डोनाल्ड ट्रंप और मार्क कार्नी एक-दूसरे से इतने ख़फ़ा क्यों, दोनों की तकरार का क्या है इतिहास?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच तक़रार बढ़ती जा रही है. राष्ट्रपति ट्रंप ने कनाडा को 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होने का न्योता दिया था, लेकिन अब उन्होंने इसे वापस ले लिया है.
ट्रंप ने यह क़दम ऐसे वक़्त पर उठाया है जब स्विट्ज़रलैंड के दावोस में 'वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम' में कनाडा के पीएम कार्नी ने खुलकर अपनी बात रखी.
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, "प्रिय प्रधानमंत्री कार्नी, कृपया इस पत्र को इस बात की सूचना के रूप में लें कि 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होने के आमंत्रण को वापस लिया जा रहा है, इस मामले पर ध्यान देने के लिए धन्यवाद."
इससे पहले 'वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम' के मंच पर मार्क कार्नी का भाषण खूब चर्चा में रहा है. उनका दावोस में दिया भाषण वायरल हो रहा है.
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अमेरिकी टिप्पणीकार क्रिस हेज़ ने भी कार्नी के भाषण की तारीफ़ में लिखा, "मार्क कार्नी का दावोस में दिया गया भाषण बहुत लंबे समय में किसी भी राजनेता के दिए गए सर्वश्रेष्ठ भाषणों में से एक है."
द वायर के संस्थापक सदस्य एमके वेणु ने कहा, "दावोस में मार्क कार्नी का भाषण इतना वायरल क्यों हो रहा है और दुनिया भर के देशों को उत्साहित क्यों कर रहा है? क्योंकि उन्होंने सबसे पहले उन बातों को ज़ाहिर किया है जो अन्य राष्ट्राध्यक्ष कहना तो चाहते हैं लेकिन कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाए हैं."
"कार्नी ने कुछ भी नया नहीं कहा, सिवाय इसके कि मिडिल पावर्स मिलकर दादागिरी करने वालों को कमजोर कर सकती हैं."
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के कनाडा के पूर्व पीएम जस्टिन ट्रूडो से बेहद ख़राब संबंध रहे. अब ऐसा दिखता है कि उनके निशाने पर कनाडा के वर्तमान पीएम मार्क कार्नी भी आ गए हैं. हालांकि, यह समझना भी जरूरी है कि दावोस के सम्मेलन में हुई बयानबाज़ी से पहले दोनों के रिश्ते कैसे रहे हैं?
मार्क कार्नी ने क्या कहा जो ट्रंप को अच्छा नहीं लगा?

वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के मंच पर कनाडाई प्रधानमंत्री कार्नी ने 'नए वर्ल्ड ऑर्डर' पर भाषण दिया था.
साथ ही उन्होंने इस बात को मजबूती से रखा कि कनाडा सरीखे मिडिल पावर वाले देश आपसी सहयोग से लाभ उठा सकते हैं. कार्नी ने दुनिया में बड़े देशों के दबदबे के ख़िलाफ़ अपनी बात रखी.
उन्होंने कहा, "हमें यह याद दिलाया जाता है कि हम महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के युग में जी रहे हैं. नियम आधारित व्यवस्था कमज़ोर पड़ रही है. शक्तिशाली देश वही करते हैं जो वे कर सकते हैं और कमज़ोरों को सहना पड़ रहा है."
वे आगे बोले, "हम जानते थे कि नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की कहानी आंशिक रूप से झूठी थी. सबसे शक्तिशाली देश सुविधा होने पर ख़ुद को छूट दे देते हैं. व्यापार नियम असमान रूप से लागू होते हैं और अंतरराष्ट्रीय क़ानून की कठोरता अभियुक्त या पीड़ित की पहचान पर निर्भर करती है."
"मैं कहूँगा कि महाशक्तियाँ अकेले चलने का जोखिम उठा सकती हैं. उनके पास बाज़ार का आकार, सैन्य क्षमता और शर्तें तय करने की पावर है. मिडिल पावर वाले देशों के पास ये सब नहीं है. जब हम किसी ताक़तवर से द्विपक्षीय वार्ता करते हैं, तो हम कमज़ोरी की स्थिति से बातचीत करते हैं. जो दिया जाता है, वही स्वीकार करते हैं."
ट्रंप का जवाब और कार्नी का पलटवार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम में मार्क कार्नी के भाषण का जवाब दिया. साथ ही आरोप लगाया कि कनाडा उनके प्रति अहसानमंद नहीं है.
ट्रंप ने कहा, "कनाडा हमसे बहुत-सी मुफ़्त सुविधाएँ पाता है. उन्हें आभार व्यक्त करना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं कर रहे हैं."
ट्रंप ने कहा, "मैंने मार्क कार्नी को देखा, वह हमारे प्रति ज़्यादा कृतज्ञ नहीं थे. कनाडा अमेरिका की वजह से ही अस्तित्व में है. अगली बार जब मार्क बयान देंगे तो उन्हें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए."
ट्रंप पर पलटवार करते हुए मार्क कार्नी ने गुरुवार को क्यूबेक सिटी में एक राष्ट्रीय संबोधन में कहा, "कनाडा और अमेरिका ने शानदार साझेदारी बनाई है. लेकिन कनाडा अमेरिका की वजह से जिंदा नहीं है. कनाडा इसलिए आगे बढ़ रहा है क्योंकि हम कनाडाई हैं."
उन्होंने आगे कहा, "जब दुनियाभर में लोकतांत्रिक मूल्यों में गिरावट आई है, तब कनाडा एक आदर्श मॉडल के रूप में सामने है. कनाडा दुनिया की तमाम समस्याओं को हल नहीं कर सकता, लेकिन हम दिखा सकते हैं कि एक और तरीका संभव है."
इतने गुस्से में क्यों थे मार्क कार्नी?

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पीएम कार्नी ने प्रचार अभियान के दौरान अपनी छवि 'ट्रंप से निपटने में माहिर' की तरह पेश की. लेकिन कार्नी प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका ने कनाडा पर टैरिफ़ और बढ़ा दिए.
कनाडा के सामान पर 35 फीसदी टैरिफ़ लगाए गए हैं. हालांकि, अधिकांश सामान अमेरिका-कनाडा-मेक्सिको फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के तहत छूट प्राप्त हैं. इसके अलावा, आयातित धातुओं पर 50% का ब्लैंकेट लेवी और अमेरिका के बाहर बनी गैर-अमेरिकी कारों पर 25% ड्यूटी भी लगाई गई है.
अक्तूबर 2025 में ट्रंप ने बातचीत को स्थगित कर दिया और कनाडा पर 10 फ़ीसदी का अतिरिक्त टैरिफ़ लगाने की धमकी दी. इसकी वजह थी कनाडा का एक 'एंटी-टैरिफ़ विज्ञापन', जिसे प्रसारित किया था.
यह विज्ञापन ओंटारियो प्रांत ने बनवाया था और इसमें पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के पुराने भाषण के क्लिप्स का इस्तेमाल किया गया था. इसके बाद कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने माफ़ी भी मांगी.
इसके अलावा, ट्रंप कनाडा का अमेरिका में विलय करना चाहते हैं और उसे 51वां राज्य बनाना चाहते हैं. जबकि मार्क कार्नी ने इस बात का जमकर विरोध किया है.
ट्रंप से हुई पहली आधिकारिक बैठक में भी उन्होंने अपना पक्ष रखा था कि कनाडा बिकने को तैयार नहीं है. जबकि ट्रंप कार्नी की बात मानने को तैयार नहीं थे.
पीएम बनने से पहले कार्नी ट्रंप के बारे में क्या सोचते थे?
मार्क कार्नी प्रधानमंत्री बनने से पहले इंग्लैंड के सेंट्रल बैंक के गवर्नर हुआ करते थे. ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान मार्क कार्नी उनकी नीतियों से असहमति व्यक्त कर चुके थे.
साल 2018 में कार्नी ने कहा था, "अगर हर देश, हर दूसरे देश पर टैरिफ़ लगा देगा तो दुनिया की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) को बहुत ज़्यादा नुक़सान होगा."
मार्क कार्नी सिर्फ़ आर्थिक मोर्चे पर ही ट्रंप के विरोधी नहीं रहे. वे अन्य मुद्दों पर भी ट्रंप की अप्रत्यक्ष रूप से आलोचना करते रहे हैं.
साल 2020 में मार्क कार्नी बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के गवर्नर थे. उन्होंने दावोस में ब्लूमबर्ग की तरफ से आयोजित एक कार्यक्रम में डोनाल्ड ट्रंप के साथ टकराव में ग्रेटा थनबर्ग का समर्थन किया.
उन्होंने कहा, "ग्रेटा थनबर्ग बिल्कुल सही हैं जब वे बताती हैं कि दुनिया तेजी से अपने बचे हुए कार्बन बजट को ख़त्म कर रही है और अमेरिका का रुख़ वैश्विक तापमान वृद्धि से निपटना और मुश्किल बना रहा है."
ट्रंप से मुक़ाबला करने की छवि दिखाकर जीता था चुनाव

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ट्रंप के पहले कार्यकाल (2017-2021) में कनाडा के पूर्व पीएम जस्टिन ट्रूडो के साथ उनका रिश्ता तनावपूर्ण था, जिसमें टैरिफ़ और कनाडा को '51वें राज्य' बनाने की बातें शामिल थीं.
जब कनाडा में चुनाव हुआ तो कार्नी ने कनाडा के लोगों का सेंटीमेंट समझा और अपना प्रचार अभियान इसी दिशा में रखा कि वे ट्रंप से 'मोल-भाव' करने में सक्षम हैं.
स्काई न्यूज में प्रकाशित हुए एक एनालिसिस में लिखा था कि मार्क कार्नी ने चुनाव में ख़ुद को डोनाल्ड ट्रंप का मुक़ाबला करने वाला व्यक्ति बताया था. कनाडा के लोगों ने उनकी इस बात पर भरोसा भी दिखाया.
कार्नी के व्यवहार में ट्रंप के प्रति एक आक्रामकता है. उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान अपने अनुभव का हवाला देते हुए ख़ुद को ट्रंप के साथ बातचीत और विवाद में विशेषज्ञ बताया.
उन्होंने आगे लिखा "कार्नी ने राजनीतिक समझदारी दिखाई जब उन्होंने ट्रंप को कनाडा के लिए अस्तित्व का ख़तरा बताया और ख़ुद को इसका इलाज 'एंटीडोट' पेश किया. कार्नी ने राष्ट्र की भावना को भांपा और उसे पकड़ लिया"
ट्रंप ने भी कार्नी की जीत पर ख़ास खुशी ज़ाहिर नहीं की थी. उन्होंने इतना जरूर कहा था, "मुझे लगता है कि वही जीता जिसने ट्रंप से सबसे कम नफ़रत की."
कार्नी ने बीबीसी को बताया, "हमारी साझेदारी हमारी शर्तों पर होगी. मैं राष्ट्रपति (ट्रंप) की इच्छा और उनकी अपेक्षाओं में अंतर स्पष्ट करना चाहूंगा.
अमेरिका हमारी ज़मीन, हमारे संसाधन, हमारा पानी, हमारा देश चाहता है. लेकिन ये कोरी धमकियां नहीं हैं. राष्ट्रपति ट्रंप हमें तोड़ना चाहते हैं ताकि अमेरिका हम पर क़ब्ज़ा कर सकें." कार्नी के बयान से स्पष्ट है कि वे ट्रंप की नीतियों के कड़े आलोचक रहे हैं.
मैकगिल यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डैनियल बेलैंड ने 'द गार्डियन' अख़बार से कार्नी के बारे में कहा था, "वे एक टेक्नोक्रेट हैं, यानी बहुत पढ़े-लिखे, एक्सपर्ट. लेकिन बोरिंग आदमी हैं. उनमें ज़्यादा चार्म या जोश नहीं है. लेकिन अभी कनाडा में ट्रंप के व्यापार युद्ध और देश की आज़ादी पर हमले से लोग डरे हुए हैं."
"ऐसे में कार्नी की गंभीर समझदारी और बिना ड्रामे वाली योग्यता अच्छी लग रही है. वे एक ऐसे व्यक्ति की तरह दिखते हैं जो सब कुछ अच्छे से समझते हैं और भरोसा दिलाते हैं."
रिश्ते सहज करने की कोशिश भी असफल रही

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कनाडा की सत्ता से जस्टिन ट्रूडो की विदाई के बाद मार्क कार्नी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से रिश्ते सुधारने का प्रयास किया, लेकिन वह सफल नहीं हो पाए.
कार्नी भी अपनी शर्तों से नहीं हटे और ट्रंप भी कनाडा को लेकर अपनी नीतियों में लचीलापन लाने को तैयार नहीं थे. प्रधानमंत्री बनने के दो महीने बाद ही कार्नी अमेरिका दौरे पर गए थे. यहाँ उन्होंने व्हाइट हाउस में पहली बार ट्रंप से मुलाक़ात की थी.
कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में नॉर्थ अमेरिकन हिस्ट्री के प्रोफ़ेसर जॉन पारमेंटर ने इस मुलाक़ात का विश्लेषण करते हुए कहा कि इस बैठक से 'मिश्रित परिणाम' निकले, जो अमेरिका और कनाडा के बीच संबंधों में कोई बड़ा बदलाव या रीसेट नहीं ला सके.
उन्होंने कहा, "एक तरफ़, राष्ट्रपति ट्रंप ने इस बात को छोड़ने को तैयार नहीं थे कि वे कनाडा का अमेरिका में विलय कर लेंगे. दूसरी तरफ़, प्रधानमंत्री कार्नी ने साफ़ कर दिया कि कनाडा बिक्री के लिए नहीं है और ऐसा कभी नहीं होगा."
"इस मीटिंग में राष्ट्रपति ट्रंप के लहजे में रचनात्मकता थी, जो पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो से बात करते हुए देखने को नहीं मिलती थी. लेकिन यह भी स्पष्ट है कि इन दोनों देशों के लंबे समय से चले आ रहे संबंधों में स्थिरता बहाल करने के लिए बहुत काम बाक़ी है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















