खांटी लखनवी थे अमृतलाल नागर!

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हिंदी साहित्य में यूँ तो आत्मकथाएं बहुत लिखी गई हैं, लेकिन बहुत कम लोगों ने अपना ख़ुद का सेल्फ़ पोर्ट्रेट कागज़ पर उतारने की कोशिश की है.
एक बानगी देखिए, "मेरे गालों की हड्डियां उभरी हैं जो विद्रोही व्यक्तित्व की सूचक हैं. नाक नुकीली है, देख कर कोई भी समझदार ये मान जाएगा कि नाक वाला है. होठ न पतले, न मोटे, मुंह छोटा, निचले होठ पर एक तिल भी है. अनुभवी लोगों से सुना है कि ऐसे तिल वालों को रसीले भोजन, पानों और रसीले होठों का सुख मिलता है. सब मिला कर चेहरा बुरा नहीं है."
"लोगों का ध्यान एक बार तो अपनी ओर खींच लेता है. कुछ औरतें भी इस पर रीझ चुकी हैं. तसल्ली है. सबसे बड़ी तसल्ली इस बात की है कि मेरे चेहरे पर इश्क फ़रमाते रहने का धंधा या लफ़ंगापन अपना साइनबोर्ड कभी नहीं टांग पाया. देखते ही किसी को विश्वास हो जाएगा कि आदमी भला और शरीफ़ है."
ये हैं अमृतलाल नागर, अपना ख़ुद का पोट्रेट खींचते हुए टुकड़े-टुकड़े दास्तान में. उनके मुंहबोले शिष्य मनोहर श्याम जोशी अपनी किताब लखनऊ मेरा लखनऊ में लिखते हैं कि नागरजी की जिस चीज़ से मैं चकित चमत्कृत रह जाता था, वो थी उनकी ज़िंदादिली.

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अमृतलाल नागर की बेटी और मशहूर फ़िल्म कथाकार अचला नागर कहती हैं, "वो बहुत ख़ूबसूरत थे. काफ़ी लोग उन्हें मुस्लिम समझते थे, क्योंकि उनकी ज़बान बहुत अच्छी थी. शुरुआती दिनों में वो अचकन भी पहन लेते थे कई बार लेकिन बाद में तो वो सफ़ेद कपड़ों पर आ गए थे. अपने बारे में उन्होंने एक शब्द चित्र लिखा है कि मैं बीच की माँग निकालता हूँ और मेरी आँखों की पुतलियों का रंग हल्का भूरा, सुनहरा है. मेरी मुस्कराहट ख़ुशनुमा है. जब उन्हें क्रोध आता था, तो किसी बाहर वाले पर नहीं आता था."
"किसी बात पर उनकी ट्रेजेक्ट्री अटक जाती थी या कोई ऐसी बात कर रहा होता था जो उन्हें बुरी लगती थी तो वो नाराज़ हो जाते थे. वो घड़ी के पाबंद थे. कोई देर कर रहा हो उस पर भी वो नाराज़ होते थे. वो खुद कहते थे कि मेरा क्रोध कोई भी विकराल रूप ले सकता है. लेकिन उनका क्रोध ऐसा होता था कि बादल आए, गरजे और बरस कर ख़त्म."
अमृतलाल नागर पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ा था मुंशी प्रेमचंद और शरद चंद चटोपाध्याय का. वो उनके दर्शन करने ख़ास तौर से कोलकाता जाते थे. अपनी आत्मकथा टुकड़े टुकड़े दास्तान में अमृतलाल नागर लिखते हैं, "शरद बाबू हिंदी मज़े की बोल लेते थे. उन्होंने मुझे एक सीख दी थी, जो लिखना अपने अनुभव से लिखना."

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नागर जी के निकट सहयोगी रहे और उनकी कहानियों पर शोध करने वाले प्रोफ़ेसर एस पी दीक्षित बताते हैं, "उन्होंने अपने लेखन के तीन सूत्र बनाए थे. एक तो ये कि जो सलाह उन्हें प्रेमचंद से मिली थी कि जो लिखो वास्तविक लिखो. दूसरी बात उन्होंने शरद चंद्र से सीखी थी कि पहले फ़ील करो, फिर लिखो और तीसरी बड़ी बात उनके बाबा रामजी ने कही थी कि अपनी कलम से किसी की निंदा कभी मत करना. इन तीनों चीज़ों का निर्वाह वो आजीवन अपने लेखन में करते रहे."
"हांलाकि सब जानते हैं कि वो फ़्रीलांसर थे और आज के इस युग में पूरे परिवार के साथ कलम के सहारे जीविका चला पाना बहुत कठिन होता है. कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं बाज़ार से. कुछ रोचक चटपटा मसाला देना पड़ता है, जो विचारधारा या स्तरीय लेखन से भिन्न होता है. लेकिन यहां भी नागर जी ने ख़ास तरह का संतुलन और संयम बनाए रखा."
1929 में अमृतलाल नागर का निरालाजी से पहली बार परिचय हुआ और तब से लेकर 1939 तक वह परिचय दिनोंदिन घनिष्टतम होता ही चला गया. नागर ने अपनी आत्मकथा में निराला से संबंधित एक दिलचस्प किस्सा लिखा है. निराला को पहलवानी का बड़ा शौक़ था. उन दिनों वो खूब कसरत करते थे और अपना बदन बनाते थे. एक दिन उन्हें एक स्थानीय पहलवान परागी ने एक मुकाबले में चार बार पटकनी दे दी.

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दूसरे ही दिन निरालाजी एक मटकी घी ले कर परागी पहलवान के घर पहुंच गए. बोले, "पहलवान ख़ूब लड़ते हो. ये लो, घी खाओ." एक बार उन्होंने परागी और उस इलाके के एक दूसरे पहलवान दुलारे का दंगल कराया. दुलारे का उस ज़माने में बड़ा दबदबा था.
लेकिन जब परागी ने दुलारे को पछाड़ दिया तो निरालाजी ऐसे प्रसन्न हुए, मानो उन्होंने ने ही कुश्ती जीती हो. परागी से बोले, "तुम्हें सोने का मैडल दूँगा." नागर जी लिखते हैं, "निरालाजी और सोने का मैडल! मिट्टी का भी दे देते तो सोने से बढ़ कर होता!"
लखनऊ के जनजीवन और बोली का जितना शानदार चित्रण अमृतलाल नागर की रचनाओं में मिलता है उतना शायद कहीं नहीं.
प्रोफ़ेसर एस पी दीक्षित कहते हैं, "उन्होंने लखनऊ के जनजीवन को ओढ़ा, बिछाया. इसको पूरी तरह से जिया. उसके पूरे इतिहास और पूरी सामाजिक संरचना को समझा और हर वर्ग से निकट संबंधित स्थापित कर तब उसे लेखन में परिणित किया. बूंद और समुद्र के बारे में लोग बोलते हैं कि उसमें चौक की गलियाँ बोलती हैं. घरों से वही आवाज़ आती है. वही संवाद.... उसी तरह के पात्र."

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"लेकिन एक विशेषता ये देखिए कि किसी भी पात्र को जैसा देखा जाता है, हूबहू चित्रित न करके, ताकि वो वैयक्तिक न हो, उन्होंने उसी से मिलते जुलते कई पात्रों का एक कॉकटेल बनाया और उसे मिला करके एक नए पात्र का गठन किया. लखनऊ की भाषा को उन्होंने पूरी तरह से अपनी घुट्टी में पी लिया था. वही बोली वाणी, वही लहजे, वही मुहावरे और वही शब्दावली. एक ख़ास तरह की भाषा उन्होंने बनाई थी जिसको मैं मज़ाक मज़ाक में नागरी भाषा कहा करता था. जैसे देवनागरी एक लिपि है, उसी प्रकार उन्होंने एक भाषा गढ़ी थी, जिसे उन्होंने गली मोहल्लों से इकट्ठा किया था. ऐसे बहुत सारे पात्र उन्होंने चुने थे... कोई तांगे वाला है, कोई चाट बनाने वाला है, कोई कादिर मियाँ हैं... कोई पतीला की मां है."
अमृतलाल नागर एक ऐसे लेखक थे जो किसी संकीर्ण मतवाद से प्रतिबद्ध नहीं थे. वो प्रगतिशील साहित्यकारों के बीच भी उतनी सहजता से बैठते थे, जितना उनके विरोधियों के बीच.
उनके मानवतावाद का उदाहरण देते हुए अचला नागर बताती हैं,"वो हमसे कहते थे हमारे यहाँ पूजा होती है, होती रहेगी. अच्छी बात है लेकिन कोई तुम्हारा धर्म पूछे तो हमेशा कहना मानवता. एक बार मेरे स्कूल के फ़ार्म में धर्म के कॉलम में उन्होंने लिखा था मानवता. वो हमेशा कहते थे कि किसी से मिलते समय हमेशा जय हिंद बोलो क्योंकि इससे धर्म बोध नहीं होता."
अचला आगे कहती हैं,"एक बार उन्होंने बहुत अच्छी बात उन्होंने मेरे भाई कुमुद को पत्र में लिखी कि बेटा तुम्हारी नानी तुम्हारा यज्ञोपवीत संस्कार कराना चाहती है. इसमें धागे का एक समूह होता है जिसे पहनाया जाता है मंत्रोच्चार के साथ. मैं एक बात और कहता हूँ. एक ऐसा भी जनेऊ हो सकता है जिसमें कुरान, बाइबिल और गीता के तीन धागों को गांठ बाँध कर गले में पहना दिया जाए. मेरी नज़र में वो भी बहुत सुंदर जनेऊ हो सकता है."

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अमृतलाल नागर 1940 में मुंबई गए थे जहाँ वो सात साल रहे. इस बीच उन्होंने 18 फ़िल्मों की पटकथाएं लिखीं. डबिंग का काम करने वाले वो पहले लेखक थे. वहाँ उन्हें कई बड़े बड़े लोगों के सानिध्य का मौका मिला. उन दिनों उनकी कवि नरेंद्र शर्मा से बहुत दोस्ती हुआ करती थी. जब नरेंद्र शर्मा का विवाह हुआ तो उन्हें मशहूर गायिका सुब्बालक्ष्मी की नई कार पर बैठा कर ले जाया गया.
अमृतलाल नागर लिखते हैं, "दूसरे दिन मेरे घर पर श्री व श्रीमति नरेंद्र शर्मा का विधिवत स्वागत किया गया. मशहूर अभिनेत्री नलिनी जयवंत और सुब्बालक्ष्मी ने मांगलिक गीत गाए. लेकिन सबसे अधिक प्रभावशाली पंत जी का काव्यपाठ रहा. मैंने पंत जी को ऐसे तन्मय होकर काव्य पाठ करते हुए न तो कभी पहले सुना और न कभी बाद में ही. उस दिन धोती कुर्ता पहने हुए पंतजी बड़े ही भव्य लग रहे थे."

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उन दिनों को याद करते हुए अचला नागर बताती हैं,"मुझे शिवाजी पार्क के उस कमरे की बड़ी याद है. इतने बड़े बड़े सितारे उस कमरे में बैठे हैं. भारत रत्न सुब्बालक्ष्मी, रबींद्र नाथ टैगोर के भतीजे अबनींद्रनाथ टैगोर जो शर्मीला टैगोर के दादा थे. बहुत बड़े चित्रकार थे वो. शर्मीला मुझसे ढाई साल छोटी होगी. तब हमारे घर के पास ही रहती थी. वो केन का कैप लगाती थीं और अबनींद्रनाथ टैगोर उसका हाथ पकड़ कर हमारे यहाँ आया करते थे."
"कवि प्रदीप, नरेंद्र शर्मा, अनिल विश्वास सभी हमारे यहां आते थे. दिलीप कुमार के पिता की बहुत बड़ी ड्राई फ़्रूट्स की दुकान हुआ करती थी. वो पहले भगवतीचरण वर्मा के संपर्क में आए और फिर उनके ज़रिए बाऊजी से मिले. जब मैंने बाद में दिलीप साहब को बताया कि मैं नागर जी की बेटी हूँ तो वो बहुत प्यारी स्माइल दे कर बोले, अरे भाई आप उनकी बिटिया हैं. हम तो उनके हुक्काबर्दार थे... नागर साहब के. जब दिलीप साहब हमारे यहाँ आते थे तो मेहमानों को कोल्ड ड्रिंक सर्व करने की ज़िम्मेदारी खुद उठा लिया करते थे."
मुंबई से वापस आ जाने के बाद भी अमृतलाल नागर का संबंध फ़िल्मों से छूटा नहीं. उनके लखनऊ वाले घर में पहले सत्यजीत रे की शतरंज के खिलाड़ी फ़िल्म की शूटिंग हुई और उसके बाद श्याम बेनेगल की जुनून की.

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अमृतलाल नागर की पौत्री दीक्षा नागर याद करती हैं, "जुनून की शूटिंग हमारे घर में 12-14 दिन चली थी. जिस हिस्से में हम रहते थे वहाँ फ़िल्म यूनिट का मेस बनाया गया था. बीच का दरवाज़ा खोलो तो मर्दानख़ाना आता था. वहां फ़िल्म के बहुत से दृश्यों की शूटिंग हुई थी. ये वो घर था जहाँ नफ़ीसा अली और जेनेफ़र कपूर ने पनाह ली थी. जिस दिन ये शूटिंग शुरू हुई मैं स्कूल में थी.”
“नागर जी के सहयोगी संचित बाबा मुझे स्कूल से लेने आए. मुझे याद है जब हम अपने घर पहुंचे तो वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मियों ने हमें अपने ही घर में घुसने नहीं दिया. वो कह रहे थे पास दिखाओ, तभी हम आपको अंदर घुसने देंगे. किसी तरह जब हम अंदर पहुंचे तो हमने नज़ारा ही दूसरा देखा. वहीँ इतनी भीड़ मौजूद थी कि हमारी दादी कह रही थीं कि कहीं भीड़ के बोझ से हमारे घर की छत ही न टूट जाए.”

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अमृतलाल नागर की रचनाओं की ख़ास बात होती थी उसकी विषय वस्तु पर किया गया शोध. एक तरह से वो उपन्यासों के माध्यम से हमारे कई सौ सालों का सामाजिक इतिहास लिख रहे थे. प्रोफ़ेसर एस पी दीक्षित बताते हैं, “मैंने ये पाया कि वो होमवर्क बहुत करते थे. किसी भी ऐतिहासिक कथा को लिखने से पूर्व वो पचासों पुस्तकें पढ़ते थे. उनसे नोट्स बनाते थे और इससे भी बड़ी बात जिस घटना को वो लिख रहे होते थे, वहीं जा कर वो बस जाते थे.”
“उदाहरण के लिए जब वो खंजन नैन लिख रहे थे तो ढ़ाई तीन महीने वो मथुरा में, वृंदावन में, पारसौली में किराए का मकान ले कर रहे. एक बार जब वो बृज से लौट कर आए तो मैंने उनसे पूछा बाबूजी इन दिनों क्या चल रहा है तो उन्होंने कहा डाक्टर अंधा उंगली नहीं पकड़ने दे रहा है. उनका कहने का तात्पर्य था कि जब तक पात्र भीतर स्पंदित न हो, खुद न बोले तब तक वो चरित्र जीवित नहीं होता है.”
वो अपनी कृति बोल कर लिखवाते थे. गाव तकिया दीवार से टिकाते और पीठ गाव तकिए से. फिर धारा प्रवाह बोलते जाते समाँ बांधने वाले किसी किस्सागो के अंदाज़ में.

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करीब 38 साल पहले बीबीसी के आले हसन से बात करते हुए उन्होंने अपने लेखन का फ़लसफ़ा बयान करते हुए कहा था, “मैं तो भाई जनता जो यहाँ बोलती है, उस बोली का लेखक हूँ. न मैं हिंदी जानता हूँ और न उर्दू. मैं पढ़ते पढ़ते थोड़ी भाषा ज़रूर सीख गया हूँ. यही कह सकता हूँ कि अपने बारे में जानने का मेरा प्रोसेस अभी जारी है. इस दुनिया के अनुभवों के सागर से मैंने बहुत पानी पिया है, लेकिन अभी भी प्यासा हूँ.”
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