मणिपुर में जातीय हिंसा के धार्मिक हमलों में बदलने की कहानी

नितिन श्रीवास्तव

बीबीसी संवाददाता, इम्फ़ाल, मणिपुर से लौटकर

मणिपुर, इम्फाल

मणिपुर जल रहा है.

जल रही है, उसकी सैंकड़ों साल पुराने आपसी सद्भाव की नींव.

जल रही है अलग-अलग समुदायों के बीच हँसी-ख़ुशी साथ रहने की डोर भी.

और जल कर राख हो रहा है, एक सपना कि पुराने गिले-शिकवे मिटा कर साथ रहेंगे मैतेई, कुकी और नगा समाज के लोग.

आपसी भरोसा कम हुआ है और नाउम्मीदी बेपनाह है.

तो सच ये है कि भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में जातीय हिंसा भड़के हुए डेढ़ महीने से ज़्यादा हो चुका है लेकिन हालात वैसे ही तनावपूर्ण बने हुए हैं.

मैतेई और कुकी समुदाय के बीच जारी इस हिंसा में अब तक 100 से ज़्यादा लोगों की जान गई है और 390 लोग घायल हुए हैं.

लेकिन हिंसा थम नहीं रही है और स्थानीय लोगों का सब्र ख़त्म सा हो रहा है.

मणिपुर

क्यों लोग कह रहे हैं, इसे गृह युद्ध?

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मणिपुर का मैतेई समुदाय खुद को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग कर रहा है और यही मांग आगे चलकर पूरे विवाद की तात्कालिक वजह बनी.

तीन मई से लेकर छह मई तक प्रदेश में जम कर हिंसा हुई, जिसमें मैतेई लोगों ने कुकी पर और कुकी लोगों ने मैतेई के ठिकानों को निशाना बनाया.

राजधानी इम्फ़ाल से दो घंटे की दूरी पर स्थित कुकी बहुल चुराचांदपुर ज़िले में जब दोनों गुटों के बीच झड़पें जारी थीं तब 23 साल के एलेक्स जमकोथांग भी तमाशबीन भीड़ का हिस्सा थे.

एकाएक ऊपर की किसी इमारत से आई एक गोली उनके सीने को चीरते हुए निकल गई. उन्हें फ़ौरन अस्पताल पहुँचाया गया लेकिन तब तक वह दम तोड़ चुके थे.

एलेक्स जमकोथांग की माँ तब से सो तक नहीं सकी हैं और अक्सर सिसकती रहती हैं.

एलेक्स के पिता फ़ौज में थे और भाई आईटीबीपी में है. लेकिन उन्होंने कहा कि मारे गए छोटे भाई का अंतिम संस्कार अपनी मांग पूरी होने पर ही करेंगे.

जमकोथांग ने बताया, “हमारी ज़िंदगी यहाँ ख़तरे में है. कब क्या होगा, कौन मरेगा. सेंट्रल गवर्नमेंट अगर ट्राइबल लोगों के लिए सुविधा नहीं देगी तो हम भी नहीं मानेंगे और मैतेई लोग भी नहीं मानेंगे क्योंकि ये अब शुरू हो गया है. ये गृह युद्ध भी है और सरकार के साथ भी है. मांगें नहीं पूरी होंगी तो शवगृह से शव भी नहीं निकलेंगे.”

मणिपुर हिंसा
इमेज कैप्शन, पिछले महीने जब हिंसा शुरू हुई तो पुलिस थानों से हज़ारों की संख्या में हथिार लूट लिए गए थे.

साफ़ विभाजन रेखा

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मणिपुर इस समय दो टुकड़ों में बँट सा गया है.

एक हिस्सा मैतेई लोगों के पास है, दूसरा कुकी लोगों के पास.

हिंसा का जिस तरह का मंज़र दिखता है, वो एक दो चार दिन का नहीं, हफ़्तों तक चली हिंसा है, जिसमें घर बर्बाद हो गए हैं, लोग-बाग तबाह हो गए हैं, गांव के गांव उजड़ गए हैं.

जिस तरह की फ़ॉल्टलाईन्स अब यहाँ दिख रही हैं, उससे ऐसा लगता है कि ये दरार लंबे समय के लिए पड़ चुकी है.

आज़ादी के बाद से ईसाई धर्म मानने वाले कुकी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला हुआ है जबकि मैतई हिंदू समुदाय में कुछ को आरक्षण नहीं मिला जबकि कुछ अनुसूचित जाति बने और कुछ को ओबीसी का दर्जा मिला.

झगड़े की वजह यही है, क्योंकि मैतेई लोग कुकी इलाक़ों में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते और अब वे भी जनजाति का दर्जा चाहते हैं.

ज़ाहिर है, मसला ज़मीन पर अधिकार का है. 28 लाख की आबादी में बहुसंख्यक मैतेई घाटी में रहते रहे हैं जबकि कुकी आबादी चार पहाड़ी ज़िलों में बसी हुई है.

इस हिंसा में एक दूसरे के यहां जा बसे दोनों समुदाय के लोग शिकार हुए हैं. वैसे राज्य में मैतई मुसलमान और नगा भी हैं जो इस हिंसा से अछूते रहे.

मणिपुर हिंसा

राहत शिविरों में 50,000 लोग

मणिपुर यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर रहे प्रियोरंजन सिंह बताते हैं कि इलाक़े में इस तरह की हिंसा का कोई पुख़्ता इतिहास भी नहीं रहा है.

उन्होंने कहा, “इतिहास ये है कि मैतेई ने नगा और कुकी समुदायों को एकजुट किया था और राज-काज में उन्हें जगह दी. यहां लोगों के हिंदू होने का इतिहास भी ख़ासा अलग है. मणिपुरी लोग कभी भी किसी धर्म को लेकर कट्टरवादी नहीं रहे हैं. हां, 19वीं सदी में ज़रूर एक दौर था जब यहां राजशाही के दौरान हिंदू धर्म को थोपा गया था लेकिन वो लंबे समय नहीं चला.”

लेकिन हक़ीक़त ये है कि हिंसा के इस दौर में मौतें और नुक़सान दोनों पक्षों का हुआ है.

फ़िलहाल 50,000 से भी ज़्यादा लोग राहत शिविरों में भाग कर शरण लिए हुए हैं, जिनमें कुकी और मैतेई दोनों शामिल हैं.

राजधानी इम्फ़ाल में स्टेडियम की बगल में एक यूथ हॉस्टल है, जिसे इन दिनों एक राहत शिविर में तब्दील कर दिया गया है.

ख़ास बात ये है कि यहां पर 40 ऐसी महिलाएँ हैं जो हिंसा शुरू होने के समय गर्भवती थीं.

पिछले एक महीने में यहां चार बच्चों का जन्म हो चुका है और इन माताओं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि इनके बच्चे एक रिलीफ़ कैंप में पैदा होंगे जो 'कॉन्फ़्लिक्ट चिल्ड्रन' कहलाएंगे.

मरीना सोराम
इमेज कैप्शन, गांव पर हमले के बाद किसी तरह मरीना सोराम राहत कैंप में पहुंचीं.

यहीं पर मुलाक़ात 27 साल की मरीना से हुई, जिन्होंने अपने बच्ची को जन्म दिया और फ़िलहाल पति से बिछड़ी हुई हैं. ग़ुस्सा इतना है कि मरीना ने बेटी का नाम ‘जीत’ पर रख दिया है.

कांगपोकपी की रहने वालीं मरीना सोराम ने कहा, “रात का खाना खाने जा रहे थे, जब गांव पर हमला हुआ. घर-बार छोड़ कर नदी की तरफ़ भागे, जहां देखा कई बच्चे पानी के तेज़ बहाव से जूझ रहे थे. अगले दिन हमें उनके शव मिले.”

एक जला हुआ चर्च
इमेज कैप्शन, सरकारी आंकड़ों के अनुसार हिंसा में मणिपुर में 200 चर्च जला दिए गए.

पूर्व मैतेई हिंदू राजघराना

पिछले कुछ सालों में राज्य की सियासत ने पूर्व मैतेई हिंदू राजघराने की बढ़ती लोकप्रियता को भी देखा है. पूर्व राजघराने के महाराजा लीशेम्बा संजाओबा इस समय भाजपा के राज्य सभा सांसद हैं.

हालांकि बीबीसी की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्होंने इंटरव्यू के लिए हामी नहीं भरी लेकिन इस दौरान उन्होंने एक बयान जारी कर के ये ज़रूर कहा कि, “हिंसा होना बेहद निन्दनीय है और बातचीत ही हर मसले का हल है.”

लेकिन ख़ास बात ये है कि मणिपुर के इतिहास में धार्मिक स्थल पहली बार जातीय हिंसा का निशाना बने हैं.

प्रदेश भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष शारदा देवी भी माना कि मैतेई और कुकी समुदायों के बीच होने वाली व्यापक हिंसा सही नहीं है.

प्रदेश भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष शारदा देवी
इमेज कैप्शन, प्रदेश भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष शारदा देवी

वैसे शारदा देवी के घर पर भी कुछ हमलावरों ने आगज़नी करने की कोशिश की थी जिसे सुरक्षा बलों ने विफल कर दिया.

उन्होंने बताया, “चर्च जलाया और मंदिर जलाया. ख़ासतौर से चर्च जहां कुकी लोग प्रार्थना करते हैं और मैतेई समुदाय के घरों में पूजा करने के लिए मंदिर होते हैं, तो दोनों समुदायों के जो स्थल जल रहे हैं, दोनों का जो नुक़सान हुआ है, ये हम सबके लिए दुख की बात है.”

बीबीसी को मिले सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़, जून के पहले हफ़्ते तक प्रदेश में 250 से ज़्यादा चर्च और क़रीब 2000 कुकी घर निशाना बन चुके थे.

कुकी क्रिसचियन लीडर्स फ़ेलोशिप के प्रमुख पादरी हाओकिप थोंगखो
इमेज कैप्शन, कुकी क्रिसचियन लीडर्स फ़ेलोशिप के प्रमुख पादरी हाओकिप थोंगखो.

'सरकार पर भरोसा नहीं'

चुराचांदपुर में कुकी क्रिश्चन लीडर्स फ़ेलोशिप के प्रमुख पादरी हाओकिप थोंगखोसे से मुलाक़ात हुई जो प्रदेश के गिरिजाघरों की सुरक्षा को लेकर ख़ासे चिंतित दिखे.

हाओकिप थोंगखोसे ने कहा, “कुकी समुदाय बहुत ज़्यादा परेशान है और हमारा भरोसा सरकार पर नहीं रहा है क्योंकि राज्य सरकार ने मॉब (भीड़) को नहीं रोका जो चर्चों, इंसानों और उनकी संपत्तियों पर हमला कर रहे थे. इसलिए ये हमारे लिए बेहद मुश्किल दौर था. मुझे लगता है कि ये जातीय हिंसा ही है लेकिन भारतीय हिंदुओं को ख़ुश करने के लिए ही चर्चों पर हमले हुए.”

वैसे इन दिनों इम्फ़ाल में चर्चों को फ़िल्म करना या उनके सामने खड़े होकर काम करना मीडिया वालों के लिए सबसे ज़्यादा ख़तरनाक समझा जाता है क्योंकि स्थानीय लोग आकर कई तरह के सवाल पूछते हैं.

वे इस बात पर अपनी नाराज़गी जताते हैं अगर आप टूटे हुए चर्चों को या जो मंदिर तोड़े गए हैं, उनको फ़िल्म करें या उनकी तस्वीरें खींचे.

हिंसा के दौरान ध्वस्त मंदिर.
इमेज कैप्शन, हिंसा के दौरान 100 मंदिरों को निशाना बनाया गया.

ग़ुस्सा बराबरी का है. सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ 100 मंदिरों के अलावा 2000 मैतेई घरों पर भी हमला हुआ है.

हालांकि मैतेई समाज के हितों के लिए बने समूह कोकोमी के प्रवक्ता के ओथाबाय इस बात पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि “मणिपुर में मामले धार्मिक नहीं होते हैं और इस बार भी बात बढ़ने से रोक ली गई.”

उनके मुताबिक़, “200 चर्चों को नुक़सान पहुँचा है लेकिन आपको ये पता होना चाहिए कि यहां 400 और चर्च हैं जो अभी भी जस के तस हैं. अगर धार्मिक हिंसा होती तो क्या वे वैसे ही खड़े रहते? हां, ये है कि पहाड़ी इलाक़ों में अब आपको एक भी मंदिर नहीं मिलेगा.”

मौजूदा संकट के लिए पड़ोसी म्यांमार के चिन प्रांत से भाग कर आए कुकी उग्रवादियों का भी हाथ बताया जा रहा है, जिनके पास आधुनिक हथियारों की कमी नहीं है.

लेकिन मणिपुर के अल्पसंख्यक कुकी अपने इलाक़ों के लिए अलग प्रशासन की मांग कर रहे हैं, जिसे केंद्र सरकार ने मना कर दिया है.

कुकी स्टूडेंट्स ऑरगनाइज़ेशन के होम सेक्रेटरी मांग खोनसाय
इमेज कैप्शन, कुकी स्टूडेंट्स ऑरगनाइज़ेशन के होम सेक्रेटरी मांग खोनसाय.

'हक़ की लड़ाई की जगह धार्मिक हिंसा ने ले ली'

कुकी स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइज़ेशन के होम सेक्रेटरी मांग खोनसाय की नाराज़गी इस बात से है कि “चाहे केंद्र हो या राज्य सरकार किसी ने उनकी सुध ठीक से ली ही नहीं.”

उन्होंने कहा, “सभी कहीं न कहीं अल्पसंख्यक होते हैं. आज सिर्फ़ मणिपुर में होने की वजह से अगर आप बहुसंख्यक हैं तो क्या आप सिर्फ़ मणिपुर में ही सीमित रहेंगे. इतनी सारी दूसरी जगहें हैं, जहां उन्हें भी हमारी तरह के हालात का सामना करना पड़ सकता है,”

पूछे जाने पर कि क्या कुकी समाज या उन्हें इस बात का अफ़सोस है कि इस हिंसा में धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया, मांग खोनसाय ने कहा, “मैं भी भ्रमित हो जाता हूँ कि आख़िर हम किस चीज़ के लिए लड़ रहे हैं. इस हिंसा का दौर शुरू हुआ था, अधिकारों की माँग के साथ और फिर ये शिफ़्ट होकर धर्म पर आ गया. लेकिन केंद्र सरकार को अब इसे ख़त्म करने के लिए तेज़ी से काम करना होगा नहीं तो हालात और बिगड़ जाएंगे”.

आरपीजी से फेंके गए गोले भी लोगों ने दिखाए.
इमेज कैप्शन, हमले में आरपीजी से फेंके गए गोले भी लोगों ने दिखाए.

ग्राउंड पर हालात ये हैं कि राजधानी इम्फ़ाल से किसी पहाड़ी कुकी बहुल इलाक़े में जाने के लिए प्रशासन नहीं, कुकी गार्डों से आज्ञा लेनी पड़ती है. दोपहर में महिलाएँ सीमा पर पहरा देती हैं और रात को पुरुष गार्ड तैनात रहते हैं.

दोनों समुदाय के गाँवों के बीच आपसी हमले भी जारी हैं और एक कुकी गांव में स्थानीय लोगों ने हमें ग्रेनेड्स और आरपीजी से फेंके गए बारूदी गोले भी दिखाए.

कई गाँवों के गार्ड्स के पास वॉकी-टॉकी भी हैं, जिससे वे आपस में बात करते रहते हैं.

कुछ दिन पहले तक इनके पास लाइसेंसी बंदूकें भी थीं लेकिन भारतीय सुरक्षा बलों ने अब चारों तरफ़ अपनी छावनी बना ली है और गांव वालों को असलहे न इस्तेमाल करने की सख़्त हिदायत है.

मणिपुर के ट्राइबल इलाक़े में अलग प्रशासन की मांग को लेकर भी विरोध है.
इमेज कैप्शन, मणिपुर के ट्राइबल इलाक़े में अलग प्रशासन की मांग को लेकर भी विरोध है.

'पक्षपातपूर्ण राजनीति दोषी'

राजधानी इम्फ़ाल के बाहर हमने एक सीक्रेट लोकेशन पर जाकर दशकों तक अंडरग्राउंड रहे और स्वतंत्र मणिपुर की मांग करने वाले और यूएनएलएफ़ के पूर्व चेयरमैन राजकुमार मेघन से बात की.

उनके अनुसार, “मुझे न सिर्फ़ सदमा लगा बल्कि दुख भी हुआ क्योंकि पुराने समय में इस तरह का वाक़या कभी नहीं हुआ था. मैं चर्च या धार्मिक स्थलों को जलाए जाने का समर्थन नहीं करता. दोनों के लिए ही, मैं कहूँगा कि पक्षपातपूर्ण राजनीति इसका प्रमुख कारण रही जिससे आम मैतेई और कुकी लोगों को झेलना पड़ा.”

हक़ीक़त ये भी है कि इतने लंबे समय चली हिंसा के बाद का मंज़र और ज़्यादा डरावना है.

क्योंकि एक समुदाय की तरह सैंकड़ों सालों से साथ रहने वालों में आपसी भरोसा ख़त्म हो चुका है.

मणिपुर कांग्रेस पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष देवब्रत सिंह ने हालात को चंद लफ़्ज़ों में बयान करते हुए कहा, “मणिपुर में कभी धर्म के नाम पर दंगा-फसाद नहीं हुआ था. जो हो रहा है ये सबसे पहली बार है वो भी किसी ने डाइवर्ट करने की कोशिश की होगी जिससे ये धार्मिक हिंसा लगे.”

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