मणिपुर: अलगाववाद, चरमपंथ और हिंसा का इतिहास
सलमान रावी
बीबीसी संवाददाता

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पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में शांति बहाल करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अलग अलग जनजातियों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से लगातार बातचीत कर रहे हैं.
इसके बावजूद राज्य में माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है और अलग अलग स्थानों से लोग पलायन भी कर रहे हैं.
मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा देने के सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ राज्य में हिंसा भड़क उठी थी.
मैतेई समुदाय और कुकी जनजाति के लोगों में ख़ूनी संघर्ष चलता रहा और हालात तेज़ी से बेकाबू होते चले गए थे.
नौबत यहाँ तक पहुंची कि राज्य में शांति बहाल करने के लिए सेना को उतारना पड़ा.
मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह ने दावा किया कि स्थिति को नियंत्रण में कर लिया गया है और 20 हज़ार के क़रीब लोगों को हिंसाग्रस्त इलाकों से निकालकर शिविरों में पहुंचा दिया गया है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, अमित शाह ने विभिन्न वर्गों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के दौरान कहा कि राज्य में शांति बहाल करना सरकार की सबसे पहली प्राथमिकता है.
फिर सेना, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक के दौरान उन्होंने अधिकारियों को शांति भंग करने वालों से सख़्ती के साथ निपटने का निर्देश दिया. पीटीआई के अनुसार, मणिपुर में 3 मई को अचानक भड़की हिंसा के बाद राज्य में कुल 80 लोग मारे गए हैं.
यहाँ ये बता देना ज़रूरी है कि भारत में विलय के पहले से ये इलाक़ा हिंसक वारदातों का गवाह रहा है और द्वितीय विश्व युद्ध में तो यहाँ जापानी फौजों ने लगातार दो सालों तक बमबारी भी की.

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मणिपुर का नाम ‘ग़रीब नवाज़’ महाराजा ने दिया
अपनी किताब – ‘मणिपुर का इतिहास’ - में जाने माने इतिहासकार ज्योतिर्मय राय लिखते हैं कि मैतेई महाराजा ‘पामहेयीबा’ को ही ‘ग़रीब नवाज’ के नाम से जाना जाता था जिन्होंने इस इलाके में हिन्दू धर्म की स्थापना की थी.
वो मणिपुर के पहले हिन्दू महाराजा थे जिनका शासनकाल 1709 से 1751 तक रहा.
उन्होंने मैतेई धर्म त्याग कर हिन्दू धर्म अपना लिया था और अपने साम्राज्य में इसे लागू कर दिया था.
इतिहासकारों का दावा है कि उन्होंने ही सभी मैतेई समुदाय के लोगों को हिन्दू धर्म शामिल किया था.
वो मूलतः वैष्णव पंथ के अनुयायी थे.
कई इतिहासकारों की किताबों में वर्णन किया गया है कि वो महाराजा ‘पामहेयीबा’ ही थे जिन्होंने ‘कांगलेइपाक’ से अपने साम्राज्य का नाम बदलकर मणिपुर रखा था.
बर्मा और मणिपुर में युद्ध

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बात 1819 की है, जब राजा मरजीत का मणिपुर में शासन था.
ये वही साल है जब तत्कालीन बर्मा ने मणिपुर पर हमला कर दिया था और चाही खारेट तुनगपा ने बतौर राजा मणिपुर में शासन संभाल लिया.
लेकिन कुछ सालों बाद यानी 1825 में गंबीर सिंह के नेतृत्व में मणिपुरियों ने राजा के साथ जंग लड़ी और उन्हें हराकर मणिपुर में अपने शासन को पुनर्स्थापित कर लिया.
उनके निधन के बाद उनके पुत्र चंद्रकीर्त राजा बने. फिर 1886 में उनकी मृत्यु के बाद उनके जयेष्ट पुत्र सूरज चंद की ताजपोशी की गई.
राजा सूरज चंद का शासन 1890 तक ही चला क्योंकि उनके ख़िलाफ़ भाइयों ने बग़ावत कर दी थी. सिंहासन के संघर्ष के बाद कुल्लाचंद्र राजा बन गए. मगर इसी बीच 1891 के अप्रैल माह में ब्रितानी हुकूमत की फ़ौज ने मणिपुर पर हमला कर दिया.
1891 से 1941 तक महाराजा चुराचांद सिंह का शासन चला जबकि महाराजा बुधाचंद्र सिंह मणिपुर के अंतिम राजा रहे जिनका शासन 1949 तक चला.
कई इतिहासकारों ने मणिपुर के राजनीतिक काल खण्डों को अपनी अपनी किताबों में दर्ज किया है.
इसका उल्लेख मुख्य तौर पर प्रोफ़ेसर लाल देना की किताब ‘आधुनिक मणिपुर का इतिहास’, ज्योतिर्मोय राय और प्रोफ़ेसर गंग्मुमेयी काबुयी की इतिहास की किताबों में मिलता है.
वैसे इतिहासकारों ने लिखा है कि मणिपुर साम्राज्य की स्थापना ‘निंगथोउजा’ कुनबे के दस क़बीलों के एक साथ आने के बाद हुई.
इतिहासकार बताते हैं कि ये इलाक़ा बर्मा और चीन के साथ व्यापार का मुख्य केंद्र हुआ करता था.

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द्वितीय विश्व युद्ध में तबाह हुआ मणिपुर
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान की सेना और ‘मित्र देशों’ की सेना के बीच चल रहे युद्ध का एक बड़ा केंद्र भी रहा.
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व वाली ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ का साथ जापान की सेना ने दिया था क्योंकि बोस जापान की सेना की मदद से ब्रितानी हुकूमत को शिकस्त देना चाहते थे.
लेकिन इस मोर्चे पर जापान की सेना और ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा.
मणिपुर दो सालों तक बमबारी झेलता रहा जिसने पूरे प्रांत में भारी तबाही मचाई थी. इस दौरान इंफ़ाल स्थित राजा का महल भी क्षतिग्रस्त हो गया था.
इस तबाही के बाद मणिपुर के लोग ब्रितानी हुकूमत के ख़िलाफ़ गोलबंद होने लगे. आखिरकार ब्रितानी हुकूमत ने 1947 में प्रान्त की बागडोर महाराजा बुधाचंद्र को सौंप दी.
ये बात है 28 अगस्त, 1947 के मध्यरात्रि की है, जिसके बाद महाराजा बुधाचंद्र मणिपुर का तत्कालीन ‘राष्ट्र ध्वज’ लेकर इम्फाल के कांगला में दाख़िल हुए जहां हज़ारों मणिपुरी जमा थे. इस क्षण का जश्न मनाने के लिए 18 तोपें भी दागी गईं.

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भारत के साथ विलय
मणिपुर के महाराजा ने शिलॉन्ग में, 21 सितम्बर 1949 को, भारत के साथ विलय के दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर किये और उसी साल 15 अक्टूबर को मणिपुर भारत का अभिन्न अंग बन गया.
इसकी औपचारिक घोषणा भारतीय सेना के मेजर जनरल अमर रावल ने की थी. महाराजा बुधाचंद्र की मृत्यु वर्ष 1955 में हो गयी.
मणिपुर स्वतंत्र भारत का हिस्सा बन गया था और एक निर्वाचित विधायिका के माध्यम से सरकार का गठन भी हो गया.
फिर 1956 से लेकर 1972 तक मणिपुर केंद्र शासित राज्य बना रहा.
इस बीच अलग राज्य की मांग को लेकर राजनीतिक और छात्र संगठनों का उग्र आन्दोलन भी चलता रहा.
21 जनवरी 1972 को मणिपुर को अलग राज्य का दर्जा दे दिया गया.

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केंद्र शासित होने के बाद शुरू हुआ संघर्ष
मणिपुर में कई जातियां और जनजातियाँ हैं जिनमें आपस के विवाद की वजह से संघर्ष शुरू हो गया.
सरकारी दस्तावेजों के अनुसार मणिपुर में लगभग 30 के आसपास जातियां और जनजातियाँ मौजूद हैं. इनमें सबसे प्रमुख जाति है मैतेई, जिनकी जनसंख्या मणिपुर की कुल आबादी का 50 फ़ीसद है.
मैतेई के लावा यहाँ नगा, कुकी, पेतेस, थादौस, सिम्तेस, राल्तेस, गंग्तेस और हमार जनजातियाँ हैं.
जानकार मानते हैं कि 1956 में केंद्र शासित राज्य घोषित किये जाने के बाद से ही मणिपुर में संघर्ष शुरू हो गया और बाद में ये संघर्ष हिंसक होने लगा.
सामरिक मामलों के ‘थिंक टैंक’, ‘इंस्टिट्यूट ऑफ़ कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट’ के अनुसार इस संघर्ष ने अलगाववाद को भी जन्म दे दिया.
इस दौरान कई अलगाववादी संगठन भी पनप उठे.

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छापामार युद्ध
‘इंस्टिट्यूट ऑफ़ कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट’ ने अपनी एक ‘रिपोर्ट’ में कहा कि सबसे पहले समरेन्द्र सिंह ने ‘यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट’ नाम का संगठन खड़ा किया जो आज़ादी की मांग करने लगा और समाजवादी विचारधारा की वकालत करने लगा.
इसी बीच संगठन के एक नेता ओइनम सुधीर कुमार ने एक अलग धड़ा बना लिया और एक भूमिगत समांनातर सरकार के गठन की घोषणा कर दी. ये बात 1968 के दिसम्बर महीने की है.
ओइनम सुधीर कुमार की ‘रेवोल्युशनरी गवर्नमेंट ऑफ़ मणिपुर’ ने तत्कालीन पूर्वी पकिस्तान (अब बंगलादेश) के सिलहट में अपना मुख्यालय बना लिया.
हालांकि, 1971 की जंग के बाद मणिपुर के तत्कालीन मुख्यमंत्री आर के दोरेंद्रो सिंह ने कई अलगाववादी नेताओं से आत्मसमर्पण करवा लिया, जबकि कुछ बाग़ी मैतेई अलगाववादी नेताओं को गिरफ़्तार भी किया गया.
रिपोर्ट में बताया गया है, “इनमें अलगाववादी नेता एन बिशेश्वर सिंह भी शामिल थे जिन्हें त्रिपुरा की जेल में बंद किया गया था जहां उनकी मुलाक़ात पहले से बंद माओवादी नेताओं से हुई."
जून 1975 में जेल से छूटने के बाद 16 अन्य मेतेई अलगावादी नेताओं के साथ बिशेश्वर सिंह ने तिब्बत के ल्हासा में शरण ले ली.
हथियार चलाने और छापामार युद्ध का प्रशिक्षण लेने के बाद वो अपने सहयोगियों के साथ मणिपुर लौटे. मणिपुर आने के बाद बिशेश्वर ने ‘जनमुक्ति छापामार सेना’ का गठन कर लिया और ‘अलगाववादी संघर्ष ने फिर ज़ोर पकड़ लिया.”
सत्तर के दशक के अंत में और अस्सी के दशक की शुरुआत में कई और अलगाववादी संगठन पनप उठे जिनमें आरके तुलाचंद्र की ‘पीपल्स रेवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ़ कांगलेइपाक’, ‘कांगलेइपाक कम्युनिस्ट पार्टी’ (केसीपी), ‘पोइरेई लिबरेशन फ्रंट’, ‘मेतेई स्टेट कमिटी’ और ‘यूनाइटेड पीपल्स रेवोल्युशनरी सोशलिस्ट पार्टी’ शामिल थे.

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अस्सी के दशक के अंत तक मणिपुर पूरी तरह चरमपंथ की चपेट में आ गया.
इसी दौरान 8 अप्रैल, 1989 को ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ (पीएलए) ने मणिपुर की राजधानी इम्फाल के पास घात लगाकर भारतीय पुलिस सेवा की अधिकारी वंदना मल्लिक की हत्या कर दी थी.
‘इंस्टिट्यूट ऑफ़ कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट’ की ‘रिपोर्ट’ में कहा गया कि पीएलए की राजनीतिक इकाई ‘रेवोल्युशनरी पीपल्स फ्रंट (आरपीएफ) ने बांग्लादेश से ‘निर्वासन की सरकार’ का गठन कर लिया जिसका अध्यक्ष भोरोत सिंह को बनाया गया.
संगठन के कई कैंप म्यांमार और बांग्लादेश में सक्रिय हो गए.
इसी दौरान नगा चरमपंथियों ने भी सक्रिय होना शुरू कर दिया. मणिपुर ने नगा बहुल चंदेल, उखरुल, तामेंगलांग और सेनापति ज़िलों में आइज़ैक मुईवाह के नेतृत्व वाले संगठन ‘नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड’ ने एक के बाद एक हिंसक वारदातों को अंजाम देना शुरू किया.
1993 में मई और सितम्बर महीनों के बीच ‘नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड’ के हथियारबंद चरमपंथियों के हमलों में सुरक्षा बलों के 120 के आसपास जवान और अधिकारी मारे गए थे.
फिर नगा और कुकी जनजाति के चरमपंथी संगठनों के बीच संघर्ष शुरू हो गया.
लागू रहा सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1958
आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पॉवर्स एक्ट यानी सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1958 का ही क़ानून है जो पूर्वोत्तर राज्यों में अलगावादी गतिविधियों और हिंसा को रोकने के लिए बनाया गया था.
हालंकि इस साल मार्च के महीने में इसे मणिपुर, असम और नागालैंड के कई इलाकों से इसे हटा लिया गया था.
ये क़ानून तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिष्णु राम मेढ़ी की पहल पर 1958 में ही लाया गया था.
शुरू में तो ये क़ानून मणिपुर के नगा बहुल उखरुल ज़िले में ही प्रभावी था, मगर 18 सितंबर 1981 को इसे पूरे मणिपुर में लागू कर दिया गया.
फिर 2004 में मणिपुर की राजधानी इम्फाल की नगरपालिका के कुछ इलाकों को इसके प्रभाव से हटा लिया गया.
लगभग 50 वर्षों से ये क़ानून पूर्वोत्तर में मणिपुर के अलावा, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, त्रिपुरा, असम और मेघालय के कुछ इलाकों में लागू रहा है.
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