पूर्वोत्तर के राज्यों से हट रहा AFSPA, मगर लोगों को इंसाफ़ का इंतज़ार - ग्राउंड रिपोर्ट

अपावी
    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नगालैंड और मणिपुर से लौटकर

गुरुवार को असम के दिफू में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में लिए गए केंद्र सरकार के उस फैसले का ज़िक्र किया जिसके तहत चार पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ इलाकों से आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट या अफ्स्पा हटाने की घोषणा की गई है.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पूर्वोत्तर राज्यों में जैसे-जैसे शांति लौट रही है वैसे-वैसे पुराने नियमों में भी बदलाव किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, "लम्बे समय तक आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (अफ्स्पा) नॉर्थ-ईस्ट के अनेक राज्यों में रहा है. लेकिन बीते आठ सालों के दौरान, स्थायी शांति और बेहतर कानून-व्यवस्था लागू होने के कारण हमने अफ्स्पा को नॉर्थ-ईस्ट के कई क्षेत्रों से हटा दिया है."

साथ ही मोदी ने कहा कि बीते आठ सालों के दौरान नॉर्थ-ईस्ट में हिंसा की घटनाओं में करीब 75 प्रतिशत की कमी आयी है और इसी वजह से पहले त्रिपुरा और फिर मेघालय से अफ्स्पा को हटाया गया.

उन्होंने कहा, "असम में तो तीन दशक से ये लागू था. स्थितियों में सुधार न होने के कारण पहले की सरकारें इसको बार-बार आगे बढाती रहीं. लेकिन बीते वर्षों में, हालात को ऐसे संभाला गया कि आज असम के 23 ज़िलों से अफ्स्पा हटा दिया गया है. अन्य क्षेत्रों में भी हम तेज़ी से हालात सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वहां से भी अफ्स्पा को हटाया जा सके. नगालैंड और मणिपुर में भी इस दिशा में बहुत तेज़ी से काम किया जा रहा है."

किन इलाकों से हटा है अफ्स्पा?

ओटिंग गांव

केंद्र सरकार ने नगालैंड, असम और मणिपुर में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम या आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (AFSPA) के तहत अशांत क्षेत्रों को कम करने का निर्णय लिया है.

केंद्र सरकार ने कहा कि ये फैसला "पूर्वोत्तर में सुरक्षा स्थिति में सुधार और तेजी से विकास" के कारण किया गया है.

इस फैसले का सीधा मतलब ये हुआ कि जो इलाके अब अशांत नहीं माने जा रहे वहां पर अफ्स्पा लागू नहीं होगा.

केंद्र सरकार के फैसले के तहत नगालैंड के सात और मणिपुर के छह ज़िलों में 15-15 पुलिस थानों के इलाकों से अशांत क्षेत्र की अधिसूचना हटा ली गई है.

लेकिन इसके बावजूद, मणिपुर के 16 ज़िलों के 82 पुलिस थानों और नगालैंड के 13 ज़िलों के 57 पुलिस थानों को अब भी अशांत क्षेत्र की सूची में रखा गया है और वहां अफ्स्पा लागू रहेगा.

12 कब्रें और इन्साफ का इंतज़ार

ओटिंग गांव में क़ब्रें

नगालैंड के मोन ज़िले के ओटिंग गाँव के एक कोने में इसी गाँव के 12 लोग दफ़न हैं.

ये वो बारह लोग हैं जो पिछले साल दिसंबर में भारतीय सेना की एक चरमपंथी विरोधी कार्रवाई और उसके बाद हुई हिंसा में मारे गए 15 लोगों में शामिल थे.

इस घटना के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में खेद जताते हुए ये माना था कि ये हादसा एक गलत पहचान या मिस्टेकन आइडेंटिटी का मामला था. साथ ही उन्होंने कहा था कि एक स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम इस मामले की जांच करेगी.

भारतीय सेना ने भी इस घटना पर खेद जताया था और कहा था कि इस घटना के कारणों की उच्च स्तर पर जांच की जा रही है और कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की जाएगी.

लेकिन ओटिंग गाँव के लोगों को इंसाफ मिलने की उम्मीद कम है.

इसकी वजह है आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट जिसके तहत भारतीय सेना को अशांत क्षेत्रों में कार्रवाई की न सिर्फ विशेष शक्तियां दी गई हैं बल्कि ये सुनिश्चित किया गया है कि इन शक्तियों के इस्तेमाल से होनी वाली घटनाओं के लिए भारतीय सेना के सैनिकों पर केंद्र सरकार की मंज़ूरी के बिना कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती.

चेम्वांग कोन्यक
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चेम्वांग कोन्यक के 32 वर्षीय बेटे शोमवंग की मौत भी पिछली दिसंबर में ओटिंग में हुई सैनिक कार्रवाई के दौरान हुई थी. खुद कैंसर से जूझ रहे इस पिता का मानना है कि ऐसी घटनाएं होने की वजह अफ्स्पा जैसे कानून का होना है.

वे कहते हैं, "अपने बच्चे को खोने का दर्द आपको क्या बताऊँ. मैं तो मरीज़ हूँ. भारतीय सेना का तो हम कुछ नहीं कर पाएंगे. फिर भी सभी लोग बहुत नाराज़ है. हम कहते है अफस्पा हटाओ. लेकिन अब तक तो इसे हटाया नहीं है. नगालैंड की कई जगहों से हटाया है. लेकिन मोन ज़िले से तो नहीं हटाया. हम इससे खुश नहीं है. केवल मेरे बेटे को ही नहीं मारा है. हमारी बस्ती के कितने लड़कों को मार डाला. वो बच्चे हमारा भविष्य थे."

शोमवंग
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23 वर्षीय शैवांग कोन्यक उसी गाड़ी में सवार थे जिस पर सुरक्षा बलों की तरफ से गोलीबारी हुई. गोलियां लगने के बावजूद शैवांग की जान तो बच गयी लेकिन अपने शरीर पर लगी चोटों का असर वो आज भी झेल रहे हैं.

शैवांग बहुत मुश्किल से ही बात कर पाते हैं. वे कहते हैं, "हाथ भी नहीं हिला पाता हूँ. एक आँख से दिखाई नहीं देता है. टांग में भी दिक्कत रहती है. पेट में काफ़ी दर्द रहता है. पूरे शरीर में दर्द रहता है. दुःख में गुज़र रहा है जीवन."

लम्बी कानूनी लड़ाई

बबलू लोइतोंगबाम
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बबलू लोइतोंगबाम एक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता हैं जो पिछले कई वर्षों से पूर्वोत्तर भारत में हुई फ़र्ज़ी मुठभेड़ों से पीड़ित परिवारों को इन्साफ दिलाने की कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. उन्होंने 1,528 कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामलों की एक सूची बनाई है जिस पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

केंद्र सरकार के कुछ इलाकों से अफ्स्पा हटाने के फैसले पर वे कहते हैं, "हम निश्चित रूप से इसे एक सकारात्मक दृष्टि से देखते हैं. यह सही दिशा में एक कदम है, लेकिन केवल पहला कदम है. ये वृद्धिशील कदम हैं और हम निश्चित रूप से इस समझ का स्वागत करते हैं कि आप अफस्पा को हमेशा के लिए नहीं रख सकते जब इसकी बिल्कुल भी ज़रुरत नहीं है."

मणिपुर में कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ों की जांच करने के लिए साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस संतोष हेगड़े आयोग बनाया था. इस आयोग ने 6 मामलों की जांच की और पाया कि ये सभी फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामले थे.

न्याय मांगता पोस्टर

साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इन मुठभेड़ों की जांच के लिए सीबीआई की एक स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम का गठन किया.

सीबीआई ने 39 एफआईआर दर्ज कर के तफ्तीश की और 30 मामलों में अपनी रिपोर्ट दी जिनमें 21 मामलों में संघ के सशस्त्र बलों और मणिपुर पुलिस की भूमिका पर सवालिया निशान लगाए गए.

इन 21 मामलों में से 6 मामले ऐसे थे जिनमें सीबीआई ने संघ के सशस्त्र बलों को फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में शामिल पाया और बाकी मामलों में करीब 100 मणिपुर पुलिस के कर्मियों को फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में शामिल पाया गया.

जहाँ एक तरफ मणिपुर सरकार ने मणिपुर पुलिस के आरोपियों पर कानूनी कार्रवाई करने की अनुमति दे दी वहीँ दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने अभी तक किसी भी मामले में भारतीय सेना या अर्धसैनिक बलों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की इजाज़त नहीं दी है.

बबलू लोइतोंगबाम के मुताबिक केंद्र सरकार से प्रॉसिक्यूशन सैंक्शन या मुक़ददमा चलाने की इजाज़त न मिलना ही इन्साफ की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है. वे कहते हैं, "दुर्भाग्य से न्याय मिलने में बहुत ज़्यादा देरी हो रही है. और जैसा कि कहा जाता है, न्याय में देरी होना न्याय से वंचित किये जाने के बराबर है. पांच साल बीत जाने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए बेंच का गठन तक नहीं किया है. पिछली सुनवाई सितंबर 2018 में हुई थी."

प्रॉसिक्यूशन सैंक्शन

ओटिंग गांव

आखिर क्या वजह है कि कई मुठभेड़ों के फ़र्ज़ी पाए जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने एक भी मामले में भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों के कर्मियों के खिलाफ मुक़ददमा चलाने की इजाज़त नहीं दी है?

रक्षा विशेषज्ञ अजय साहनी दिल्ली इंस्टिट्यूट ऑफ़ कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट में कार्यकारी निदेशक हैं.

वे कहते हैं, "सरकार की सोच है कि हम किसी भी फौजी के खिलाफ कार्रवाई करेंगे तो इससे सेनाओं का मनोबल गिरेगा. मैं इससे बिलकुल सहमत नहीं हूँ. अगर आप उन ख़राब अफसरों या ख़राब सैनिकों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे जो व्यक्तिगत उद्देश्यों या श्रेय पाने की होड़ में ऐसी कार्रवाइयां करते हैं तो उससे फ़ौज के मनोबल पर कोई असर नहीं होगा. बल्कि जो सही काम कर रहे हैं उनको लगेगा की जो लोग ऐसी कार्रवाइयों के ज़रिये मैडल जीत रहे हैं या पुरस्कृत हो रहे हैं, उनको हटाया जा रहा है और जो सही काम करता है उसे संरक्षण मिलता है."

तो केंद्र सरकार के हालिया फैसले को कैसे देखा जाए?

अजय साहनी कहते हैं कि काफी समय से आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट के दायरे की समीक्षा की जाने की ज़रुरत थी. उन्होंने कहा, "ये समीक्षा इसलिए ज़रूरी थी क्यूंकि ऐसे कई इलाके जहाँ आतंकवाद की घटनाएं होती रही हैं और अब वहां कई वर्षों से हिंसा के स्तर में काफी कमी आयी है. लेकिन सरकार ने जो पहल की है वो नगालैंड के मोन ज़िले में हुए हादसे की एक प्रतिक्रिया है. ये एक तर्क-सांगत फैसला नहीं है और इस पूरे मसले की एक व्यापक समीक्षा की ज़रुरत है."

अफ्स्पा के तहत विशेष शक्तियां

शैवांग कोन्यक
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अफ्स्पा के तहत सशस्त्र बालों को अशांत क्षेत्रों में सार्वजनिक व्यवस्था बनाये रखने की विशेष शक्तियां दी गई हैं. इस कानून का इस्तेमाल करके सशस्त्र बल किसी भी इलाके में पांच या पांच से अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगा सकते हैं. अगर सशस्त्र बलों को लगे की कोई व्यक्ति कानून तोड़ रहा है तो उसे उचित चेतावनी देने के बाद बल का प्रयोग किया जा सकता है और गोली चलाई जा सकती है. साथ ही ये कानून सशस्त्र बलों को उचित संदेह होने पर बिना वारंट किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और किसी भी परिसर में प्रवेश कर तलाशी लेने का अधिकार देता है.

समय-समय पर सशस्त्र बलों पर आरोप लगते रहे हैं कि वे इन विशेष शक्तियों का दुरूपयोग करते रहे हैं. और इन आरोपों को सीबीआई की जांच में कई मुठभेड़ों के फ़र्ज़ी पाए जाने से बल मिला है.

वीडियो कैप्शन, मोन ज़िले में भारतीय सेना की कार्रवाई और उसके बाद भड़की हिंसा में 15 लोगों की मौत हुई थी

बबलू लोइतोंगबाम कहते हैं कि अफ्स्पा की वजह से हिंसा का एक चक्र बन गया है. वे कहते हैं, "उग्रवाद से निपटने के लिए अफ्स्पा के तहत अधिक बल का प्रयोग होता है. इससे नागरिक आबादी हताहत होती है और लोगों में गुस्सा बढ़ता है और ज़्यादा विद्रोह पैदा होता है. पूर्वोत्तर में जो विद्रोह एक समूह से शुरू हुआ वो आज इतना बढ़ गया है कि आप सक्रिय विद्रोही समूहों की गणना भी नहीं कर सकते. ये अफ्स्पा का सीधा असर है."

'सच सामने आना चाहिए'

हाथ में फोटो

मणिपुर जैसे राज्यों में भारतीय सेना और स्थानीय पुलिस के खिलाफ ये इलज़ाम लगता रहा है कि उन्होनें फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में स्थानीय नागरिकों की हत्या की है. यहाँ के लोग इस बात से भी आहत हैं कि बहुत सी मुठभेड़ों के फ़र्ज़ी साबित हो जाने के बाद भी दोषियों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. ऐसे दर्जनों परिवार हैं जिनके लिए इंसाफ का इंतज़ार एक लम्बा और दर्द भरा सफर रहा है.

इम्फाल शहर से कुछ दूर सेकता गाँव में रीटा फैरोइजाम उन दर्जनों महिलाओं में से एक हैं जो आज भी इन्साफ का इंतज़ार कर रही हैं. रीटा बताती हैं कि वो अपने बच्चों से छुप-छुप के रोती हैं और सारी-सारी रात सो नहीं पातीं.

रीटा के पति सानाजीत की साल 2004 में एक सैनिक कार्रवाई में मौत हो गई थी. मामले की जांच के बाद सीबीआई ने इस कार्रवाई को एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ कहा और भारतीय सेना के अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की लेकिन केंद्र सरकार ने अफ्स्पा का हवाला देकर इसकी इजाज़त नहीं दी.

रीटा आज भी उस रात को याद कर कांप उठती हैं.

वे कहती हैं, "रात के बारह-एक बजे वो लोग आये. मेरे पति सो रहे थे. उन्हें बालों कर उठाया. मैंने उनसे पूछा की इनकी क्या गलती है. लेकिन उन लोगों ने कुछ सुना नहीं."

रीटा
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कुछ वक़्त बाद रीटा को पता चला की एक सैनिक कार्रवाई में उनके पति की मौत हो गई है. वे कहती हैं, "मैं चाहती हूँ की सच सामने आये. मुझे इस बात का दुःख है कि इस तरह मेरे पति को मार दिया गया. वो एक सीधे-साधे इंसान थे. कैसे उन पर इलज़ाम लगा कि उनके पास हथियार हैं. क्यों उन्हें बिना वजह ऐसे मार दिया गया?"

रीटा फैरोइजाम कहती हैं कि अगर अफ्स्पा हटा लिया जाये तो बेहतर होगा. "अफ्स्पा की वजह से बहुत लोगों को मार दिया गया है. मेरे पति भी उन्हीं में से एक हैं."

रीटा अब अपने माता-पिता के घर पर रहती हैं और तरह-तरह के काम करके अपना और अपने बच्चों का गुज़ारा चलाती हैं.

दर्द और गुस्सा

अपावी
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कुछ ही दूर इम्फाल शहर में एक माँ आज भी अपने बेटे की मौत के दुःख से जूझ रही है. अपावी के 22 वर्षीय बेटे अनिल 2012 में एक सैनिक कार्रवाई में मारे गए थे.

अपावी के मन में दुःख के साथ-साथ गुस्सा भर गया है. वे कहती हैं, "जिसने मेरे बेटे को मारा उसे मैं मार देना चाहती हूँ. मैं उसके चाकू से टुकड़े टुकड़े कर देना चाहती हूँ."

अपावी कहती हैं कि जब भी कोई त्यौहार आता है तो उन्हें अपने बेटे की ज़्यादा याद आती है. अपने आंसूं पोंछते हुए वे कहती हैं, "मेरी जीने की इच्छा ख़त्म हो गई है. मैं चाहती हूँ की सच सामने आये और जो मेरे बेटे की मौत के लिए ज़िम्मेदार है उसे सजा मिले. हमारे निर्दोष बच्चों को जिस तरह झूठा इलज़ाम लगा कर मार दिया जाता है, वो नहीं होना चाहिए."

'आखिरी सांस तक इंसाफ के लिए लड़ूंगी'

रेणु ताखेलम्बम
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मणिपुर में ऐसे ही पीड़ित परिवारों के लोगों ने एक्स्ट्रा-जुडिशल एक्ज़ीक्यूशन विक्टिम फैमिलीज़, मणिपुर (EEVFAM) के नाम से एक संस्था बनाई है जिसके ज़रिये वो अपने मारे गए परिजनों के लिए इन्साफ की लड़ाई लड़ रहे हैं.

ईईवीएफएएम की अध्यक्ष रेणु ताखेलम्बम के पति भी साल 2007 में एक सैनिक कार्रवाई में मारे गए थे. वे कहती हैं, "हमें अब तक न्याय तो नहीं मिला लेकिन हमें उम्मीद है कि किसी दिन हम इन हत्याओं के पीछे की सच्चाई का पता लगा पाएंगे."

एडिना याइखोम और नीना निंगोमबाम के पति भी सैन्य कार्रवाइयों में मारे गए थे. अपने बच्चों की अच्छी परवरिश के अलावा इन दोनों का अब एक ही लक्ष्य है: इन्साफ.

एडिना याइखोम कहती हैं कि वो नहीं जानती कि इन्साफ मिलने में कितना वक़्त लगेगा लेकिन वो अपनी आखरी सांस तक इन्साफ के लिए लड़ती रहेंगी.

नीना निंगोमबाम कहती हैं, "मेरे पति की हत्या कर दी गई और उन्हें एक संदिग्ध आतंकवादी कहकर फंसाया गया. मुझे उनके नाम से ये धब्बा मिटाना है क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मेरे बच्चों को उनके भविष्य के जीवन में किसी भी तरह के उत्पीड़न का सामना करना पड़े."

नीना निंगोमबाम
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साल 2004 का वो दृश्य भूलना मुश्किल है जब 12 मणिपुरी महिलाओं ने इम्फाल में असम राइफल्स के मुख्यालय के सामने निर्वस्त्र होकर एक 32 वर्षीय महिला के सामूहिक बलात्कार और हत्या के खिलाफ प्रदर्शन किया था.

उन्हीं प्रदर्शनकारी महिलाओं में लौरेमबाम नगानबी भी शामिल थीं.

पूर्वोत्तर के कुछ इलाकों को अशांत क्षेत्रों के सूची से हटाने के केंद्र सरकार के फैसले को वो एक लम्बे संघर्ष का नतीजा मानती हैं.

वे कहती हैं, "यह हमारे संघर्ष, इरोम शर्मिला के उपवास और ईईवीएफएएम द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर सभी मामलों का परिणाम है. इस सबकी वजह से ही कुछ इलाकों से अफस्पा को हटा दिया गया है. कुछ नहीं होने से कुछ होना बेहतर है. हम चाहते हैं कि पूर्वोत्तर से अफस्पा पूरी तरह हटा लिया जाए."

कुछ इलाकों से अफ्स्पा का हट जाना पूर्वोत्तर के लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण है.

वीडियो कैप्शन, नगालैंड हिंसा में मारे गए आम लोगों के परिवारों का हालः ग्राउंड रिपोर्ट

लेकिन अतीत में मिले हुए ज़ख्मों का मरहम शायद उन्हें तभी मिलेगा जब उनके परिजनों की मौत का सच सामने आएगा और इन्साफ होगा.

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