ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने पर भारत की बढ़ी दुविधा, एक्सपर्ट्स गिना रहे हैं ये ख़तरे

शहबाज़ शरीफ़

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इमेज कैप्शन, ग़ज़ा में पीस काउंसिल की मीटिंग के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को कथित 'बोर्ड ऑफ पीस' पहल की शुरुआत कर दी.

ट्रंप का कहना है कि इसका मक़सद ग़ज़ा में इसराइल और हमास के बीच संघर्षविराम को स्थायी बनाना और फ़लस्तीनी क्षेत्र में एक अंतरिम सरकार की निगरानी करना है.

भारत उन दर्जनों देशों में शामिल है, जिन्हें इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण मिला है.

हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि भारत इसे स्वीकार करेगा या नहीं. शुरुआत में इसराइल ने भी इसे लेकर असहमति जताई थी लेकिन बाद में स्वीकार कर लिया था.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को अपने बोर्ड ऑफ पीस की औपचारिक शुरुआत की तो भारत उन देशों में शामिल था जो इस समारोह में मौजूद नहीं थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन कई वैश्विक नेताओं में थे, जिन्हें ट्रंप ने बोर्ड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है.

ट्रंप के निमंत्रण को स्वीकार करने वाले देशों में पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल हैं.

ट्रंप ने कहा कि 59 देशों ने बोर्ड में शामिल होने के लिए हस्ताक्षर किए हैं लेकिन दावोस में विश्व आर्थिक मंच के दौरान आयोजित इस कार्यक्रम में केवल 19 देशों के प्रतिनिधि ही मौजूद थे.

ट्रंप ने समूह को संबोधित करते हुए कहा, "आप दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोग हैं. इसमें अज़रबैजान से लेकर पराग्वे और हंगरी तक के देश शामिल हैं. यह अमेरिका के लिए नहीं है, यह पूरी दुनिया के लिए है. मुझे लगता है कि हम इसे दूसरे स्थानों तक फैला सकते हैं, जैसा कि हमने ग़ज़ा में सफलतापूर्वक किया है."

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इमेज कैप्शन, कहा जा रहा है कि इस बोर्ड में पाकिस्तान का शामिल होना भारत के शुभ संकेत नहीं है

भारत की बढ़ी दुविधा

'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने पर भारत के अनिर्णय की स्थिति को लेकर बहस हो रही है.

कुछ लोग इसमें शामिल होने की वकालत कर रहे हैं तो कई लोग विरोध कर रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत रहे सैयद अकबरुद्दीन ने अंग्रेज़ी अख़बार द टाइम्स ऑफ इंडिया में 23 जनवरी को लिखा है कि इसमें भारत को नहीं शामिल होना चाहिए.

अकबरुद्दीन ने लिखा है, ''ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ पीस' पिछले साल नवंबर में पारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 से काफ़ी अलग है. इसने ग़ज़ा के अंतरिम प्रशासन की निगरानी के लिए एक बोर्ड को अधिकृत किया था.''

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अकबरुद्दीन ने लिखा है, ''यूएनएससी के प्रस्ताव ने स्पष्ट सीमाएँ तय की थीं. इसकी समय सीमा 31 दिसंबर 2027 तक रखी गई थी. इसके अलावा यूएनएससी को हर छह महीने में रिपोर्टिंग अनिवार्य की थी. ये सीमाएँ इसलिए थीं ताकि एक तात्कालिक समाधान ख़ुद को स्थायी वैश्विक मॉडल में न बदल ले.''

अकबरुद्दीन कहते हैं, ''लेकिन ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' की कोई समय सीमा नहीं है. इसका इस्तेमाल ग़ज़ा से बाहर भी हो सकता है. इसके अलावा बीओपी अपने अध्यक्ष ट्रंप पर ज़्यादा निर्भर है. पे-टू-स्टे प्रावधान एकल योगदान से आगे बढ़कर स्थायी सदस्यता प्रदान करता है. यह सार्वजनिक अंतरराष्ट्रीय संस्था की बजाय निजी क्लब जैसा रूप ले सकती है. यह ट्रंप की अध्यक्षता को और मज़बूत करता है.''

''संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों ने संकेत दिया है कि इस ढांचे को अन्य संघर्ष क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है. इसी वजह से कई लोग बीओपी को संयुक्त राष्ट्र के विकल्प के रूप में देखने लगे हैं. चार्टर पर हस्ताक्षर के समय ट्रंप का विस्तृत बयान भी बोर्ड की शांति-स्थापना भूमिका को लेकर बढ़ते संदेह को दर्शाता है.''

ट्रंप

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इमेज कैप्शन, ट्रंप बोर्ड ऑफ पीस के चेयरमैन हैं

शामिल होने के पक्ष में तर्क

फ़लस्तीनी प्राधिकरण में भारत के पहले प्रतिनिधि रहे और संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रहे टी एस तिरुमूर्ति का मानना है कि भारत को इसमें शामिल होना चाहिए.

तिरूमूर्ति ने जर्मन प्रसारक डीडब्ल्यू से कहा, ''बीओपी वास्तव में संयुक्त राष्ट्र को चुनौती नहीं दे रहा है. सीमित प्रतिनिधित्व को देखते हुए, यह अधिकतम जी-20 की प्रधानता को चुनौती दे सकता है, जिसकी सदस्यता भी सीमित है. चूंकि अमेरिका चाहता है कि जी-20 आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित रहे, इसलिए बीओपी जी-20 का जियोपॉलिटिकल समकक्ष बन सकता है."

तिरुमूर्ति का मानना है कि भारत की भागीदारी ग्लोबल साउथ की चिंताओं को कमज़ोर करने के बजाय उन्हें और मज़बूत करेगी.

उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "किसी भी मंच पर भारत की उपस्थिति हमेशा विवेक और व्यवहारिकता की आवाज़ रही है. अपने हितों को सामने रखने के साथ-साथ भारत ने आम तौर पर ग्लोबल साउथ की चिंताओं को भी उठाया है. अगर भारत बोर्ड में शामिल होता है, तो मुझे पूरा भरोसा है कि उसकी भूमिका इससे अलग नहीं होगी."

कनाडा

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इमेज कैप्शन, इस हफ़्ते मंगलवार को कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिकी दबदबे वाली दुनिया पर कई गंभीर सवाल खड़े किए थे

भारत के लिए ख़तरे

नेपाल और वियतनाम में भारत के राजदूत रहे रंजित राय मानते हैं कि ट्रंप के बीओपी को लेकर भारत के लिए कोई भी फ़ैसला लेना आसान नहीं है.

रंजित राय ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''भारत के लिए दुविधा बढ़ गई है. भारत इसे स्वीकार करे या फिर नकार दे, इसका असर तो होगा. मुझे लगता है कि बीओपी में शामिल होने के ख़तरे ज़्यादा हैं. एक तो ट्रंप इसके चेयरमैन हैं और उनका व्यवहार इतना ज़्यादा लेन देन वाला है कि इससे न्याय की उम्मीद करना बेमानी लगता है.''

रंजीत राय कहते हैं, ''इसमें हर देश की हैसियत एक जैसी होगी, ये स्पष्ट नहीं है. जैसे यूएन जनरल असेंबली में हर देश का एक ही वोट होता है. जब यूएनएससी से इसको अनुमति मिली थी तो यह ग़ज़ा तक सीमित था लेकिन अब जो बदलाव हुआ है, वो ग़ज़ा से बाहर भी जा सकता है.''

''ट्रंप इसके अध्यक्ष हमेशा रहेंगे या अमेरिका हमेशा रहेगा, यह स्पष्ट नहीं है. ऐसे में भारत के लिए शामिल होना जोखिम भरा है. भारत को इस पर कई अन्य देशों से विचार विमर्श करके कोई फ़ैसला लेना होगा. प्रधानमंत्री की ब्राज़ील के राष्ट्रपति से बात हुई है.''

रंजीत राय मानते हैं कि अगर भारत शामिल नहीं भी होगा, तब भी इसका असर होगा क्योंकि इसके फ़ैसले से पश्चिम एशिया प्रभावित होगा.

भारत के लिए पश्चिम एशिया में स्थिरता ऊर्जा सुरक्षा, भारतीय प्रवासियों के हित, शिपिंग मार्ग और निवेश के लिए ज़रूरी है. रंजीत राय कहते हैं कि अगर बीओपी के फ़ैसले से पश्चिम एशिया की स्थिरता प्रभावित होती है तो भारत के हितों पर सीधा असर पड़ेगा.

रंजित राय कहते हैं, ''मुझे डर है कि इसमें शामिल होने पर भारत कहीं बीओपी के लिए गए फ़ैसलों पर मुहर लगाने का माध्यन न बन जाए.''

ट्रंप

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इमेज कैप्शन, ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने पर कोई भी फ़ैसला करना भारत के लिए आसान नहीं माना जा रहा है

अमेरिका की मनमानी?

ट्रंप का बीओपी तब आकार ले रहा है, जब अमेरिका संयुक्त राष्ट्र के कई संगठनों से ख़ुद को बाहर कर रहा है. ऐसे में सवाल और गहरा हो रहा है कि बीओपी क्या संयुक्त राष्ट्र को अप्रासंगिक बनाने के लिए है.

एक डर यह भी है कि क्या बीओपी यूनिपोलर वर्ल्ड यानी अमेरिका के दबदबे वाली व्यवस्था को ही मज़बूत करेगा. दूसरी तरफ़ भारत मल्टिपोलर वर्ल्ड यानी बहुध्रुवीय दुनिया की बात करता है, जहाँ उसकी भी अपनी एक हैसियत हो न कि अमेरिका का पिछलग्गू बना रहे.

अकबरुद्दीन ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है, ''बीओपी के अध्यक्ष के अधिकार को क्या सदस्य देश चुनौती दे सकते हैं? क्या भारत ऐसे मॉडल का समर्थन करेगा जो निमंत्रण पैसे और व्यक्तिगत वर्चस्व पर आधारित है. भारत को इस जाल में नहीं फँसना चाहिए. भारत अपनी भूमिका को किसी और की योजना की मुहर लगाने तक सीमित नहीं होने दे सकता.''

बोर्ड ऑफ पीस

बीओपी के कार्यकारी बोर्ड के सदस्यों में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर, अमेरिका के डेप्युटी रक्षा सलाहकार रॉबर्ट गेब्रियल, अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के सीईओ मार्क रोवन और वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा हैं. ये सारे अमेरिकी नागरिक हैं या ट्रंप के वफ़ादार माने जाते हैं.

विदेश मामलों की जानकार और विश्लेषक निरूपमा सुब्रमण्यम कहती हैं कि भारत अगर इसमें शामिल होता है तो इसके कई ख़तरे हैं.

वह कहती हैं, ''बीओपी से जुड़े कई सवाल हैं. भारत इसमें जल्दीबाज़ी में शामिल नहीं हो सकता है. किन शर्तों पर सदस्य देश इसके चार्टर से बंधे होंगे? इसकी व्याख्या का अधिकार किसके पास होगा? कई देशों ने बोर्ड में शामिल होने का अवसर लपक लिया है.''

''कुछ ने ट्रंप के निमंत्रण को अपने देश के महत्व की मान्यता माना है. अन्य देश अमेरिका की प्रतिक्रिया के डर से शामिल होंगे. कई लोग विकसित हो रहे अंतरराष्ट्रीय मंच के अंदर रहने के लिए शामिल होंगे, भले ही उसमें एक ही देश के हित हावी हों.''

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इमेज कैप्शन, ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस को लेकर यूरोप के भी कई देश असहमत हैं

पाकिस्तान का शामिल होना भारत के लिए कैसा?

निरूपमा सुब्रमण्यम कहती हैं यूएई, सऊदी अरब, इसराइल और तुर्की के इसमें शामिल होने के फ़ैसले से मोदी सरकार पर भी ऐसा ही करने का दबाव बन सकता है.

23 जनवरी को भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू ने इस मुद्दे पर संपादकीय लिखा है.

द हिन्दू ने संपादकीय में लिखा है, ''अमेरिका-भारत संबंधों में आई दरार और व्यापार वार्ताओं की नाज़ुक स्थिति भी इस स्तर पर ट्रंप के निमंत्रण को ठुकराने से बचने की एक वजह हो सकती है. ऐसा करने से ट्रंप की नाराज़गी झेलनी पड़ सकती है, जैसा कि फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के साथ हुआ है. इस प्रस्ताव को पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी लेकिन रूस और चीन ने मतदान से दूरी बनाई थी.''

हिन्दू ने संपादकीय में लिखा है, ''न तो व्यवहारिकता और न ही सिद्धांत इस तरह के फ़ैसले को जल्दबाज़ी में लेने की सलाह देते हैं और भारत जैसे कद का देश प्रभावशाली पद से वंचित रह जाने के डर या अमेरिकी ग़ुस्से का शिकार बनने के भय से फ़ैसला नहीं कर सकता.

''शुरुआत में भले ही संयुक्त राष्ट्र ने अमेरिका की मूल योजनाओं का समर्थन किया हो, लेकिन लीक हुए चार्टर के अनुसार, बोर्ड ऑफ पीस को बदल दिया गया है और इसमें वास्तव में ग़ज़ा का उल्लेख तक नहीं है. ट्रंप ने ख़ुद को अध्यक्ष नियुक्त किया है, कार्यकारी बोर्ड में अपने निजी मित्रों और परिवार के सदस्यों को शामिल किया है. जारी चार्टर में बोर्ड ऑफ पीस को अन्य टकरावों के समाधान में भी शामिल करने का प्रस्ताव है, जिससे संकेत मिलता है कि यह संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने की कोशिश कर सकता है.''

बोर्ड ऑफ पीस

द हिन्दू ने लिखा है, ''भारत के लिए पाकिस्तान का बोर्ड में शामिल होने का फ़ैसला एक चेतावनी का संकेत है. ख़ासकर अगर ट्रंप कश्मीर विवाद को भी उन शांति योजनाओं में शामिल करने का फ़ैसला करते हैं, जिन्हें बोर्ड ऑफ पीस सुलझाने की कोशिश करेगा. एक बार बोर्ड में शामिल होने के बाद, भारत के लिए इंटरनेशनल पीसमेकिंग फोर्स में अपने सैनिकों की तैनाती पर आपत्ति जताना भी कठिन हो जाएगा''

ट्रंप कश्मीर मामले में भी कई बार मध्यस्थता की पेशकश कर चुके हैं. दूसरी तरफ़ भारत किसी तीसरे पक्ष की भूमिका को ख़ारिज करता रहा है.

ट्रंप पहले के अंतरराष्ट्रीय संगठनों ख़ारिज कर रहे हैं, इसलिए लोग ज़्यादा आशंकित हैं. ट्रंप पश्चिमी देशों के सैन्य गठजोड़ नेटो को ख़ारिज कर रहे हैं. अमेरिका ने 60 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलने का फ़ैसला किया है, जिनमें संयुक्त राष्ट्र की कई संस्थाएं भी शामिल हैं. ट्रंप का कहना है कि ये अक्षम है और अमेरिकी संप्रभुता के ख़िलाफ़ हैं. ऐसे में भारत के लिए बीओपी पर फ़ैसला लेना आसान नहीं है.

बोर्ड ऑफ पीस में ट्रंप अपनी चलाएंगे, इसकी मिसाल गुरुवार को देखने को मिली.

ट्रंप ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को अपने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए दिया गया निमंत्रण वापस ले लिया.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है, ''यह संगठन ट्रंप ने ग़ज़ा में इसराइल और हमास के बीच शांति समझौते की निगरानी के लिए बनाया था लेकिन अब वह इसे संयुक्त राष्ट्र को टक्कर देने वाली संस्था के रूप में विस्तारित करने की कोशिश कर रहे हैं.''

ट्रंप

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''कार्नी को दिया गया निमंत्रण वापस लेना इस बात का भी ताज़ा संकेत है कि बोर्ड ऑफ पीस एक सामान्य अंतरराष्ट्रीय संगठन से बिल्कुल अलग होगा, जहाँ सदस्य देशों के बीच मतभेद और खुली बहस को स्वीकार या प्रोत्साहित किया जाता है.''

एनवाईटी ने लिखा है, ''इसके चार्टर में संगठन के अध्यक्ष ट्रंप को असाधारण अधिकार दिए गए हैं, जिनमें फै़सलों को वीटो करने, एजेंडा तय करने, सदस्यों को आमंत्रित करने और हटाने, पूरे बोर्ड को भंग करने और अपने उत्तराधिकारी को नामित करने की शक्ति शामिल है.''

''बोर्ड की स्थापना ऐसे समय में हुई है, जब ट्रंप अमेरिकी विदेश नीति के एक साम्राज्यवादी दृष्टिकोण को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसमें अमेरिका सरकारों को गिरा सकता है, विदेशी क्षेत्रों और संसाधनों पर कब्ज़ा कर सकता है और पड़ोसी देशों पर "उनकी इच्छा के ख़िलाफ़" भी प्रभुत्व जमा सकता है.

ट्रंप ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उन्होंने यह निमंत्रण क्यों रद्द किया लेकिन इसी हफ़्ते मार्क कार्नी ने दावोस में एक चर्चित भाषण दिया था और अमेरिकी दबदबे वाले वर्ल्ड ऑर्डर की आलोचना की थी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.