शांति समझौते के बावजूद क्यों ख़फ़ा हैं नागालैंड के विद्रोही संगठन

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिन था तीन अगस्त का और वर्ष 2015. सबसे बड़े नगा विद्रोही संगठन, नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड यानी एनएससीएन (मुइवाह) और भारत सरकार के बीच शांति समझौता हुआ.
इस समझौते को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'ऐतिहासिक' बताया था. नगा विद्रोही गुट के साथ हुए समझौते पर भारत सरकार की तरफ़ से नियुक्त किए गए मध्यस्थ आर एन रवि ने हस्ताक्षर किए थे. रवि इंटेलीजेंस ब्यूरो के वरिष्ठ अधिकारी थे.
चार साल के बाद, यानी वर्ष 2019 में, रवि को नागालैंड का राज्यपाल नियुक्त कर दिया गया. हालांकि एनएससीएन ने भारत सरकार के साथ वर्ष 2001 में ही युद्ध विराम घोषित कर दिया था. वर्ष 2015 में होने वाले समझौते को काफ़ी अहम माना जाने लगा क्योंकि सरकार को भी लगा कि इसके बाद भूमिगत विद्रोही छापामार गुटों के मुख्यधारा में लौटने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा.
लेकिन ठीक पांच साल के बाद एनएससीएन (मुइवाह) गुट और सरकार के बीच फिर से खटास ज़ाहिर होने लगी. मामले ने तब तूल पकड़ना शुरू कर दिया जब संगठन कार्यपालक सदस्य वी होराम ने बयान जारी कर राज्यपाल द्वारा सरकार को लिखे गए पत्र पर न सिर्फ़ अपनी नाराज़गी जताई बल्कि समझौते का हवाला देते हुए कहा कि उसमें स्पष्ट था कि "नगा भारतीय संविधान का हिस्सा नहीं होंगे बल्कि सहवर्ती होंगे.'
उन्होंने राज्यपाल के पत्र का ज़िक्र करते हुए कहा कि रवि ने लिखा है कि नागालैंड में आधे दर्जन हथियारबंद गिरोह ऐसे हैं जो प्रदेश में अपनी समानांतर सरकार चला रहे हैं. पत्र में राज्यपाल द्वारा ये भी कहा गया कि ये गिरोह राज्य की वैधता को भी चुनौती दे रहे हैं.
राज्यपाल के पत्र के बाद नागालैंड के मुख्य सचिव ने सरकारी कर्मचारियों को निर्देश जारी कर कहा कि सभी बताएं कि "उनका या उनके परिवार का किस विद्रोही गुट के साथ संबंध है"?

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सोमवार को दिल्ली में मुइवाह गुट के सदस्य इकठ्ठा हुए और उन्होंने सरकार से बात करने की पेशकश भी की. सरकार ने नागालैंड के राज्यपाल को वार्ता के लिए बुलाया. मगर मुइवाह गुट के लोगों ने उनसे बात करने से इनकार कर दिया और इंटेलीजेंस ब्यूरो के अधिकारियों के साथ ही गुट के सदस्यों की बातचीत हो पायी.
मुइवाह गुट राज्यपाल को हटाने की मांग कर रहा है. गुट का तर्क है कि वो 70 सालों से नागालैंड के लोगों के अधिकार के लिए लड़ रहा है. ऐसे में इस तरह का अध्यादेश निकाल कर सरकारी कर्मचारियों से कहना कि वो बताएं किस गुट से उनकी रिश्तेदारी है, बहुत आपत्तिज़नक है. उनका तर्क है कि जनजातीय समुदाय में सबकी रिश्तेदारी एक दूसरे से निकल आती है.
आदेश वापस लिया गया
हालांकि नागालैंड की सरकार के अधिकारियों का कहना है कि मुख्य सचिव ने अपना आदेश वापस ले लिया है मगर मुइवाह गुट ने इसे मुद्दा बना लिया है.
जानकारों को लगता है कि नागा गुटों के साथ वर्ष 2015 में जो समझौता हुआ उसमे वर्ष 2017 में एक नया मोड़ तब आया जब सरकार ने इसमें नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स यानी एनएनपीजी गुटों को भी एक पक्ष के रूप में शामिल कर लिया.
नागालैंड से प्रकाशित एक दैनिक की सम्पादक मोनालिसा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि राज्यपाल आर एन रवि ने जो पत्र लिखा था वो पांच पन्नों का है जिसमे भ्रष्टाचार और ग़बन जैसे गंभीर मुद्दों के बारे में ज़िक्र किया गया है. मगर मुइवाह गुट उसमे से सिर्फ़ चार पंक्तियाँ निकालकर आपत्ति जता रहा है.
पूर्वोत्तर भारत और ख़ासतौर पर नागालैंड पर नज़र रखने वालों का कहना है कि सरकार और मुइवाह गुट ने बड़ी ग़लती की है कि उसने समझौते को आम लोगों के साथ साझा नहीं किया है. किसी को कुछ नहीं पता कि समझौते में किन बिन्दुओं पर सहमति बनी है. जबकि मुइवाह गुट दावा करता रहा है कि उसमे राज्य के लिए अलग संविधान और अलग ध्वज पर भी सहमति बनी थी.
लेकिन राज्याल ने स्पष्ट किया कि एक तो संगीनों के साए में अंतहीन समझौता वार्ताएं मुमकिन नहीं हैं और ये भी कि समझौते में न अलग संविधान की बात है और ना ही ध्वज की.
नगा विद्रोह की समस्या का अंत कब होगा?

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पूर्वोत्तर भारत पर लंबे अरसे से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार किशलय भट्टाचार्य बीबीसी से कहते हैं कि नगा समस्या काफ़ी जटिल है जिसके तार अंग्रेजों के शासनकाल तक जाते हैं. उनका कहना है कि नागा विद्रोह के जन्मदाता अंगामी ज्हापू फिज़ो ने तो भारत की स्वतंत्रता के साथ नागालैंड की भी स्वतंत्रता घोषित कर दी थी.
फिज़ो को बाद में गिरफ़्तार कर लिया गया था मगर तब तक नगा विद्रोह पूरी तरह से शुरू हो चुका था. स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनावों का नागालैंड में बहिष्कार हुआ था. वर्ष 1980 में एनएससीएन का गठन हुआ फिर 1988 में ये भी दो गुटों में बंट गया, एक गुट का नेतृत्व आयिज़ेक और थुएन्गलेंग मुइवाह के पास आया तो दूसरे का नेतृव एस एस खापलांग को मिला. अयिज़ेक और मुइवाह गुट ने नागालैंड के मामले को संयुक्त राष्ट तक उठाया.
भारत सरकार के प्रतिनिधि विद्रोही नागा नेताओं से विदेशों में मिलते रहे और उन्हें शांति के रास्ते पर लाने के लिए कोशिश करते रहे हैं. यहां तक कि नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री रहते हुए नगा विद्रोहियों से फ़्रांस में मिले थे जबकि प्रधानमंत्री रहते हुए एच डी देवेगौडा की भी विद्रोहियों से मुलाक़ात स्विट्ज़रलैंड के ज्यूरिक में हुई थी.
मोनालिसा कहती हैं कि शुरू में मुइवाह गुट आर एन रवि से बहुत खुश था. मगर जबसे वो राज्यपाल बने और उन्होंने भारत के संविधान की मर्यादा को लागू करने का प्रयास किया जो इन गुटों को पसंद नहीं आया.
वो कहती हैं कि नगा विद्रोही गुटों की पकड़ सरकार पर रहती है क्योंकि बिना उनके समर्थन के कोई सरकार नहीं बना सकता है. इसके अलावा वो पैसों की उगाही भी करते हैं और वो उसे अपना अधिकार बताते हैं. वो कहतीं हैं कि रवि ने इन्हीं मुद्दों को लेकर आपत्ति जताई है.
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