मणिपुर में 13 मैतई लोगों के शव मिलने के बाद शांति के बारे में सरकारी दावे पर सवाल

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए
मणिपुर में म्यांमार सीमा के पास तेरह लोगों के शव बरामद होने से राज्य में शांति वापस लौटने के सरकार के दावों पर सवाल खड़े हो गए हैं.
ये घटना 4 दिसंबर की है. मणिपुर पुलिस के मुताबिक़, अज्ञात हथियारबंद उपद्रवियों की गोलीबारी में 13 लोग मारे गए थे.
इस बीच शुक्रवार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने गोलीबारी की इस घटना में मारे गए 13 लोगों के मामले में प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को एक नोटिस जारी कर अगले दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है.
टेंग्नौपाल ज़िले के माची पुलिस स्टेशन के अंतर्गत जिस जगह इन लोगों के शव बरामद किए गए वो जगह म्यांमार बॉर्डर के बिलकुल पास है.
पुलिस के अनुसार, गोलियों से छलनी सभी शवों की शिनाख़्त कर ली गई है और वे सभी इंफाल घाटी के रहने वाले थे और मैतेई समुदाय से ताल्लुक रखते थे.
इन शवों को मंगलवार इंफाल पूर्व में जवाहरलाल नेहरू आयुर्विज्ञान संस्थान ले जा गया जहां पोस्टमार्टम करने के बाद उनके परिवारों को सौंप दिया गया.
इन लोगों के कई रिश्तेदारों का कहना है कि 'उन्हें नहीं पता था कि वे किन परिस्थितियों में म्यांमार सीमा के पास जंगल में पहुंचे थे.' ये सभी लोग बिष्णुपुर, इंफाल पश्चिम, इंफाल पूर्व और काकचिंग ज़िलों के रहने वाले थे.
माची पुलिस स्टेशन के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बीबीसी से कहा, "गोलीबारी की घटना में मारे गए सभी 13 लोग इंफाल घाटी के रहने वाले थे. सभी मृतकों की पहचान कर ली गई है."
"हमें शुरुआती जांच से पता चला कि वे सभी लोग किसी संगठन से जुड़े थे जो शत्रुतापूर्ण क्षेत्र में प्रवेश कर गए थे. हमने एक मामला दर्ज किया है और आगे की जांच की जा रही है."
घटना को लेकर आक्रोश

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कई रिपोर्टों में यह बात सामने आई है कि उस रोज 22 युवक पीपुल्स लिबरेश आर्मी (पीेएलए) में भर्ती होने म्यांमार जा रहे थे लेकिन रास्ते में हुई गोलीबारी में 13 लोग मारे गए.
इस सवाल के जवाब में पुलिस अधिकारी ने कहा, "फिलहाल इस घटना की जांच की जा रही है और इससे अधिक जानकारी अभी नहीं दी जा सकती."
मणिपुर पुलिस ने भी आधिकारिक तौर पर एक ट्वीट कर इस गोलीबारी की घटना में 13 लोगों की मौत होने की जानकारी दी है. ये हत्याएं किन परिस्थितियों में हुई हैं ये जानकारी अभी मणिपुर पुलिस ने नहीं दी है.
मृतकों के परिजनों ने कुकी चरमपंथियों पर हत्या के आरोप लगाए हैं. हालांकि इन आरोपों की पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं की जा सकती है.
इस घटना को लेकर मैतेई समुदाय के लोग गुस्से में हैं. मंगलवार की देर शाम अंतिम संस्कार करने से पहले राजधानी इंफाल के कई जगहो पर भारी विरोध प्रदर्शन किया गया. इस दौरान बाज़ार और कार्यालय बंद रहे.
मृतक रॉकी थिंगोम की बहन रोज़ी ने मीडिया से बात करते हुए कहा, "हमारा परिवार जातीय हिंसा के कारण तोरबुंग से विस्थापित हो गया था और हम इंफाल पश्चिम ज़िले के थांगमीबंद में एक राहत शिविर में चले गए थे. मेरा भाई राहत शिविर में स्थानांतरित होने के तुरंत बाद कहीं चला गया और अब उसका शव मिला है."
रोज़ी ने कहा कि उनके भाई ने जाने से पहले मां से 'विजयी होने' और 'हमारी मातृभूमि के लिए लड़ने का आशीर्वाद' मांगा था.
रोजी ने दावा किया, “अगर वह गोलीबारी में मर गया होता, तो ठीक था. लेकिन उसे कुकी चरमपंथियों ने पकड़ लिया और प्रताड़ित किया. इसके बाद उसे मार डाला गया.”
अभी तक किसी कुकी संगठन ने इस घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि भी नहीं की जा सकती है.
अंतिम संस्कार के दौरान जमा हुए लोगों ने अपना गुस्सा व्यक्त करते हुए कहा कि 'सीएम बीरेन सिंह के नेतृत्व में मणिपुर एक अराजक राज्य' बन गया है.
सीएम की चुप्पी

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मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने 4 दिसंबर को सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स के अपने आधिकारिक अकाउंट पर कुल तीन ट्वीट किए लेकिन टेंग्नौपाल ज़िले के लीथाओ गांव में हुई इस घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
मुख्यमंत्री ने ना ही अभी तक कोई सार्वजनिक बयान दिया है.
इन घटना के महज़ दो दिन पहले ही मणिपुर सरकार ने कहा था कि 'नेशनल रिवोल्यूशनरी फ्रंट मणिपुर (एनआरएफ़एम) अलगाववादी संगठन के करीब 25 कैडर 25 हथियारों के साथ शांति वार्ता में आ गए हैं.'
इसके कुछ दिन पहले ही मणिपुर के सबसे पुराने मैतेई विद्रोही संगठन यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ़) के एक गुट ने भारत सरकार के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.
राज्य में शांति स्थापित करने के इन दावों को लेकर अभी चर्चा शुरू ही हुई थी और टेंग्नौपाल में यह घटना घट गई जिसने मणिपुर की क़ानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ख़ुद भी मैतेई समुदाय से ही आते हैं.
म्यांमार जाने के दावे

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मणिपुर के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि ये सभी लोग चरमपंथी संगठन में भर्ती होने म्यांमार जा रहे थे.
मणिपुर के चरपमंथी संगठन देश से बाहर अपने काडर को प्रशिक्षण देते रहे हैं. म्यांमार में चरमपंथियों के कैंप होने की जानकारी भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास भी है.
1978 में बने पीएलए को भारत सरकार ने प्रतिबंधित संगठन घोषित कर रखा है जिसमें ज़्यादातर कैडर घाटी इलाकों से हैं.
मानवाधिकार कार्यकर्ता के अनुसार, "राज्य में 3 मई से मैतेई समुदाय और कुकी जनजाति के बीच जारी जातीय हिंसा के बाद से ही कुछ चरमपंथी गुट युवाओं को मातृभूमि की सेवा करने जैसी बातों में फंसा कर अपने संगठन में भर्ती करने का प्रयास कर रहें हैं."
"उस दिन कुल 22 लोग विद्रोही संगठन पीएलए में भर्ती होने के लिए म्यांमार के लिए निकले थे. इनमें 9 लोग सुरक्षित म्यांमार पहुंच गए. लेकिन 13 लोग सीमा के पास वाले जंगलों में हुई गोलीबारी में मारे गए. इन सभी लोगों की उम्र 17 से 45 वर्ष के बीच थी. ऐसा संदेह किया जा रहा है कि कुकी चरमपंथियों ने घात लगाकर इन लोगों पर हमला किया."
हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है और अभी तक किसी कुकी समूह ने इस हत्याकांड की ज़िम्मेदारी नहीं ली है.
किसी मैतेई संगठन ने भी अभी तक इन लोगों के अपने साथ जुड़ने या इस घटना को लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
'मणिपुर क़ानून विहीन राज्य बन गया है'

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मणिपुर में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे प्रदीप फंजोबम मणिपुर के मौजूदा हालात को राज्य के युवाओं के लिए काफी नाज़ुक बताते हैं.
वो कहते है, "मणिपुर में शांति स्थापित करने की बजाए एक अराजकता का माहौल पैदा कर दिया गया है. यह सरकार कुछ नहीं कर पा रही है. मणिपुर इस समय एक क़ानून विहीन राज्य बन गया है."
"मरने वाले ज्यादातर बहुत कम उम्र के युवा थे. केंद्र सरकार भी कोई उपाय नहीं कर रही है. लिहाजा यह लड़ाई अभी ख़त्म होती नहीं दिख रही. जिस यूएनएलएफ़ की बात हो रही है उसका एक धड़ा अब भी सक्रिय है."
"मणिपुर में ऐसे कई चरमपंथी गुट हैं जो राज्य में अशांति के कारण इस हिंसा की आड़ में युवाओं को गुमराह कर रहे हैं."
एक सामूहिक निर्णय के तहत इन 13 शवों का अंतिम संस्कार इंफाल पूर्व ज़िले में स्थित एंड्रो नामक जगह में किया गया.
इस दौरान शोक सभा में भाग लेने आए लोगों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पीड़ित परिवारों को केवल सरकार से मुआवज़ा और नौकरी की पेशकश स्वीकार नहीं करनी चाहिए.
उनका तर्क था सरकार मुआवज़ा देकर समस्या का समाधान करना भूल जाती है जिससे आगे अन्य लोगों को नुक़सान उठाना पड़ता है.
- मणिपुर में मैतेई और कुकी लोगों के बीच पिछले पिछले 9 महीनों से संघर्ष चल रहा है
- मैतेई और कुकी लोगों के इलाक़े बंटे हैं और दोनों समुदायों में ग़हरे मतभेद हैं
- अब तक इस हिंसा में क़रीब 200 लोग मारे जा चुके हैं
- 4 दिसंबर को म्यांमार सीमा के पास कुकी इलाक़े में 13 मैतेई लोगों के शव मिले
- गोलीबारी की घटना में इनकी मौत हुई, पुलिस घटना की जांच कर रही है
- किसी संगठन ने इस हत्याकांड की ज़िम्मेदारी नहीं ली है
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