फ़ॉर्मूला प्रोडक्ट को लेकर नेस्ले ने क्यों मांगी माफ़ी? शिशुओं के लिए कौन सा दूध बेहतर है?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, शुभ राणा
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
हाल ही में नेस्ले ने दुनिया भर में अपने कुछ बेबी फ़ॉर्मूला (शिशु दूध) उत्पादों को वापस ले लिया है. इनमें एक संभावित टॉक्सिन के होने की आशंका बताई गई, जो फ़ूड पॉइजनिंग का कारण बन सकती है.
नेस्ले कंपनी ने कहा कि उसके एसएमए ब्रांड के कुछ ख़ास बैच के इन्फ़ेंट फ़ॉर्मूला (शिशुओं के लिए) और फॉलो-ऑन फ़ॉर्मूला बच्चों को खिलाना सुरक्षित नहीं है. ये बैच दुनिया भर में बेचे गए थे.
इनमें सेरुलिड नाम का टॉक्सिन हो सकता है, जिससे उल्टी या जी मिचलाने जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. ये प्रोडक्ट फ़्रांस, जर्मनी, इटली, ऑस्ट्रेलिया, साउथ अफ़्रीका समेत कई देशों में सावधानी बरतते हुए वापस ले लिया गया है.
नेस्ले के सीईओ फ़िलिप नाव्राटिल ने एक वीडियो जारी कर माफ़ी मांगी और कहा, "पिछले हफ़्ते, हमने कुछ इन्फ़ेंट फ़ॉर्मूला के बैच वापस मंगाने की घोषणा की. यह हमने सावधानी के तौर पर किया, क्योंकि हमें कुछ उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली एक सामग्री की क्वालिटी में समस्या मिली."
बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
नेस्ले इंडिया ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा, "जिन प्रोडक्ट्स को वापस लिया गया है वे भारत में न तो आयात किए जाते हैं और न ही बेचे जाते हैं. हमारे सभी उत्पाद एफ़एसएसएआई और दूसरे सभी नियमों व कानूनों के अनुरूप ही होते हैं."
हालांकि, मार्केटिंग रिसर्च कंपनी आईएमएआरसी ग्रुप के अनुसार, भारत में बेबी फ़ूड और इन्फ़ेंट फ़ॉर्मूला बाज़ार का आकार 2024 में 5.99 अरब अमेरिकी डॉलर था.
इसमें फ़ॉर्मूला मिल्क की सबसे बड़ी हिस्सेदारी 54% थी. इस बाज़ार का आकार 2033 तक 9.27 अरब अमेरिकी डॉलर होने की संभावना है.
हालांकि, इस घटना के बाद अब यह सवाल उठने लगे हैं कि फ़ॉर्मूला मिल्क कितना सुरक्षित है और शिशुओं के लिए सबसे बेहतर दूध कौन सा है? इन सवालों को लेकर बीबीसी हिन्दी ने हेल्थ एक्सपर्ट्स से बात की.
बच्चों को फ़ॉर्मूला मिल्क कब दिया जाता है?

इमेज स्रोत, Getty Images
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) 6 महीने तक के शिशु को सिर्फ़ और सिर्फ़ मां का दूध ही पिलाने की सिफ़ारिश करता है.
डब्ल्यूएचओ की पूर्व चीफ़ साइंटिस्ट और एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन की चेयरपर्सन, डॉक्टर सौम्या स्वामीनाथन कहती हैं, "नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में जिन बच्चों को ट्यूब से दूध देना पड़ता है, उन्हें डॉक्टर फ़ॉर्मूला मिल्क दे सकते हैं. लेकिन अब कई सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में ह्यूमन मिल्क बैंक शुरू हो गए हैं."
डॉक्टर स्वामीनाथन बताती हैं कि कई स्वस्थ मांएं अतिरिक्त दूध मिल्क बैंक में देती हैं, जिससे एनआईसीयू के बच्चों को फ़ॉर्मूला की जगह मां का दूध मिलता है. जिन अस्पतालों ने ऐसा मिल्क बैंक शुरू किया है, उनके अनुसार ब्रेस्ट मिल्क पीने वाले एनआईसीयू बच्चों का अस्पताल में रहना करीब एक हफ़्ते कम हो जाता है.
वहीं, कई बार ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं जब मां अपने बच्चों को स्तनपान नहीं करा पाती हैं.
इस बारे में नई दिल्ली के सीताराम भारतिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एंड रिसर्च के शिशु रोग विभाग के प्रमुख और डिप्टी मेडिकल डायरेक्टर डॉक्टर जितेंद्र नागपाल बताते हैं, "फ़ॉर्मूला मिल्क आमतौर पर तीन स्थितियों में दिया जाता है. पहला, तब जब मां का दूध बच्चे की पूरी ज़रूरत के अनुसार पर्याप्त न हो. दूसरी स्थिति में जब माता-पिता दोनों कामकाजी हों, और उनके पास पर्याप्त समय न हो तो वे अपनी सुविधा के अनुसार फ़ॉर्मूला मिल्क देते हैं. तीसरी स्थिति में डॉक्टर खुद सलाह देते हैं, लेकिन ऐसा कम मामलों में होता है."
डॉक्टर नागपाल कहते हैं कि ब्रेस्ट मिल्क को 'लिक्विड गोल्ड' भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें कई ऐसे तत्व होते हैं जो हम चाहकर भी फ़ॉर्मूला मिल्क में नहीं डाल सकते जैसे डिफेंस सेल्स (रोग प्रतिरोधक कोशिकाएं) जो बच्चे के पोषण और विकास पर गहरा असर डालते हैं.
लेकिन वह दावा करते हैं कि गाय और भैंस के दूध की तुलना में फ़ॉर्मूला मिल्क थोड़ा बेहतर नज़र आता है.
दरअसल, फ़ॉर्मूला मिल्क में ऐसे कई माइक्रोन्यूट्रिएंट्स होते हैं जो बच्चों की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर डाले जाते हैं.
अंतर क्या हैं?

इमेज स्रोत, Dr Saumya Swaminathan
डॉक्टर स्वामीनाथन कहती हैं, "अगर स्तनपान की जगह बच्चों को बोतल के जरिए फ़ॉर्मूला मिल्क पिलाया जाए और बोतल की साफ़-सफ़ाई का ध्यान न रखा जाए तो इसमें कीटाणु लग सकते हैं. बच्चे को दस्त और अन्य बीमारियां हो सकती हैं, जो कुपोषण का कारण बनती हैं."
"वहीं कई बार पैसों की कमी की वजह से फ़ॉर्मूला मिल्क में बहुत ज्यादा पानी मिलाकर बच्चों को दिया जाता है जिससे बच्चे को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता."
दिल्ली स्थित पीडियाट्रिशियन और चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉक्टर दिनेश मित्तल के अनुसार, "अगर बच्चे को इन्फ़ेक्शन होता है, तो मां का शरीर अपने आप ऐसी एंटीबॉडी बनाता है, जो दूध के ज़रिए बच्चे तक पहुंचती है. जबकि फ़ॉर्मूला मिल्क पीने वाले बच्चों में कब्ज़ की समस्या ज्यादा देखी जाती हैं. ऐसे बच्चों का वजन भी जल्दी बढ़ता है, जिससे आगे चलकर मोटापे का खतरा बढ़ सकता है."
यूनिसेफ़ के अनुसार, जिस शिशु को पहले 6 महीने तक सिर्फ़ और सिर्फ़ मां का दूध (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफ़ीडिंग) नहीं पिलाया जाता, उन्हें दस्त या निमोनिया से मरने का ख़तरा काफ़ी ज्यादा होता है. इसके अलावा, स्तनपान शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) को मजबूत करता है और ज़िंदगी में मोटापा और डायबिटीज़ जैसी लंबी बीमारियों से बचाव कर सकता है.
फिर भी, दुनिया भर में 0 से 5 महीने के शिशुओं में से आधे से भी कम (केवल 47 प्रतिशत) को ही पहले 6 महीने तक सिर्फ़ मां का दूध पिलाया जा रहा है. (ये डेटा यूनिसेफ़ का ही है)
स्तनपान और फ़ॉर्मूला मिल्क देने वाली मांओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर को लेकर डॉक्टर स्वामीनाथन कहती हैं कि स्तनपान कराने वाली मांओं का बच्चे से ज़्यादा गहरा रिश्ता बनता है क्योंकि स्किन-टू-स्किन संपर्क होता है, बच्चे को ज्यादा संतुष्टि मिलती है.
बच्चे का चेहरा मां के चेहरे से सही दूरी पर होता है, जिससे बच्चा आसानी से मां को देख और पहचान सकता है.
लेकिन यह तभी संभव है जब मां को पूरा सहयोग मिले. बच्चे को ज़रूरत के हिसाब से दूध पिलाना पड़ता है, इसलिए मां को हमेशा उपलब्ध रहना पड़ता है.
'बच्चे का पहला टीका'

इमेज स्रोत, Getty Images
स्तनपान को एक सुखद अनुभव बनाने के लिए मां को पूरा आराम, संतुलित भोजन, घर के कामों में मदद, संगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए सैलरी के साथ छुट्टी या असंगठित क्षेत्र में सरकारी मातृत्व लाभ, और परिवार के लोगों की समझ व अपनापन ज़रूरी होता है.
फ़ॉर्मूला मिल्क चुनने वाली मांओं को दोष नहीं देना चाहिए या उन्हें गिल्ट फ़ील नहीं कराना चाहिए. अक्सर वे ऐसा इसलिए करती हैं क्योंकि उनके पास स्तनपान कराने के लिए पर्याप्त समय नहीं होता.
डॉक्टर मित्तल बताते हैं, "स्तनपान मां के लिए भी बहुत फायदेमंद है. इससे ब्रेस्ट कैंसर और ओवेरियन कैंसर का ख़तरा कम होता है. स्तनपान के दौरान ऑक्सीटोसिन हार्मोन निकलता है, जो भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाता है और पोस्टपार्टम डिप्रेशन (प्रसव बाद उदासी) का ख़तरा कम करता है. इससे मां का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है."
ब्रेस्ट मिल्क के फ़ायदे बच्चे और मां दोनों के लिए होते हैं
डॉक्टर स्वामीनाथन कहती हैं कि मां का दूध बच्चे की ज़रूरत के हिसाब से बदलता रहता है. मां का शरीर बच्चे की पोषण की ज़रूरत को समझकर दूध की मात्रा और गुणवत्ता को एडजस्ट करता रहता है.
पहला दूध जो बच्चे के जन्म के तुरंत बाद आता है, उसे कोलोस्ट्रम कहते हैं. यह बहुत पौष्टिक और इम्युनिटी बढ़ाने वाले तत्वों से भरा होता है, इसलिए इसे बच्चे का 'पहला टीका' भी कहा जाता है. यह पचने में भी आसान होता है.
रिसर्च में पता चला है कि इसमें लंबे समय तक सेहत के लिए फ़ायदेमंद नए बायोएक्टिव कंपाउंड्स भी होते हैं.
फ़ॉर्मूला मिल्क में ये बायोएक्टिव और इम्यून तत्व नहीं होते. इसलिए फ़ॉर्मूला मिल्क पीने वाले बच्चों में बीमारियां ज़्यादा होती हैं.
बच्चे और मां दोनों के लिए फ़ायदेमंद

डॉक्टर नागपाल बताते हैं कि जो मांएं अपने बच्चों को ब्रेस्टफ़ीडिंग कराती हैं, उन्हें वजन कम करने में मदद मिलती है, साथ ही प्रेग्नेंसी के बाद रिकवरी भी तेज़ होती और गर्भाशय सामान्य स्थिति में जल्दी लौटता है.
ब्रेस्ट मिल्क पीने वाले बच्चे बुद्धिमत्ता यानी इंटेलिजेंस के मामले में बेहतर प्रदर्शन करते हैं. उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी भी बहुत अच्छी होती है."
डॉक्टर सवामीनाथन कहती हैं, "माता-पिता के लिए गर्भावस्था पता चलते ही स्तनपान की काउंसलिंग शुरू हो जानी चाहिए. पूरे परिवार को इसमें शामिल करना चाहिए, खासकर मां को सहयोग देने पर ज़ोर होना चाहिए."
"मां को सही पोजीशन और दूध पीने का तरीका समझाना चाहिए ताकि निप्पल में दरार या दर्द न हो. काउंसलिंग और सहयोग बच्चे के पूरक आहार शुरू होने के बाद भी जारी रहना चाहिए, ताकि समस्याओं का समाधान हो सके."
डॉक्टर नागपाल सुझाते हैं कि ब्रेस्टफीडिंग शुरू में मुश्किल लग सकती है, तो ऐसे में हार न मानें. अपनी दिनचर्या बच्चे के सोने-उठने के हिसाब से बनाएं.
मन में ठान ले कि फ़ॉर्मूला मिल्क कोई विकल्प नहीं है. जब तक डॉक्टर स्पष्ट सलाह न दें, ब्रेस्ट मिल्क ही चुनें.
घड़ी देखकर नहीं, बच्चे की भूख के अनुसार दूध पिलाएं इससे आपको चिंता कम होगी और बच्चे को बेहतर पोषण मिलेगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












