मनमोहन सिंह को ढूंढ़कर लाए थे नरसिम्हा राव

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जॉन एफ़ केनेडी और फ़ील्ड मार्शल मोंटगोमरी की जीवनी लिखने वाले नाइजल हैमिल्टन कहते हैं- 'बायोग्राफ़ी इज़ सिंपली द ऑरफ़न ऑफ़ अकेडिमिया.'

अगर कोई राजनीतिक शख़्सियत वो सब करती है जो ऐतिहासिक ताक़तें उसके लिए अपरिहार्य कर देती हैं, तो फिर वो शख़्स इतना मायने नहीं रखता, जितना कि ‘समय’ का वो ‘क्षण’ मायने रखता है.

अगर इस संदर्भ में नरसिम्हा राव को देखा जाए तो 1991 में उनकी राजनीतिक पारी का एक तरह से अंत हो गया था. रोजर्स रिमूवल कंपनी का ट्रक उनकी किताबों के 45 कार्टन लेकर हैदराबाद रवाना हो चुका था.

ये अलग बात है कि उनके एक नौकरशाह मित्र ने, जो शौकिया ज्योतिषी भी थे, उनसे कहा था, “इन किताबों को यहीं रहने दीजिए. मेरा मानना है कि आप वापस आ रहे हैं.”

विनय सीतापति अपनी किताब ‘हाफ़ लायन- हाऊ पीवी नरसिम्हा राव ट्रांसफ़ॉर्म्ड इंडिया’ में लिखते हैं कि नरसिम्हा राव इस हद तक रिटायरमेंट मोड में चले गए थे कि उन्होंने दिल्ली के मशहूर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की सदस्यता के लिए आवेदन कर दिया था, ताकि अगर भविष्य में वो कभी कुछ दिनों के लिए दिल्ली आएं तो उन्हें रहने की दिक्कत न हो.

लेकिन तभी अचानक जैसे सब कुछ पलट गया. 21 मई, 1991को श्रीपेरंबदूर में राजीव गाँधी की हत्या हो गई. इस घटना के कुछ घंटों के भीतर जब बीबीसी के परवेज़ आलम ने उनसे नागपुर में संपर्क किया तो उनसे हुई बातचीत से इस बात का दूर दूर तक अंदाज़ा नहीं लगा कि अगले कुछ दिनों में वो भारत के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं.

नटवर सिंह ने बीबीसी को बताया कि राजीव गाँधी की हत्या के बाद जब शोक व्यक्त करने आए सभी विदेशी मेहमान चले गए तो सोनिया गाँधी ने इंदिरा गाँधी के पूर्व प्रधान सचिव पीएन हक्सर को 10, जनपथ तलब किया. उन्होंने हक्सर से पूछा कि आपकी नज़र में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए कौन सबसे उपयुक्त व्यक्ति हो सकता है? हक्सर ने तत्कालीन उप राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा का नाम लिया.

नटवर सिंह और अरुणा आसफ़ अली को ज़िम्मेदारी दी गई कि वो शंकरदयाल शर्मा का मन टटोलें. शर्मा ने इन दोनों की बात सुनी और कहा कि वो सोनिया की इस पेशकश से अभिभूत और सम्मानित महसूस कर रहे हैं लेकिन “भारत के प्रधानमंत्री का पद एक पूर्णकालिक ज़िम्मेदारी है. मेरी उम्र और मेरा स्वास्थ्य, मुझे देश के इस सबसे बड़े पद के प्रति न्याय नहीं करने देगा.”

इन दोनों ने वापस जाकर शंकरदयाल शर्मा का संदेश सोनिया गाँधी तक पहुंचाया. एक बार फिर सोनिया ने हक्सर को तलब किया. इस बार हक्सर ने नरसिम्हा राव का नाम लिया. आगे की कहानी इतिहास है. नरसिम्हा राव भारतीय राजनीति के ऊबड़खाबड़ धरातल से ठोकरें खाते हुए सर्वोच्च पद पर पहुंचे थे. किसी पद को पाने के लिए उन्होंने किसी राजनीतिक पैराशूट का सहारा नहीं लिया था. राव का कांग्रेस और भारत के लिए सबसे बड़ा योगदान था डॉक्टर मनमोहन सिंह की खोज.

विनय सीतापति ने बीबीसी को बताया, “जब नरसिम्हा राव 1991 में प्रधानमंत्री बने तो वो कई चीज़ों के विशेषज्ञ बन चुके थे. स्वास्थ्य और शिक्षा मंत्रालय वो पहले देख चुके थे. वो भारत के विदेश मंत्री भी रह चुके थे. एक ही विभाग में उनका हाथ तंग था, वो था वित्त मंत्रालय. प्रधानमंत्री बनने से दो दिन पहले कैबिनेट सचिव नरेश चंद्रा ने उन्हें आठ पेज का एक नोट दिया था जिसमें बताया गया था कि भारत की आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब है.”

सीतापति आगे कहते हैं, “उनको एक चेहरा या मुखौटा चाहिए था जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और उनके घरेलू विरोधियों को संबल बंधा सके कि भारत अब पुराने ढर्रे से नहीं चलेगा. उन्होंने उस समय के अपने सबसे बड़े सलाहकार पीसी एलेक्ज़ेंडर से पूछा कि क्या आप वित्त मंत्री के लिए ऐसे शख़्स का नाम सुझा सकते हैं जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता हो. अलेक्ज़ेंडर ने उन्हें रिज़र्व बैंक के गवर्नर रह चुके और लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स के निदेशक आईजी पटेल का नाम सुझाया.”

सीतापति के मुताबिक, “आईजी पटेल दिल्ली आना नहीं चाहते थे क्योंकि उनकी माँ बीमार थीं और वो वड़ोदरा में रह रहे थे. फिर एलेक्ज़ेंडर ने ही मनमोहन सिंह का नाम लिया. एलेक्ज़ेंडर ने शपथ ग्रहण समारोह से एक दिन पहले मनमोहन सिंह को फ़ोन किया. उस समय वो सो रहे थे क्योंकि कुछ घंटे पहले ही विदेश से लौटे थे. जब उन्हें उठाकर इस प्रस्ताव के बारे में बताया गया तो उन्होंने इस पर विश्वास नहीं किया.”

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“अगले दिन शपथ ग्रहण समारोह से तीन घंटे पहले मनमोहन सिंह के पास विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के दफ़्तर में नरसिम्हा राव का फ़ोन आया कि मैं आपको अपना वित्त मंत्री बनाना चाहता हूँ. शपथ ग्रहण समारोह से पहले नरसिम्हा राव ने मनमोहन सिंह से कहा कि अगर हम सफल होते हैं तो हम दोनों को इसका श्रेय मिलेगा लेकिन अगर हमारे हाथ असफलता लगती है तो आपको जाना पड़ेगा.”

सीतापति बताते हैं कि 1991 के बजट से दो हफ़्ते पहले जब मनमोहन सिंह बजट का मसौदा लेकर नरसिम्हा राव के पास गए तो उन्होंने उसे सिरे से ख़ारिज कर दिया. उनके मुंह से निकला, “अगर मुझे यही चाहिए था तो मैंने आपको क्यों चुना?”

अपने पहले बजट में मनमोहन सिंह ने विक्टर ह्यूगो की उस मशहूर लाइन का ज़िक्र किया था कि “दुनिया की कोई ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती, जिसका समय आ पहुंचा है.” उन्होंने अपने बजट भाषण में राजीव गांधी, इंदिरा और नेहरू का बार-बार नाम ज़रूर लिया, लेकिन उनकी आर्थिक नीतियों को पलटने में वो ज़रा भी नहीं हिचके.

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एक ज़माने में विश्वनाथ प्रताप सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके प्रेम शंकर झा कहते हैं कि राव अपने मंत्रियों से काम करवाते थे और पीछे से उनका सपोर्ट करते थे. उस समय भी कांग्रेस के अंदर एक 'जिंजर ग्रुप' हुआ करता था जो नेहरुवियन सोशलिज़्म का नाम लेकर उन पर ग़द्दारी का आरोप लगाया करता था.

मनमोहन सिंह कहा करते थे कि मंत्रिमंडल में हर कोई उनके ख़िलाफ़ हुआ करता था लेकिन उनके पास हमेशा एक शख़्स का बहुमत होता था... वो थे प्रधानमंत्री राव. जब उनको यूरो मनी ने 1994 में सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्री का पुरस्कार दिया था तो उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि इसका श्रेय नरसिम्हा राव को दिया जाना चाहिए.

लेकिन नरसिम्हा राव के बढ़ते राजनीतिक ग्राफ़ को बहुत बड़ा धक्का तब लगा जब 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया और वो कुछ नहीं कर पाए.

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कुलदीप नय्यर ने अपनी आत्मकथा में लिखा, “मुझे जानकारी है कि राव की बाबरी मस्जिद विध्वंस में भूमिका थी. जब कारसेवक मस्जिद को गिरा रहे थे, तब वो अपने निवास पर पूजा में बैठे हुए थे. वो वहाँ से तभी उठे जब मस्जिद का आख़िरी पत्थर हटा दिया गया.” लेकिन विनय सीतापति इस मामले में नरसिम्हा राव को क्लीन चिट देते हैं.

सीतापति कहते हैं, “नवंबर 1992 में दो विध्वंसों की योजना बनाई गई थी- एक थी बाबरी मस्जिद की और दूसरी खुद नरसिम्हा राव की. संघ परिवार बाबरी मस्जिद गिराना चाह रहा था और कांग्रेस में उनके प्रतिद्वंद्वी नरसिम्हा राव को. राव को पता था कि बाबरी मस्जिद गिरे या न गिरे उनके विरोधी उन्हें ज़रूर 7- आरसीआर से बाहर देखना चाहते थे. नवंबर 1992 में सीसीपीए की कम से कम पाँच बैठकें हुईं. उनमें एक भी कांग्रेस नेता ने नहीं कहा कि कल्याण सिंह को बर्ख़ास्त कर देना चाहिए.”

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सीतापति आगे बताते हैं, “राव के अफ़सर उन्हें सलाह दे रहे थे कि आप किसी राज्य सरकार को तभी हटा सकते हैं जब कानून और व्यवस्था भंग हो गई हो न कि तब जब कानून और व्यवस्था भंग होने का अंदेशा हो. रही बात बाबरी मस्जिद गिरने के समय राव के पूजा करने की कहानी की तो क्या कुलदीप नय्यर वहाँ स्वयं मौजूद थे? वो कहते हैं कि उनको ये जानकारी समाजवादी नेता मधु लिमए ने दी थी जिनको ये बात प्रधानमंत्री कार्यालय में उनके एक 'सोर्स' ने बताई थी. उन्होंने इस सोर्स का नाम नहीं बताया.”

विनय सीतापति कहते हैं कि उनका शोध बताता है कि ये बात ग़लत है कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने के समय नरसिम्हा राव सो रहे थे या पूजा कर रहे थे. नरेश चंद्रा और गृह सचिव माधव गोडबोले इस बात की पुष्टि करते हैं कि वो उनसे लगातार संपर्क में थे और एक-एक मिनट की सूचना ले रहे थे.

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लेकिन राजनीतिक विश्लेषक और इस समय इंदिरा गांधी सेंटर ऑफ़ आर्ट्स के निदेशक रामबहादुर राय कहते हैं, “जब 1991 में ये लगने लगा कि बाबरी मस्जिद पर ख़तरा मंडरा रहा है, तब भी उन्होंने इसे कम करने की कोई कोशिश नहीं की. राव के प्रेस सलाहकार रहे पीवी आरके प्रसाद ने एक किताब लिखी है जिसमें वो बताते हैं कि किस तरह राव ने मस्जिद गिरने दी. वो वहाँ पर मंदिर बनाने के लिए उत्सुक थे, इसलिए उन्होंने रामालय ट्रस्ट बनवाया.”

राय आगे कहते हैं, “मस्जिद गिराए जाने के बाद तीन बड़े पत्रकार निखिल चक्रवर्ती, प्रभाष जोशी और आरके मिश्र नरसिम्हा राव से मिलने गए. मैं भी उनके साथ था. ये लोग जानना चाहते थे कि 6 दिसंबर को आपने ऐसा क्यों होने दिया? मुझे याद है कि सबको सुनने के बाद नरसिम्हा राव ने कहा कि क्या आप लोग ऐसा समझते हैं कि मुझे राजनीति नहीं आती? ”

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राय कहते हैं, “मैं इसका अर्थ ये निकालता हूँ कि अपनी राजनीति के तहत और ये सोचकर कि अगर बाबरी मस्जिद गिरा दी जाएगी तो भारतीय जनता पार्टी की मंदिर की राजनीति हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी, उन्होंने इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया. मेरा मानना है कि राव किसी ग़लतफ़हमी में नहीं, भारतीय जनता पार्टी से सांठगांठ के कारण नहीं बल्कि इस विचार से कि उनसे वो ये मुद्दा छीन सकते हैं, उन्होंने एक-एक कदम इस तरह उठाया कि बाबरी मस्जिद का ध्वंस हो जाए.”

सीतापति इस तर्क को सिरे से नकारते हैं और अपने समर्थन में राव के निजी डाक्टर श्रीनाथ रेड्डी से हुई अपनी बात का हवाला देते हैं. बीबीसी से बात करते हुए डाक्टर श्रीनाथ रेड्डी ने कहा, “जब मैंने टेलिविजन पर बाबरी मस्जिद को गिरते हुए देखा तो मैंने सोचा कि मुझे राव के पास जाना चाहिए, क्योंकि वो दिल के मरीज़ हैं. जब मैं उनके पास पहुंचा तो वो अधिकारियों से घिरे हुए थे. मुझे देखते ही वो नाराज़ हो गए और बोले तुम यहाँ क्यों आए हो?”

डॉक्टर रेड्डी बताते हैं, “मैंने कहा कि मुझे आपकी जाँच करनी है. बड़ी मुश्किल से मैं उन्हें बगल वाले कमरे में ले गया. मैंने जब उनकी जाँच की तो पाया कि उनका दिल तेज़ी से धड़क रहा था, नाड़ी भी तेज़ चल रही थी. ब्लड प्रेशर बहुत ऊँचा था. उनका चेहरा उत्तेजना से लाल था और वो बहुत एजिटेटेड थे. मैंने उनको तुरंत एक गोली दी और तभी वहाँ से हटा जब उनकी हालत थोड़ी बेहतर हो गई. उनके शरीर की जाँच से ये नहीं लगा कि उनकी इस ट्रेजेडी में कोई साठगाँठ थी. द बॉडी डज़ नॉट लाई.”

मैंने मशहूर पत्रकार सईद नक़वी से पूछा कि क्या इस मामले में नरसिम्हा राव की भूमिका को ज़्यादा से ज़्यादा एक राजनीतिक 'मिस-कैलकुलेशन' या 'एरर ऑफ़ जजमेंट' कहा जाए? नकवी का जवाब था, “क्या राव के साथ-साथ उनके गृह मंत्री भी इसका शिकार थे? और शाम को भारत सरकार के बड़े अधिकारी अपने माथे पर तिलक लगाकर घूम रहे थे मानो इस घटना को सेलीब्रेट कर रहे हों, इसको आप क्या कहेंगें?”

नकवी आगे कहते हैं, “इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि इसके बाद से कांग्रेस पार्टी का मुसलमानों ने नाम लेना छोड़ दिया और कांग्रेस पार्टी को इसकी बड़ी राजनीतिक क़ीमत चुकानी पड़ी.”

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हालांकि नरसिम्हा राव को कांग्रेस और देश का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी सोनिया गांधी ने ही दी थी लेकिन कुछ दिनों के भीतर ही दोनों के बीच ग़लतफ़हमियाँ पैदा हो गईं. सोनिया गांधी पर किताब लिखने वाले राशिद क़िदवई कहते हैं, “राव राजनीतिक व्यक्ति थे. वो भी सोनिया गाँधी का इस्तेमाल करना चाहते थे. जब भी मंत्रिमंडल में फेरबदल करना चाहते थे, वो उनसे सलाह मशविरा करते थे. दोनों एक-दूसरे का आदर भी करते थे. जब राजीव गांधी फ़ाउंडेशन की बैठक की बात आई तो राव समझ गए कि सोनिया को बैठक के लिए 7 रेसकोर्स रोड आने में दिक्कत है क्योंकि वहाँ से उनकी बहुत सी यादें जुड़ी हुई थीं. उन्होंने खुद पेशकश की थी कि वो इस बैठक के लिए सोनिया के निवास स्थान 10- जनपथ आएंगे.”

“ये उनका बड़प्पन था लेकिन बीच के लोग जैसे अर्जुन सिंह, माखनलाल फ़ोतेदार और विंसेंट जॉर्ज उनके बीच ग़लतफ़हमियाँ पैदा करने की कोशिश करते थे. नरसिम्हा राव भी दूध के धुले नहीं थे. वो किसी की कठपुतली बनकर नहीं रहना चाहते थे. सोनिया गाँधी को उस समय राजनीति की इतनी समझ नहीं थी. इसलिए धीरे-धीरे उनके बीच दूरियाँ बढ़ती चली गईं.”

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विनय सीतापति बताते हैं कि पहले राव महीने में दो बार सोनिया गांधी से मिलने जाते थे. लेकिन बाद में दोनों के बीच इतनी दूरी बढ़ गई कि जब राव सोनिया गांधी को फ़ोन करते थे तो सोनिया उन्हें फ़ोन पर चार-पाँच मिनट तक इंतज़ार करवाती थीं. उस समय राव ने अपने एक नज़दीकी को बताया था कि मुझे निजी तौर पर फ़ोन होल्ड करने पर कोई एतराज़ नहीं है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री को ज़रूर है.

सीतापति इस किताब में रहस्योद्घाटन करते हैं कि 1996 में जब अटलबिहारी वाजपेई की 13 दिन की सरकार बनी थी तो उन्होंने नरसिम्हा राव का समर्थन लेने की कोशिश की थी.

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इसकी पुष्टि करते हुए राव के ज्योतिषी और राजनीतिक सलाहकार पंडित एनके शर्मा ने बीबीसी को बताया, “अटलबिहारी वाजपेई मेरे पिता को जानते थे. मैं उनकी तरफ़ से ये प्रस्ताव लेकर नरसिम्हा राव के पास गया था. पेशकश ये थी कि उनके ख़िलाफ़ चल रहे सारे मुकदमे वापस ले लिए जाएंगे और 1997 में राष्ट्रपति पद के लिए वो उम्मीदवार होंगे. लेकिन नरसिम्हा राव ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि वो कांग्रेस पार्टी के साथ ग़द्दारी नहीं कर सकते. हालांकि उसी कांग्रेस पार्टी ने उनके साथ बाद में बहुत ख़राब व्यवहार किया.”

विनय सीतापति कहते हैं, “जब 2004 में नरसिम्हा राव का देहांत हुआ तो अटलबिहारी वाजपेई ने स्वीकार किया कि वो नहीं बल्कि नरसिम्हा राव भारतीय परमाणु परीक्षण के असली पितामह थे. जब वाजपेई 16 मई 1996 को प्रधानमंत्री बने तो नरसिम्हा राव, एपीजे अब्दुल कलाम और आर चिदंबरम के साथ उनसे मिलने गए थे. उन्होंने तब उनसे कहा था कि सामग्री तैयार है. आप कभी भी परीक्षण करने का फ़ैसला ले सकते हैं.”

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लेकिन नरसिम्हा राव के जीवन की साँध्यबेला में स्वयं उनकी पार्टी ने उनसे किनारा कर लिया. वो बहुत एकाकी और अपमानित होकर इस दुनिया से विदा हुए. न सिर्फ़ उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में नहीं होने दिया गया, बल्कि उनके पार्थिव शरीर को भी कांग्रेस मुख्यालय 24, अकबर रोड के अंदर नहीं आने दिया गया. उन पर डाक टिकट जारी करने की मांग नहीं हुई. न ही किसी ने उन्हें भारत रत्न देने की मांग की. शायद कुछ समय बाद इतिहास उनका सही मूल्यांकन कर पाए.

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