ट्रंप का ग्रीनलैंड प्लान: चीन नाराज़ लेकिन रूस ख़ुश क्यों है?

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण इसलिए 'ज़रूरी' है क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो रूस और चीन 'ग्रीनलैंड पर क़ब्ज़ा' कर लेंगे.
ट्रंप ने हाल ही में कहा था, "वहां रूसी विध्वंसक लड़ाकू विमान तैनात हैं, रूसी सबमरीन हैं, चीन के विध्वंसक लड़ाकू विमान हैं."
ग्रीनलैंड, डेनमार्क का अर्ध स्वायत्त क्षेत्र है. ट्रंप के इस ग्रीनलैंड प्लान का डेनमार्क और उसके अन्य सहयोगी देशों ने विरोध किया है.
जिसके जवाब में ट्रंप ने 17 जनवरी को कहा था कि डेनमार्क, फ़िनलैंड, फ़्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, नॉर्वे, स्वीडन और ब्रिटेन अगर उनके प्रस्तावित क़दम का विरोध करते हैं, तो वह फ़रवरी में इन आठ अमेरिकी सहयोगी देशों पर नए टैरिफ़ लगाएंगे.
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ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर 'रूसी और चीनी क़ब्ज़े' के डर वाली बात कही. ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है कि ग्रीनलैंड पर ट्रंप के इरादे ज़ाहिर होने के बाद दोनों देशों में ही नाराज़गी होगी.
जहां चीन ने ट्रंप की बात पर आपत्ति ज़ाहिर की लेकिन रूस में इसे लेकर अलग ही प्रतिक्रिया है.
रूस के अंदर कैसी प्रतिक्रिया

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बीबीसी रशियन एडिटर स्टीव रोज़नबर्ग के मुताबिक़ रूस के सरकारी अख़बार में ट्रंप की ज़बरदस्त तारीफ़ की गई और उन यूरोपीय नेताओं की आलोचना की गई जो ग्रीनलैंड पर ट्रंप के प्लान की आलोचना कर रहे हैं.
रूसी अख़बार रोस्सिस्काया गज़ेटा लिखता है, "अमेरिकी राष्ट्रपति की ऐतिहासिक सफलता के रास्ते में डेनमार्क की ज़िद और अड़ियल यूरोपीय देशों की दिखावटी एकजुटता खड़ी है. जिनमें अमेरिका के तथाकथित दोस्त ब्रिटेन और फ्रांस भी शामिल हैं,"
अख़बार आगे लिखता है, "4 जुलाई 2026 को अमेरिका अपनी आज़ादी की 250वीं वर्षगांठ मना रहा होगा. अगर तब तक ट्रंप ग्रीनलैंड को अपने में मिला लेते हैं, तो वे इतिहास में ऐसे व्यक्ति के रूप में दर्ज होंगे जिन्होंने अमेरिका की महानता को स्थापित किया."
"अगर ट्रंप की वजह से ग्रीनलैंड अमेरिका का हिस्सा बन जाता है, तो यक़ीनन अमेरिकी जनता ऐसी उपलब्धि को नहीं भूलेगी."
और इस रूसी अख़बार का ट्रंप के लिए एक ही संदेश है- यूटर्न न लें.
"ग्रीनलैंड के मुद्दे पर अमेरिकी राष्ट्रपति का पीछे हटना ख़तरनाक होगा. इससे मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति कमज़ोर पड़ेगी और संभव है कि कैपिटल हिल पर डेमोक्रेट्स का बहुमत हो जाए, जिसका ट्रंप पर असर पड़ेगा. जबकि चुनावों से पहले ग्रीनलैंड का तेज़ी से अधिग्रहण इस राजनीतिक रुझान को बदल सकता है."
चीन की प्रतिक्रिया

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ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों पर चीन ने प्रतिक्रिया दी है.
चीन ने अमेरिका से कहा है कि वह अपने हित साधने के लिए तथाकथित 'चीनी ख़तरे' को बहाने के तौर पर इस्तेमाल करना बंद करे. यह बात सोमवार को चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कही.
प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने प्रेस ब्रीफ़िंग में कहा, "संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय क़ानून ही मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बुनियाद हैं और इसे बनाए रखा जाना चाहिए."
गुओ ने यह टिप्पणी उस सवाल के जवाब में की, जिसमें राष्ट्रपति ट्रंप की हालिया घोषणा का ज़िक्र था.
बीबीसी मॉनिटरिंग के मुताबिक़ ट्रंप के ग्रीनलैंड प्लान और उनके बयानों पर चीनी मीडिया में दो अहम बातें सामने रखी जा रही हैं- पहली, चीन को ख़तरे के रूप में पेश किए जाने का कड़ा विरोध, और दूसरी जवाब देने को लेकर यूरोप की 'दुविधा' को उभारना.
चीन के सरकारी अख़बार 'ग्लोबल टाइम्स' के 12 जनवरी को प्रकाशित एक संपादकीय में कहा गया कि चीन ग्रीनलैंड को लेकर 'उसे ख़तरा' बताने वाले, 'संसाधनों का लुटेरा' या 'नियम तोड़ने वाला' जैसे अमेरिकी और यूरोपीय बयानों का मज़बूती से विरोध करता है.
लेख में तर्क दिया गया कि ऐसे बयान दशकों से आर्कटिक की जलवायु के 'संरक्षक' के तौर पर चीन की 'सक्रिय भूमिका' को नज़रअंदाज़ करते हैं.
इसमें कहा गया कि अमेरिका चीन को आर्कटिक के लिए ख़तरे के तौर पर इसलिए पेश कर रहा है ताकि उसकी आड़ में वो आर्कटिक क्षेत्र में अपने 'सैन्य विस्तार, एकतरफ़ा संसाधन दोहन और वर्चस्व की कोशिशों' को छिपा सके.
यह लेख तब आया जब नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड ने सीबीसी को बताया कि आर्कटिक में रूसी और चीनी गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं. वहीं, नेटो प्रमुख मार्क रुटे ने भी 13 जनवरी को आर्कटिक में चीन की बढ़ती गतिविधियों का ज़िक्र किया.
अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव भी एक अहम विषय रहा है.
नौ जनवरी को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए काम करने वाले सरकारी ब्रॉडकास्टर सीजीटीएन में प्रकाशित एक लेख में कहा गया कि ग्रीनलैंड पर क़ब्ज़ा करने की अमेरिकी धमकियां अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और नेटो की विश्वसनीयता के 'मूलभूत पतन' का संकेत हैं.
लेख में कहा गया कि यह संकट डेनमार्क की संप्रभुता की अंतिम परीक्षा है और 'सभी देशों के लिए कड़ी चेतावनी' है.
चीनी मीडिया ने यूरोप को सलाह देने के लहजे में कहा कि ट्रंप की मौजूदा बयानबाज़ी से यूरोपीय देशों के मन में उन्हें लेकर किसी भी तरह का भ्रम अब नहीं पालना चाहिए.
रूस क्यों ख़ुश है?
लेकिन रूस की ओर से ट्रंप की इतनी तारीफ़ क्यों? यह खुला प्रोत्साहन क्यों?
स्टीव रोज़ेनबर्ग के मुताबिक़ इसकी वजह यह है कि मौजूदा हालात से रूस को बड़ा फ़ायदा दिख रहा है.
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की सनक, द्वीप पर क़ब्ज़ा करने का उनका संकल्प और इस योजना का विरोध करने वाले यूरोपीय देशों पर टैरिफ़ लगाने की धमकी ने ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन पर भारी दबाव डाल दिया है- यानी अमेरिका और यूरोप के रिश्तों पर भी और नेटो के भीतर भी.
पश्चिमी गठबंधन को कमज़ोर करने वाली या उसमें दरार डालने वाली कोई भी चीज़ रूस की नज़र में बड़ी सकारात्मक बात है.
ग्रीनलैंड पर एक लेख में रूसी टैब्लॉइड मॉस्कोव्स्की कोम्सोमोलेट्स ने तंज़ कसते हुए लिखा,
"यूरोप पूरी तरह उलझन में है और सच कहें तो इसे देखना मज़ेदार है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.














