मैतेई पांगल: मणिपुर में संघर्ष के बीच फंसा मुस्लिम समुदाय

इमेज स्रोत, Seraj Ali
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, मणिपुर
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
पिछले क़रीब तीन सालों से मणिपुर का ज़िक्र लगातार अशांति, जातीय तनाव और हिंसा के चक्र के साथ जुड़ा रहा है. इन सबके बीच हम मैतेई और कुकी समुदायों की चर्चा लगातार सुनते रहे हैं.
लेकिन इन्हीं चर्चाओं के बीच एक ऐसा समुदाय भी है जिसकी आवाज़ बहुत कम सुनाई देती है.
इस समुदाय का नाम है मैतेई पांगल- यानी मणिपुर के वे मुसलमान जो 17वीं सदी में यहाँ आए और फिर यहीं के हो कर रह गए.
साल 2023 में जब मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा शुरू हुई, उस वक़्त इस मैतेई पांगल समुदाय ने ख़ुद को इस संघर्ष के बीच खड़ा पाया.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
मई 2023 में शुरू हुई हिंसा में कम से कम 260 लोगों की मौत हुई और क़रीब 60 हज़ार लोग बेघर हुए हैं.
हिंसा की जड़ में मैतेई समुदाय की उस माँग को माना गया जिसमें वे आधिकारिक 'जनजातीय' दर्जा चाहते थे. ऐसा दर्जा जो उन्हें सरकारी लाभ और आरक्षण का अधिकार देता, जैसा कि कुकी जैसे अन्य जनजातीय समुदायों को मिलता है.
हिंसा की आग और एक समुदाय की दहशत

इमेज स्रोत, Seraj Ali
एक बड़ी मुसलमान आबादी वाला इलाक़ा, क्वाक्ता साल 2023 में शुरू हुई हिंसा के निशाने पर आ गया. यह इलाक़ा बिशेनपुर ज़िले में है.
क्वाक्ता मणिपुर की राजधानी इम्फ़ाल से क़रीब 50 किलोमीटर दूर है. यहाँ से कुकी बहुल चुराचांदपुर इलाक़ा महज़ 13 किलोमीटर दूर है.
साल 2023 में शुरू हुई हिंसा के निशान क्वाक्ता में आज भी मौजूद हैं.
वहाँ के रहने वाले मोहम्मद ज़िआउद्दीन के ज़हन में उसकी यादें अभी भी ताज़ा हैं.
उनके मुताबिक़, "पाँच अगस्त 2023 को बाहर से कुछ कुकी लोगों ने आकर क्वाक्ता के वार्ड नंबर-8 में तीन मैतेई लोगों को मारा था. उसके अगले दिन 6 अगस्त को मणिपुर की पब्लिक और सिविल सोसाइटी आर्गेनाईजेशन के लोगों ने हमारी मस्जिद में आकर यहीं से फ़ायरिंग शुरू की थी, कुकी इलाक़ों की तरफ़. और कुकी लोगों ने भी इस तरफ़ फायरिंग शुरू की थी."
क्वाक्ता की मस्जिद की दीवारों पर गोलियों के निशान और टिन की छत पर सुराख़ साफ दिखते हैं.

इमेज स्रोत, Seraj Ali
मोहम्मद ज़िआउद्दीन कहते हैं कि ये सुराख़ उन गोलियों से बने हैं, जो पहाड़ी इलाक़ों से कुकी समुदाय के लोगों ने चलाईं और इस मस्जिद से मैतेई समुदाय के लोगों ने.
उनका कहना है कि ये गोलीबारी लगातार पाँच-छह दिन चली.
कभी मिश्रित आबादी वाले मुहल्ले, जहाँ मुसलमान, कुकी और मैतेई साथ रहते थे, अब ज़्यादातर खाली पड़े हैं.
हिंसा के बाद कुकी और मैतेई दोनों समुदायों के परिवार सुरक्षित जगहों पर चले गए हैं.
आज यहाँ क्वाक्ता में सिर्फ़ मुसलमान परिवार ही बचे हैं.
'लड़ने वाले हमारे नहीं थे, लेकिन डर हमारा भी था'

इम्फ़ाल से क़रीब 15 किलोमीटर दूर लिलॉन्ग एक और मुसलमान बहुल क्षेत्र है. यह आज भी हिंसा के घावों को ढो रहा है.
मणिपुर की हिंसा ने मैतेई पांगल समुदाय को सीधे चोट तो नहीं पहुँचाई, लेकिन उनके दिल पर गहरे ज़ख्म छोड़ दिए.
डॉ. रज़िया नॉन्गजाइ लिलॉन्ग हाओरेबि कॉलेज में फ़िज़िक्स पढ़ाती हैं.
वह कहती हैं, "मैं बहुत भावुक हो गई थी. जो लड़ रहे थे, वे मेरे समुदाय के नहीं थे फिर भी मैं भावुक हो गई थी क्योंकि वे सब लोग मेरे दोस्त थे- कुकी भी और मैतेई भी. मैं सोच रही थी कि उन लोगों के साथ क्या हुआ होगा? हमारे समुदाय को ख़तरा तो नहीं था लेकिन फिर भी मैंने उस डर को महसूस किया."
सांस्कृतिक और भाषाई रूप से पांगल समुदाय मैतेई समुदाय से गहरा जुड़ाव रखता है. दूसरी ओर, उनके सामाजिक और आर्थिक रिश्ते कुकी समुदाय के साथ भी पुराने हैं.
यही दोहरी पहचान उन्हें दोनों पक्षों के बीच एक अनकहे मध्यस्थ की भूमिका में ले आती है.
डर के साए में पुल बनाने की कोशिश

इमेज स्रोत, Seraj Ali
इम्फ़ाल से चुराचांदपुर जाने वाले रास्ते पर आज भी हालात इतने तनावपूर्ण हैं कि मैतेई और कुकी एक-दूसरे के इलाक़ों में सुरक्षित रूप से सफ़र नहीं कर सकते.
इसी दरार को पाटने का काम मुसलमान ड्राइवर कर रहे हैं.
हिंसा शुरू होने के बाद से मोहम्मद अयाज़ ख़ान एक ड्राइवर के तौर पर कई लोगों को मैतेई बहुल इम्फाल घाटी के इलाक़ों से कुकी बहुल पहाड़ी इलाक़ों तक पहुँचाते रहे हैं.
वह कहते हैं, "हम लोगों को भी जाने में डर लगता है. किसी के मन में क्या है, वह तो हमें पता नहीं होता. इसीलिए हम लोगों को थोड़ा डर लगता है. मैतेई लोग क्या बोलेंगे और कुकी लोग क्या बोलेंगे- ये सोचकर हमें दोनों तरफ़ से थोड़ा डर लगता है. हम लोग थोड़ा परेशान हैं."
चुराचांदपुर जाने वाले पत्रकार और राहतकर्मी आमतौर पर तोर्बुंग से किसी मुसलमान ड्राइवर के साथ आगे जाते हैं. यह व्यवस्था आज भी वैसी ही है, जैसी 2023 के वक़्त थी.
मैतेई पांगल कौन हैं?

इतिहासकार प्रोफ़ेसर सैयद अहमद इम्फ़ाल में रहते हैं और मैतेई पांगल समुदाय के इतिहास पर काफ़ी शोध कर चुके हैं.
वे कहते हैं, "साल 1606 ये लोग (मुसलमान) पूर्वी बंगाल के सिलहट ज़िले के हबीगंज इलाक़े में 'तरफ़' नाम के साम्राज्य से मणिपुर आए थे. इस जगह से एक हज़ार मुसलमान कछार की सेना के साथ मणिपुर आए थे."
वे बताते हैं कि उस वक़्त मणिपुर में राजा खागेम्बा का शासन था और उनके भाई सानोंगबा उन्हें गद्दी से हटाने की कोशिश कर रहे थे. सानोंगबा ने कछारी राजा से मदद माँगी. कछारी राजा के कहने पर 'तरफ़' के शासक ने मुसलमान सैनिकों को मणिपुर भेजा.
प्रोफ़ेसर सैयद अहमद कहते हैं, "तो कछारी सिपाहियों के साथ मुसलमान सिपाही मणिपुर आए और यहाँ बिष्णुपुर में लड़ाई हुई. लड़ाई में कछारी सैनिक अपने मुसलमान साथियों को छोड़ कर भाग गए."
प्रोफ़ेसर सैयद अहमद के मुताबिक़, मुसलमान सैनिक डटे रहे और चूंकि उनके पास बंदूकें थीं इस वजह से राजा खागेम्बा के सैनिक उन्हें तुरंत नहीं हरा सके. आख़िरकार राजा खागेम्बा ने शांति-वार्ता का प्रस्ताव दिया. मुसलमान सैनिकों ने हथियार डाल दिए और उन्हें बंदी बना लिया गया.
लेकिन इसके बाद जो हुआ वो बहुत दिलचस्प था.
प्रोफ़ेसर सैयद अहमद के मुताबिक़, इन मुसलमान सैनिकों में कुछ किसान थे. कुछ कारीगर और कुछ के पास और भी तरह के हुनर थे. राजा खागेम्बा ने समझ लिया कि अपने राज्य में ऐसे लोगों को बसाने से उन्हें फ़ायदा होगा.
वे बताते हैं, "उन्होंने इन सैनिकों को ज़मीनें दीं और साथ ही ये इजाज़त भी कि वे मैतेई महिलाओं से शादी कर सकें."
प्रोफ़ेसर सैयद अहमद कहते हैं, "राजा खागेम्बा ने उन मुसलमानों के साथ युद्ध-बंदियों की तरह सुलूक नहीं किया. खागेम्बा ने देखा कि ये लोग बंगाल से आये हैं और इनके पास कई तरह के हुनर हैं. खागेम्बा ने सोचा कि ये लोग मणिपुर में बसेंगे तो मणिपुर का फ़ायदा होगा."
मणिपुर में मुसलमानों के बसने की कहानी की शुरुआत यही थी.

एक ऐसी कहानी जिसके क़िरदार पिछली चार सदियों में पीढ़ी दर पीढ़ी मणिपुर की कहानी का एक ज़रूरी हिस्सा बनते चले गए.
आज पांगल समुदाय भाषा, परिधान और परंपराओं में मैतेई संस्कृति से प्रभावित है.
लिलोंग हाओरेबी कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. ज़िनी रहमान बताती हैं, "यहाँ पर रहने में हमें कभी ऐसा नहीं लगा कि हम मुस्लिम हैं... अलग हैं. सब समुदायों के साथ सब लोग मिल-जुल कर रहते हैं. मुस्लिम समुदाय की संस्कृति पर मैतेई समुदाय का काफ़ी प्रभाव है. जैसे मेतेई समुदाय की पारंपरिक वेशभूषा है- फनेक. उसे हम भी पहनते हैं. लेकिन हम उसे इस्लामिक दायरे में रहकर पहनते हैं, जिसमें हमें पर्दा करना ज़रूरी होता है."
'दोनों से संबंध रखना अब शक़ पैदा करता है'

इमेज स्रोत, Seraj Ali
मणिपुर के अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष मोहम्मद अनवर हुसैन बताते हैं, "हम कुकी इलाक़ों में जा सकते हैं, लेकिन भरोसा नहीं होता. अगर मैतेई दोस्त को पता चल जाए कि हम वहाँ गए थे, तो शक़ करेगा कि हम किससे मिले. ऐसा लगता है जैसे आप एक पतली तार पर चल रहे हों — थोड़ा भी एक ओर झुकें, तो गिर जाएँगे. उस संतुलन को बनाए रखना बेहद मुश्किल है."
एक वक़्त था जब क्वाक्ता में रहने वाले मोहम्मद ज़िआउद्दीन के घर पर रमज़ान के दौरान इफ़्तार में मैतेई और कुकी दोनों ही समुदाय के लोग शामिल होते थे.
साल 2023 के बाद ये परंपरा टूट गई.
वे कहते हैं,"मेरे ख़याल से ये समुदाय अलग-अलग रहकर ख़ुश नहीं रहेंगे. सब समुदाय अगर एक साथ प्यार से रहेंगे तो ख़ुश रहेंगे. इसका ज़ायका हमें पहले मिल चुका है. अगर हम लोग एक साथ नहीं रहेंगे तो जीना बहुत मुश्क़िल होगा. इसीलिए हमारी कोशिश है कि हम एक साथ मिल कर रहें. एक मध्यस्थ के तौर पर हम कुकी और मैतेई दोनों समुदायों से अच्छे रिश्ते चाहते हैं.
मणिपुर की हिंसा ने मैतेई पांगल समुदाय के लोगों की ज़िंदगियों में जो दरारें डालीं, वह अब तक भर नहीं पाई हैं. हालाँकि, आने वाले वक़्त में हालात बेहतर होंगे, ये उम्मीद आज उनकी सबसे मज़बूत पनाह है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












