ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ़ पीस' क्या कमज़ोर पड़ रहे संयुक्त राष्ट्र को किनारे कर देगा?

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- Author, लीस डूसेट
- पदनाम, चीफ़ इंटरनेशनल कॉरेस्पॉन्डेंट, बीबीसी
"साथ मिलकर हम उस स्थिति में हैं… जहां हम दशकों से चल रहे दुखों का अंत कर सकते हैं, पीढ़ियों से चली आ रही नफ़रत और ख़ून-ख़राबे को रोक सकते हैं, और उस क्षेत्र के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक ख़ूबसूरत, स्थायी और शानदार शांति स्थापित कर सकते हैं."
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हफ़्ते दावोस में विश्व आर्थिक मंच से अपने नए बोर्ड ऑफ़ पीस की शुरुआत करते हुए यही बड़े वादे किए.
पहले ही काफ़ी संघर्ष और पीड़ा झेल चुकी दुनिया उनके इन वादों पर यक़ीन करना चाहती है.
लेकिन दुनिया भर की कई राजधानियों में तमाम विश्लेषकों और अधिकारियों के लिए यह बात ट्रंप की उस कोशिश का एक और सबूत भर लगी, जिसमें वह युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को तोड़कर उसकी जगह नई संस्थाएं बनाना चाहते हैं... ऐसी संस्थाएं जो पूरी तरह उनके प्रभाव में हों.
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पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने सोशल मीडिया पर संक्षिप्त चेतावनी दी, "हम किसी को भी हमारे साथ चालबाज़ी नहीं करने देंगे."
लेकिन यूरोप में ट्रंप के सबसे बड़े समर्थक विक्टर ओर्बान ने तो भावुक होकर तारीफ़ की, "अगर ट्रंप हैं, तो शांति है."
अब सवाल यह है कि ख़ुद ट्रंप के आजीवन नेतृत्व वाला यह बोर्ड असल में करेगा क्या? क्या सच में संयुक्त राष्ट्र का एक छोटा-रूप बनाने की कोशिश है?
बोर्ड के चेयरमैन की ताक़त

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इस विचार का जन्म पिछले साल ग़ज़ा युद्ध ख़त्म करने के अमेरिकी प्रयासों से हुआ था और जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव ने समर्थन भी दिया था. अब यह और अधिक बड़ा, महत्वाकांक्षी और वैश्विक रूप ले चुका है. इसके केंद्र में ट्रंप ही हैं.
ड्राफ़्ट चार्टर की लीक हुई डिटेल्स के मुताबिक़, ट्रंप बोर्ड के आजीवन चेयरमैन होंगे, भले ही वह राष्ट्रपति पद पर न रहें. इस चार्टर के तहत उनकी शक्तियां बेहद व्यापक होंगी, जैसे कि- किसी देश को सदस्य बनने का निमंत्रण देना या न देना, सहायक संस्थाएं बनाना या भंग करना, और वह जब भी पद छोड़ना चाहें, या किसी कारण अक्षम हो जाएं, तो अपने उत्तराधिकारी को ख़ुद नियुक्त कर सकने का अधिकार. अगर कोई और देश स्थायी सदस्य बनना चाहता है, तो उसके लिए उसे चौंका देने वाले दाम, एक बिलियन डॉलर, चुकाने होंगे.
यह ताज़ा धमाका ऐसे महीने में हुआ है जो पहले ही चक्कर में डालने वाली घटनाओं से भरा हुआ है. कुछ ही हफ्तों के अंदर ये सब हुआ - अमेरिका ने वेनेज़ुएला के नेता को गिरफ़्तार कर लिया, ट्रंप ने ईरान के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई की धमकियां दीं और ग्रीनलैंड को ख़रीदने की मांग कर दी, जिसने पूरे यूरोप ही नहीं और बाक़ी दुनिया में हलचल मचा दी.
दावोस में बोर्ड के उद्घाटन में दुनिया के हर कोने से 19 देश मौजूद थे - अर्जेंटीना से लेकर अज़रबैजान तक, सोवियत संघ के पूर्व गणराज्यों से लेकर खाड़ी देशों तक, और कहा जा रहा है कि इससे भी ज़्यादा देशों ने इसमें 'शामिल होने पर सहमति' दे दी है.
नेताओं और अधिकारियों की कतार को देखते हुए ट्रंप मुस्कुराए और बोले, "इस ग्रुप में हर एक शख़्स मुझे पसंद है."
अब इनके नाम बोर्ड और इसके नीचे बनने वाली कार्यकारी इकाइयों में दर्ज हो चुके हैं.
हालांकि कई संभावित देशों ने अब तक विनम्रता से इससे दूरी बनाए रखी है.
ब्रिटेन के विदेश मंत्री येवेट कूपर ने साफ़ कहा, "यह एक ऐसे समझौते की बात है जो कहीं ज़्यादा व्यापक मुद्दे उठाता है, और हमें इस बात की भी चिंता है कि राष्ट्रपति पुतिन किसी ऐसी संस्था में शामिल होंगे जो शांति पर बात कर रही है."
ट्रंप का कहना है कि रूस शामिल हो चुका है, लेकिन मॉस्को का संदेश था कि वे अभी 'साथियों से परामर्श कर रहे हैं.'
स्वीडन ने जवाब दिया, "फ़िलहाल प्रस्ताव में जो लिखा गया है, उसे देखते हुए हम शामिल नहीं हो रहे."
नॉर्वे ने कूटनीतिक अंदाज़ में कहा, "इस प्रस्ताव में कई ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब के लिए वॉशिंगटन से और बातचीत की ज़रूरत है."
'ग़ज़ा का ज़िक्र ही नहीं'

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इसी बीच सात मुस्लिम देशों का एक समूह, जिनमें से छह अरब राष्ट्र हैं, साथ ही तुर्की और इंडोनेशिया भी, ने यह साफ़ कर दिया कि वे इसमें 'सिर्फ़ ग़ज़ा में न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति के लिए' हिस्सा ले रहे हैं, जिसमें बर्बाद हो चुके इलाके़ का पुनर्निर्माण भी शामिल है.
लेकिन लीक हुए बोर्ड के चार्टर की डिटेल्स में ग़ज़ा का कहीं ज़िक्र ही नहीं है.
कई आलोचकों, जिनमें वह देश भी शामिल हैं जो इस बोर्ड में शामिल होने से हिचक रहे हैं, उनके लिए यह एक ऐसे राष्ट्रपति का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है जो यह बात कभी नहीं छुपाते कि वे दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान - नोबेल शांति पुरस्कार - जीतने के लिए बेहद उत्सुक हैं. यह वही पुरस्कार है जो 2009 में राष्ट्रपति ओबामा को व्हाइट हाउस में उनके पहले कार्यकाल की शुरुआत में मिला था.
दुनिया के नेता जानते हैं कि इस नए क्लब में शामिल न होने की कुछ कीमत चुकानी पड़ सकती है.
ट्रंप ने फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पर तंज़ कसते हुए अपना पसंदीदा, धमकी का हथियार लहराया, "मैं उसकी वाइन और शैम्पेन पर 200% टैरिफ़ लगा दूंगा, और फिर वह शामिल हो जाएगा, हालांकि उसके शामिल होने की ज़रूरत नहीं है."
सिर्फ़ स्लोवेनिया ने वही बात खुलकर कही, जिसे दूसरे धीमी आवाज़ में कह रहे थे. प्रधानमंत्री रॉबर्ट गोलोब ने अपनी चिंता साफ़ जताई कि यह 'अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ख़तरनाक दख़ल' है.
ट्रंप ने इस चिंता का सीधे-सीधे जवाब दिया. दुनिया भर के कोनों से आए लोगों से भरे हुए हॉल में उन्होंने कहा, "एक बार यह बोर्ड पूरी तरह बन गया, तो हम जो भी चाहें ,लगभग वह कर सकेंगे, और हम इसे संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर करेंगे."
लेकिन उन्हें यह भी पसंद है कि दुनिया अनुमान लगाती रहे.
एक दिन पहले, फ़ॉक्स टीवी के एक पत्रकार ने पूछा कि क्या उनका बोर्ड संयुक्त राष्ट्र की जगह ले लेगा, तो उन्होंने जवाब दिया, "हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र ज़्यादा मददगार तो रहा है नहीं."
फिर उन्होंने जोड़ा, "मैं संयुक्त राष्ट्र की क्षमताओं का बड़ा प्रशंसक हूं, लेकिन उसने कभी अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं किया. संयुक्त राष्ट्र को वे सभी युद्ध सुलझा देने चाहिए थे जिन्हें मैंने सुलझाया."
शांति-स्थापकों के नेतृत्व का नया दावेदार?

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193 सदस्यों वाले संयुक्त राष्ट्र ने वास्तव में काफ़ी पहले ही अपनी मुख्य शांति-स्थापक की भूमिका गवां दी थी.
अक्तूबर 2016 में मैंने महासचिव अंतोनियो गुटेरेस का इंटरव्यू उनके पहले कार्यकाल के पहले ही दिन सुरक्षा परिषद से मिली दुर्लभ सर्वसम्मत मंज़ूरी के कुछ ही घंटों बाद किया था. उस बातचीत में उन्होंने वादा किया था कि वह 'शांति के लिए कूटनीति में तेज़ उछाल' लाएंगे.
लेकिन पिछले एक दशक में संयुक्त राष्ट्र की कोशिशें बार‑बार नाकाम रहीं. इसकी वजह थी, सुरक्षा परिषद की गतिरोध में फंसी राजनीति, दुनिया भर के युद्धों में अड़चन डालने वाले पक्ष और उन्हें समर्थन देने वाले देश, और साथ ही ख़ुद संयुक्त राष्ट्र की लगातार गिरती साख, ख़ासकर अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों के सामने.
यूएन के अनुभवी राजनयिक मार्टिन ग्रिफ़िथ्स के शब्दों में, "हमें ट्रंप की युद्ध ख़त्म कराने की सक्रियता का स्वागत करना चाहिए."
उनका मानना है कि यह नई पहल, "ख़ुद सुरक्षा परिषद और पूरे संयुक्त राष्ट्र की नाकामी का प्रतिबिंब है."
लेकिन मानवीय मामलों और आपात राहत के लिए संयुक्त राष्ट्र के पूर्व उपमंत्री ने सावधान किया कि "पिछले 80 सालों में हमने बहुत सारी नाकामियों और जटिलताओं से क्या सीखा है? हमने सीखी है समावेशन की अहमियत, पूरी वैश्विक बिरादरी का प्रतिनिधित्व."
ख़ुद गुटेरेस ने हाल ही में अफ़सोस जताया था कि "ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि क़ानून की ताक़त को ताक़त के क़ानून से बदल देना चाहिए."
बीबीसी के टुडे कार्यक्रम के इंटरव्यू में, जब उनसे ट्रंप के इस दावे के बारे में पूछा गया कि उन्होंने आठ युद्ध ख़त्म कर दिए, तो उन्होंने सीधी बात कही, "ये युद्ध ख़त्म नहीं हुए, यह तो सिर्फ़ संघर्ष विराम हैं."
इनमें से कुछ तो पहले ही टूट चुके हैं. रवांडा और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य के बीच अस्थायी शांति समझौता जल्दी ही बिखर गया, कंबोडिया और थाईलैंड ने अपनी सीमा पार आरोप ही नहीं और बहुत कुछ दागना शुरू कर दिया, और भारत ने पाकिस्तान के साथ तनाव कम कराने में ट्रंप की केंद्रीय भूमिका के दावे से असहमति जताई.
बोर्ड की चुनौतियां

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लेकिन ट्रंप के मज़बूत और प्रत्यक्ष दख़ल के बिना ईरान और इसराइल के बीच 12 दिन का युद्ध ख़त्म होना शायद संभव नहीं था.
ग़ज़ा में विनाशकारी जंग में संघर्षविराम कराने में भी उनकी सीधी भागीदारी अहम रही, जिसने फ़लस्तीनियों की पीड़ा और इसराइली बंधकों की यातना दोनों को कुछ हद तक कम किया. अपने क़रीबी अरब सहयोगियों और शोकग्रस्त इसराइली परिवारों के दबाव के बाद, ट्रंप ने इस संकट पर पूरी तरह ध्यान लगाया और इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और हमास, दोनों पर समझौते के लिए दबाव डाला.
लेकिन बोर्ड की पहली ही परीक्षा, समझौते के पहले चरण से दूसरे चरण में आगे बढ़कर ग़ज़ा युद्ध को ख़त्म कराना काफ़ी चुनौतीपूर्ण है. और जैसे‑जैसे यह नया बोर्ड आकार ले रहा है, इसमें दो बिल्कुल विपरीत ध्रुव नज़र आते हैं- एक ओर नेतन्याहू हैं, जो फ़लस्तीनी राज्य की स्थापना रोकने की कसम खाए बैठे हैं, और दूसरी ओर अरब नेता हैं, जो ज़ोर देकर कहते हैं कि टिकाऊ शांति का रास्ता तभी खुलेगा जब फ़लस्तीनियों को आत्म‑शासन मिले और इसराइली क़ब्ज़ा ख़त्म हो.
अमेरिका और यूरोप के एजेंडा में दूसरा बड़ा युद्ध है- यूक्रेन. राष्ट्रपति ज़ेलेन्स्की ने साफ़ कर दिया है कि वह मॉस्को और मिन्स्क के साथ एक ही मेज़ पर नहीं बैठेंगे.
इस बोर्ड के नीचे तीन स्तर बनाए गए हैं, जिनका ज़्यादातर ध्यान ग़ज़ा पर है- एग्ज़िक्यूटिव बोर्ड, ग़ज़ा एग्ज़िक्यूटिव बोर्ड और नेशनल कमेटी फ़ॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ़ ग़ज़ा.
इन बोर्डों में अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों और अरबपतियों का मिश्रण शामिल है, साथ ही सम्मानित पूर्व राजनेता और वे पूर्व संयुक्त राष्ट्र दूत भी, जिन्हें ग़ज़ा की ज़मीनी हक़ीक़त की गहरी समझ है. इनके साथ अरब देशों के मंत्री, ख़ुफ़िया प्रमुख और फ़लस्तीनी टेक्नोक्रेट भी जुड़े हुए हैं.
संयुक्त राष्ट्र में सुधार की ज़रूरत

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कुछ आलोचक भी इस बात का श्रेय ट्रंप को देते हैं कि उन्होंने एक बेहद पुराने लेकिन अलग तरह के मुद्दे को फिर से चर्चा के लिए सामने रख दिया है. वह मुद्दा है, युद्ध के बाद बने संयुक्त राष्ट्र के ढांचे, जिसमें सुरक्षा परिषद भी शामिल है, उसमें सुधार की मांग, क्योंकि ये अब दुनिया के किसी क्षेत्र की वास्तविक ताक़तों के राजनीतिक नक्शे से मेल नहीं खाता.
यह ढांचा अब मौजूदा ज़रूरतों के हिसाब से बिल्कुल उपयुक्त नहीं है.
पूर्व संयुक्त राष्ट्र उप-महासचिव मार्क मैलॉक ब्राउन ने कहा, "शायद ट्रंप की इस पहल का एक अनचाहा लेकिन अच्छा नतीजा यह होगा कि ये मुद्दे फिर से अंतरराष्ट्रीय एजेंडा में सबसे ऊपर पहुंच जाएं,"
"हम बेहद कमज़ोर संयुक्त राष्ट्र नेतृत्व के दौर से निकल रहे हैं, और मुझे लगता है कि यह एक तरह की कार्रवाई के लिए पुकार हो सकती है."
विडंबना देखिए, दुनिया को शांति की ओर ले जाने का ट्रंप का यह दावा ऐसे समय आ रहा है जब कई राजधानियों में गुटेरेस के उत्तराधिकारी पर चर्चा तेज़ हो गई है. उनका दूसरा कार्यकाल इस साल के अंत में ख़त्म हो रहा है.
राष्ट्रपति ट्रंप जो पहले कहते थे कि वह यूक्रेन युद्ध 'एक दिन में' ख़त्म कर सकते हैं, अपनी सत्ता के पिछले साल में यह सीख चुके हैं कि शांति स्थापित करना एक लंबी और जोखिम भरी प्रक्रिया है.
लेकिन आज उन्होंने मध्य पूर्व की स्थिति का ज़िक्र करते हुए कहा कि वहां अब सिर्फ़ 'छोटी-छोटी आगें' जल रही हैं.
उन्होंने यह भी वादा किया कि यूक्रेन में एक समझौता 'बहुत जल्द होने वाला है.'
और वह अपनी नई भूमिका, 'होने वाले मुख्य-शांति-निर्माता' का आनंद लेते दिखाई दिए.
उन्होंने कहा, "यह दुनिया के लिए है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















