नगालैंड हिंसा: 14 लोगों का अंतिम संस्कार, दिखा ग़म और गुस्सा

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- Author, पिनाकी दास
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
नगालैंड के मोन ज़िले में सोमवार को ग़मगीन और तनावपूर्ण माहौल के बीच 14 नगा लोगों का अंतिम संस्कार किया गया.
वहां मौजूद रहे नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ़ियू रियो ने केंद्र सरकार से आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्ट (AFSPA) हटाने की मांग की तो कुछ घंटे बाद लोकसभा में दिए अपने बयान में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि ये तय किया गया है कि 'आगे से ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो.'
मोन ज़िले में जिन 14 लोगों को अंतिम विदाई दी गई, उनकी मौत ज़िले के तिरु इलाक़े में शनिवार रात कथित तौर पर सुरक्षाबलों की कार्रवाई में हुई थी. ये लोग जहां मारे गए, वो इलाक़ा म्यांमार की सीमा के क़रीब है.
अंतिम संस्कार के वक़्त सीएम के अलावा, उनके मंत्रिमंडल के कई सदस्य, पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारी मौजूद थे.
इस घटना के विरोध में, मरने वालों के प्रति शोक जताने और उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए सोमवार को बड़ी संख्या में आम लोग भी वहां मौजूद थे.

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अमित शाह का बयान
इस बीच, लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को इस मामले में बयान दिया.
उन्होंने घटना पर खेद जताते हुए कहा, "ये निर्णय लिया गया है कि सभी एजेंसियों को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि विद्रोहियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाते समय भविष्य में ऐसी कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना की पुनरावृत्ति न हो. सरकार घटना पर सूक्ष्मता से नज़र रख रही है."
गृह मंत्री अमित शाह ने ये भी कहा कि सेना ने निर्दोष नागरिकों की दुखद मृत्यु के घटनाक्रम पर अत्याधिक दुख व्यक्त किया है. सेना इसकी उच्चतम स्तर पर जांच कर रही है और क़ानून के हिसाब से इस मामले में कार्रवाई की जाएगी.

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ग़म और गुस्सा
उधर, मोन ज़िले में अंतिम विदाई देने आए लोगों ने अपने हाथों में काले झंडे और तख्तियां थामी हुई थीं.
ताबूत के क़रीब खड़े लोगों ने एक बैनर थामा हुआ था, उस पर लिखा था, "4 और 5 दिसंबर 2021 को भारतीय सेना द्वारा ओटिंग गांव और मोन हेडक्वार्टर में जिन निर्दोष नागरिकों की निर्मम हत्या की गई, उनके सम्मान में अंतिम संस्कार की रस्म. "
नगालैंड पुलिस ने इस घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए भारतीय सेना के 21 पैरा विशेष बल के ख़िलाफ़ तिज़ित पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज की है.
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ये केस आईपीसी की धारा 302, 307 और 34 में दर्ज किया गया है. आरोपों के मुताबिक नगालैंड के मोन ज़िले में शनिवार रात सेना के जवानों ने कथित तौर पर आम नागरिकों को चरमपंथी समझते हुए 'अंधाधुंध गोलियां चलाईं'.
तिरु और ओटिंग के बीच हुई गोलीबारी में कई लोगों की मौत हो गई जबकि कई अन्य घायल हो गए.

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क्या बोले मुख्यमंत्री?
मुख्यमंत्री रियो ने वहां मौजूद लोगों को संबोधित किया. उन्होंने कहा, "निर्दोष लोगों के अंतिम संस्कार के मौके पर आकर उन्हें बहुत दुख हो रहा है."
मुख्यमंत्री ने आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्ट (AFSPA) को हटाने की मांग की. नगालैंड को अशांत क्षेत्र घोषित करते हुए ये एक्ट लागू किया गया था, लेकिन फ़िलहाल नगालैंड में संघर्ष विराम की स्थिति है और वहां शांति बनी हुई है.
मुख्यमंत्री रियो ने मरने वाले व्यक्तियों में से हर एक के परिवार को राज्य सरकार की ओर से पांच लाख रुपये का मुआवज़ा देने का एलान किया.
केंद्र सरकार ने मरने वाले लोगों से में हर एक के लिए 11 लाख रुपये का मुआवज़ा और एक रिश्तेदार को नौकरी देने का एलान किया है. घायलों को एक लाख रुपये देने की घोषणा की गई है.
मुख्यमंत्री रियो ने पत्रकारों से भी बात की और कहा, "नगालैंड की राज्य सरकार केंद्र सरकार से आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्ट को रद्द करने की मांग कर रही है. ये एक क्रूर क़ानून है जो सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की छवि कलंकित करता है और इस क़ानून की वजह से दुनिया हमारी आलोचना करती है."
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जांच शुरू
इस बीच, नगालैंड सरकार ने मामले की जांच के लिए जो स्पेशल इन्वेस्टिगशन टीम (एसआईटी) गठित की है, उसके अधिकारी बीती शाम मोन ज़िले में पहुंच गए और उन्होंने जांच शुरू कर दी है.
सरकार ने मामले की जांच के लिए एक महीने का समय दिया है.

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विशेष सचिव (गृह) एसआर सरवनन के मुताबिक एडीजीपी (क़ानून और व्यवस्था) संदीप तामगाडगे एसआईटी के इनचार्ज हैं. वो जांच प्रक्रिया पर नज़र रखेंगे. आईजीपी लिमासुनेप जमीर जांच की अगुवाई कर रहे हैं और उनके साथ जांच दल में चार अन्य अधिकारी आईपीएस रूपा एम, आईपीएस मनोज कुमार, एनपीएस किलांग वालिंग और एनपीएस रेलो आए शामिल हैं.
इस घटना की जांच का दायरा मोन ज़िले के न्यायाधिकरण क्षेत्र के बाहर भी जा सकता है, इसलिए ये मामला राज्य क्राइम पुलिस के हवाले किया गया है.

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आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्ट (आफस्पा) क्या है?
पूर्वोत्तर में बढ़ते अलगाववाद की समस्या को देखते हुए और सेना को कार्रवाई में मदद के लिए 11 सितंबर 1958 को आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्टअर्थात आफ़स्पा पारित किया गया था.
बाद में आतंकवाद से निपटने के लिए 1990 में इस क़ानून को जम्मू-कश्मीर में लागू किया गया. आफ़स्पा क़ानून कहीं भी तब लगाया जाता है जब उस क्षेत्र को वहां की सरकार अशांत घोषित कर देती है.
इसके लिए संविधान में प्रावधान किया गया है और अशांत क्षेत्र क़ानून यानी डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट मौजूद है जिसके अंतर्गत किसी क्षेत्र को अशांत घोषित किया जाता है.
जिस क्षेत्र को अशांत घोषित कर दिया जाता है वहां पर ही आफ़स्पा क़ानून लगाया जाता है और इस क़ानून के लागू होने के बाद ही वहां सेना या सशस्त्र बल भेजे जाते हैं.
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