अहमद शाह मसूद जिन्हें रूस-तालिबान कभी हरा नहीं पाए

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लोगों के ज़हन में वो दृश्य अभी भी ताज़ा है जब अप्रैल 1992 में रूसियों के अफ़ग़ानिस्तान से जाने के तीन साल बाद, अहमद शाह मसूद बागरान हवाई अड्डे पर सोवियत संघ में बनी एक जीप पर सवार हुए थे और टैंकों के एक कॉलम का नेतृत्व करते हुए काबुल जाने वाली सड़क पर बढ़ निकले थे.
तीन घंटे बाद वो काबुल में दाख़िल हुए थे. बीच में कुछ मिनटों के लिए वो खाली सड़क पर नमाज़ पढ़ने के लिए रुके ज़रूर थे. दिलचस्प बात ये है कि मसूद के काबुल में दाख़िल होते समय एक भी गोली नहीं चली थी.
हालांकि, कुछ दिनों पहले तक उनके नॉर्दर्न अलायंस और गुलबुद्दीन हिकमतयार और कम्यूनिस्ट सरकार के सैनिकों के बीच घमासान जंग हो रही थी.

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योद्धा होने के साथ-साथ अदब के भी शौकीन
विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) और अफ़ग़ानिस्तान में भारत के राजदूत रहे विवेक काटजू को अहमद शाह मसूद से कई बार मिलने का मौका मिला था.

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काटजू याद करते हैं, "उनमें एक तेज़ था और ये साफ़ ज़ाहिर था कि वो जनता के नेता थे. बहुत ज़हीन थे. बहुत कम लोगों को पता था कि वो बहुत पढ़े लिखे थे. उनको अदब का शौक़ था. वो कुशल प्रशासक थे और बहुत महान योद्धा थे. छापामार युद्ध में उनका कोई सानी नहीं था. उनमें साहस बहुत था."
"लोगों ने बताया मुझे कि जब तालिबान ने 1997 में उत्तर अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सेनाओं को भेजकर फ़तह पाई और मज़ारेशरीफ़ को अपने कब्ज़े में ले लिया. एक समय ये भी आया कि उनके साथियों को भी लगने लगा कि शायद पंजशेर को भी संभालना मुश्किल होगा."
"उनके सारे साथी अपने इलाक़ों को छोड़कर जा रहे थे. उन्होंने मसूद को भी यही सलाह दी कि आप भी हमारे साथ चलें. उन्होंने उनकी बात मानने से इंकार कर दिया और कहा कि चाहे मेरे साथ दो योद्धा भी बचें, मैं अपनी सरज़मीं को छोड़कर हरगिज़ नहीं जाउंगा."
पंजशेर की वादी में अजेय
जब मसूद शुरू में रूसी आक्रमण का सामना करने के लिए पाकिस्तान से अफ़ग़ानिस्तान में घुसे थे, तो उनके पास मात्र 27 साथी, 2 कैलिशनिकोव, 7 रॉकेटों के साथ 2 आर पीजी, पाँच बंदूकें और 9 ब्रिटिश ज़माने की 0.303 (इंच की गोलियां) थीं.

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पेशावर में रह रहे जाने माने पत्रकार रहीमउल्ला यूसुफ़ज़ई बताते हैं, "जो उनका इलाक़ा था वादिए- पंजशेर, जो काबुल के उत्तर में है, उसकी बड़ी ही दिफ़ाई अहमियत थी. इसके पास ही एक दालांग टनल थी जिसे रूसियों ने बनाया था. ये उत्तरी अफ़गानिस्तान को दक्षिणी अफ़गानिस्तान से मिलाती थी. इसके बारे में कहा जाता है कि ये दुनिया का आठवाँ आश्चर्य है."
"यहाँ काफ़ी बर्फ़ भी गिरती है. यहाँ पर अहमद शाह मसूद ने कई बार रूसियों और अफ़गान फ़ौज का रास्ता रोका था और उनकी सप्लाई लाइन काट दी थी. ये कहा गया कि पंजशेर की वादी कभी फ़तह नहीं हो सकी. बाद में तालिबान ने भी उसे फ़तह करने की कोशिश की लेकिन वो भी कामयाब नहीं हुए."
नौ बार रूसियों को पंजशेर से भगाया
मसूद के विरोधी भी मानते थे कि वो छापामार युद्ध के महारथी थे. रूसियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में अहमद शाह मसूद बेहद साधारण लेकिन असरदार रणनीति अपनाते थे.
'ऑन द ट्रेल ऑफ़ लायन अहमद शाह मसूद' के लेखक ए आर रोवान अपनी किताब में लिखते हैं, "रूसियों के गढ़ पर रॉकेट और मोर्टार गोलों को दागने से पहले वो उसके प्रवेश और बाहर निकलने के रास्ते पर अनगिनत बारूदी सुरंगें बिछा देते थे, जिसके बारे में सिर्फ़ मुजाहिदीन को ही पता होता था. कुछ देर तक गोलाबारी करने के बाद वो उस पर बिछाई गई बारूदी सुरंगों से बचते हुए हमला करते थे."
"जब रूसी सैनिक हमले का सामना करने के लिए बाहर से कुमुक मंगवाते थे तो वो सब बारूदी सुरंगों का शिकार हो जाते थे. कुछ ही महीनों की लड़ाई के बाद अधिकतर रूसी सैनिकों ने पंजशीर की वादी छोड़ दी थी. बाद में उन्होंने नौ बार इस घाटी पर हमला किया और हर बार मसूद ने उन्हें वापस जाने के लिए मजबूर किया."

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तालिबान भी पाकिस्तान के ज़बरदस्त समर्थन और संख्या में उनसे तीन गुना होने के बावजूद भी मसूद को पूरी तरह से कभी धूल नहीं चटा सका. 1999 में जब बागराम हवाई अड्डे के पास तालिबान ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर किया तो उनके साथ पाँच लाख नागरिक पूरी रात चलते रहे. ताकि वो पंजशीर घाटी में तालिबान के टैंकों के पहुंचने से पहले पहुंच जाएं.
मसूद ने घाटी के मुहाने पर स्थित दालांग टनल को डायनामाइट से उड़ाया और एक तरीके से अपने को अपने ही क्षेत्र में 'लॉक' कर दिया. फिर उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को अपने क्षेत्र की रक्षा के लिए अपना सब कुछ झोंक देने के लिए प्रेरित किया.
भारत के साथ संबंधों की पहल
जब अफ़गानिस्तान में मुजाहेदीन की सरकार बनी तो उसमें अहमद शाह मसूद रक्षा मंत्री बनाए गए. चूँकि भारत से अफ़ग़ानिस्तान का पुराना रिश्ता रहा है, उन्होंने भारत से भी संपर्क स्थापित किया.

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काटजू बताते हैं, "काबुल की लड़ाई में बरबादी के बाद वहाँ लड़ रहे विभिन्न पक्षों ने महसूस किया कि भारत उप-महाद्वीप का एक महत्वपूर्ण देश है. अफ़गानिस्तान के साथ भारत के संबंध बहुत क़दीमी हैं."
"भारत एक सिद्धांत पर हमेशा कायम रहा कि अफ़ग़ानिस्तान की जो वैध सरकार होगी, उसके साथ भारत अपने संबंध बनाएगा. इन लोगों ने फिर भारत से संपर्क करने की पहल की और हमने उसका उचित जवाब दिया."

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गुलबुद्दीन हिकमतयार के साथ लड़ाई
अफ़ग़ानिस्तान में अहमद शाह मसूद और गुलबुद्दीन हिकमतयार के बीच शुरू से ही प्रतिद्वंदिता रही. हालांकि दोनों काबुल में एक ही बैच में साथ-साथ इंजीनयरिंग की पढ़ाई कर रहे थे.
रहीमउल्ला यूसुफ़ ज़ई बताते हैं, "ये जो इनकी आपस में ख़लिश है. इसे आप दुश्मनी समझ लें या ख़ूनी लड़ाई समझ ले, इसकी शुरुआत सत्तर के दशक में पेशावर में हुई थी. बाद में भी पूरे अफ़गान जेहाद के दौरान ये आपस में जंग करते रहे."
"अक्सर कहा जाता था कि हिकमतयार ने मसूद के जितने बंदे मारे हैं, उतने रूसी सेना के भी नहीं. हिकमतयार सुलह करके इतने अर्से के बाद काबुल गए हैं लेकिन अहमद शाह मसूद के पुराने साथी उससे ख़ुश नहीं हैं. उनकी पुरानी दुश्मनी अभी तक चल रही है विभिन्न स्वरूपों में."

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ओसामा बिन लादेन के साथ मतभेद
ओसामा बिन लादेन भी शुरू में रूसियों के ख़िलाफ़ उनके साथ लड़े लेकिन बाद में उनके उनसे गहरे मतभेद हो गए. ये मतभेद इस हद तक गए कि बाद में वो मसूद की हत्या का कारण बने.

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रहीमउल्ला यूसुफ़ ज़ई बताते हैं, "जब मुजाहेदीन आपस में लड़ते रहे तो ओसामा बिन लादेन ने पूरी कोशिश की कि इनकी सुलह हो जाए, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. इस लड़ाई में बाद में ओसामा बिन लादेन ने तालिबान का साथ दिया. चूंकि मसूद तालिबान के ख़िलाफ़ थे, इसलिए लादेन भी उनके ख़िलाफ़ हो गए."
दोस्त को बुलावा
9 सितंबर, 2001 को अहमद शाह मसूद अमू नदी के पास अपने ठिकाने खोजे बहाउद्दीन में थे. मसूद ख़लीली की अहमद शाह से बीस साल पुरानी दोस्ती रही है. इस समय वो स्पेन में अफ़गानिस्तान के राजदूत हैं. सितंबर, 2001 में उन्होंने ख़लीली से अनुरोध किया कि वो उनसे मिलने अफ़गानिस्तान आएं. ख़लीली उस समय भारत में रह रहे थे.
ख़लीली बताते हैं, "उन्होंने मुझे संदेशा भिजवाकर कहा कि मैं उनसे देश के उत्तर में आकर मिलूँ. मैं फ़ौरन वहाँ पहुंच गया. पहली चीज़ मैंने उनसे पूछी 'कोई ख़ास बात?' उन्होंने कहा, 'कुछ भी नहीं.' कुछ दिनों तक तुम्हें मेरे साथ रहना होगा, क्योंकि मैं भी एक इंसान हूँ. मैं चाहता हूँ कि मेरे दोस्त अहबाब मेरे इर्द गिर्द रहें."

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8 सितंबर की रात दोनों दोस्त रात साढ़े तीन बजे तक बातें करते रहे. राजनीति, सेना, अलक़ायदा, हार, जीत और न जाने कितने विषयों पर उनकी बातचीत हुई.
ख़लीली याद करते हैं, "उस सुबह हम दोनों बहुत ख़ुश थे. मेरा नया-नया पासपोर्ट आया था. चमड़े के कवर के साथ. कमांडर ने मुझसे कहा कि मैं इसे अपनी जेब में रखूँ, क्योंकि मुझे इसकी ज़रूरत पड़ेगी. मैंने कहा, 'नहीं-नहीं, नहीं... इसे बैग में ही रहने दीजिए. लेकिन उन्होंने उसे निकाल कर मेरे जैकेट की बांई जेब में रख दिया. उस दिन कमांडर बहुत अच्छे लग रहे थे.''
अरब 'चरमपंथी पत्रकारों' को इंटरव्यू
दो अरब पत्रकार पिछले दो हफ़्तों से अहमद शाह मसूद से मिलने की कोशिश कर रहे थे. हालांकि वो बहुत व्यस्त थे लेकिन फिर भी वो उनसे मिलने के लिए तैयार हो गए. इन लोगों की तलाशी नहीं ली गई, क्योंकि मसूद इसे अपने मेहमानों के लिए एक तरह का असम्मान समझते थे और दूसरे इन पत्रकारों की ज़ोरदार सिफ़ारिश की गई थी.
बाद में पता चला कि उनके बेल्जियम में बने पासपोर्ट नकली थे और वो जिस इस्लामिक ऑबज़र्वेशन सेंटर के सदस्य होने की बात कर रहे थे, उसका संबंध अलक़ायदा से था. कुछ लोगों को ये भी याद आया कि ये दोनों चरमपंथी अपने टेलिविज़न कैमरे की कुछ ज़रूरत से ज़्यादा हिफ़ाज़त कर रहे थे.
बाद में पता चला कि ये दोनों पत्रकार नहीं थे, बल्कि अलक़ायदा के लड़ाके थे जिन्हें ओसामा बिन लादेन ने अहमद शाह मसूद की हत्या करने के लिए भेजा था. ख़लीली को जो कि सवालों का अनुवाद करने के लिए मसूद के बग़ल में बैठे हुए थे, लग भी गया कि कुछ गड़बड़ ज़रूर है.

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ख़लीली बताते हैं, "जो लोग मसूद का इंटरव्यू लेने आए थे, उम्र में बहुत कम थे. उनके चेहरे पर मुस्कान थी और वो बहुत खुश दिखाई देते थे. बाद में मुझे ख़ुद इसका यकीन नहीं हुआ कि उन्हें पता था कि वो कुछ ही मिनटों में मरने वाले हैं. कैमरामैन लंबा था. घुंघराले बाल थे उसके."
"कमांडर ने कहा, पहले अपने सवाल बता दीजिए. वो अपने सवाल बताने लगा. कुल 14-15 सवाल थे. उसमें से करीब आठ सवाल ओसामा बिन लादेन पर थे. मैंने जब उनसे पूछा कि आप किस अख़बार का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो उसने झटके से जवाब दिया, 'मैं पत्रकार नहीं हूँ. हम इस्लामिक संगठन के सदस्य हैं जो पेरिस, लंदन और दुनिया में हर जगह फैला हुआ है.' मैंने कमांडर से अपनी ज़ुबान में कहा, ये लोग तो दूसरी तरफ़ के हैं.''
आत्मघाती जैकेट और कैमरा
मसूद ने ख़लीली की टिप्पणी पर कुछ ख़ास ध्यान नहीं दिया. ख़लीली बताते हैं, "उन्होंने कहा, इन्हें ख़त्म कर लेने दो. पहला सवाल उसने बहुत ख़राब अंग्रेज़ी में पूछा... क्या हालात हैं आजकल...? मैं कमांडर के कान में फुसफुसा कर उसका अनुवाद करना चाह रहा था, कि मुझे 'व्हूप' की सी आवाज़ सुनाई दी."
"फिर मैंने देखा कि एक मोटी और नीली आग मेरी तरफ़ बढ़ रही है. मैंने अपने सीने पर एक हाथ को महसूस किया. वो कमांडर का हाथ था. कमरा पूरी तरह से जल रहा था. उस लड़के के चीथड़े उड़ गए थे. दूसरा लड़का भाग निकला था. मुझसे उस समय एक गलती हुई. मैंने समझा कि कैमरे में बम था, जबकि ऐसा नहीं ता. लड़के के जिस्म के कई हिस्से हो गए थे. इसका मतलब ये हुआ कि उसके जिस्म में ही कुछ लगा हुआ था... शायद आत्मघाती जैकेट या कुछ और."

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हेलिकॉप्टर में ही मौत
उस विस्फोट में अहमद शाह मसूद बुरी तरह से घायल हुए. उनका एक और सहयोगी मारा गया. मसूद ख़लीली भी बुरी तरह से घायल हुए थे. लंबी बेहोशी में जाने से पहले उन्हें एक चीज़ याद है कि जिस हेलिकॉप्टर में उन्हें इलाज के लिए तजाक़िस्तान ले जाया जा रहा था, उसमें उन्हें कुछ सेकेंड के लिए होश आया था.
ख़लीली बताते हैं, "मुझे याद है हेलिकॉप्टर में मैंने एक सैकेंड के लिए अपनी आँख खोली थी और मैंने कमांडर को अपने बग़ल में पड़े हुए देखा था. शायद आख़िरी बार मेरी नज़र उनके ऊपर गई थी और मैंने ख़ून से सना उनका चेहरा देखा था. मैंने अपने आप को उनके पास धकेलने की कोशिश की थी. लेकिन तभी मुझे अहसास हुआ कि कमांडर अपनी आख़िरी साँसें ले रहे हैं."

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फ़ारसी कविता
अहमद शाह मसूद ने उसी हेलिकॉप्टर में दम तोड़ दिया. मसूद ख़लीली का कई दिनों तक जर्मनी में इलाज चला. वो अहमद शाह मसूद की मौत से पहले का एक दिन आज तक नहीं भूल पाए हैं. जब वो और मसूद देर रात तक फ़ारसी कवि हाफ़ैज़ की कविताएं पढ़ रहे थे.
ख़लीली याद करते हैं, 'हमने पढ़ा
अपने दिल से दुश्मनी के अंकुरों को हटा दो
मोहब्बत के बीज बोओ और इसके पेड़ लगाओ
आज की रात तुम दोनों साथ हो
बहुत सी रातें जाएंगी
और बहुत से दिन भी गुज़रेंगें
तुम दोनों भी एक दूसरे को देख नहीं पाओगे
कभी भी नहीं.
उन्होंने मेरी आँखों में देख कर कहा था, इसके कितने गहरे माने हैं.

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मुझे याद है जब कई दिनों के बाद मेरी पत्नी मेरा पासपोर्ट लाकर बोली, ये क्या है? ये तुम्हारी जैकेट की जेब में पड़ा हुआ मिला था. उसके एक पन्ने पर आठ नुकीली कीलें धँसी हुई थीं.
मैंने कहा, "काश कमांडर ने वो पासपोर्ट मेरी जेब में न रख अपनी जेब में रखा होता. अफ़ग़ानिस्तान को मुझसे कहीं ज़्यादा उनकी ज़रूरत थी."
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