मणिपुर में हिंसा का दौर और गहरे होते घाव

- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मणिपुर
मणिपुर में हिंसा शुरू हुए क़रीब नौ महीने हो चले हैं, लेकिन राज्य से लगातार लोगों की मौत की ख़बरें आ रही हैं.
पिछले कुछ दिनों में गोलीबारी में सुरक्षाबलों और आम लोगों की जानें गई हैं. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ हिंसा में अब तक 200 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं. स्थिति का जायज़ा लेने पहुँची गृह मंत्रालय की टीम ने वहाँ नेताओं, अधिकारियों, संगठनों आदि से बात की है.
इसी हिंसा के माहौल में 14 जनवरी को कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू हुई थी.
यात्रा में शामिल कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "आठ महीने से प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं? वो एक घंटे के लिए भी इंफाल नहीं आए हैं."
शोक में डूबा एक गांव

हम राजधानी इंफाल से क़रीब 60 किलोमीटर दूर मैतेई-बहुल आकाशोई गाँव पहुँचे, जो शोक में डूबा है.
10 जनवरी को यहाँ सनसनी फैल गई थी, जब गाँव के चार लोग घर लौटकर नहीं आए. बाद में उनका शव पास के पहाड़ी इलाक़े में मिला.
ओएनाम रोमेन सिंह, अहंतेन दारा मैतेई, थाऊदाम इबोमचा मैतेई और उनके बेटे थाऊदाम आनंद सिंह लकड़ी बेचकर दिन का 100-200 रुपए कमाकर अपने परिवार का जीवन चलाते थे. पुलिस का शक़ सशस्त्र चरमपंथियों पर है.
हम जब उनके घर पहुँचे, तो मृतकों के घर के बाहर उनकी तस्वीरें रखी हुई थीं. दारा मैतेई की पत्नी रोते-रोते बेहोश सी हो गईं थीं. परिवारवालों ने उनके चेहरे पर पानी के छीटें मारे और फिर उन्हें घर के भीतर ले गए.
जबसे ओयनाम रोमेन सिंह की मौत की ख़बर आई थी, उनकी पत्नी प्रमोदिनी लेइमा ने खाना छोड़ दिया था. घर में सामान के बीच रखे बिस्तर पर वो आंख बंद कर लेटी हुई थीं और उन्हें ड्रिप लगा था. बच्चे सहमे हुए हैं.
ओयनाम बच्चों से वायदा करके गए थे कि परीक्षा में अच्छे प्रदर्शन पर कुछ अच्छा खिलाएँगे. नतीजे आ गए, लेकिन ओयनाम लौटकर नहीं आए.
सभी की आँखों में आँसू थे. माँ लेइंबी लेइमा बात करते-करते तेज़ रोने लगती थीं.
मृतकों में उनका दामाद थोऊदाम इबोमचा मैतेई और पोता थोऊदाम आनंद सिंह भी थे. तीन घर छोड़कर ही उनका मकान था.
वो कहती हैं, "हम रोएँ तो किसके लिए रोएँ. अपनी बहू के साथ रोएँ, क्योंकि मेरा बेटा चला गया, या फिर अपनी बेटी के लिए जिसका बेटा और पति चला गया. हम किसके लिए आँसू बहाएँ."
उन्होंने बताया, "ये हत्या दरिंदगी से की गई है. अगर वो आमने-सामने की लड़ाई में मारे जाते, तो हम कुछ नहीं कहते, लेकिन निहत्थे लकड़हारे पर जानलेवा हमला कर उसे मार देने से हम बहुत दुखी हैं और इसकी घोर निंदा करते हैं."
जीना तो चाहते हैं लेकिन कैसे और क्यों जिएँ. डर इतना बढ़ गया है कि हमें मौत कब आएगी उसका पता ही नहीं चल रहा है.
थोऊदाम इबोमचा मैतेई की पत्नी और मृत ओएनाम रोमेन सिंह की बहन थाऊदान सुमिला लेइमा कहती हैं, "जीना तो चाहते हैं लेकिन कैसे और क्यों जिएँ. डर इतना बढ़ गया है कि हमें मौत कब आएगी उसका पता ही नहीं चल रहा है."
बेहद ग़रीबी में रह रहे इन परिवारों का भविष्य अनिश्चित है. सुरक्षा की स्थिति ने चिंता और बढ़ा दी है. जगह-जगह पर हमें टेंटनुमा स्थान देखे, जहाँ हमें बताया गया कि यहाँ लोग रात में पहरा देते हैं.
ये हिंसा पिछले साल मई में शुरू हुई थी. राज्य के प्रभावशाली मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की माँग को इस हिंसा की मुख्य वजह माना जाता है.
इसका विरोध मणिपुर के पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाली जनजातियों के लोग कर रहे हैं, जिनमें मुख्यतः कुकी जनजाति के लोग हैं.
हिंसा से डर का माहौल

आकाशोई गाँव से कुछ किलोमीटर आगे हाऊतक टैंफ़ाखुनाऊ गाँव पड़ता है. ये इलाक़ा दूर पहाड़ों और पेड़ों से भरा पड़ा है.
गाँव में सन्नाटा पसरा था, सड़कें ख़ाली थीं. गाँव में हमें कुछ पुरुषों के साथ सुनील मैसनाम मिले. उन्होंने बताया कि खेती पर निर्भर क़रीब 400 लोगों के इस मैतेई गाँव में बमबारी और गोलीबारी के बाद में सिर्फ़ 100 लोग ही रह गए थे.
वो कहते हैं, "यहाँ की सभी महिलाओं और बच्चों ने गाँव छोड़ दिया है. यहाँ सिर्फ़ पुरुष रह रहे हैं. लोग सतर्क हैं कि कहीं से गोली आ सकती है. डर है कि अगर हम भी यहाँ से चले गए तो हमारे घरों को जला दिया जाएगा."
हम इतना कपड़ा, कंबल भी लेकर नहीं आए. हम जब रात को सोते हैं, तो कंबल का जो ऊपरी हिस्सा है, वहीं पर इतना पानी आता है कि ठंड में हमें सोना पड़ता है. बहुत मुश्किल है.
वापस आते हुए क़रीब दो किलोमीटर दूर हम एक बड़े घर में पहुँचे, जहाँ गाँव की 45-50 महिलाओं ने बच्चों के साथ शरण ले रखी थी.
एक तरफ़ रज़ाई और गद्दे का ढेर लगा था. कुछ छोटे बच्चे एक ख़ाली जगह पर खेल रहे थे. धूप निकली थी, लेकिन रात में यहाँ ठंड बढ़ जाती है.
यहीं रह रहीं रेविका ने बताया कि सभी लोग जल्दबाज़ी में घर छोड़कर भागे थे.
वो कहती हैं, "हम इतना कपड़ा, कंबल भी लेकर नहीं आए. हम जब रात को सोते हैं, तो कंबल का जो ऊपरी हिस्सा है, वहीं पर इतना पानी आता है कि ठंड में हमें सोना पड़ता है. बहुत मुश्किल है."
रिलीफ़ कैंप में बीतता जीवन

स्थानीय लोगों के मुताबिक़ अब भी हज़ारों लोग रिलीफ़ कैंपों में रहने को मजबूर हैं, हालाँकि उनकी सही संख्या स्पष्ट नहीं है.
इंफाल के एक रिलीफ़ कैंप के बड़े हॉल में दूसरे परिवारों के साथ रह रहीं 26 साल की मैबराम विक्टोरिया चानू ने हाल ही में कृषि में मास्टर्स पूरा किया है.
इस कैंप में 79 लोग रह रहे थे. कुकी-बहुल चुराचांदपुर के मैतेई परिवार में पैदा हुईं विक्टोरिया ने बताया कि वो कुकी, मिज़ो समुदाय के दोस्तों के साथ बड़ी हुईं, लेकिन हिंसा में उनका घर बर्बाद हो गया.
बाक़ी दूसरे परिवारों की तरह उनके घर का सामान भी वहीं रखा था.
वो कहती हैं, "ये बहुत अजीब सा है. हम इतने लंबे समय तक साथ रहे लेकिन घटना के बाद हमारे संबंध टूट गए. न उन्होंने संपर्क किया, न मैंने. हमारे बीच एक दूरी सी है और ये दूरी बढ़ती जा रही है. पता नहीं क्या होगा."
इन परिवारों ने नौ महीने पहले शायद ही सोचा हो कि उनका जीवन ऐसा हो जाएगा. हमारी बातचीत में कई लोगों ने राज्य और केंद्रीय सरकारों और अधिकारों के प्रति नाराज़गी जताई.
एक सवाल के जवाब में मणिपुर के सुरक्षा सलाहकार ने पत्रकारों से कहा, "मैं क्यों इस्तीफ़ा दूँ? अगर आप कहते हैं या मुझे लगता है कि मैंने अपना कर्तव्य नहीं निभाया है तो मैं उसी दिन इस्तीफ़ा दे दूँगा. पूरे 24 घंटे, सोने और खाना खाने के अलावा, मैं सुरक्षाबलों के बीच तालमेल, उनकी तैनाती और उनकी कार्रवाई के लिए काम कर रहा हूँ."
सरकार का दावा है कि उसने सुरक्षा को बेहतर करने के लिए कई क़दम उठाए हैं, लेकिन राज्य में हिंसा जारी है.
गृहमंत्री अमित शाह के भारत-म्यामार सीमा पर फ़ेंसिंग लगाए जाने पर भी बयान और प्रतिक्रियाएँ आई हैं.
रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट और स्तंभकार डॉक्टर आरके निमाई सिंह पूछते हैं, "क्या आपने भारत में नस्लीय हिंसा को एक हफ़्ते से ज़्यादा चलते देखा है? ये ज़्यादा से ज़्यादा तीन या चार दिन चलती है. ये सिर्फ़ मणिपुर में ही है कि ये आठ या नौ महीनों से जारी है. ये दिखाता है कि जितनी कोशिशें की जानी चाहिए थीं, वो नहीं की गईं."
इंफाल के आगे चुराचांदपुर की ज़िंदगी

इंफाल से हम कई सुरक्षा चेक प्वाइंट्स को पार करते हुए जब हम चुराचांदपुर पहुँचे, तो वहाँ एक बड़ी भारी भीड़ जमा थी. एक के बाद एक स्पीकर अपनी बात लोगों के सामने रख रहे थे. लोगों के हाथों में बैनर्स से साफ़ था कि वो राज्य के बीरेन सिंह सरकार से खासे नाराज़ थे और वो अलग प्रशासन की मांग कर रहे थे.
हमें बताया गया कि यहाँ ऐसे प्रदर्शन हर हफ़्ते हो रहे हैं, ये जताने के लिए कि महीनों बाद भी दर्द का सैलाब इस तरफ़ भी कम नहीं.
जैसे लिंगनेकी लुंगडिन. जब हिंसा शुरू हुई, वो अपने पति के साथ इंफाल में थीं. तीन दिन पहले ही उनकी बेटी पैदा हुई थी. उन्होंने बताया कि चार मई को उनके पति और भाई को एक भीड़ ने पीट-पीटकर मार दिया और वो बहुत मुश्किल से बच पाईं.
नज़दीक ही रहने वाले जांगलेट हाओकिप ने बताया कि 3 मई की रात उनके भतीजे नेहमिनलुन को एक भीड़ ने घेरकर मार दिया था.
नेहमिनलुन के चाचा जांगलेट हाओकिप ने बताया, "जब भी मैं उस घटना के बारे में सोचता हूँ, तो बहुत दुख होता है. जिस तरह की परेशानियाँ और ज़ख्म हमने देखे हैं, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है. भविष्य के बारे में सोचने भर से चिंता होती है."
आम लोगों की परेशानी का समाधान क्या है?

दर्द में जी रहे लोग ये पूछ रहे हैं कि अभी भी हालात क्यों नहीं सुधर रहे हैं. नतीजा ये है कि राजधानी इंफाल और कुकी-बहुल चुराचांदपुर के बीच संपर्क अभी भी थमा सा है.
इसका असर 47 साल की चिनखोनेंग बायते जैसे लोगों पर पड़ा है. रिलीफ़ कैंप में रह रहीं चिनखोनेंग को ब्रेस्ट कैंसर है.
इलाज के लिए घर की क़रीब-क़रीब हर संपत्ति बिक गई. इलाज के लिए पहले इंफाल जाने वाली चिनखोनेंग को अब सड़क से आइज़ोल के रास्ते गुवाहाटी जाना पड़ता है.
पहले जो सफ़र दो घंटे का था वो अब क़रीब दो दिन का हो गया है. वापस आकर वो इतना थक जाती हैं कि क़रीब हफ़्ते भर आराम करना पड़ता है.
वो कहती हैं, "मुझे भविष्य के बारे में पता नहीं. मुझे अपनी पुरानी ज़िंदगी याद आती है. हालांकि यहाँ के लोग बहुत दयालु हैं, मददगार हैं, लेकिन यहाँ बड़ी संख्या में रह रहे लोगों के लिए मात्र दो शौचालय हैं. ये बहुत चुनौतीपूर्ण है. ये एक सरकारी स्कूल है. हम यहाँ कितना लंबा रह सकते हैं? ये मेरी बीमारी के लिए भी अच्छा नहीं है."
मुझे भविष्य के बारे में पता नहीं. मुझे अपनी पुरानी ज़िंदगी याद आती है. यहाँ के लोग बहुत दयालु हैं, मददगार हैं, लेकिन यहाँ बड़ी संख्या में रह रहे लोगों के लिए मात्र दो शौचालय हैं.
ट्राइबल-बहुल चुराचांदपुर में स्थानीय लोगों की मानें, तो हालात तब तक नहीं सुधरेंगे जब तक उन्हें अलग प्रशासन नहीं मिल जाता.
हालात का असर यहाँ की शिक्षा, अर्थव्यवस्था पर पड़ा है. रास्ते में हमें लोग बोतलों में पेट्रोल बेचते नज़र आए. स्थानीय लोगों के मुताबिक़ सामान का दाम बढ़ा है, जिससे जीवन मुश्किल हुआ है.
इंडिजेनस ट्राइबल लीडर्स फ़ोरम के प्रवक्ता गिंजा वुअलज़ॉंग कहते हैं, "दोनों तरफ़ इतना ख़ून बह चुका है, इतनी जानें जा चुकी हैं कि मुझे नहीं लगता कि दोनों तरफ़ के लोग अब साथ रह सकते हैं. हम केंद्र सरकार से मांग कर रहे हैं कि हमारी राजनीतिक मांग को माना जाए और हमें अलग प्रशासन दिया जाए. जितनी जल्दी ये होगा, उतनी जल्दी यहाँ शांति आएगी."
लेकिन मैतेई इस मांग के विरोध में हैं. मैतेई हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली सिविल सोसाइटी संस्था कोकोमी को क्या राहुल गांधी की न्याय यात्रा से उम्मीद है?
कोकोमी के अथूबा खुरइजाम के मुताबिक़, "हमारी नज़र से भारतीय कांग्रेस की तरफ़ से ठीक तरह से एक एजेंडा उठाकर काम हमने नहीं देखा. हाँ, कई बार राहुल जी ने सदन में थोड़ा बहुत असंतोष व्यक्त किया भाजपा कैसे मणिपुर को हैंडल कर रही है लेकिन मणिपुर की समस्या की वजह 2008 से शुरू होती है. और 2008 से 2017 तक मणिपुर में भी कांग्रेस की सरकार थी. दिल्ली में साल 2014 में और मणिपुर में साल 2017 में सरकार बदली लेकिन नीति वही रही."
शांति की तलाश में हैं लोग

जानकार कहते हैं मैतेई और कुकी दोनों ही शांति चाहते हैं, लेकिन हालात का ख़ामियाज़ा आम लोग भुगत रहे हैं.
रिटायर्ड नौकरशाह और स्तंभकार डॉक्टर आरके निमाई सिंह कहते हैं, "हालात ख़राब हैं क्योंकि दोनो पक्ष अपनी बात पर अड़े हैं. मैतेई और कुकी दोनो ही शांति चाहते हैं क्योंकि चाहे अर्थव्यवस्था हो या फिर स्वास्थ्य या शिक्षा, राज्य के हालात पर इसका असर पड़ रहा है. दुखद है कि चुराचांदपुर में डॉक्टरों की कमी और निमोनियों से बच्चों की मौत हो रही है. दोनों ही तरफ़ सामान महंगा हुआ है. नेता आराम से हैं, लकिन आम लोग परेशान हैं."
सीमा पार से कथित घुसपैठ, हथियारों के इस्तेमाल, ड्रग्स की भूमिका आदि पर बहस के बीच हिंसा का ख़ामियाज़ा मणिपुर में समाज के हर तबके ने भुगता है.
यहाँ दिलों में दूरियाँ आई हैं. जो लोग पहले एक दूसरे के दुख-सुख में शामिल होते थे, बदले वक़्त में वो एक-दूसरे से दूर हुए हैं. इस हिंसा से लगे घाव बहुत गहरे हैं.
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