मणिपुर हिंसाः क्या हिमंत बिस्व सरमा की सुनेंगे मैतेई, कुकी?
दिलीप कुमार शर्मा
बीबीसी हिंदी के लिए, मणिपुर से लौट कर

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मणिपुर के एक गांव में संदिग्ध चरमपंथी हमले में कम से कम नौ लोगों की मौत और 10 लोग घायल हुए हैं. घायलों को राजधानी इम्फ़ाल के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है.
मणिपुर पुलिस ने बताया कि सुबह क़रीब एक बजे सीमावर्ती ज़िले इंफाल ईस्ट और कांगपोकी के खामेनलोक इलाके में हथियारबंद चरमपंथियों ने गांववालों को घेर लिया था.
ये हिंसा जिस स्थान पर हुई, वो जगह मैतेई लोगों के प्रभाव वाले इम्फ़ाल ईस्ट ज़िले और जनजातीय बहुल कांगपोकी ज़िले की सीमा पर है.
सोमवार रात को खामेनलोक इलाके में हुई हिंसा में नौ लोग घायल हो गए थे.
वहीं, सुरक्षा बलों की ओर से बताया गया है कि मंगलवार को बिष्णुपुर ज़िले के फौगाकचाओ इखाई में सुरक्षा बलों और कुकी चरमपंथियों के बीच मुठभेड़ हुई.
कुकी चरमपंथी मैतेई इलाकों के पास बंकर बनाने की कोशिश कर रहे थे, जब सुरक्षा बलों ने उन्हें रोका तो दोनों पक्षों के बीच गोलीबारी हुई.
इस बीच ज़िला अधिकारियों ने पूर्व और पश्चिम इंफाल में कर्फ़्यू में ढील के घंटों में कमी कर दी है.
अब इसे सुबह 5 बजे से शाम 6 बजे की जगह 5 बजे से सुबह 9 बजे तक कर दिया गया है.
क़रीब महीने भर पहले शुरू हुई कुकी और मैतेई समुदाय के बीच हिंसा में अब तक कम से कम 100 लोगों की मौत हो चुकी है और 310 लोग घायल हुए हैं.
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हिमंत बिस्व सरमा मैदान में...

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केंद्र सरकार लगातार यह प्रयास कर रही है कि दोनों समुदायों के बीच शांति बहाल हो. लिहाजा हिमंत बिस्व सरमा को मणिपुर भेजा गया.
हिमंत बिस्वा सरमा को पूर्वोत्तर के संकटमोचक के तौर पर देखा जाता है.
साल 2015 में कांग्रेस से बीजेपी में आए हिमंत लगातार पूर्वोत्तर के एक बड़े नेता के रूप में ख़ुद को स्थापित करने के प्रयास में लगे हैं.
साल 2017 में मणिपुर में बीजेपी को बहुमत नहीं मिलने के बावजूद वहां की सरकार के गठन से लेकर मेघालय, नगालैंड और मिजोरम जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों की सरकार बनाने में उनकी भूमिका को लेकर हिमंत की चर्चा हमेशा ही होती रही है.

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मणिपुर में हिमंत के महत्व को ऐसे भी देख सकते हैं कि वहां के एक वरिष्ठ मंत्री के घर की दीवार पर पीएम नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के साथ हिमंत बिस्वा सरमा की तस्वीर लगी हुई है.

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हालांकि, इन तस्वीरों के बीच बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा कहीं नज़र नहीं आए.
गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में बने राजनीतिक मोर्चे नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस में हिमंत को संयोजक की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी ताकि वे पूर्वोत्तर में कांग्रेस का सफ़ाया कर सकें.
लिहाजा मणिपुर में जारी व्यापक हिंसा के बीच मैतेई समुदाय और कुकी जनजाति के बीच जो जातीय विभाजन हुआ है उसे पाटने की ज़िम्मेदारी अब हिमंत बिस्वा सरमा को सौंपी गई है.
मणिपुर के आंतरिक मामलों में दखल को लेकर मुख्यमंत्री हिमंत पर सवाल

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लेकिन मैतेई समुदाय के कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व को यह समझना चाहिए कि हिमंत बिस्वा सरमा उत्तर पूर्वी राज्यों की आवाज़ के प्रतिनिधि नहीं हैं.
इसके साथ ही मणिपुर में क़रीब तीन दशकों से प्रकाशित हो रहे इंफाल फ्री प्रेस नामक अखबार ने अपनी संपादकीय में लिखा है कि 'यह समझ से बाहर है कि पड़ोसी राज्यों के कुछ मुख्यमंत्री मणिपुर के आंतरिक मामलों में दखल देने में इतनी रुचि क्यों रखते हैं?'
मणिपुर के मानवाधिकार कार्यकर्ता के. ओनिल ने इस बात पर अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है कि उन्हें नहीं लगता कि हिमंत बिस्वा सरमा इस मामले में कुछ कर पाएंगे.
इसकी वजह समझाते हुए वह कहते हैं, "मणिपुर की हिंसा गुजरात और दंतेवाड़ा में हुई हिंसा से बिलकुल अलग है. अगर बाहर से आने वाले नेता अपना खुद का एजेंडा लेकर यहां की समस्या को ठीक करना चाहते है तो कोई समाधान नहीं निकलेगा."

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ओनिल मानते हैं कि इस समय केंद्र सरकार की ओर से ईमानदारी से अपनी प्रतिबद्धता दिखाने की ज़रूरत है.
वे कहते हैं, "अगर सरकार के लोग सही में ईमानदार होते तो पहले दिन से ही इस हिंसा को रोका जा सकता था. मणिपुर को बहुत नुकसान हो चुका है. लिहाजा इस हिंसा को रोकने के लिए सरकार को गंभीरता से प्रयास करने की जरूरत है."
सरमा ने पिछले शनिवार को इंफाल पहुंचकर एन बीरेन सिंह और उनके मंत्रिमंडल समेत कई नागरिक संगठनों से मुलाक़ात की है.
इसके बाद उन्होंने अपने दौरे को "सद्भावना यात्रा" बताया है.
बीती 3 मई से हिंसा शुरू होने के बाद यह उनका पहला मणिपुर दौरा था.
उन्होंने रविवार को गुवाहाटी में वार्ता का समर्थन करने वाले कुछ कुकी चरमपंथी समूहों से भी मुलाक़ात की है.
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पत्रकारों से कहते है, "हमारे लिए मणिपुर में शांति और स्थिरता बहुत जरूरी है. मेरी लोगों के साथ जो भी चर्चा हुई है, मैं उसे आगे की आवश्यक कार्रवाई के लिए केंद्रीय गृह मंत्री को रिपोर्ट करूंगा."
मुख्यमंत्री हिमंत के इंफाल दौरे के बाद भी हुई हिंसा

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हालांकि, मणिपुर के मौजूदा ज़मीनी हालात में मैतेई-कुकी समुदाय के लोगों के बीच इस समय विश्वास बहाली का काम सबसे बड़ी चुनौती है.
मुख्यमंत्री हिमंत की मणिपुर यात्रा के महज़ तीन दिन बाद मंगलवार देर रात इंफाल ईस्ट में हुई गोलीबारी में 9 लोगों की मौत हुई है. जबकि दर्जनों घायल लोगों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है.
इस समय हालात इतने तनावपूर्ण है कि कुकी लोग मैतेई बहुल इंफाल में आने से डर रहे हैं जबकि मैतेई समुदाय के लोग कुकी इलाके में जाने से कतरा रहे हैं.
एक तरफ कुकी लोगों को मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह और उनकी पुलिस पर बिलकुल भरोसा नहीं है.
वहीं मैतेई लोग कुकी चरमपंथियों और असम राइफल्स पर कई तरह के आरोप मढ़ रहे हैं.

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राजधानी इंफाल समेत समूचे प्रदेश में जिस भयानक तरीके से सैकड़ों घरों को जलाया गया है, वहां का नज़ारा किसी युद्ध क्षेत्र जैसा दिखाई पड़ता है.
राज्य में कर्फ़्यू है और इंटरनेट पूरी तरह बंद है. हिंसा रोकने के लिए 40 हज़ार से अधिक सेना और सुरक्षाबलों को उतारा गया है.
ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि क्या असम के मुख्यमंत्री दोनों समुदाय की नाराज़गी को दूर कर राज्य का माहौल शांत कर पाएंगे?
क्योंकि गृह मंत्री अमित शाह ने मणिपुर दौरे के समय सभी पक्षों से बात कर 15 दिनों के भीतर शांति बहाल करने की अपील की थी.
लेकिन इसके बाद भी प्रदेश में हिंसा लगातार जारी है.
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शांति बहाली की उम्मीद कम

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कुकी जनजाति की सर्वोच्च छात्र निकाय कुकी छात्र संगठन के गृह सचिव मांग खोंगसाई ने बीबीसी से बात करके अपनी चिंता ज़ाहिर की है.
उन्होंने कहा, "गृह मंत्री अमित शाह से लेकर राज्यपाल सभी लोगों के प्रयास के बाद भी हिंसा नहीं रुकी है. ऐसे में हमें शांति बहाली को लेकर कोई उम्मीद दिख नहीं रही है."
खोंगसाई इस बात को लेकर आहत हैं कि असम सीएम सरमा ने उनसे मुलाक़ात करने के प्रयास नहीं किए.
वह कहते हैं, "असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इंफाल में कुछ लोगों से मिलकर वापस लौट गए. अगर वे शांति बहाल के लिए ईमानदारी से प्रयास करने आए है तो उन्हें यहां आकर हमसे मिलना चाहिए था. उन्होंने गुवाहाटी में कुछ कुकी ग्रुप से बात की है लेकिन हमें इसकी कोई जानकारी नहीं है."
वहीं, मणिपुर हिंसा पर पीएम मोदी की ओर से प्रतिक्रिया नहीं आने पर कुकी छात्र नेताओं के बीच नाराज़गी का भाव है.
छात्र नेता मांग कहते हैं, "पीएम की प्रतिक्रिया तब आएगी जब उनकी ओर से यहां भेजे गए प्रतिनिधि उन्हें यहां की सही जानकारी देंगे. गृह मंत्री अमित शाह का दौरा होने के बाद भी यहां शांति बहाली को लेकर कुछ नहीं हुआ."
इन छात्र नेताओं का मानना है कि यहां शांति बहाली के लिए राष्ट्रपति शासन ही सबसे सही विकल्प रहेगा.
मणिपुर की राज्यपाल अनुसुइया उइके की अध्यक्षता में केंद्र सरकार ने 51 लोगों की जो शांति कमेटी बनाई है उसको लेकर भी सवाल खड़े हो गए है.
एक तरफ कुकी जनजाति की सर्वोच्च संस्था कुकी इंपी ने शांति समिति के गठन को खारिज किया है.
वहीं, मैतेई समुदाय का नेतृत्व कर रही कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी ने इस शांति कमेटी में शामिल नहीं होने की घोषणा की है.
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केंद्र सरकार के उपाय नाकाफ़ी साबित

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मणिपुर में शांति बहाली के प्रयासों पर कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी के समन्वयक निगोमबम जितेंद्र ने बीबीसी से बात की है.
वह कहते है,"असम के मुख्यमंत्री ने हम लोगों से मुलाकात कर शांति बहाल के लिए कई सुझाव दिए है. अगर वो सकारात्मक सोच के साथ राज्य में शांति लाने का प्रयास करेंगे तो हम उनके सुझाव मानेंगे."
जितेंद्र ने बताया है कि 'हमने उनको मणिपुर में हो रही अवैध घुसपैठ के बारे में भी बताया है. हमें उम्मीद है कि वे शांति बहाल करने की दिशा में कुछ ठोस काम कर सकते है."
मणिपुर में कई दशकों से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप फंजोबम मानते हैं कि सरमा के प्रयासों से कुछ बदलेगा, इस बात को लेकर मैं निश्चिंत नहीं हूं.
वह कहते है, "मैं निश्चित नहीं हूँ कि हिमंत बिस्वा सरमा मणिपुर में जातीय हिंसा के कारण पैदा हुए हालात में कुछ कर पाएंगे.
क्योंकि अब तक सरकार की तरफ से जो कुछ भी किया गया है उससे राज्य में किसी तरह का सुधार देखने को नहीं मिला है. सरकार के प्रयास में कई कमियां है. सरकार 40 हजार सैनिकों को राज्य में उतार चुकी है लेकिन हिंसा लगातार हो रही है."
हिमंत बिस्वा सरमा के बारे में कहा जाता है कि भारत सरकार के साथ लंबे समय से चल रही नागा शांति वार्ता में भी उन्हें अलगाववादी संगठन एनएससीएन (आईएम) की नाराजगी दूर करने के लिए भेजा गया था.
लेकिन वह कुछ ख़ास नहीं कर पाए थे.
बीजेपी का जवाब

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हालांकि, बीजेपी का कहना है कि हिमंत बिस्वा सरमा पूर्वोत्तर के बड़े नेता है और वे इस क्षेत्र की समस्याओं को समझते है.
मणिपुर में वरिष्ठ बीजेपी विधायक के इबोम्चा कहते है, "कुछ लोग हिमंत को लेकर गलत बात कर सकते है लेकिन वे नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस के संयोजक है और पूर्वोत्तर के नेता उनकी बात सुनते है."
मणिपुर में 3 मई से शुरू हुई इस जातीय हिंसा में अब तक 100 से अधिक लोगों की जान गई है जबकि 50 हजार से अधिक लोगों को विस्थापित होना पड़ा है.
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