अमेरिका, रूस और चीन की दुनिया पर हावी होने की होड़ कहां तक जाएगी

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेज़ुएला के नेता निकोलस मादुरो को पकड़े जाने के बाद घोषणा करते हुए कहा, "पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी दबदबे पर अब कभी सवाल नहीं उठाया जाएगा."
जैसे ट्रंप अमेरिका की ताक़त का दावा कर रहे हैं. वहीं चीन और रूस अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों को मज़बूत करने और उनका विस्तार करने की अपनी कोशिश जारी रखे हुए हैं.
कई विश्लेषकों का कहना है कि ये तीनों ही देश एक नई वैश्विक व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका असर यूरोप और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों पर भी पड़ेगा.
इस कहानी में हम जानने की कोशिश करेंगे कि अमेरिका, चीन और रूस किस तरह से न केवल पड़ोसी देशों बल्कि दूर के देशों को भी प्रभावित करने के लिए सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक साधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं.
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एक ऐसी दुनिया जहाँ शासन 'ताक़त के दम' पर हो

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एंथनी ज़र्चर
नॉर्थ अमेरिका, संवाददाता, बीबीसी
ट्रंप प्रशासन के दौर में अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध पर ख़ास ध्यान देते हुए अपनी विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतियों को फिर से परिभाषित और नए सिरे से तैयार करने में लगा हुआ है.
यह अमेरिका के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों से हाल में बने राष्ट्रपतियों की नीतियों में एक बड़ा बदलाव है, जिन्होंने अमेरिका की ताक़त और अधिकार को लेकर अधिक वैश्विक नज़रिया अपनाया था.
ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि यह 'अमेरिका फ़र्स्ट' विदेश नीति को लागू करना है जो इमिग्रेशन, अपराध और ड्रग तस्करी जैसे मुद्दों पर ज़ोर देती है. ये ऐसे मुद्दे हैं जो अमेरिकी नागरिकों की ज़िंदगी को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं.
ट्रंप के शीर्ष सलाहकार स्टीफ़न मिलर ने हाल में अपने कमेंट्स में एक ऐसी दुनिया का ज़िक्र किया है जहाँ "ताक़त (स्ट्रेंथ) से शासन होता है, बल (फ़ोर्स) से शासन होता है और शक्ति (पावर) से शासन होता है."
उनकी इस बात की तुलना हेनरी किसिंजर और रिचर्ड निक्सन जैसे राष्ट्रपतियों की 1960 और 1970 के दशक की व्यावहारिक, गैर-आदर्शवादी विदेश नीति से तुलना की जा सकती है.
लेकिन इसकी सबसे अच्छी तुलना 20वीं सदी की शुरुआत में राष्ट्रपति विलियम मैककिनले और टेडी रूज़वेल्ट के अमेरिकी साम्राज्य-निर्माण के प्रयासों से की जा सकती है.
सन 1823 के 'मोनरो सिद्धांत' का विस्तार करते हुए कि पश्चिमी गोलार्ध यूरोपीय हस्तक्षेप से मुक्त होना चाहिए, रूजवेल्ट ने ज़ोर दिया कि अमेरिका को पूरे अमेरिकी महाद्वीप की पुलिसिंग और सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए.
मोनरो सिद्धांत एक अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने रखा था.
उस समय अमेरिका ने वेनेज़ुएला और डोमिनिकन रिपब्लिक जैसे देशों को वित्तीय सहायता दी और हैती और निकारागुआ में अमेरिकी सैनिकों को तैनात किया.
अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही, डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के क़रीबी भौगोलिक क्षेत्रों और वहाँ से जुड़े मुद्दों में गहरी दिलचस्पी दिखाई है.
वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने का उनका सैन्य अभियान इसका सबसे नाटकीय उदाहरण है.
लेकिन यह कैरिबियन क्षेत्र में संदिग्ध ड्रग-तस्करी वाली नावों पर अमेरिकी हमलों, लैटिन अमेरिकी देशों पर दबाव डालने के लिए टैरिफ़ लगाने के बाद हुआ है.
इसके साथ ही अमेरिका ने लैटिन अमेरिकी देशों के राष्ट्रीय चुनावों में ख़ास उम्मीदवारों और पार्टियों के लिए वकालत की; साथ ही ट्रंप ने पनामा नहर, ग्रीनलैंड और कनाडा के अमेरिका में विलय की भी मांग की.
व्हाइट हाउस ने हाल ही में जारी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में कहा है, "हमारी सुरक्षा और समृद्धि के लिए शर्त यह है कि अमेरिका को पश्चिमी गोलार्ध में सर्वोपरि होना चाहिए. एक ऐसी शर्त जो क्षेत्र में जहाँ और जब हमें ज़रूरत हो, पूरे आत्मविश्वास के साथ दख़ल देने की अनुमति देती है."
हालांकि, इस नई अंतरराष्ट्रीय रणनीति का एक हिस्सा विदेशी ताक़तों के हाथों अमेरिका के क्षेत्रीय पड़ोसियों को प्रभावित करने की कोशिशों को रोकना भी है.
इसमें सबसे ख़ास तौर पर चीन शामिल है. और यहीं अमेरिका का किसी गोलार्ध में प्रभाव क्षेत्र पर उसका नया फ़ोकस वैश्विक राजनीतिक चिंताओं से सीधे टकरा सकता है.
इसके अलावा, ट्रंप ने दुनिया भर में शांति समझौतों में मध्यस्थता करने में दिलचस्पी दिखाई है और सऊदी अरब, क़तर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे अरब देशों के साथ आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को मज़बूत करने में ख़ास दिलचस्पी दिखाई है.
ट्रंप और उनके क़रीबी सलाहकारों, जिनमें मिलर भी शामिल हैं, ने यह राय ज़ाहिर की है कि अमेरिका उन ताक़तों के ख़िलाफ़ पश्चिमी सभ्यता का रक्षक है जो इसकी संस्कृति और परंपराओं को ख़त्म करने की कोशिश करेंगी.
यह सब बताता है कि भले ही अमेरिका की विदेश नीति की रणनीतिक बुनियाद एक नए 'अमेरिका फ़र्स्ट' नज़रिए से जुड़ी हो, लेकिन ट्रंप के अपने निजी विचार और दिलचस्पी अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय एजेंडे को आगे बढ़ाती रहेंगी.
अमेरिका के 250 साल के इतिहास में, उसकी विदेश नीति किसी मुद्दे पर अलग रहने से लेकर उसमें हस्तक्षेप और समर्थन करने; फिर वापस आदर्शवाद और व्यावहारिकता पर लौटने के अलग-अलग मिश्रण के साथ बदलती रही है.
यह सब अमेरिका की सैन्य ताक़त, उसके लोगों और नेताओं के हितों पर निर्भर करता है.
हालांकि राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप ने दूसरे कार्यकाल के दौरान ज़मीन काफ़ी बदलती दिख रही है, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं है कि लंबे समय के लिए अमेरिकी विदेश नीति के ये चक्र और बदलाव ख़त्म हो गए हैं.
चीन का कायाकल्प

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लौरा बिकर
चीन संवाददाता, बीबीसी
चीन का वैश्विक असर दुनिया के किसी एक "क्षेत्र" या इलाक़े तक सीमित नहीं है. चीन की मौजूदगी अब दुनिया के हर कोने में महसूस की जा रही है- साउथ पैसिफिक से लेकर साउथ और सेंट्रल एशिया, विस्तृत मिडिल ईस्ट, लैटिन अमेरिका और इनके बीच के इलाक़ों तक.
वैश्विक दबदबे की अपनी कोशिश में चीन ने अपनी मुख्य स्किल का इस्तेमाल किया है, जो है मैन्युफैक्चरिंग. दुनिया भर में जो सामान बनाए जाते हैं, उसका एक तिहाई चीन में बनता है. इनमें हमारी जेब में रखे गैजेट, हमारी अलमारी में रखे कपड़े और जिस फर्नीचर पर बैठकर हम टीवी देखते हैं, वे सब शामिल हैं.
चीन ने दुनिया के रेयर अर्थ मिनरल्स का सबसे बड़ा हिस्सा अपने पास रखकर भविष्य पर क़ब्ज़ा करने के लिए ख़ुद को सबसे अच्छी स्थिति में रखा हुआ है. यह उन तत्वों का एक ग्रुप है जिनकी ज़रूरत टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में होती है, जिसमें स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक कार, विंड टर्बाइन और मिलिट्री हथियार शामिल हैं.
चीन दुनिया के क़रीब 90% रेयर अर्थ मिनरल्स को प्रोसेस करता है और उसने हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर अपनी इस ताक़त का इस्तेमाल किया.
पिछले साल अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर के दौरान चीन ने इसके एक्सपोर्ट को सीमित कर दिया. शायद यही वजह है कि अमेरिका ग्रीनलैंड और उससे आगे मिनरल्स की तलाश कर रहा है.
ऐसा लगता है कि दोनों महाशक्तियां संसाधनों को सुरक्षित करने की लड़ाई लड़ रही हैं.
यह पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना के लिए एक बहुत बड़ा बदलाव है, जो साल 2000 में अमेरिका के दबदबे वाली दुनिया में एक दूसरे दर्जे का खिलाड़ी था. अब राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक महत्वाकांक्षी ग्लोबल लीडर के रूप में उभरे हैं, जो अपनी बढ़ती सैन्य ताक़त के समर्थन से ट्रेड, टेक्नोलॉजी और इन्वेस्टमेंट के ज़रिए अपनी शक्ति और प्रभाव दिखा रहे हैं.
दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में से एक बड़ी इंडस्ट्रियल और टेक्नोलॉजिकल शक्ति बनने की चीन की अपनी तरक्की कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करती है.
वे इसे पश्चिमीकरण के बिना आधुनिकीकरण के रूप में देखते हैं - जहाँ कोई राज्य और देश पश्चिमी राजनीतिक प्रणालियों या विदेश नीति (गठबंधनों) को अपनाए बिना आर्थिक विकास कर सकते हैं.
चीन के लिए यह एक प्रभावी रणनीति साबित हुई है, साल 2001 में 80% से ज़्यादा अर्थव्यवस्थाओं (देशों) ने अमेरिका के साथ ज़्यादा दो-तरफ़ा व्यापार किया था. मौजूदा समय में दुनिया का क़रीब 70% व्यापार अमेरिका के मुक़ाबले चीन के साथ ज़्यादा होता है.
बीजिंग ने विकास पर भी ध्यान केंद्रित किया है और अपनी 'बेल्ट एंड रोड' योजना के तहत उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में भारी निवेश किया है.
यह एक विशाल ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है जिसका मक़सद एशिया, यूरोप और अफ्रीका को ज़मीन और समुद्री रास्तों से जोड़ना है. इसमें बंदरगाहों, रेलवे, सड़कों और ऊर्जा परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर चीनी निवेश किया गया है.
इस वजह से कई देश चीन के कर्ज़दार हो गए हैं. वेनेज़ुएला में डोनाल्ड ट्रंप के ऑपरेशन के बाद सबसे बड़े सवालों में से एक यह था कि क्या इससे चीन को ताइवान पर हमला करने का आइडिया मिलेगा.
लेकिन चीन इस सेल्फ़-गवर्निंग आइलैंड को अपना मामला मानता है - एक अलग हुआ प्रांत जो एक दिन अपनी मातृभूमि के साथ फिर से मिल जाएगा.
अगर शी जिनपिंग ताइवान पर हमला करने का फ़ैसला करते हैं, तो यह इसलिए नहीं होगा कि अमेरिका ने कोई मिसाल कायम की है. ज़्यादातर विश्लेषक मानते हैं कि चीन ताइवान के लोगों को थकाने के लिए दबाव बनाने की अपनी रणनीति जारी रखेगा, जिसका मक़सद ताइवान को बातचीत की मेज़ पर लाना है.
राष्ट्रपति शी का विज़न हमेशा चीनी राष्ट्र का "महान पुनरुद्धार" रहा है.
पिछले साल की मिलिट्री परेड में, जब वह अपने सैनिकों को देखते हुए एक बालकनी पर खड़े थे, तो उन्होंने कहा था कि चीन का उदय "अजेय" है.
वह एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जो चीन की तरफ़ देखे और उसकी तारीफ़ करे. वह डोनाल्ड ट्रंप के दौर में दुनिया भर में मची उथल-पुथल को 'बदलाव' के दौर के रूप में देखते हैं.
वह इसे एक अवसर के तौर पर देखेंगे. उनका संदेश है कि दुनिया एक चौराहे पर है और उनका मानना है कि चीन आगे बढ़ने में किसी की मदद करने के लिए सबसे अच्छी स्थिति में है.
रूस- 'क़रीब में विदेश'

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विताली शेवचेंको
चीफ़ एनालिस्ट, बीबीसी मॉनिटरिंग
व्लादिमीर पुतिन ने सोवियत संघ के टूटने को मशहूर घटना या शायद बदनाम घटना के तौर पर 20वीं सदी की "सबसे बड़ी भू-राजनीतिक तबाही" कहा था.
यह इस बात की एक अहम जानकारी देता है कि पूर्व सोवियत गणराज्य जिन्होंने 1990 के दशक में आज़ादी हासिल की उनके बारे में पुतिन का क्या नज़रिया है. रूस के लोग अक्सर इन देशों को "निकटवर्ती विदेश" कहते हैं.
कई लोगों के लिए यह शब्द ही यह बताता है कि उन्हें "दूर के विदेश" में स्थित देशों की तुलना में स्वतंत्र राष्ट्र बनने का कुछ कम अधिकार है.
इस सोच के अनुसार, जो क्रेमलिन की विचारधारा का आधार है, रूस का इन देशों में वैध हित है, जिसकी सुरक्षा करना उसका अधिकार है.
लेकिन रूस के प्रभाव क्षेत्र की सीमा कहाँ तक हो, यह बहुत स्पष्ट नहीं है और क्रेमलिन ने जानबूझकर भी इस बारे में अस्पष्टता बनाए रखी है.
राष्ट्रपति पुतिन ने एक बार कहा था कि "रूस की सीमाएँ कभी ख़त्म नहीं होतीं."
उनकी विस्तारवादी नीतियों के कुछ समर्थकों के अनुसार, रूस के प्रभाव क्षेत्र में वे सभी ज़मीनें शामिल हैं जो ऐतिहासिक रूप से रूसी साम्राज्य का हिस्सा थीं, या शायद उससे भी ज़्यादा.
यह एक वजह है कि यूक्रेन के क़ब्ज़े वाले इलाकों को रूस "ऐतिहासिक क्षेत्र" कहता है.
काग़ज़ों पर, क्रेमलिन पूर्व सोवियत गणराज्यों और अन्य देशों की संप्रभुता का सम्मान करता है जहाँ वह कहता है कि उसके "हित" हैं.
लेकिन, व्यवहार में, उसका रिकॉर्ड रहा है कि जब ये देश रूस के दायरे से बाहर निकलने के बारे में सोचने लगते हैं, तो रूस उनके ख़िलाफ़ आर्थिक और सैन्य दबाव का इस्तेमाल करता है.
यूक्रेन को यह बात मुश्किल तरीके़ से पता चली.
सोवियत संघ के टूटने के एक दशक से भी ज़्यादा समय तक यूक्रेन की सरकार ने ऐसी नीतियाँ अपनाईं जो बहुत हद तक क्रेमलिन के मक़सद के अनुरूप थीं और ब्लैक सी में क्रीमिया में एक प्रमुख रूसी नौसैनिक अड्डे की मेज़बानी की.
क्रेमलिन इस रिश्ते से तब तक खुश था जब तक यूक्रेन ने सुधारवादी पश्चिमी समर्थक राष्ट्रपति विक्टर युशचेंको को नहीं चुना. उनके कार्यकाल में रूस ने साल 2006 और 2009 में दो बार यूक्रेन के लिए गैस की आपूर्ति बंद कर दी.
जब आर्थिक दबाव और राजनीतिक दख़लअंदाज़ी काम नहीं आई, तो रूस ने साल 2014 में क्रीमिया पर हमला करके उस क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया और 2022 में यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर हमला किया.
इसी तरह रूस ने साल 2008 में जॉर्जिया के ख़िलाफ़ युद्ध किया, जब वहाँ सुधारवादी राष्ट्रपति मिखाइल साकाशविली का शासन था.
इससे जॉर्जिया के क़रीब 20% क्षेत्र पर रूसी नियंत्रण मज़बूत हुआ और उसका विस्तार हुआ. तब से रूसी सैनिक बॉर्डर पोस्ट और कांटेदार तारों को जॉर्जियाई इलाक़े में और अंदर की तरफ ले जा रहे हैं, जिसे स्थानीय तौर पर "रेंगता हुआ (क्रीपिंग) कब्ज़ा" कहा जाता है.
साल 2008 में जॉर्जिया और 2014 में यूक्रेन पर रूस के हमले पर पश्चिम की तरफ से कोई ठोस जवाब न मिलने से पुतिन का यह विश्वास और मज़बूत हो गया कि "पड़ोसी देश" उनके ही हैं.
यह ध्यान देने वाली बात है कि जहाँ यूक्रेन और जॉर्जिया ने रूस के राजनीतिक दबदबे का विरोध किया, जिसके कारण सेना का दख़ल हुआ, वहीं कुछ पूर्व सोवियत गणराज्य रूस के साथ बने रहे.
उनमें से पाँच देशों - बेलारूस, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, कज़ाख़स्तान और आर्मिनिया की सरकारों ने अभी भी रूसी सैनिकों को अपने देश में जगह दी हुई है.
यूक्रेन और जॉर्जिया के लिए समस्याएँ तब शुरू हुईं जब उन्होंने ऐसी सरकारें चुनीं जिन्होंने लोकतांत्रिक सुधारों को लागू करके और पश्चिम के साथ क़रीबी संबंध बनाकर रूस के प्रभाव क्षेत्र से बाहर निकलने की इच्छा जताई.
इसके बाद जो हुआ वह बिल्कुल भी नया नहीं था. इतिहास ऐसे संघर्षों से भरा पड़ा है जो अपने हितों की रक्षा करने और जातीय अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के बहाने लड़े गए.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद और फिर शीत युद्ध के बाद इसकी बहुत कोशिश की गई कि वैश्विक समुदाय में लोगों के बीच बराबरी हो, चाहे उनका आकार कुछ भी हो या उनके पास कोई भी हथियार हों.
लेकिन प्रभाव क्षेत्रों का फिर से उभरता हुआ विचार हम सभी को अतीत के एक बहुत ही बुरे दौर में वापस ले जा सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

















