क्या रहमान पर हमला करना उनकी शिकायत को ही जायज़ ठहराना नहीं है- नज़रिया

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- Author, प्रियदर्शन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार,बीबीसी हिंदी के लिए
संगीतकार एआर रहमान ने बीबीसी को दिए एक लंबे इंटरव्यू में बहुत हल्के लहज़े में यह शिकायत की थी कि बॉलीवुड का शक्ति-संतुलन बदलने की वजह से शायद उन्हें काम मिलना कम हो गया है.
उन्होंने कहा कि संभव है, इसके पीछे एक सांप्रदायिक पहलू भी हो, लेकिन उन्हें इसके बारे में सुनी-सुनाई बातों के अलावा साफ़ कुछ नहीं पता.
बस इतनी भर शिकायत करने से छह राष्ट्रीय पुरस्कार, दो अकेडमी अवॉर्ड, दो ग्रैमी, एक बाफ़्टा, 15 फ़िल्मफ़ेयर और 18 फ़िल्मफ़ेयर साउथ हासिल करने वाले पद्म भूषण संगीतकार की ट्रोलिंग शुरू हो गई.
उन पर आरोप लगाया गया कि वे देश को बदनाम कर रहे हैं, बॉलीवुड को बदनाम कर रहे हैं. उनसे माफ़ी की मांग की गई.
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आरोप लगाने वालों में घोर दक्षिणपंथी संगठनों से लेकर खुद को कुछ प्रगतिशील मानने वाले वे लोग भी शामिल दिखे जिन्हें बॉलीवुड पर उंगली उठाना गवारा न था.
इसके अलावा बहुत सारे लोग ख़ामोश रहे. बेशक, कई लोगों ने एआर रहमान के पक्ष में भी बयान दिए.
परेश रावल ने कहा कि उन्हें रहमान पर गर्व है.
लेकिन इस ट्रोलिंग का दबाव ऐसा था कि एआर रहमान को स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा. उन्हें बताना पड़ा कि भारत ही उनका घर है, उनकी प्रेरणा है, उनके संगीत के स्रोत भारत की बहुसांस्कृतिकता में हैं और अपने देश पर उन्हें गर्व है.
असहमति का अधिकार

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ध्यान से देखें तो एआर रहमान का संगीत उस दौर में परवान चढ़ रहा था जब भारत में हिंदूवादी राजनीति अपने चरम की ओर बढ़ रही थी. एक तरफ राम रथ यात्रा जारी थी और बाबरी मस्जिद का ध्वंस हो रहा था तो दूसरी तरफ़ 'रोज़ा', 'बॉम्बे', 'लगान' और 'दिल से' जैसी फ़िल्मों के गीत गूंज रहे थे.
इनके उत्कर्ष के रूप में 'स्लमडॉग मिलियनेयर' का 'जय हो' आया जिसने वाकई ऑस्कर जीतकर दुनिया में भारत की जय-जय करा दी और आने वाले कई वर्षों तक वह भारत में राष्ट्रीय गर्व के मौक़ों पर देश का 'थीम सॉन्ग' बना रहा.
इन सबसे पहले भारत की आज़ादी के पचास साल पूरे होने पर 'मां तुझे सलाम' रच कर रहमान ने राष्ट्रीयता के जज़्बे को अलग तरह की सांगीतिक अभिव्यक्ति दी थी.
कुछ देर के लिए मान लें कि एआर रहमान ने जो शिकायत की, वह बहुत सही न रही हो. हालांकि ख़ुद इसको लेकर वह संशय में दिखे थे. लेकिन अगर उन्हें कोई तकलीफ़ है तो इस तकलीफ़ को रखने का अधिकार है.
दूसरों को इस अधिकार से असहमति का भी अधिकार है.
क्या ही अच्छा होता कि लोग इस तकलीफ़ को समझते और रहमान को समझाने की कोशिश करते कि माहौल वैसा नहीं है जैसा उन्हें लग रहा है, कि इस देश में सांप्रदायिकता के विकट उभार के बावजूद सदियों से चली आ रही और स्वाधीनता संग्राम के दौर में सींची गई सांस्कृतिक बहुलता की परंपरा बेहद मज़बूत है.
लेकिन जिस तरह रहमान पर हमले शुरू हो गए, उससे लगा कि रहमान की शिकायत की ही पुष्टि हो रही है.
क्या यह रहमान की शिकायत से नाराज़गी का मामला था, या रहमान की धार्मिक पहचान के आधार पर उन पर हमले किए जा रहे थे? क्या इस धार्मिक पहचान को पिछले दिनों लगातार निशाने पर नहीं रखा जा रहा है?
इस देश में अचानक अच्छा मुसलमान और बुरा मुसलमान खोजने-बताने की जो मुहिम चल पड़ी है, उसके पीछे कौन लोग हैं? वे कौन लोग हैं जो यह सर्टिफिकेट देते हैं कि कौन बाबर जैसा मुसलमान है और कौन एपीजे अब्दुल कलाम जैसा?
लोकतंत्र को सीमित करने की कोशिश

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अगर कोई समझता है कि यह मुहिम बस बहुसंख्यकवाद के वर्चस्व को, हिंदूवाद की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश का नतीजा है जिसमें अल्पसंख्यकों को न बोलने का हक़ है न ही शिकायत करने का, तो वह इसके संभावित ख़तरे को नहीं समझ रहा है.
यह इस देश का स्वभाव बदलने की कोशिश है- इस देश के लोकतंत्र को सीमित करने की कोशिश है.
बेशक, इस कोशिश में सबसे ज़्यादा निशाने पर अल्पसंख्यक ही आ रहे हैं, लेकिन दूसरे प्रगतिशील लोग और उदार हिंदू भी इसके दायरे से दूर नहीं हैं. याद कर सकते हैं कि एआर रहमान से ठीक पहले शाहरुख़ खान पर हमले किए गए.
उनसे भी माफ़ी की मांग की गई क्योंकि उन्होंने आईपीएल की नीलामी के दौरान एक बांग्लादेशी खिलाड़ी मुस्तफ़ीज़ुर्रहमान को भी अपनी टीम में ले लिया, जबकि इन दिनों बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार हो रहे हैं.
शाहरुख़ के ख़िलाफ़ इस मुहिम के पीछे बीजेपी नेता संगीत सोम सहित इन दिनों देश को बौद्धिक नेतृत्व देने में लगे कुछ लोग भी थे. लेकिन इन लोगों ने बीसीसीआई से एक भी सवाल नहीं पूछा जिसने बांग्लादेश के खिलाड़ियों की बोली लगाने की इजाज़त दी थी.
जाहिर है, यहां भी शाहरुख के फ़ैसले को उनकी धार्मिक पहचान से जोड़ कर देखा गया.
बोलना हुआ ख़तरनाक

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यह दुहराने की ज़रूरत है कि जो अल्पसंख्यक पहचानों पर हमला लग रहा है, दरअसल वह हमारी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी पर हमला है. मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की असहमति जताना जैसे नामंज़ूर है.
कोविड के दिनों को याद कर सकते हैं जब सोशल मीडिया पर अपने बीमार परिजनों के लिए ऑक्सीजन सिलिंडर या अस्पताल में बिस्तर की गुहार कर रहे लोगों को ट्रोल किया गया और उन्हें देश को बदनाम करने वाला बताया गया.
एक दौर था जब रुपये की घटती क़ीमत या पेट्रोल के बढ़ते दामों पर इस देश के खिलाड़ी या अभिनेता खुलकर अपनी राय रखते थे, लेकिन जब रुपया डॉलर के मुक़ाबले 90 पार है और पेट्रोल का न्यू नॉर्मल 100 रुपये को छू चुका है, तब सबके होंठ सिले हुए हैं.
जाहिर है, उनकी आर्थिक समझ नहीं बदली है, उनमें यह राजनीतिक समझ आ गई है कि इस नई व्यवस्था में बोलना ख़तरनाक होता जा रहा है.
एआर रहमान के बचाव की ज़रूरत नहीं है. सारे हमलों के बावजूद इस देश की बहुसांस्कृतिक जड़ें इतनी मज़बूत हैं और बॉलीवुड में भी रचनात्मक कामों की इतनी ज़रूरत और क़द्र बची हुई है कि उन्हें काम मिलता रहेगा.
लेकिन इस देश के लोकतंत्र को सिकुड़ने से बचाने की ज़रूरत है. हमारी विविधता की जो सिंफनी है, उसमें एक बेसुरे राग को पहचानने और ठीक करने की ज़रूरत है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.














