डेनमार्क ने इस इलाक़े को अमेरिका को क्यों बेचा और इसका ग्रीनलैंड से क्या नाता है

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- Author, गिएर्मो दी ओल्मो
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ मुंडो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को हासिल करने की ज़िद अब नए स्तर पर पहुंच चुकी है. हाल ही में उन्होंने उन यूरोपीय सहयोगियों पर 10 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाने की धमकी दी, जो आर्कटिक द्वीप पर क़ब्ज़ा करने के उनके मक़सद का विरोध कर रहे हैं.
अमेरिकी नेता का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से अमेरिका के पास ग्रीनलैंड का होना ज़रूरी है. उन्होंने सैन्य ताक़त के इस्तेमाल की संभावना से भी इनकार नहीं किया है.
ग्रीनलैंड के नेताओं और डेनमार्क ने उनकी इन मांगों को ख़ारिज कर दिया है. ग्रीनलैंड डेनमार्क का एक अर्ध-स्वायत्त इलाक़ा है.
हालांकि ट्रंप के दौर में अमेरिकी विस्तारवाद ने फिर से रफ़्तार पकड़ी है, लेकिन डेनमार्क के इलाक़ों पर अमेरिकी नियंत्रण का विचार मौजूदा राष्ट्रपति से काफ़ी पहले का है.
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सौ साल से भी ज़्यादा पहले अमेरिका ने डेनमार्क से कैरेबियाई क्षेत्र में मौजूद कुछ द्वीप ख़रीदे थे, जो ग्रीनलैंड की बर्फ़ीली जलवायु से काफ़ी दूर हैं.
यह कहानी है कि कैसे डेनिश वेस्ट इंडीज़ अमेरिका के वर्जिन आइलैंड्स बने और कैसे एक कमज़ोर पड़ती यूरोपीय ताक़त ने अपने विदेशी इलाक़ों का हिस्सा उस दौर की उभरती शक्ति को सौंप दिया.

अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स क्या हैं?
अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स कैरेबियाई सागर में स्थित हैं और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स के पास होते हुए भी उनसे अलग हैं. यह इलाक़ा प्यूर्टो रिको के ठीक पूर्व में है और अमेरिका का हिस्सा है.
क़रीब 83,000 की आबादी वाले इस क्षेत्र में सेंट जॉन, सेंट थॉमस और सेंट क्रॉइक्स मुख्य द्वीप हैं. साथ ही इसमें 40 से ज़्यादा छोटे द्वीप और रेतीले टापू भी शामिल हैं.
हालांकि यहां रहने वाले ज़्यादातर लोग अमेरिकी नागरिक हैं, लेकिन यह इलाक़ा वॉशिंगटन की राजनीतिक और क़ानूनी व्यवस्था में पूरी तरह शामिल नहीं है. इसलिए यहां के लोग राष्ट्रपति चुनाव में वोट नहीं दे सकते, जब तक कि वे किसी अमेरिकी राज्य में न रहने लग जाएं. अमेरिकी संविधान के भी सिर्फ़ कुछ हिस्से ही यहां लागू होते हैं.
इन द्वीपों की ज़्यादातर आबादी अपनी जड़ें उन अफ्रीकी लोगों से जोड़ती है, जिन्हें ट्रांस अटलांटिक ग़ुलाम व्यापार के दौरान जबरन यहां लाया गया था. उन्हें गन्ने उगाने का काम करने के लिए मजबूर किया गया था.
अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स का डेनमार्क से नाता क्यों था?
कई सदियों तक ये द्वीप डेनमार्क के उपनिवेश रहे और डेनिश वेस्ट इंडीज़ के नाम से जाने जाते थे.
16वीं और 17वीं सदी में स्पेन, इंग्लैंड, फ्रांस और नीदरलैंड्स समय-समय पर इन द्वीपों पर नियंत्रण को लेकर भिड़ते रहे. उस दौर में यह इलाक़ा कैरेबियाई समुद्र में समुद्री लुटेरों के ठिकानों के रूप में भी इस्तेमाल होता था.
साल 1684 में डेनमार्क ने सेंट जॉन पर क़ब्ज़ा कर लिया और वहां अपनी संप्रभुता स्थापित की. इससे कुछ समय पहले उसने सेंट थॉमस पर भी यही किया था.
इसके बाद डेनमार्क ने इन द्वीपों पर बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती को विकसित किया और यूरोपीय व्यापारियों के ज़रिये लाए गए ग़ुलाम अफ्रीकियों से काम कराया.

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अमेरिका ने इन द्वीपों में क्यों दिलचस्पी दिखाई थी?
19वीं सदी के दूसरे हिस्से में हालात बदलने लगे.
एक तरफ़ दुनिया में डेनमार्क का प्रभाव घट रहा था, दूसरी तरफ़ अमेरिका गृहयुद्ध से निकलकर उभर रहा था.
तत्कालीन राष्ट्रपति एंड्रयू जॉनसन का प्रशासन अमेरिकी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में था और साथ ही महाद्वीप से यूरोपीय दख़ल को ख़त्म करना चाहता था. उनके विदेश मंत्री विलियम हेनरी सीवर्ड ने शांतिपूर्ण क्षेत्रीय विस्तार की योजना के तहत डेनिश वेस्ट इंडीज़ पर नज़र डाली.
सेंट थॉमस का बंदरगाह अमेरिकी रणनीतिकारों के लिए ख़ासा अहम था, क्योंकि इसे कैरेबियाई क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए एक आदर्श ठिकाना माना जा रहा था.
इसी दौरान चीनी की क़ीमतें गिर रही थीं और डेनमार्क को लगने लगा था कि ये द्वीप फ़ायदे से ज़्यादा बोझ बनते जा रहे हैं.
इससे दोनों सरकारों के बीच द्वीपों की बिक्री को लेकर बातचीत शुरू हुई.
1867 में एक समझौते पर दस्तख़त हुए, जिसके तहत अमेरिका 7.5 मिलियन डॉलर मूल्य का सोना देकर इन द्वीपों को हासिल करने वाला था. आज के हिसाब से इसकी क़ीमत क़रीब 164 मिलियन डॉलर बैठती है.
लेकिन यह सौदा अमल में नहीं आ सका.
इसके ठीक एक साल बाद अमेरिका ने रूस से अलास्का ख़रीदकर कहीं और अपना प्रभाव बढ़ाने में कामयाबी हासिल की. इसके लिए उसने क़रीब 7 मिलियन डॉलर चुकाए. यह सीवर्ड का एक जोखिम भरा फ़ैसला था, जिसकी अमेरिका में काफ़ी आलोचना हुई और कई लोगों ने इसका मज़ाक भी उड़ाया.
अलास्का ख़रीद को लेकर उठे विवाद ने डेनिश वेस्ट इंडीज़ की ख़रीद वाले समझौते को अमेरिकी कांग्रेस से मंज़ूरी न मिलने में अहम भूमिका निभाई.
प्रथम विश्व युद्ध और अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स की ख़रीद
क़रीब आधी सदी तक इस ख़रीद पर दोबारा विचार नहीं हुआ. हालात तब बदले जब पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ और यह ख़तरा बढ़ गया कि जर्मनी डेनमार्क से रणनीतिक रूप से अहम इन द्वीपों पर क़ब्ज़ा कर सकता है. इसके बाद अमेरिका के पक्ष में माहौल बनने लगा.
यूरोप एक लंबे युद्ध में बुरी तरह थक चुका था और मित्र राष्ट्र चाहते थे कि अमेरिका उनकी तरफ़ से युद्ध में उतरे, ताकि जर्मनी और दूसरी केंद्रीय शक्तियों को हराया जा सके.
तत्कालीन राष्ट्रपति वुडरो विल्सन अब तक कांग्रेस और आम लोगों को युद्ध में शामिल होने के लिए राज़ी नहीं कर पाए थे. लेकिन जर्मन पनडुब्बियों के अमेरिकी व्यापारिक और यात्री जहाज़ों पर बढ़ते हमले सोच बदलने वाले थे.

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अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक़, 1915 में आयरलैंड के तट के पास जर्मन पनडुब्बी के हमले में यात्री जहाज़ आरएमएस लुसिटानिया डूब गया था, जिसमें 1200 लोगों की मौत हुई. इस घटना ने तनाव और बढ़ा दिया.
डेनिश इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल स्टडीज़ की वरिष्ठ शोधकर्ता एस्ट्रिड एंडरसन बताती हैं कि युद्ध के दौरान डेनमार्क तटस्थ था, "इसी वजह से वॉशिंगटन को डर था कि जर्मनी वहां घुसपैठ कर सेंट थॉमस के बंदरगाह समेत द्वीपों पर कब्ज़ा कर सकता है."
अगर ये द्वीप जर्मनी के हाथ लग जाते, तो वे अमेरिकी जहाज़ों या यहां तक कि अमेरिकी इलाक़ों पर हमले के लिए आदर्श ठिकाना बन सकते थे.
1914 में पनामा नहर के बनने से भी अमेरिका की दिलचस्पी इस क्षेत्र में बढ़ी, क्योंकि द्वीपों पर नियंत्रण से हर साल यहां से गुज़रने वाले सैकड़ों जहाज़ों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती थी.
आर्थिक कारणों और राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वॉशिंगटन और कोपेनहेगन के बीच बातचीत शुरू हुई.
एंडरसन कहती हैं कि उस समय अमेरिका का रुख़ आज राष्ट्रपति ट्रंप के रुख़ से मिलता-जुलता था.
वह कहती हैं, "आज जो हम सुन रहे हैं, उसकी गूंज तब भी थी. अमेरिका ने साफ़ कहा था कि या तो इसे हमें बेच दो, नहीं तो हम इस पर क़ब्ज़ा कर लेंगे."

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अमेरिकी विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक़, विल्सन के विदेश मंत्री ने डेनमार्क को चेतावनी दी थी कि अगर उसने इलाक़ा बेचने से इनकार किया, तो अमेरिका उसे अपने क़ब्ज़े में ले सकता है, ताकि कोई और उस पर हाथ न डाल सके.
इस महीने की शुरुआत में ट्रंप ने वॉशिंगटन में पत्रकारों से कहा था कि रूस और चीन को रोकने के लिए अमेरिका को ग्रीनलैंड का "मालिक" बनना ज़रूरी है. उन्होंने कहा कि यह काम "आसान तरीके़" से भी हो सकता है और "कठिन तरीके़" से भी.
ब्लूमबर्ग के मुताबिक़, आख़िरकार अगस्त 1916 में डेनमार्क और अमेरिका के बीच द्वीपों की बिक्री पर सहमति बनी. इसके तहत अमेरिका ने 25 मिलियन डॉलर मूल्य का सोना दिया, जिसकी आज की क़ीमत क़रीब 630 मिलियन डॉलर है.
इस समझौते से डेनमार्क की ग्रीनलैंड पर संप्रभुता को अमेरिकी मान्यता मिलने का रास्ता भी साफ़ हुआ. समझौते के तहत अमेरिका ने वादा किया कि वह डेनमार्क के "पूरे ग्रीनलैंड पर अपने राजनीतिक और आर्थिक हित बढ़ाने का विरोध नहीं करेगा."
इस बार दोनों देशों ने समझौते की पुष्टि की. डेनमार्क के लोगों ने भी जनमत संग्रह में भारी बहुमत से बिक्री के पक्ष में वोट दिया.
एंडरसन कहती हैं, "असल में ज़्यादातर डेनिश लोग इन द्वीपों को डेनमार्क का हिस्सा मानते ही नहीं थे."

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इतिहासकार यह भी बताते हैं कि उस समय और उससे पहले की कोशिश में द्वीपों के स्थानीय लोगों की राय कभी नहीं ली गई.
लेकिन ग्रीनलैंड के मामले में समस्या यह है कि इस बार डेनमार्क बेचने के लिए तैयार नहीं है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















