तमिलनाडु के सीएम स्टालिन ने कहा, 'यहां हिन्दी के लिए कोई जगह ना थी, ना है, ना रहेगी'

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मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के एक ताज़ा बयान ने तमिलनाडु में हिन्दी भाषा पर चल रही बहस को एक बार फिर हवा दे दी है.
रविवार को राज्य में सत्तारूढ़ डीएमके ने चेन्नई में 'भाषा शहीद दिवस' मनाया और इस मौके पर मुख्यमंत्री ने राज्य के उन 'भाषा शहीदों' को श्रद्धांजलि दी, जिनकी जान अतीत में 'हिन्दी विरोधी आंदोलन' के दौरान गई थी.
स्टालिन ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, "न तब, न अभी, ना ही कभी हिन्दी को यहां जगह मिलेगी."
हिन्दी को लेकर केंद्र की एनडीए सरकार और राज्य की डीएमके सरकार के बीच लंबे समय से तनातनी बनी हुई है, हालांकि इसकी जड़ें अतीत में रही हैं.
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डीएमके अध्यक्ष स्टालिन कई बार आरोप लगा चुके हैं कि तमिलनाडु पर हिन्दी थोपने की कोशिश की जा रही है और वो इसका विरोध करना जारी रखेंगे.
हालांकि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कुछ महीने पहले कहा था कि, "तमिलनाडु सरकार इस पर राजनीति कर रही है."
उनका कहना था कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय भाषाओं को महत्व देने वाली है और इसमें कहीं भी ये नहीं कहा गया है कि हिन्दी की ही पढ़ाई जानी चाहिए.
स्टालिन ने क्या कहा?

रविवार को एक्स पर स्टालिन ने लिखा, "भाषा शहीद दिवस, गौरवशाली श्रद्धांजलि, हिन्दी के लिए कोई जगह नहीं है, न तब थी, न अब है और ना ही कभी होगी."
उन्होंने आगे लिखा, "वह राज्य जो अपनी भाषा से अपनी जीवनधारा जैसा प्यार करता है, उसने एकजुट होकर हिन्दी थोपे जाने के ख़िलाफ़ संघर्ष किया. हर बार जब हिन्दी थोपी गई, उसने उसी बहादुरी के साथ प्रतिरोध किया."
"उसने भारतीय उपमहाद्वीप में विविध भाषा-आधारित राष्ट्रों के अधिकारों और अस्मिता की रक्षा की. मैं उन शहीदों को हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ जिन्होंने तमिल (भाषा) के लिए अपने प्राणों की आहुति दी."
"अब से भाषा संघर्ष में और कोई प्राण न खोए; हमारी तमिल चेतना कभी न बुझे! हम हिन्दी थोपे जाने का हमेशा विरोध करेंगे."
उन्होंने हिन्दी विरोधी आंदोलन के इतिहास से जुड़ा एक छोटा वीडियो भी साझा किया, जिसमें अतीत में हुए आंदोलनों की रिपोर्टिंग की झलकियां और उसे नेतृत्व देने वाले नेताओं और प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें दिखाई गई हैं.
वीडियो में 'शहीदों' के संदर्भ के साथ डीएमके के दिवंगत नेताओं सी एन अन्नादुरै और एम करुणानिधि के योगदान का भी जिक्र किया गया. यह आंदोलन 1965 में अपने चरम पर पहुंचा था.
तमिलनाडु में भाषा शहीद उन लोगों के संदर्भ में कहा जाता है जिनकी हिन्दी विरोधी आंदोलन के दौरान जान गई.
आज भी यह दक्षिणी राज्य दो भाषा फ़ॉर्मूला मानता है- तमिल और अंग्रेज़ी.
यह मामला तब फिर से उठा जब केंद्र ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लागू किया. तमिलनाडु सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को राज्य में लागू नहीं किया है. डीएमके का आरोप है कि केंद्र इसके मार्फ़त हिन्दी थोपने की कोशिश कर रहा है.
वहीं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा था कि तमिलनाडु सरकार इस पर 'राजनीति' कर रही है. उनका कहना है, "राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय भाषाओं को महत्व देने वाली है और इसमें कहीं भी ये नहीं कहा गया है कि हिन्दी ही पढ़ाई जानी चाहिए."
जब तमिलनाडु में भड़का था 'हिन्दी विरोधी आंदोलन'

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बीबीसी हिन्दी पर 26 जनवरी, 2015 को प्रकाशित इमरान क़ुरैशी की एक रिपोर्ट तमिलनाडु में हिन्दी विरोधी आंदोलन पर एक व्यापक चर्चा करती है. इस रिपोर्ट को यहां पुनः प्रकाशित किया जा रहा है-
एरा सेज़ियान तमिल भाषा के जाने-माने लेखक हैं और विरोध प्रदर्शन के दिनों में सांसद थे.
सेज़ियान ने बीबीसी से कहा, "आज भी जब कभी संस्कृत या हिन्दी को लाने की हल्की सी कोशिश की जाती है तमिलनाडु में विरोध भड़क जाता है. लेकिन हिन्दी को थोपे जाने पर अब पहले जैसा डर का माहौल नहीं है."
तमिल इतिहासकार एआर वेंकटचलापति का कहना है कि आज भी वहां उपेक्षित होने का एहसास बना हुआ है.
वे कहते हैं, "सभी भाषाओं को बराबरी का दर्जा देकर ही सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया जा सकता है. तमिलनाडु के दूरदराज के इलाके में अगर किसी को बैंक के एटीएम पर कुछ काम होता है तो उसे अंग्रेज़ी या फिर हिन्दी का सहारा लेना होता, लेकिन उसके पास तमिल का विकल्प नहीं होता."


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तमिलनाडु में हिन्दी को लेकर विरोध 1937 से ही है, जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सरकार ने मद्रास प्रांत में हिन्दी को लाने का समर्थन किया था पर द्रविड़ कषगम (डीके) ने इसका विरोध किया था.
तब विरोध ने हिंसक झड़पों का स्वरूप ले लिया था और इसमें दो लोगों की मौत भी हुई थी. लेकिन साल 1965 में दूसरी बार जब हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने की कोशिश की गई तो एक बार फिर से ग़ैर हिन्दी भाषी राज्यों में पारा चढ़ गया था.
डीएमके नेता डोराई मुरुगन उन पहले लोगों में से थे, जिन्हें तब के मद्रास शहर के पचाइअप्पन कॉलेज से गिरफ़्तार किया गया था.
मुरुगन बताते हैं, "हमारे नेता सीएन अन्नादुराई 26 जनवरी को सभी घरों की छत पर काला झंडा देखना चाहते थे. चूंकि इसी दिन गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम भी थे, इसलिए उन्होंने तारीख बदलकर 25 जनवरी कर दी थी."


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मुरुगन ने बताया, "राज्य भर में हज़ारों लोग गिरफ़्तार किए गए थे लेकिन मदुरई में विरोध प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया. स्थानीय कांग्रेस दफ्तर के बाहर एक हिंसक झड़प में आठ लोगों को ज़िंदा जला दिया गया. 25 जनवरी की उस तारीख को 'बलिदान दिवस' का नाम दिया गया."
ये विरोध प्रदर्शन और हिंसक झड़पें तकरीबन दो हफ्ते तक चलीं और आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 70 लोगों की जानें गईं.
सेज़ियान कहते हैं, "यहां तक कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी रॉय भी हिन्दी थोपे जाने के ख़िलाफ़ थे. दक्षिण के सभी राज्य भी इसके विरोध में थे. विरोध करने वालों में दक्षिण के कांग्रेस शासित राज्य भी थे."
विरोध प्रदर्शनों के नतीजतन उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री को आश्वासन देना पड़ा.


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उन आश्वासनों को तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी ने राजभाषा अधिनियम में संशोधन के जरिए अंग्रेज़ी को सहायक राज भाषा का दर्जा देकर अमल में लाया.
वेंकटचलापति कहते हैं, "तमिलनाडु ने अंग्रेज़ी पर बहुत निवेश किया है. उन्होंने इसका सामाजिक विकास और आर्थिक समृद्धि की सीढ़ी की तरक्की के तौर पर इस्तेमाल किया है और तमिल ने इसे ख़ास पहचान दी है."
उनका कहना है, "सॉफ़्टवेयर क्षेत्र में भारत के नेतृत्व वाली हैसियत मुख्यतः दक्षिण में है. और यह अंग्रेज़ी के बिना कभी नहीं हो पाता. दूसरी तरफ देखें तो हिन्दी बोलने वाले लोग दक्षिण के राज्यों में मजदूरों की तरह काम करने आते हैं. इसलिए ये तर्क पूरी तरह ग़लत निकला कि हिन्दी सीखने से काम मिलेगा."


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वेंकटचलापति कहते हैं, "हिन्दी को पूरी तरह से केंद्र की ओर से थोपी गई भाषा के तौर पर देखा जाता है. इसमें पैसा फूंककर और इसके प्रसार को संरक्षण देकर केंद्र सरकार ने हिन्दी को कमज़ोर ही किया है. लोगों में इस बात को लेकर बहुत अंसतोष है कि भारत अन्य कई भाषाओं की कीमत पर भाषा विशेष को गैरज़रूरी तवज्जो देता है."
मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंटल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक वीके नटराज कहते हैं, "विरोध प्रदर्शनों के बिना हिन्दी को संरक्षण देने वाले लोग मज़बूत हो जाते. तमिल अपनी भाषाई पहचान को अन्य लोगों की तुलना में अधिक गंभीरता से लेते हैं."
एरा सेज़ियान कहते हैं, "यहां तक कि अब उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य भी अंग्रेज़ी सीखने को प्रोत्साहन दे रहे हैं. अब हालात पूरी तरह से बदल गए हैं. राज्य पहले से अधिक मजबूत हुए हैं और केंद्र अब पहले की तरह ताकतवर नहीं रहा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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