडल से ट्वीट किया गया, "अफ़ग़ान शांति से रहना चाहते हैं. ये प्रॉक्सी वॉर बंद करें."
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बहुत से यूज़र्स गृहयुद्ध में मरने वाले बच्चों की दर्दनाक तस्वीरें शेयर करते हुए पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की मांग कर रहे हैं.
विदेशों में रह रहे अफ़ग़ान भी इस मांग में अपनी आवाज़ शामिल कर रहे हैं.
अमेरिका की जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल अफ़ेयर्स पढ़ाने वालीं अफ़ग़ान मूल की निलोफ़र सख़ी ने संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की मांग की है.
निलोफ़र का कहना है, "बीते 72 घंटों में 27 बच्चे मारे गए हैं. हालात इससे अधिक ख़राब नहीं हो सकते. क्या यूएन को और सबूत चाहिए?"
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पाकिस्तान से कुछ लोग इस पर आपत्ति दर्ज कर रहे हैं
पाकिस्तान में इमरान ख़ान के तेज़तर्रार मंत्री फ़वाद चौधरी ने एक ट्वीट कर कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे युद्ध से उनके देश का कोई फ़ायदा नहीं होगा.
फ़वाद चौधरी ने ट्वीट किया, "पाकिस्तान शांति की हिमायत करता है. हमें युद्ध से कोई लाभ नहीं. दरअसल काबुल की सरकार को पाकिस्तान में आए दिन होने वाली आतंकवाद की घटनाओं के लिए जवाब देना चाहिए. सब जानते हैं कि हम्दुल्लाह जैसे लोग किसके लिए काम करते हैं."
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हम्दुल्लाह मोहिब अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं और वे अक्सर पाकिस्तान के निशाने पर रहते हैं.
पिछले महीने बीबीसी के कार्यक्रम हार्ड टॉक में जब हम्दुल्लाह मोहिब से पूछा गया कि क्या पाकिस्तान तालिबान को रोक सकता है,
उनका जवाब था, "बिल्कुल, पाकिस्तान में तालिबान के ठिकाने हैं उनके नेता पाकिस्तान में हैं. पाकिस्तान ने कभी इस बात का खंडन नहीं किया है. वहाँ उनका इलाज होता है. उन्हें हथियार और गोला-बारुद मिलता है. हमारा मानना है कि लड़ाई तो तालिबान लड़ रहे हैं पर ये एक छदम युद्ध है जिसकी डोर पाकिस्तान के हाथ में है."
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उधर कई विदेशी हस्तियां भी अफ़ग़ानिस्तान के बिगड़ते हालात पर चिंता जता रही हैं. न्यूज़ीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री हेलेन क्लार्क ने ट्वीट किया है कि तालिबान ने पांच प्रांतीय राजधानियों पर कब्ज़ा कर लिया है और वहाँ की सरकार और लोगों को तुरंत मदद की ज़रुरत है.
कनाडा के राजनेता क्रिस एलेक्ज़ेंडर भी अफ़ग़ानिस्तान को लेकर पाकिस्तान की आलोचना करते रहे हैं.
अपने ताज़ा ट्वीट में उन्होंने लिखा है- पुतिन के रूस ने जब यूक्रेन पर आक्रमण किया, तो दुनिया ने उस पर पाबंदी लगाई. पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर रहा है. हम किस चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं.
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राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी समेत कई मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी पाकिस्तान पर अफ़ग़ानिस्तान में सीधे हस्तक्षेप के आरोप लगाते रहे हैं.
अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान संबंध
1980 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान की सोवियत संघ समर्थित कम्युनिस्ट हुकूमत के ख़िलाफ़ मुजाहिदीन के अभियान के बाद से ही दोनों देशों के बीच रिश्ते उलझते गए हैं.
कोल्ड वॉर की सियासत में मोहरा बने अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत दख़ल को मिटाने के लिए अमेरिका ने मुजाहिदीन की मदद की. और मुजाहिदीन तक ये मदद पहुँचाई जनरल ज़िया की पाकिस्तान सरकार ने.
सोवियत सेनाओं के वापस लौटने के बाद आख़िरकार 1989 में नजीबुल्लाह की सरकार ने हथियार डाल दिए और देश पर मुजाहिदीन का कब्ज़ा हो गया.
लेकिन ये महज़ एक पड़ाव था क्योंकि अलग-अलग अफ़ग़ान वॉरलार्ड आपस में उलझने लगे. इसी बीच तालिबान का उदय शुरू हो गया था. ये आंदोलन पहले धार्मिक मदरसों से उबरा फिर सऊदी अरब ने इसकी फंडिंग की. इस आंदोलन में सुन्नी इस्लाम की कट्टर मान्याताओं का प्रचार किया जाता था.
अफ़ग़ानिस्तान की कथित बदइंतज़ामी और अफ़ग़ान जनरलों में मतभेद का फ़ायदा उठाते हुए तालिबान ने देश के दक्षिण से काबुल की ओर बढ़ना शुरु किया. कहा जाता है कि 1990 के दशक में भी तालिबान को पाकिस्तान का समर्थन था.
कई जानकार कहते हैं कि पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान के अपनी 'स्ट्रेटजिक डेप्थ' के तौर पर देखता है और हर हाल वो वहाँ एक ऐसी सरकार चाहता है जो उसके हित की बात करे.
पाकिस्तान मौजूदा अफ़ग़ानिस्तान सरकार के साथ, भारत के संबंधों को लेकर भी अहसज रहा है.
हाल ही में इस्लामाबाद में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत की बेटी अपहरण और प्रताड़ना के बाद से ही अफ़ग़ानिस्तान के सोशल मीडिया में पाकिस्तान को लेकर काफ़ी ग़ुस्सा देखा गया है
कॉपी- पवन सिंह अतुल
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