मणिपुर: मैतेई समुदाय को एसटी सूची में शामिल करने का मामला, हाई कोर्ट के आदेश से क्या बदलेगा

इमेज स्रोत, Dilip Kumar Sharma
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए
मणिपुर हाई कोर्ट का एक आदेश फिर से सुर्खियों में है. दरअसल मणिपुर हाई कोर्ट ने 27 मार्च, 2023 को अपने एक आदेश में राज्य सरकार से मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची में शामिल करने की बात पर शीघ्रता से विचार करने को कहा था.
लेकिन इस आदेश के कुछ दिन बाद ही राज्य में जातीय हिंसा भड़क गई. इसमें कई लोगों की जान भी गई.
हालांकि कुछ लोग कोर्ट के आदेश और मणिपुर में भड़की हिंसा को जोड़कर देखने को ठीक नहीं मानते.
लेकिन अब मणिपुर हाई कोर्ट ने पिछले आदेश से उस अंश को हटा दिया है जिसमें मैतेई समुदाय के लिए अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की सिफ़ारिश का ज़िक्र था.
न्यायमूर्ति गोलमेई गाइफ़ुलशिलु की एकल जज की पीठ ने 21 फरवरी को एक समीक्षा याचिका की सुनवाई के दौरान इस मामले में आदेश दिया.
कोर्ट ने कहा, "माननीय एकल न्यायाधीश के 27 मार्च 2023 के पैराग्राफ़ संख्या 17(iii) में दिए गए निर्देश की समीक्षा करने की आवश्यकता है, क्योंकि इसमें उल्लेख किया गया निर्देश माननीय सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ में की गई टिप्पणी के ख़िलाफ़ है. लिहाज़ा उक्त पैरा संख्या को हटाने के लिए आदेश दिया जाता है."
न्यायमूर्ति गाइफ़ुलशिलु ने कहा कि यह आदेश "क़ानून की ग़लत धारणा" के तहत पारित किया गया था क्योंकि "याचिकाकर्ता तथ्य और क़ानून के बारे में अपनी ग़लतफ़हमी के कारण रिट याचिका की सुनवाई के समय अदालत की उचित सहायता करने में विफल रहे."
मणिपुर में पिछले साल तीन मई से कुकी जनजाति और मैतेई समुदाय की बीच हिंसक संघर्ष जारी है. क़रीब 32 लाख जनसंख्या वाले इस छोटे से राज्य में मैतेई समुदाय एसटी का दर्जा मांग रहा है ताकि वो एसटी संरक्षित इलाक़ों में ज़मीन का अधिकार हासिल कर सके.
इस हिंसा की वजह से कुकी जनजाति और मैतेई समुदाय के बीच विश्वास खाई पैदा हो गई है.
हालांकि कोर्ट के इस ताजा आदेश के बाद प्रदेश में अब तक किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दिखी है.

इमेज स्रोत, Dilip Kumar Sharma
क्या कहती है एसटी डिमांड कमेटी?
एसटी डिमांड कमेटी ऑफ़ मणिपुर के कार्यकारी अध्यक्ष लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) लैशराम लोकेंद्र सिंह कहते हैं कि कोर्ट के फै़सले में किए गए बदलाव से राज्य में कोई असर नहीं पड़ेगा.
वो कहते हैं, "दरअसल मैतेई लोगों को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने के इस मामले में कोर्ट की कोई भूमिका नहीं है. राज्य सरकार को ही यह सिफ़ारिश केंद्र को भेजनी होगी."
"हम मैतेई समुदाय को एसटी सूची में शामिल करने के लिए पिछले 10 सालों से लोकतांत्रिक तरीक़े से आंदोलन कर रहे हैं. हम इस मामले में कोर्ट नहीं जाना चाहते थे. लेकिन मैतेई ट्राइब यूनियन नामक एक नए संगठन ने कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है और उन्हीं की याचिका पर सुनवाई हो रही है."
"लेकिन कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले का फिलहाल कोई प्रभाव नहीं है. हिंसा के बाद से क़ानून-व्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं है लिहाज़ा हम इस बात का ध्यान ज़रूर रख रहे हैं कि जो लोग क़ानूनी बातों को नहीं समझते वो कुछ हंगामा खड़ा न कर दें. हालांकि ज़्यादातर लोग इस बात को जानते हैं कि कोर्ट ने पिछले आदेश में से जिस अंश को हटाया है उससे हमारी मांग पर कोई असर नहीं पड़ेगा."
'नहीं बचेगी ज़मीन'
एसटी डिमांड कमेटी ऑफ़ मणिपुर का कहना है कि भारत सरकार के आदिवासी कल्याण मंत्रालय ने 29 मई 2013 को मणिपुर सरकार को एक पत्र भेजा था जिसमें सिफारिश मांगी गई थी.
लोकेंद्र सिंह कहते हैं, "मणिपुर में मैतेई समुदाय की आबादी 14 लाख है और अब वो बहुसंख्यक समुदाय नहीं है. 1951 की जनगणना में मैतेई लगभग 59 प्रतिशत थे और 2011 की जनगणना के अनुसार, मैतेई आबादी 44 फ़ीसदी है. हमारे पास रहने के लिए केवल 10 फ़ीसदी ज़मीन है, जबकि 90 फ़ीसदी ज़मीन आदिवासियों के पास है. वो अब हमारी ज़मीनें भी खरीद रहे हैं."
सिंह कहते हैं, "हमें अगर एसटी सूची में नहीं शामिल किया गया तो एक समय आएगा जब हमारे पास रहने के लिए ज़मीन नहीं बचेगी. लिहाज़ा राज्य सरकार मैतेई समुदाय को एसटी सूची में शामिल करने की सिफ़ारिश जल्दी ही केंद्र को भेजे."

वो कहते हैं कि हाई कोर्ट के पिछले आदेश का मणिपुर हिंसा से कोई लेना-देना नहीं है.
वो कहते हैं, "अगर मैतेई लोगों को एसटी दर्जा देने की सिफ़ारिश वाले निर्देश पर हिंसा भड़की होती तो नगा इलाक़ों में भी हिंसा होती. कुकी लोग मणिपुर के एक हिस्से को कुकी लैंड में बदलना चाहते हैं और इसी कारण उन लोगों ने तीन मई को रैली निकाली जिसमें हिंसा हुई. ये हिंसा आज तक जारी है."

इमेज स्रोत, Dilip Kumar Sharma
कोर्ट के फ़ैसले की सराहना
मणिपुर हाई कोर्ट के पिछले आदेश में से एक हिस्से को हटाने को कुकी जनजाति के संगठन अच्छा कदम बता रहे हैं.
मणिपुर में कुकी-ज़ो जनजाति के प्रमुख संगठन इंडिजेनस ट्राइबल लीडर्स फ़ोरम (आईटीएलएफ़) के प्रवक्ता गिन्ज़ा वुअलज़ोंग कहते हैं, "एसटी दर्जे के लिए मैतेई की मांग एक तरह से विरोधाभासी है. वो विकसित समुदाय है, लेकिन एसटी सूची में शामिल होकर पिछड़ा वर्ग बनने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि मैतेई भाषा भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल है. लिहाज़ा हाई कोर्ट ने जो फै़सला लिया है वह सही कदम है."
क्या कोर्ट के इस फै़सले से प्रदेश में किसी तरह का प्रभाव पड़ेगा?
इस सवाल पर गिन्ज़ा वुअलज़ोंग कहते हैं, "कोर्ट के इस फै़सले से राज्य में या फिर हमारी मांग पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. कुकी-ज़ो जनजाति के लोग अपने इलाक़ों में अलग प्रशासन चाहते हैं, फिर चाहे सरकार उनकी सिफ़ारिश से जुड़े फै़सले पर कुछ भी कदम उठाए."
"उससे हमारी राजनीतिक मांग पर कोई असर नहीं पडे़गा. मैतेई एसटी दर्जे की मांग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वो जनजातीय इलाक़े में ज़मीनें नहीं खरीद सकते. लेकिन भारत का संविधान जनजातीय लोगों की ज़मीन को सुरक्षा प्रदान करता है."

इमेज स्रोत, Dilip Kumar Sharma
बीजेपी ने क्या कहा?
बीजेपी ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी है.
मणिपुर प्रदेश बीजेपी के प्रवक्ता एलंगबाम एस जॉनसन ने बीबीसी से कहा, "मणिपुर हाई कोर्ट के आदेश से जिस अंश को पिछले आदेश से हटाया गया है उस पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही रोक लगा दी थी. क्योंकि जिस पैराग्राफ़ को हटाया गया है वो अदालत की कार्रवाई के नियमों के बाहर की बात थी."
"जो लोग मैतेई समुदाय के लिए एसटी दर्जे की मांग कर रहे हैं, उनकी मांग पर सरकार के संबंधित मंत्रालय ग़ौर करेंगे. लिहाज़ा कोर्ट के ताज़ा आदेश का असर नहीं पड़ेगा. यह महज़ पिछले फै़सले को सुधाराने की कोशिश थी."
इस मामले में केंद्र सरकार को सिफ़ारिश भेजने से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए बीजेपी प्रवक्ता जॉनसन ने कहा, "हमारी सरकार के पास मैतेई लोगों को एसटी सूची में डालने की कोई पॉवर नहीं है क्योंकि इस मामले में केंद्र सरकार को ही फै़सला करना है. किसी भी समुदाय को एसटी सूची में शामिल करने की एक प्रक्रिया होती है जिसके बाद केंद्र सरकार फै़सला करती है. कोर्ट का जो निर्देश है उस पर हमारी सरकार आगे बढ़ेगी. लेकिन ऐसा नहीं है कि हम सिफ़ारिश कर देंगे तो एसटी दर्जा मिल ही जाएगा."
मणिपुर में बीते क़रीब एक दशक से मैतेई लोगों को एसटी की सूची में शामिल करने की मांग लगातार हो रही है. लेकिन इस मांग को लेकर भी मैतेई समुदाय के लोग आपस में बंटे हुए हैं.
मैतेई ब्राह्मण और राजा के वंशज वाले लोग एसटी सूची में शामिल होने के पक्ष में नहीं है क्योंकि मैतेई समुदाय के एक वर्ग को अनुसूचित जाति का दर्जा मिला हुआ है.
ऐसे में अगर समूचे मैतेई समुदाय को एसटी सूची में डाल दिया जाता है तो इससे कई लोगों को जातिवादी टकराव पैदा होने का ख़तरा नज़र आता है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















