मोजतबा ख़ामेनेई के सामने क्या है चुनौतियां, कैसे करेंगे वो अमेरिका और इसराइल के हमले का सामना?

56 साल के मोजतबा ख़ामेनेई उनके पिता के बाद सुप्रीम लीडर बने है

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    • Author, लीस डुसेट
    • पदनाम, प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

एक ऐसा नेता ईरान की सत्ता का ताज पहनने जा रहा है, जिसका कभी पूरी तरह से परीक्षा से गुज़रना नहीं हुआ है. यह ऐसे समय होने जा रहा है, जब ईरान की धर्मतांत्रिक सरकार पिछले पाँच दशकों में अपनी सबसे बड़ी परीक्षा का सामना कर रही है.

इसराइल-अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के शुरुआती दौर में ही पिता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या की वजह से मोजतबा ख़ामेनेई को मानो सत्ता के शीर्ष तक खींच लिया गया है.

लेकिन 1979 की क्रांति के बाद ईरान के तीसरे सुप्रीम लीडर बनने जा रहे मोजतबा ख़ामेनेई के सामने जंग अस्तित्व की है.

88 शिया मुस्लिम धर्मगुरुओं और विशेषज्ञों की सभा द्वारा उनके चयन का एलान होते ही इस्लामी क्रांति के अनुयायियों की बड़ी भीड़ सड़कों पर उतर आई थी. ये भीड़ 'अल्लाहु अकबर' के नारे लगा रही थी.

ईरान के सभी सुरक्षा बलों ने अपने नए कमांडर-इन-चीफ की 'खून के आखिरी क़तरे तक' सेवा करने की शपथ ली.

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ईरान के सरकारी टीवी ने उनके नाम से दागी गई पहली मिसाइलों की तस्वीरें दिखाईं, जिन पर एक संदेश लिखा था - 'आपकी सेवा में, सैय्यद मोज़तबा'.

लेकिन इसके बावजूद कुछ लोगों ने अपने घरों के भीतर से मोजतबा मुर्दाबाद के नारे भी लगाए. ये वही लोग हैं जिन्होंने जनवरी में सड़कों पर उतरकर मोजतबा के पिता को 'तानाशाह' बताते हुए प्रदर्शन किए थे.

ज्यादा कठोर और कट्टरपंथी शासन?

मध्य तेहरान में एक समर्थक हाथों में मोजतबा ख़ामेनेई का पोस्टर लिए हुए

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ईरान में हुए उन प्रदर्शनों पर की गई कार्रवाई में हज़ारों लोग मारे गए थे. लेकिन ऐसा लगता है कि अब मौजूदा ईरानी शासन पहले से भी कठोर होता जाएगा.

शायद वे लोग फिर भी ऐसा सोचने की हिम्मत कर सकते हैं कि ख़ामेनेई और उनकी सत्ता के दिन गिने-चुने ही बचे हैं.

आयतुल्लाह ख़ामेनेई के दूसरे और सबसे चहेते पुत्र मोजतबा अपने पिता के अति रूढ़िवादी साँचे में ढले हुए हैं. मोजतबा ख़ामेनेई ने दशकों तक अपने पिता के साये में काम किया है.

मोजतबा इस बात से वाकिफ़ हैं कि 'डीप स्टेट' कैसे काम करता है. उन्हें ये भी पता है कि बाहरी ख़तरों या आंतरिक उथल-पुथल का कैसे सामना किया जा सकता है.

मोजतबा ख़ामेनेई शक्तिशाली इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) से भी अच्छी तरह जुड़े हुए हैं. किशोरावस्था में हाईस्कूल से तुरंत निकलने के बाद वे उसमें शामिल हुए थे. इसके बाद वे क़ोम शहर में पढ़ाई करने गए थे, जो शिया इस्लामी अध्ययन का प्रमुख केंद्र माना जाता है.

1979 में अस्तित्व में आई आईआरजीसी की स्थापना इस्लामी क्रांति की रक्षा और उसे कायम रखने के उद्देश्य से की गई थी. आईआरजीसी अब एक बहुस्तरीय सुरक्षा प्रणाली और एक विशाल आर्थिक साम्राज्य पर अपना दबदबा बनाए हुए है. इसके कमांडर ही अब सारे फैसले लेते हैं.

कहा जाता था कि युवा मोजतबा ख़ामेनेई ही उसका नेतृत्व करेंगे.

युद्ध अब बदला लेने की लड़ाई

विशेषज्ञों की सभा ने मोजतबा ख़ामेनेई के चयन का एलान किया. ये उसी एलान की तस्वीर है जिसे ईरान के राष्ट्रपति के कार्यालय से जारी किया है.

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अब ये जंग सिर्फ़ सियासी लड़ाई नहीं बची है. ये अब एक निजी युद्ध बन चुका है. मोजतबा के लिए अब इसमें अपने परिवार की मौत का बदला लेना भी शामिल है.

28 फ़ररी की सुबह मोजतबा ख़ामेनेई ने इसराइली स्ट्राइक में सिर्फ अपने पिता को ही नहीं, बल्कि अपनी माँ मन्सौरेह ख़ोजास्तेह बगैरज़ादेह, पत्नी ज़हरा हद्दाद-अदेल और पुत्र को भी खो दिया.

उनके भी इस हमले में घायल होने की खबर थी, लेकिन तब से इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है और इसके कोई संकेत भी नहीं मिले हैं.

और यह युद्ध अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए भी पर्सनल हो चुका है. ट्रंप लगातार कहते रहते हैं कि जो लोग उनके सामने आपत्ति जताते हैं, वे उन्हें पसंद नहीं हैं.

ख़ामेनेई के उत्तराधिकारी को लेकर अटकलें तेज होने के बीच ट्रंप ने एक से अधिक बार यह बयान दिया था कि उन्हें अली ख़ामेनेई का कट्टरपंथी बेटा 'अस्वीकार्य' है.

अब ट्रंप यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि मोजतबा ख़ामेनेई 'लंबा नहीं टिक पाएंगे'. मोजतबा इसराइल के निशाने पर भी हैं, क्योंकि रक्षामंत्री इज़रायल काट्ज़ ने उन्हें 'स्पष्ट निशाना' बताया है.

अधिकांश ईरानियों ने मोजतबा भी आवाज़ भी नहीं सुनी है

मोजतबा ख़ामेनेई

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अमेरिका और इसराइल के निशाने पर होने की वजह से मोजतबा ख़ामेनेई कुछ समय तक पर्दे के पीछे ही रह सकते हैं. इससे मोजतबा के बारे में रहस्य और गहराएगा.

उनके किसी भी सार्वजनिक भाषण का कोई रिकॉर्ड नहीं है. वे शायद ही सार्वजनिक तौर पर दिखाई दिए हैं और उन्होंने कभी कोई औपचारिक पद नहीं संभाला है. उनकी तस्वीर कभी भी उनके पिता की तस्वीरों के साथ नहीं छपी है.

ऐसा कहा जाता है कि आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने उन्हें उत्तराधिकार की दौड़ से बाहर कर दिया था. अली ख़ामेनेई नहीं चाहते थे कि सुप्रीम लीडर का पद राजशाही की नक्शे-कदम पर चले, जहां पिता के बाद पुत्र की गद्दी मिलती है.

अधिकांश ईरानियों ने तो मोजतबा की कभी आवाज़ भी नहीं सुनी है, लेकिन उनके विचारों के बारे में कुछ संकेत मिलते हैं.

पिछले कुछ दिनों में एक महत्त्वपूर्ण घटना का ज़िक्र हो रहा है.

इसमें साल 2005 में रूढ़िवादी माने जाने वाले राष्ट्रपति उम्मीदवार महमूद अहमदीनेजाद की चुनावी सफलता की बात हो रही है. उनके सुधारवादी प्रतिद्वंद्वियों ने यह आरोप लगाया था कि ख़ामेनेई ने पर्दे के पीछे रहकर उन्हें जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी.

साल 2009 में अहमदीनेजाद के विवादित पुनर्निर्वाचन ने अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शनों की लहर को जन्म दिया था, जिसे अब 'ग्रीन रिवोल्यूशन' के रूप में याद किया जाता है. उस दौरान प्रमुख सुधारवादी नेताओं को नज़रबंद कर दिया गया था और वे आज तक नज़रबंद हैं.

ईरान के नए सर्वोच्च नेता के अन्य दावेदारों में से एक उम्मीदवार की क्रांतिकारी साख अलग थी. पहले सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी के पोते हसन ख़ुमैनी सुधारवादियों की श्रेणी में आते थे.

ऐसे में ख़ामेनेई के सुप्रीम लीडर बनने से ईरान के अस्थिर राजनीतिक परिदृश्य में अपेक्षाकृत उदारवादी कहे जाने वाले वर्तमान राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन जैसे लोग अब और भी हाशिए पर धकेल दिए गए हैं.

मोजतबा ख़ामेनेई की छवि

राजनीतिक रूप से, ख़ामेनेई दो प्रमुख हस्तियों के क़रीबी हैं, जो ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स से जुड़े हुए हैं और उसमें प्रमुख भूमिका भी निभाते हैं.

इन दो लोगों में सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के वरिष्ठ नेता अली लारिजानी और पूर्व सैन्य अधिकारी मोहम्मद बाकर क़ालिबाफ भी शामिल हैं. मोहम्मद बाकर फिलहाल संसद के स्पीकर हैं.

दिवंगत आयतुल्लाह के मित्र और सहयोगी होने के नाते इन लोगों को पिछले कुछ महीनों में उच्च स्तरीय योजना में बड़ी ज़िम्मेदारियां संभालने के लिए चुना गया था. इसमें क़तर की मध्यस्थता में ट्रंप के दूतों के साथ बातचीत करना भी शामिल था. इसके अलावा इनके जिम्मे ईरान के दुश्मनों की सैन्य और ख़ुफ़िया शक्ति से निपटने की तैयारी करना भी शामिल था.

पिछले महीने ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौते को सुरक्षित करने के लिए हुई असफल वार्ता के दौरान लारिजानी से मिलने वाले एक पश्चिमी देश के अधिकारी ने उन्हें एक व्यावहारिक व्यक्ति के रूप में वर्णित किया था.

ईरान में इस समय कट्टरपंथी लोग प्रमुख भूमिका में आ रहे हैं.

ख़ामेनेई के नज़दीकी राजनेता अब्दुलरेज़ा दावारी ने कुछ सार्वजनिक बयानों में और 'न्यूयॉर्क टाइम्स' को दिए एक इंटरव्यू में उन्हें 'अति उदारवादी' और ऐसे व्यक्ति के तौर पर परिभाषित किया था, जो 'कट्टरपंथियों को साइडलाइन करने वाले' हैं.

उन्होंने मोजतबा को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का ईरानी वर्ज़न बताया था, जिन्होंने सऊदी अरब में अपने कठोर शासन को बनाए रखते हुए सामाजिक स्वतंत्रता को भी बढ़ावा दिया है.

लेकिन इस तरह के बड़े बदलाव के अभी कोई संकेत नहीं हैं, खासकर इन ख़तरनाक और अनिश्चितता भरे दिनों में तो बिल्कुल भी नहीं.

ईरान अब एक ऐसे युद्ध के शिकंजे में फंस गया है, जो पूरे मध्य पूर्व को हिलाकर रख रहा है, उसके पड़ोसियों के साथ संबंधों को भी खराब कर रहा है और दूर-दूर तक आर्थिक झटके भी दे रहा है.

मोजतबा ख़ामेनेई के उभार को ट्रंप ने सबसे ख़राब स्थिति बताया है. लेकिन अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ लड़ने वाली ताकतें इसे इस लड़ाई को जीतने का सबसे अच्छा मौका मानती हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित