मोदी सरकार ने अदालत में कहा, घुसपैठ के कारण ही असम में बढ़ी है मुसलमानों की आबादी

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- Author, शुभज्योति घोष
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
केंद्र सरकार ने असम के गुवाहाटी हाईकोर्ट में चल रहे एक मामले में कहा है कि असम में मुसलमानों की आबादी अस्वाभाविक रूप से बढ़ गई है और इसके लिए सीमा पार से आने वाले लोग ही ज़िम्मेदार हैं. बीते शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से डिप्टी सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार देब चौधरी ने अदालत में यह बात कही. उन्होंने यह भी कहा कि भारत के इस हिस्से को देश से काटने के लिए ही यह साज़िश रची गई है.
असम में विदेशी या अवैध घोषित लोगों के डिपोर्टेशन से पहले भारत में रहने के दौरान उनको मिलने वाले अधिकारों से संबंधित एक मामले में केंद्र ने अपना रुख़ साफ़ किया है.
देश के कई क़ानून विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार के इस बयान की तीव्र निंदा की है.
असम के मुस्लिम सिविल सोसायटी के स्थानीय नेताओं ने कहा है कि अगर राज्य में मुसलमानों की आबादी बढ़ी भी है तो इस दावे का कोई आधार या सबूत नहीं है कि सीमा पार से होने वाली घुसपैठ ही इसके लिए ज़िम्मेदार है.
लेकिन दूसरी ओर, कुछ वकीलों का मानना है कि एनआरसी या नेशनल रजिस्टर फ़ॉर सिटीज़ंस के आंकड़ों से ही साफ़ है कि देश में साल दर साल अवैध घुसपैठ होती रही है. उन्होंने बीबीसी से कहा है, "अदालत में केंद्र सरकार का यह बयान शायद उसी धारणा का नतीजा है."
पर्यवेक्षकों का कहना है कि अवैध घुसपैठ असम में बहुत पुराना और संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा है. लंबे अरसे तक चले एनआरसी अभियान के बावजूद इस विवाद का कोई समाधान नहीं हो सका है. अब अदालत में केंद्र का यह रुख़ उस बहस में एक नया आयाम जोड़ेगा.
केंद्र सरकार ने अदालत में क्या कहा?

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दरअसल, जिस मामले पर यह विवाद पैदा हुआ है वह साल 2016 का है. असम के मोरीगांव में एक मुस्लिम वाशिंदा के काग़ज़ात में पिता के नाम में कुछ विसंगति थी, इसी आधार पर ज़िला पुलिस ने 'रेफ़रेंस रिपोर्ट' दी थी और असम के फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने उसे 'विदेशी' घोषित कर दिया था.
लेकिन उस व्यक्ति को अब तक डिपोर्ट नहीं किया जा सका है. इस बीच, साल 2022 में फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने एक अन्य मामले में उसे हिरासत में ले लिया. इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ ही उन्होंने गुवाहाटी हाईकोर्ट में अपील की थी. अब इस सवाल पर सुनवाई चल रही है कि ट्रिब्यूनल की ओर से विदेशी घोषित लोगों के भारत में रहने के दौरान कौन-कौन से अधिकार मिले हैं.
गुवाहाटी हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एएम बुजर बरुआ और न्यायमूर्ति रोबिन फूकन की खंडपीठ में 28 अप्रैल को इसी मामले की सुनवाई में डिप्टी सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार देब चौधरी ने केंद्र का रुख़ साफ़ किया था.
उनका कहना था, "जनसंख्या के आंकड़ों से साफ़ है कि वर्ष 1951 से ही असम में मुसलमानों की आबादी अस्वाभाविक रूप से बढ़ रही है. यह स्वाभाविक वृद्धि नहीं है बल्कि सीमा पार से लोगों के आने के कारण ही ऐसा हो रहा है. सीमा पार से आते ही पहले वह लोग संरक्षित इलाक़े में शरण लेते हैं. देश के इस हिस्से को काट कर दूसरे देश के साथ जोड़ने के लिए ही ऐसा किया जा रहा है."
हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर असम से सटे बांग्लादेश का नाम नहीं लिया, लेकिन सीमा पार से उनका क्या मतलब था, यह साफ़ है.

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डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि साल 1905 में अंग्रेज़ों की ओर से धर्म के आधार पर बंगाल के विभाजन के बाद से ही मुसलमानों को असम लाकर बसाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी. उनका कहना था, "अंग्रेज़ों ने उनको यहां ला कर तटवर्ती इलाक़ों में बसाने की व्यवस्था की थी. तब मुसलमानों के रहने वाले इलाक़ों को चिन्हित करने के लिए इनर लाइन नामक एक रेखा खींची गई थी."
देब चौधरी ने अदालत में कहा कि मुसलमानों ने वहीं रहना शुरू कर दिया. लेकिन उनकी इस बसावट को कोई क़ानूनी समर्थन हासिल नहीं था. इसका कारण यह था कि इनर लाइनर का अस्तित्व सिर्फ़ काग़ज़ पर ही था.
केंद्र ने कहा है कि विदेशी के तौर पर शिनाख़्त के बाद जिन लोगों को अब तक डिपोर्ट नहीं किया जा सका है, उनके पास संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सिर्फ़ राइट टू लाइफ़ या जीवन का अधिकार है.
डिप्टी सॉलिसिटर जनरल की दलील थी कि विदेशी के तौर पर शिनाख़्त लोगों ने पहले अगर किसी ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख़्त की है या लेन-देन किया है तो उसे भी ख़ारिज माना जाएगा. वैसी स्थिति में उस ज़मीन पर राष्ट्र का क़ब्ज़ा हो जाएगा और ख़रीदने वाले उसका इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे.
'केंद्र के दावे का आधार नहीं'

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देश के कई शीर्ष वकीलों ने गुवाहाटी हाईकोर्ट में केंद्र सरकार की इस दलील को 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताया है.
उनमें से कइयों ने बीबीसी से कहा है कि असम के एक ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर सरकार की ओर से ऐसे ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयान की उम्मीद नहीं थी. उन्होंने याद दिलाया है कि डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ने अपने बयान के समर्थन में कोई प्रमाण नहीं पेश किया है.
लेकिन किसी न किसी तौर पर इस मामले से जुड़े होने या इस मामले के विचाराधीन होने के कारण कई लोगों ने इस पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है.
गुवाहाटी हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट और असम में नागरिक अधिकार सुरक्षा समिति के सलाहकार हाफ़िज़ रशीद चौधरी ने बीबीसी बांग्ला से साफ़ कहा, "इस दावे का लेशमात्र भी आधार नहीं है कि घुसपैठ के कारण असम में मुसलमानों की आबादी बढ़ी है. अगर मुसलमानों की आबादी बढ़ने की बात मान भी लें तो जन्म नियंत्रण के तरीक़ों के अभाव या दूसरे किसी कारण से भी ऐसा हो सकता है. लेकिन केंद्र को यह तथ्य आख़िर कहां से मिला कि बांग्लादेश से आने वाले मुसलमान ही यहां आकर आबादी बढ़ा रहे हैं?"

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साल 1985 के असम समझौते में 25 मार्च, 1971 को नागरिकता हासिल करने की कटऑफ़ तारीख़ तय की गई थी. समझौते में कहा गया था कि जो लोग उस तारीख़ से पहले भारत आए हैं उनको ही नागरिकता मिलेगी. देश के नागरिकता क़ानून में इसी लिहाज़ से संशोधन किया गया था.
हाफ़िज़ रशीद चौधरी मानते हैं कि अब जानबूझ कर इस मुद्दे को 1905 के बंग-भंग से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है.
उनका कहना था, "साल 1971 की जनगणना के दस साल बाद साल 1981 में देश में जो जनगणना हुई थी, उसमें असम शामिल नहीं था. असम में 1971 के पूरे बीस साल बाद साल 1991 में जनगणना हुई थी. साल 1971 में मेघालय और अरुणाचल प्रदेश जैसे कई ऐसे राज्य असम का हिस्सा थे जहां मुसलमानों की आबादी हमेशा कम रही है. बीस साल बाद जनगणना के समय तक मेघालय और अरुणाचल प्रदेश को असम से काट कर अलग राज्य का दर्जा दे दिया गया था. ऐसे में यह कोई हैरत की बात नहीं है कि 1991 की जनगणना में असम में आनुपातिक तौर पर मुसलमानों की आबादी बढ़ गई थी."
कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि साल 1971 में मेघालय और अरुणाचल प्रदेश जैसे कई राज्य असम का हिस्सा थे, वहां मुसलमानों की आबादी में हुई उसी वृद्धि को अब महज़ राजनीतिक कारणों से घुसपैठ का मुलम्मा चढ़ा कर पेश किया जा रहा है.
'घुसपैठ एक हक़ीक़त है'

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असम और देश के कई विश्लेषक मानते हैं कि असम में घुसपैठ एक गंभीर समस्या है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती.
सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट शुभदीप राय का कहना है कि देश की शीर्ष अदालत ने भी इस परिस्थिति की बात स्वीकार कर ली है. राय ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "साल 2005 में सर्बानंद सोनोवाल बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा था कि असम विदेशी आक्रामकता का शिकार है (Assam is a victim of foreign aggression)."
न्यायाधीशों ने स्वीकार कर लिया था कि तत्कालीन पूर्व पाकिस्तान और मौजूदा बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर होने वाले अप्रावसन के कारण ही असम में जनसंख्या का चरित्र बदल गया है.
दरअसल, उसी मामले के कारण ही बाद में असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाने का काम शुरू हुआ था जिसे एनआरसी अभियान भी कहा जाता है.
शुभदीप राय के मुताबिक़, "पहले असम के ऐसे 40 लाख लोगों के नाम एनआरसी से बाहर थे, जो अपनी वैध नागरिकता के समर्थन में समुचित काग़ज़ात नहीं पेश कर सके थे. बाद में उनकी अपीलों के आधार पर यह संख्या घट कर भले 19 लाख तक आ गई हो, यह कोई अंतिम कड़ी नहीं है. लेकिन अगर इसे 19 लाख भी मान लें तो कहना होगा कि 3.30 करोड़ की आबादी वाले असम में कम से कम छह प्रतिशत लोग भारत के वैध नागरिक नहीं हैं---वह लोग घुसपैठिए ही हैं."
उन्होंने कहा, "मैं केंद्र सरकार का प्रवक्ता नहीं हूं. लेकिन मेरी राय है कि अदालत में डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ने इसी हक़ीक़त को बयान किया है."
गुवाहाटी हाईकोर्ट में इस अहम मामले की अगली सुनवाई मंगलवार, दो मई को होगी और उसके बाद रोज़ सुनवाई होगी.
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