मोदी की अपील में क्या किसी गहरे आर्थिक संकट की आहट है?

नरेंद्र मोदी

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इमेज कैप्शन, पीएम मोदी ने कई ऐसे अपीलें की हैं, जिनमें बचत करने का आग्रह है
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लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 में भोजन संकट और युद्ध के समय लोगों से सोमवार शाम स्वेच्छा से उपवास रखने की अपील की थी.

समाजवादी नेता मधु लिमये ने संसद में इसका समर्थन करते हुए कहा था कि कठिन समय में 'स्वैच्छिक किफायत' नागरिक कर्तव्य है और राजनीतिक वर्ग को केवल अपील करने के बजाय ख़ुद मिसाल पेश करनी चाहिए.

भारत के लिए विदेशी मुद्रा भंडार को संतुलित रखने की चुनौती हर सरकार के लिए रही है.

1990 में गल्फ़ वॉर शुरू हुआ और इसका सीधा असर भारत पर पड़ा. वैश्विक स्तर पर तेल की क़ीमतें बढ़ गईं और इसकी चपेट में भारत भी आ गया.

1990-91 में पेट्रोलियम आयात बिल दो अरब डॉलर से बढ़कर 5.7 अरब डॉलर हो गया. ऐसा तेल की क़ीमतें बढ़ने और आयात के वॉल्यूम में वृद्धि के कारण हुआ.

जब पीवी नरसिम्हा राव 21 जून 1991 में प्रधानमंत्री बने तो ऐसा लग रहा था कि भारत विदेशी क़र्ज़ तय तारीख़ पर नहीं चुका पाएगा और डिफ़ॉल्टर घोषित हो जाएगा.

भारतीय अर्थव्यवस्था

लेकिन पीवी नरसिम्हा राव ने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के ज़रिए कई सुधारों को अंजाम दिया और भारतीय अर्थव्यवस्था में बुनियादी बदलाव की बदौलत चीज़ें नियंत्रित हो पाईं.

आज की तारीख़ में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 700 अरब डॉलर है. फिर भी पीएम मोदी ऐसी अपील क्यों कर रहे हैं?

क्या भारत पुरानी चुनौतियों से आज भी उबर नहीं पाया है?

दिल्ली स्थित ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के निदेशक अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि भारत के आयात-निर्यात का संतुलन अब भी पटरी पर नहीं आ पाया है.

अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ''अब हमारी ऊर्जा ज़रूरतें ज़्यादा बढ़ी हैं. इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने का आयात ज़्यादा बढ़ा है. ऐसे में 700 अरब डॉलर भी नाकाफ़ी साबित हो रहा है. पहले भी आयात निर्यात से ज़्यादा था और आज भी ऐसा ही है. इसीलिए समय-समय पर भारत के प्रधानमंत्री ऐसी अपील करते रहे हैं.''

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीयों से ईंधन बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम अपनाने और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने की अपील की है. दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश बढ़ती ऊर्जा क़ीमतों से पैदा हो रहे आर्थिक संकट को रोकने की कोशिश कर रहा है.

ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद यह पहली बार है, जब दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश के प्रधानमंत्री ने नागरिकों से ख़र्च में कटौती करने की अपील की है.

संकट कितना गहरा है?

भारतीय अर्थव्यवस्था

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इमेज कैप्शन, रुपया डॉलर की तुलना में 100 के क़रीब पहुँचने वाला है
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यह अपील ऐसे समय आई है, जब कुछ दिन पहले ही उनकी पार्टी ने असम और पश्चिम बंगाल में बड़ी जीत हासिल की है. अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत का रूस से ऊर्जा आयात लगातार कम हुआ है.

भारत ने तेल की कमी पूरी करने के लिए अन्य देशों की ओर रुख़ किया है. मार्च में अमेरिका की ओर से आंशिक रूप से प्रतिबंधों में ढील देने के बाद भारत ने रूस से तेल ख़रीदना शुरू किया था और घरेलू रिफाइनरियों को स्थानीय खपत के लिए रसोई गैस उत्पादन को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया.

गल्फ़ के देशों में तनाव शुरू होने के बाद से भारतीय मुद्रा 'रुपया' एशिया की सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रहा है. युद्ध शुरू होने के समय डॉलर के मुक़ाबले रुपया लगभग 91 था, जो अब गिरकर ऐतिहासिक स्तर 95 प्रति डॉलर से नीचे पहुँच गया है.

आर्थिक जगत के विश्लेषकों का मानना है कि मोदी जिन क्षेत्रों में किफ़ायत करने की अपील कर रहे हैं, उसका स्पष्ट संदेश है कि विदेशी मुद्रा भंडार यानी फॉरेक्स पर बने दबाव को कम करना है. यह भी कहा जा रहा है कि मोदी की अपील भारतीय अर्थव्यवस्था के बड़े संकट की ओर इशारा कर रही है.

अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ''फ़रवरी में तेल की क़ीमत 78 डॉलर प्रति बैरल था. ईरान पर हमले के बाद 126 डॉलर प्रति बैरल पहुँच गया. अभी क़रीब 105 और 110 डॉलर प्रति बैरल के क़रीब है. इसकी वजह भारत का आयात बिल काफ़ी बढ़ गया है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का तेल आयात बिल 176 अरब डॉलर हो गया जो कि और बढ़ेगा."

"खाड़ी के देशों में क़रीब 90 लाख भारतीय कामगार हैं और वे कमाकर जो भारत भेजते थे, उस पर असर पड़ा है. तीसरा हमारे फॉरन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर हैं, उन्होंने काफ़ी पैसा भारतीय बाज़ार से निकाला है. हमारा व्यापार घाटा बढ़ रहा है, चालू खाता घाटा बढ़ रहा है और इसी वजह से रुपया भी एक डॉलर की तुलना में 100 के क़रीब पहुँच गया है. इसका एक ही उपाय है कि भारत निर्यात बढ़ाए और आयात कम करे.''

अर्थशास्त्री भारत के भुगतान संतुलन पर पश्चिम एशिया में युद्ध के असर को लेकर चिंतित हैं. पीएम मोदी की अपील के बाद शेयर मार्केट में दो दिनों से गिरावट जारी है.

मोदी ने भारतीयों से एक साल तक ग़ैर-ज़रूरी सोने की ख़रीद रोकने और छुट्टियों के साथ शादियों के लिए विदेश यात्रा से बचने की भी अपील की.

विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता दबाव

राहुल गांधी

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इमेज कैप्शन, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का कहना है कि सरकार अपनी ज़िम्मेदारी लोगों पर थोप रही है

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था कितनी मज़बूत है, उसका एक मानक यह भी है कि उस देश के केंद्रीय बैंक के पास कितना विदेशी मुद्रा भंडार है. विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में दुनिया भर में अमेरिकी मुद्रा डॉलर, ईयू की मुद्रा यूरो और चीनी मुद्रा युआन शामिल हैं.

दरअसल, इन मुद्राओं में ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है. यानी भारत गल्फ़ से तेल ख़रीदता है तो उसका भुगतान अपनी मुद्रा रुपए में नहीं बल्कि डॉलर में करना होता है. कई देश यूरो और युआन भी स्वीकार करते हैं.

विदेशी मुद्रा भंडार आता कहाँ से है? भारत जब सामान ख़रीदता है तो डॉलर में भुगतान करता है और बेचता है तो डॉलर ही लेता है. यानी आप बेचते ज़्यादा हैं तो डॉलर ज़्यादा आएंगे और ख़रीदते ज़्यादा हैं तो डॉलर ज़्यादा ख़र्च करने होंगे. ऐसे में कोई देश निर्यात ज़्यादा करता है तो उसका विदेशी मुद्रा भंडार भरा रहेगा और आयात ज़्यादा करता है, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव ज़्यादा रहेगा.

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का व्यापार घाटा 333.2 अरब डॉलर का था. यानी भारत ने निर्यात की तुलना में आयात ज़्यादा किया. भारत अपनी ज़रूरत का 90 फ़ीसदी तेल आयात करता है, ऐसे में सबसे ज़्यादा डॉलर इसी पर ख़र्च होता है.

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, निर्यात और आयात के बीच का अंतर जनवरी महीने में बढ़कर 34.68 अरब डॉलर हो गया था जबकि एक महीने पहले यह 25.05 अरब डॉलर था.

जनवरी में आयात सालाना आधार पर 19.2 प्रतिशत बढ़कर 71.24 अरब डॉलर हो गया जबकि निर्यात केवल 0.6 प्रतिशत बढ़कर 36.56 अरब डॉलर रहा.

ब्रिटिश अख़बार फाइनैंशियल टाइम्स से मुंबई स्थित एचडीएफसी सिक्योरिटीज़ के प्राइम रिसर्च प्रमुख देवार्ष वकील ने कहा, "कच्चे तेल की बढ़ती क़ीमतें और वैश्विक अस्थिरता भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर गंभीर दबाव डाल रही हैं. सोने के आयात और विदेशी यात्राओं पर खर्च कम करने से भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बचा सकता है."

फाइनैंशियल टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''युद्ध शुरू होने के बाद से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 5 प्रतिशत घटकर 690 अरब डॉलर रह गया है, क्योंकि भारतीय रिज़र्व बैंक रुपये की गिरावट को नियंत्रित करने के लिए डॉलर बेच रहा है.

ईरान

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इमेज कैप्शन, ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हमले के बाद से होर्मुज स्ट्रेट से तेल आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है

तेल की आपूर्ति पर असर

एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की मुख्य अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा ने एफ़टी से कहा, "अब जबकि चुनाव ख़त्म हो चुके हैं, मोदी ईरान युद्ध से जुड़े आर्थिक मुद्दों पर अधिक यथार्थवादी तरीक़े से बात कर सकते हैं. इसका मतलब है कि नागरिकों को ईंधन क़ीमतों में बढ़ोतरी के लिए तैयार किया जा रहा है, जिसका बोझ अब तक सरकार और सरकारी तेल कंपनियां उठा रही थीं. अब तक इसका दर्द केवल तेल कंपनियां और सरकार झेल रही थीं. अब उपभोक्ताओं को भी इसमें शामिल होने का समय आ गया है. मेरा मानना है कि तीनों आर्थिक पक्षों को इसका बोझ उठाना होगा."

मध्य-पूर्व संघर्ष के कारण भारत रसोई गैस की कमी और तेल की बढ़ती क़ीमतों से जूझ रहा है. यह संकट ऐसे देश के लिए बड़ी चुनौती है, जिसने पिछले साल 174 अरब डॉलर का तेल और गैस आयात किया था. भारत के प्राकृतिक गैस आयात का दो-तिहाई और कच्चे तेल के आयात का आधा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है.

दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरब की अरामको ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद रहा तो पेट्रोल और विमान ईंधन का भंडार "ख़तरनाक रूप से निचले स्तर" तक पहुंच सकता है.

सऊदी अरामको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमीन नासिर ने सोमवार को कहा कि ज़मीन पर मौजूद ईंधन भंडार तेज़ी से घट रहे हैं. पेट्रोल और जेट ईंधन जैसे रिफाइंड फ्यूल में सबसे तेज़ गिरावट देखी जा रही है.

उन्होंने कहा कि ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट लगभग बंद होने के बाद से दुनिया अब तक कुल एक अरब बैरल तेल आपूर्ति खो चुकी है. इसके अलावा, होर्मुज जितने सप्ताह बंद रहेगा, हर सप्ताह लगभग 10 करोड़ बैरल अतिरिक्त आपूर्ति का नुक़सान होगा.

पिछले 10 हफ़्तों में तेल क़ीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है. अप्रैल के अंत में क़ीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं लेकिन बाद में घटकर लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गईं.

सोने से कैसा संकट?

सोना

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इमेज कैप्शन, सोना भारतीय रिज़र्व बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार का भी अहम हिस्सा है

भारत दुनिया में सोने के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है. भारतीय संस्कृति में सोने का विशेष महत्व है और इसे निवेश के एक सुरक्षित ज़रिए के रूप में भी देखा जाता है.

यह क़ीमती धातु भारतीय रिज़र्व बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार का भी अहम हिस्सा है और मार्च के अंत तक देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 17 प्रतिशत सोने के रूप में था.

विश्लेषकों का कहना है कि रुपये का भविष्य काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि मध्य-पूर्व का संघर्ष किस दिशा में जाता है.

प्रधानमंत्री ने जो अपील की है क्या उसे लोग मान लेंगे या सरकार कुछ और क़दम उठाएगी? अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ''देखिए प्रधानमंत्री ने वस्तुस्थिति बता दी है कि मुश्किल समय चल रहा है. ज़ाहिर है कि इसे लोग मान नहीं लेंगे. ऐसे में सरकार के पास कुछ और विकल्प हैं. जैसे सरकार कुछ हफ़्तों में तेल की क़ीमत बढ़ाएगी. सोने पर टैरिफ़ दो साल पहले 15 प्रतिशत हुआ करता, इसे बाद में छह प्रतिशत कर दिया गया था. अब इसे फिर से 10 या 15 प्रतिशत कर सकते हैं.''

अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ''पिछले वित्त वर्ष का भारत का मर्चेंडाइज आयात बिल 775 अरब डॉलर का था. इसमें सबसे अधिक 175 अरब डॉलर कच्चे तेल का बिल था. इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक्स का 116 अरब डॉलर का था. तीसरे नंबर पर 74 अरब डॉलर का गोल्ड था. इन तीनों के आयात का विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव सबसे ज़्यादा होता है. क्रूड गोल्ड में सरकार टैक्स बढ़ाकर खपत कम करना चाह रही है. इलेक्ट्रॉनिक्स में सरकार के पास अभी कुछ करने के लिए विकल्प नहीं है.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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