भारत ने ऐसा क्या किया कि ईरान ने कहा शुक्रिया, छह अन्य देश भी आए साथ

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भारत ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के उस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ मतदान किया, जिसमें हालिया सरकार-विरोधी प्रदर्शनों पर ईरान की कार्रवाई की निंदा की गई थी.
ईरान की सरकार की ओर से की जा रही "क्रूर दमन की कार्रवाई" को समाप्त करने की मांग करने वाला यह प्रस्ताव 47 सदस्यीय परिषद में पारित हो गया.
परिषद के 25 सदस्यों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया जबकि 14 ने मतदान से परहेज किया. भारत के अलावा चीन, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, इराक़, वियतनाम और क्यूबा ने इसका विरोध किया.
नई दिल्ली में ईरान के राजदूत मोहम्मद फ़तहाली ने मानवाधिकार परिषद के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ मतदान के लिए भारत को शुक्रिया कहा है.
भारत ने ईरान के ख़िलाफ़ प्रस्ताव के विरोध में मतदान तब किया है, जब अमेरिका चाबहार पोर्ट पर प्रतिबंध बहाल करने जा रहा है.
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मोहम्मद फ़तहाली ने एक्स पर लिखा है, "मैं संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में ईरान के इस्लामी गणराज्य के प्रति सिद्धांत आधारित और दृढ़ समर्थन के लिए, जिसमें एक अन्यायपूर्ण और राजनीतिक रूप से प्रेरित प्रस्ताव का विरोध भी शामिल है, भारत सरकार के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ. यह रुख़ न्याय, बहुपक्षवाद और राष्ट्रीय संप्रभुता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है."
ये प्रदर्शन 28 दिसंबर को शुरू हुए थे और शुरुआत में बढ़ती महंगाई के ख़िलाफ़ असंतोष पर केंद्रित थे. हालांकि बाद में इनका दायरा बढ़ गया और 100 से अधिक शहरों में प्रदर्शनकारियों ने धार्मिक शासन के अंत की मांग की.
शुक्रवार को परिषद ने अपने प्रस्ताव में कहा कि वह "शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर की गई हिंसक कार्रवाई की निंदा करती है", जिसके परिणामस्वरूप हज़ारों लोगों की मौत हुई और ईरानी सरकार से अपने "मानवाधिकार दायित्वों का सम्मान करने, उनकी रक्षा करने और उन्हें पूरा करने" का आग्रह किया.
प्रस्ताव में ईरान से एक्स्ट्रा जूडिशल किलिंग्स, गुमशुदगी और मनमानी गिरफ़्तारियों को समाप्त करने और रोकने के लिए क़दम उठाने को कहा गया.
भारत ने ईरान का समर्थन क्यों किया?

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भारत के इस रुख़ पर पूर्व विदेश सचिव निरूपमा राव ने एक्स पर लिखा है, "भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में ईरान से जुड़े प्रस्ताव के ख़िलाफ़ अपने मतदान को स्पष्ट किया है. प्रस्ताव सिलेक्टिव था, राजनीतिक रूप से प्रेरित था और रचनात्मक संवाद को बढ़ावा देने की संभावना कम थी.''
''नई दिल्ली ने तर्क दिया कि देश-विशेष प्रस्ताव अक्सर मानवाधिकार परिणामों में सुधार करने के बजाय रुख़ों को कठोर बना देते हैं और सार्वजनिक निंदा के बजाय संवाद, राष्ट्रीय प्रक्रियाओं और क्षमता-निर्माण पर ज़ोर दिया.''

राव ने लिखा है, "भारत ने न तो ईरान की कार्रवाई का समर्थन किया और न ही कथित दुरुपयोग की रिपोर्टों से असहमति जताई. यह मतदान प्रक्रिया और सिद्धांत पर आधारित था: संप्रभुता और नाम लेकर शर्मिंदा करने वाले तंत्रों का विरोध था."
"भारत का तर्क चीन और पाकिस्तान से भी अलग था. चीन बाहरी जांच को व्यवस्था के स्तर पर ख़ारिज करता है. पाकिस्तान अक्सर रणनीतिक रूप से चीन और ओआईसी के साथ तालमेल रखता है. भारत का रुख़ अधिक प्रक्रियात्मक है, जो देश-विशेष प्रस्तावों के प्रति लंबे समय से चले आ रहे संदेह से आकार लेता है."
"यह रणनीतिक भी है: ऐसे तंत्रों को वैध ठहराने को लेकर सतर्कता, जिन्हें किसी अन्य राजनीतिक माहौल में कश्मीर या आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों पर भारत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा सकता है. कुल मिलाकर, यह मतदान ईरान पर भारत की व्यापक नीति के अनुरूप है: संबंधों को बनाए रखना, नैतिक दिखावे से बचना और मेगाफोन जैसी सार्वजनिक निंदा के बजाय शांत कूटनीति को प्राथमिकता देना."
प्रस्ताव में क्या कहा गया?

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मतदान से पहले प्रस्ताव पेश करते हुए आइसलैंड के राजदूत आइना गुन्नारसन ने कहा, "डर और व्यवस्थित रूप से अपराधों के प्रति खुली छूट का माहौल बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. पीड़ितों और जीवित बचे लोगों को सच, न्याय और जवाबदेही का हक़ है."
पारित प्रस्ताव में ईरान पर विशेष रिपोर्टियर के कार्यकाल को एक और साल के लिए बढ़ा दिया गया है.
इसके साथ ही नवंबर 2022 में गठित एक अलग फ़ैक्ट-फ़ाइंडिंग मिशन के काम को दो साल के लिए बढ़ाया गया है.
हिरासत में एक ईरानी कुर्द महिला महसा अमीनी की मौत के बाद भड़के प्रदर्शनों के दमन के मद्देनजर यह मिशन बनाया गया था.
प्रस्ताव के तहत जांच कमिटी को हालिया प्रदर्शनों से जुड़े "गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों और अत्याचारों, और किए गए अपराधों के आरोपों" की जांच का अधिकार दिया गया है.
यह मतदान मानवाधिकार परिषद की इमर्जेंसी मीटिंग के अंत में हुआ. यह मीटिंग ब्रिटेन, जर्मनी, आइसलैंड, मोल्दोवा और नॉर्थ मैसेडोनिया की अपील पर बुलाया गया था, जिसकी ईरान ने कड़ी आलोचना की.
यूएन मानवाधिकार प्रमुख ने क्या कहा?

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परिषद को संबोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टुर्क ने बताया कि सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर "सीधे गोलियों" का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि "हज़ारों" लोग मारे गए, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं.
उन्होंने कहा, "मैं ईरानी अधिकारियों से अपील करता हूं कि वे पुनर्विचार करें, पीछे हटें और आनन-फ़ानन में सुनवाई के साथ बेहिसाब सज़ा समेत अपनी क्रूर दमन वाली कार्रवाई को ख़त्म करें."
उन्होंने यह भी कहा, "मैं ईरानी अधिकारियों से मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए सभी लोगों को तुरंत रिहा करने और मृत्युदंड पर पूर्ण रोक लगाने की मांग करता हूं."
यूरोपीय संघ के प्रतिनिधि मिशेल सर्वोन डीउर्सो ने कहा, "पिछले हफ़्तो की भयावह घटनाओं पर जवाबदेही तय होनी चाहिए और उन सभी के लिए न्याय होना चाहिए, जिन्हें अपने मानवाधिकारों के इस्तेमाल और वैध मांगें रखने के कारण मारा गया, घायल किया गया या हिरासत में लिया गया."
प्रदर्शन अब काफ़ी हद तक थम चुके हैं, लेकिन टुर्क ने चेतावनी दी कि "ईरान की सड़कों पर हत्याएं भले कम हो गई हों, लेकिन क्रूरता जारी है."
उन्होंने इसे "डराने वाला घटनाक्रम" बताया कि ईरान के न्यायपालिका प्रमुख ने इस हफ्ते कहा है कि हिरासत में लिए गए हजारों लोगों के साथ कोई नरमी नहीं बरती जाएगी.
टुर्क ने कहा कि उन्हें इस बात पर गहरी चिंता है कि ईरानी अधिकारी विरोधाभासी बयान दे रहे हैं कि प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में हिरासत में लिए गए लोगों को फांसी दी जाएगी या नहीं.
उन्होंने यह भी कहा कि ईरान "दुनिया में सबसे ज्यादा फांसी देने वाले देशों में शामिल है", जहाँ पिछले साल कम से कम 1,500 लोगों को फांसी दिए जाने की सूचना है.
ईरान ने की आलोचना

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ईरान के राजदूत अली बहरैनी ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की इमर्जेंसी बैठक को "दिखावटी" और "ईरान पर दबाव बनाने का हथियार" करार दिया.
उनकी सहयोगी सोमायेह करीमदूस्त ने प्रस्ताव को "पूरी तरह असंतुलित, पक्षपाती और राजनीतिक मक़सद से प्रेरित" करार दिया.
कई देशों ने ईरान के समर्थन में बोलते हुए परिषद पर "राजनीतिकरण" और "दोहरे मानदंड" अपनाने का आरोप लगाया.
क्यूबा के राजदूत रोडोल्फो बेनितेज ने इस बैठक को "अत्यंत निंदनीय पाखंड" कहा, जबकि चीन के राजदूत जिया गुइडे ने कहा कि बीजिंग "मानवाधिकार के नाम पर किसी देश के आंतरिक मामलों में दख़ल का विरोध करता है."
वोल्कर टुर्क के कार्यालय और कार्रवाई में मारे गए लोगों का आंकड़ा जुटा रहे ग़ैर-सरकारी संगठनों ने कहा है कि दो हफ्ते से जारी इंटरनेट बंदी के कारण उनके काम में बाधा आ रही है.
प्रदर्शनों से जुड़ा पहला आधिकारिक आंकड़ा जारी करते हुए ईरानी अधिकारियों ने बुधवार को कहा कि दिसंबर के अंत में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू होने के बाद से अब तक 3,117 लोगों की मौत हुई है.
लेकिन अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी ने शुक्रवार को मौतों की संख्या 5,000 से ज़्यादा बताई और चेतावनी दी कि ये आंकड़े वास्तविक संख्या से काफ़ी कम हो सकते हैं.
नॉर्वे स्थित संगठन ईरान ह्यूमन राइट्स ने चेतावनी दी है कि अंतिम आंकड़ा 25,000 तक पहुंच सकता है.
उधर, तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फ़िदान ने कहा है कि ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि इसराइल अब भी ईरान पर हमला करने के मौक़े ढूंढ रहा है.
हाकान फ़िदान ने कहा कि ऐसा क़दम क्षेत्र में और अधिक अस्थिरता पैदा करेगा.
बीबीसी फ़ारसी सेवा के मुताबिक़, तुर्की के विदेश मंत्री ने शुक्रवार को एक इंटरव्यू में कहा, "मुझे उम्मीद है कि वे (इसराइली अधिकारी) कोई दूसरा रास्ता अपनाएंगे. लेकिन वास्तविकता यह है कि इसराइल ईरान पर हमला करने का अवसर तलाश रहा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












