ग्रीनलैंड पर तकरार: ट्रंप को लेकर यूरोप के रवैये में ग़ायब हो रही है नरमी

- Author, कात्या एडलर
- पदनाम, यूरोप एडिटर
यूरोप के भीतर कुछ टूटता सा महसूस हो रहा है.
सोमवार रात डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ज़ोर देकर कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से अमेरिका को ग्रीनलैंड 'हर हाल में चाहिए.' उन्होंने यह भी दावा किया कि यूरोप के नेता इसका 'ज़्यादा विरोध नहीं करने वाले'.
लेकिन बुधवार को जब वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम (डब्ल्यूईएफ़) में यूरोपीय नेताओं की अमेरिकी राष्ट्रपति से मुलाक़ात होगी, तो उनके मन में बिल्कुल अलग योजना होगी.
ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक अर्ध स्वायत्त इलाक़ा है. डेनमार्क यूरोपियन यूनियन और नेटो, दोनों का सदस्य है.
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अब राष्ट्रपति ट्रंप इन दोनों संगठनों में डेनमार्क के सहयोगियों पर ज़बरदस्त दबाव बना रहे हैं कि वे कोपेनहेगन का साथ छोड़ दें और अमेरिका को ग्रीनलैंड का नियंत्रण लेने दें. अगर ऐसा नहीं किया तो उन्होंने यूरोप से अमेरिका आने वाले सभी सामानों पर भारी टैरिफ़ लगाने की चेतावनी दी है.
यह यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं है, ख़ासकर तब, जब वे पहले ही सुस्ती के दौर में हैं. अमेरिका को बड़े पैमाने पर निर्यात करने वाले देशों के लिए यह ख़तरा और भी गंभीर है, जैसे जर्मनी का कार उद्योग और इटली का लग्ज़री सामान बाज़ार.
सोमवार को, डब्ल्यूईएफ़ से पहले अपने फ़्रांसीसी समकक्ष के साथ एक आपात बैठक के बाद, जर्मनी के वित्त मंत्री ने साफ़ कहा, "हम खुद को ब्लैकमेल नहीं होने देंगे."
'नरमी से पेश आने' वाली रणनीति की मियाद ख़त्म

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ट्रंप की ये धमकियां यूरोपीय सरकारों के मुंह पर ज़ोरदार तमाचे जैसी रहीं. यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन, दोनों ने ही अलग अलग हैसियत से, पिछले साल ही अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ टैरिफ़ समझौते सुलझाए थे.
फ़्रांस के वित्त मंत्री रोलां लेस्क्योर ने कहा, "हम अनजाने इलाक़े में पहुंच गए हैं. ऐसा हमने पहले कभी नहीं देखा. 250 साल पुराना सहयोगी और मित्र अब टैरिफ़ को… भू राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने पर विचार कर रहा है."
उनके जर्मन समकक्ष लार्स क्लिंगबाइल ने जोड़ा, "एक सीमा रेखा पार हो चुकी है… आप समझ सकते हैं कि आज मैं यह नहीं बता सकता कि आगे क्या होगा. लेकिन एक बात साफ़ है, यूरोप को तैयार रहना ही पड़ेगा."
अचानक ऐसा लगने लगा है कि ट्रंप को लेकर यूरोप के नेताओं की 'नरमी से पेश आने' वाली रणनीति, जिसे उन्होंने व्हाइट हाउस में उनके दूसरे कार्यकाल के बाद अपनाया था, की मियाद अब पूरी हो चुकी है.
यूरोप की 'गुड कॉप–बैड कॉप' रणनीति
ट्रांस-अटलांटिक (अटलांटिक के आर-पार) के रिश्तों का मातम मना लेना अभी जल्दबाज़ी होगी. कम से कम यूरोपीय यूनियन यह उम्मीद कर रही है कि इस बुधवार स्विट्ज़रलैंड में होने वाले ग्लोबल इकोनॉमिक फ़ोरम में जब वह अमेरिकी राष्ट्रपति से बात करे, तो एक पुराने अमेरिकी राष्ट्रपति के शब्दों में कहें तो वह "नरमी से बात करे, लेकिन हाथ में बड़ा डंडा भी रखे."
थियोडोर (टेडी) रूज़वेल्ट का मानना था कि अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए कूटनीति के साथ साथ ठोस ताक़त का सहारा भी ज़रूरी होता है. लगता है कि यूरोप अब यही 'गुड कॉप–बैड कॉप' वाला तरीक़ा अपना रहा है.
यूरोपीय नेता राष्ट्रपति ट्रंप से कह रहे हैं कि वे आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा को प्राथमिकता देने में उनका साथ देंगे, इसलिए ग्रीनलैंड के मामले में उन्हें अकेले ही क़दम उठाने की ज़रूरत नहीं है.

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लेकिन दूसरी ओर, यूरोपीय यूनियन के राजनयिकों ने यह भी साफ़ कर दिया है कि अगर ट्रंप अपने तथाकथित 'ग्रीनलैंड टैरिफ़' लागू करते हैं, तो ईयू बदले में अमेरिका से आने वाले सामान पर 93 अरब यूरो तक के टैरिफ़ लगाने पर विचार कर रहा है. इतना ही नहीं, अमेरिकी कंपनियों, संभव है कि इसमें बैंक और हाई टेक कंपनियां भी शामिल हों, की यूरोप के विशाल सिंगल मार्केट तक पहुंच सीमित की जा सकती है.
इन जवाबी क़दमों का असर अमेरिका के उपभोक्ताओं पर भी पड़ना लगभग तय है.
यूरोपीय यूनियन के निवेशकों की मौजूदगी अमेरिका के लगभग सभी 50 राज्यों में बेहद मज़बूत है और कहा जाता है कि उनके ज़रिए 34 लाख अमेरिकियों को रोज़गार मिलता है.
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर यूरोपीय यूनियन की आवाज़ कमज़ोर है. यह 27 देशों का समूह है, जिनके बीच आपसी मतभेद आम हैं. लेकिन जब बात वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार की आती है, तो इसकी पकड़ बहुत मज़बूत है, क्योंकि इस क्षेत्र में फ़ैसले ज़्यादातर यूरोपीय आयोग लेता है, जो ईयू के सिंगल मार्केट के सभी सदस्यों की ओर से काम करता है.
यूरोपीय यूनियन दुनिया में वस्तुओं और सेवाओं का सबसे बड़ा वैश्विक कारोबारी है, 2024 में दुनिया के कुल व्यापार का लगभग 16% हिस्सा इसका था.
इसी वजह से ब्रसेल्स सांस रोके उम्मीद कर रहा है कि अगर राष्ट्रपति ट्रंप यह समझ जाएं कि इस टकराव में उन्हें शायद एक द्वीप (ग्रीनलैंड) मिल जाए, लेकिन क़रीबी सहयोगी (यूरोपीय देश) खोने पड़ सकते हैं, और यूरोप के बदले में टैरिफ़ लगाने से अमेरिकी उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ बढ़ने की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर आएगी, तो शायद वे अपनी सबसे सख़्त मांगों से पीछे हटकर किसी समझौते के लिए बातचीत को तैयार हो सकते हैं.
सोमवार को यूरोपीय आयोग के उप मुख्य प्रवक्ता ओलोफ़ गिल ने कहा, "हमारी प्राथमिकता बातचीत करना है, हालात को और भड़काना नहीं."
ब्रसेल्स स्थित ब्रूगेल थिंक टैंक के अर्थशास्त्री और अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञ निक्लास प्वातिये कहते हैं, "ट्रंप यूरोपियों को रीढ़ मज़बूत करने पर मजबूर कर रहे हैं."
"हालांकि ट्रंप के टैरिफ़ से होने वाले आर्थिक नुक़सान को यूरोप काफ़ी हद तक संभाल सकता है… लेकिन इनसे बड़ा सवाल अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि सुरक्षा और विदेश नीति का है."
"यूरोपीय यूनियन के पास प्रतिक्रिया न देने की गुंज़ाइश नहीं है."
अमेरिका की सुरक्षा गारंटियों पर भरोसा

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लेकिन सोमवार को अमेरिकी ट्रेज़री सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट कुछ ख़ास प्रभावित नज़र नहीं आए.
दावोस में बोलते हुए उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति और उनकी मानसिकता की तस्वीर पेश की, "राष्ट्रपति ग्रीनलैंड को अमेरिका के लिए एक रणनीतिक संपत्ति के तौर पर देख रहे हैं. हम अपनी सुरक्षा (पश्चिमी गोलार्ध की) किसी और के भरोसे छोड़ने वाले नहीं हैं."
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यूरोप ने टैरिफ़ के ज़रिए पलटवार किया, तो यह 'नासमझी' होगी. और यहीं आकर यूरोप ख़ुद को फंसा हुआ महसूस कर रहा है. क़दम उठाओ तो भी नुक़सान, और न उठाओ तो भी नुक़सान.
यूरोप में कुछ लोग चिंतित हैं कि अगर अब उन्होंने ट्रंप के साथ ज़्यादा टकराव वाला रवैया अपनाया, तो अमेरिका उससे और दूर हो सकता है.
और कड़वी सच्चाई यह है कि यूक्रेन के लिए एक टिकाऊ शांति समझौता कराने और अपनी ही महाद्वीपीय सुरक्षा के लिए यूरोप को वॉशिंगटन की ज़रूरत है. रक्षा बजट बढ़ाने के तमाम वादों के बावजूद, यूरोप अब भी बड़े पैमाने पर अमेरिका पर निर्भर है.
इसी बात को सोमवार को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर कीएर स्टार्मर ने ख़ास तौर पर रेखांकित किया. उन्होंने डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संप्रभुता के समर्थन को दोहराते हुए कहा कि अमेरिका के साथ काम करते रहना ब्रिटेन के "राष्ट्रीय हित में है, चाहे बात रक्षा की हो, सुरक्षा की हो या ख़ुफ़िया जानकारी की."
उन्होंने कहा, "हमारी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता हमारा सबसे बड़ा हथियार है. ब्रिटेन में हर व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना मेरी पहली ज़िम्मेदारी है, और इसके लिए ज़रूरी है कि हमारे अमेरिका के साथ अच्छे संबंध हों."

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लेकिन अगर यूरोप राष्ट्रपति ट्रंप को सिर्फ़ 'संभालने' की कोशिश करता रहा, बजाय इसके कि वह उस वक़्त मज़बूती से खड़ा हो जब ट्रंप अपने ही नेटो सहयोगी (डेनमार्क) की संप्रभुता पर सवाल उठा रहे हैं, और कोपेनहेगन का समर्थन करने वाले दूसरे सहयोगियों को आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी दे रहे हैं तो यह महाद्वीप बेहद कमज़ोर दिखाई देने का ख़तरा उठाएगा.
सोमवार को एक्स पर यूरोपीय यूनियन की शीर्ष राजनयिक काया कालास ने लिखा, "हमें किसी से झगड़ा करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन हम अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेंगे."
एस्टोनिया एक ऐसा देश है जो विस्तारवादी रूस की बढ़ती छाया से डरता है. इसलिए इसकी पूर्व प्रधानमंत्री होने के नाते, कालास मॉस्को को यह दिखाने के लिए बेहद उत्सुक हैं कि यूरोप ज़रूरत पड़ने पर सख़्ती दिखा सकता है और दिखाएगा भी.
जर्मन मार्शल फ़ंड थिंक टैंक में सुरक्षा और भू राजनीति की विशेषज्ञ तारा वर्मा ने मुझसे कहा, "अब यूरोपीय लोग और पीछे नहीं हट सकते."
उनका कहना है, "पिछले एक साल में उन्होंने (डोनाल्ड ट्रंप के साथ) सिर्फ़ व्यक्तिगत कूटनीति पर भरोसा किया, ताकि किसी तरह उन्हें यूरोप की सामूहिक रक्षा के ढांचे से जोड़ा जाए और रूस के साथ युद्धविराम के बाद यूक्रेन की सुरक्षा की अमेरिकी गारंटी सुनिश्चित की जा सके."
वर्मा कहती हैं, "लेकिन अगर राष्ट्रपति ट्रंप इतनी आसानी से, जैसा कि अभी अभी हुआ, रुख़ बदल सकते हैं, अगर वे आर्थिक और सुरक्षा मुद्दों को आपस में जोड़कर, किसी एक मसले पर अपनी बात मनवाने के लिए नेटो को ही धमकाने लगें तो फिर इस प्रशासन के तहत अमेरिका की सुरक्षा गारंटियों पर यूरोप आख़िर कितना भरोसा कर सकता है?"
पुतिन और बोर्ड ऑफ़ पीस

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इन तमाम घटनाओं को किनारे से सिर्फ़ रूस ही नहीं, बल्कि चीन भी देख रहा है. उनकी नज़र में पश्चिम, जो दशकों तक वैश्विक राजनीति पर हावी रहा और जिसके केंद्र में अमेरिका और यूरोप की मज़बूत साझेदारी थी, अब बिखरता हुआ दिख रहा है.
दुनिया पर अब कई बड़े ताक़तवर खिलाड़ियों का दबदबा तेज़ी से बढ़ रहा है, इनमें रूस और चीन तो हैं ही, लेकिन भारत, सऊदी अरब और कुछ हद तक ब्राज़ील भी इसमें शामिल हैं.
चीन को उम्मीद है कि डोनाल्ड ट्रंप का अपने सहयोगियों के प्रति अस्थिर और पल पल बदलता रवैया बीजिंग को एक ज़्यादा स्थिर और भरोसेमंद साझेदार के रूप में पेश करेगा और इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार चीन की ओर ज़्यादा आएगा.
कनाडा, जिसे राष्ट्रपति ट्रंप कभी अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की धमकी दे चुके हैं, ने हाल ही में बीजिंग के साथ एक सीमित व्यापार समझौता कर लिया है. वह अब वॉशिंगटन पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने उन बहुपक्षीय संस्थाओं, जैसे नाटो और संयुक्त राष्ट्र, के प्रति भी ज़्यादा सम्मान नहीं दिखाया है, जिन्हें दूसरे विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने वैश्विक व्यवस्था संभालने के लिए खड़ा किया था.
कुछ लोग राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा बनाए जा रहे 'बोर्ड ऑफ पीस' की ओर भी इशारा कर रहे हैं, जिसके लिए वे कथित तौर पर इस गुरुवार दावोस में एक औपचारिक हस्ताक्षर समारोह आयोजित करना चाहते हैं. इस सम्मेलन में दुनिया के कई बड़े नेता और शीर्ष कारोबारी शख़्सियतें शामिल हो रही हैं.
कहने को तो यह बोर्ड 7 अक्तूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इसराइल द्वारा चलाए गए दो साल लंबे बेहद विनाशकारी सैन्य अभियान के बाद ग़ज़ा के पुनर्निर्माण की निगरानी के लिए बनाया गया है.
लेकिन इस बोर्ड के चार्टर में एक 'ज़्यादा चुस्त और प्रभावी अंतरराष्ट्रीय शांति निर्माण निकाय' की बात की गई है, जिससे संकेत मिलता है कि इसका दायरा इससे कहीं व्यापक हो सकता है, और संभव है कि यह संयुक्त राष्ट्र को टक्कर देने की कोशिश करे.

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फ़्रांस के राष्ट्रपति इसे ठीक इसी नज़र से देखते हैं. राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के क़रीबी एक सूत्र ने सोमवार को बयान जारी कर कहा कि फ़्रांस इस बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का इरादा नहीं रखता, जिसमें शामिल होने का निमंत्रण 'कई अन्य देशों की तरह' फ़्रांस को भी मिला था.
बयान में कहा गया, "(बोर्ड का) चार्टर… गंभीर सवाल खड़े करता है, ख़ासकर संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों और संरचना के सम्मान को लेकर, जिन पर किसी भी परिस्थिति में सवाल नहीं उठाया जा सकता."
सोमवार को क्रेमलिन ने कहा कि व्लादिमीर पुतिन को इस बोर्ड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है. इससे यह संकेत मिलता है कि राष्ट्रपति ट्रंप यूक्रेन पर चार वर्षों से जारी हमले और अमेरिका समर्थित शांति योजना को अब तक ठुकराने के बावजूद रूसी राष्ट्रपति के साथ रिश्ते बनाए रखने को लेकर उत्सुक हैं.
इस बोर्ड में ट्रंप की अति महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, ख़ासकर इस मांग को लेकर कि स्थायी सदस्यता के लिए विश्व नेताओं को एक अरब डॉलर चुकाने होंगे.
लेकिन तारा वर्मा ज़ोर देकर कहती हैं कि यह पीस बोर्ड असल में शांति के बारे में है ही नहीं. वह पूछती हैं, "अगर आप पुतिन जैसे नेताओं को इसमें आमंत्रित करते हैं, तो यह शांति के लिए कैसे हो सकता है?"
वह कहती हैं, "ट्रंप ख़ुद को एक शांति स्थापक के रूप में पेश करना चाहते हैं. उन्हें सुर्खियां चाहिए, लेकिन शांति को टिकाऊ बनाने के लिए जो बुनियादी मेहनत ज़रूरी होती है, वह करने की उनकी इच्छा नहीं दिखती. उनकी रणनीति ज़्यादा 'हिट एंड रन' जैसी है."
"वह संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं की जगह नहीं ले सकते, जो पिछले 80 वर्षों से मौजूद हैं."
रिश्ते तनाव में हैं, टूटे नहीं हैं

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हालांकि यह भी मुमकिन है कि दशकों पुराने अंतरराष्ट्रीय मानकों को खुलेआम चुनौती देकर राष्ट्रपति ट्रंप असल में कुछ बहुपक्षीय संस्थाओं को झकझोर रहे हों, उन्हें आधुनिक बनाने, ज़्यादा प्रासंगिक बनने के लिए मजबूर कर रहे हों. तर्क दिया जा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता अब पश्चिम केंद्रित कम होनी चाहिए और वैश्विक ताक़त के बदलते संतुलन को बेहतर तरीके से दर्शाने वाली चाहिए.
नेटो के यूरोपीय सदस्य भी मान चुके हैं कि उन्हें अपनी रक्षा पर ज़्यादा ख़र्च करना चाहिए. हालांकि ट्रंप पहले अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं हैं जिन्होंने यह बात कही हो, लेकिन जिस रूखेपन से वह कहते हैं, वह अलग है.
जब उन्होंने धमकी दी कि जो देश अपनी हिस्सेदारी नहीं निभाएंगे, उनकी रक्षा अमेरिका नहीं करेगा, तभी स्पेन को छोड़कर सभी नेटो देशों ने रक्षा ख़र्च में ज़बरदस्त बढ़ोतरी पर सहमति जताई.
ग्रीनलैंड के मुद्दे पर लौटें तो, सर्वे बताते हैं कि 55% अमेरिकी इस द्वीप को 'ख़रीदने' के पक्ष में नहीं हैं और 86% अमेरिका के सैन्य तरीक़े से कब्ज़ाने के ख़िलाफ़ हैं. डेनमार्क और अन्य यूरोपीय ताक़तें अमेरिकी संसद, कैपिटल हिल, में सांसदों से लगातार संपर्क कर रही हैं, ताकि उन्हें समझाया जा सके कि ग्रीनलैंड और डेनमार्क की संप्रभुता की रक्षा होना ज़रूरी है.
ट्रांस अटलांटिक रिश्ते अभी टूटे नहीं हैं, लेकिन उन्हें नुक़सान ज़रूर हुआ है. डोनाल्ड ट्रंप अब भी अपने 'दोस्तों' इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीएर स्टार्मर, और नेटो के महासचिव मार्क रुटे, को फ़ोन कर रहे हैं. बातचीत के रास्ते अब भी खुले हुए हैं.

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लेकिन आख़िरकार, अगर यूरोप सच में डोनाल्ड ट्रंप तक अपनी बात पहुंचाना चाहता है, तो उसे एकजुट रहना पड़ेगा. सिर्फ़ यूरोपीय यूनियन के अलग-अलग सदस्य देश ही नहीं, सिर्फ़ नेटो ही नहीं, बल्कि सभी देश. और यहां अमेरिका के साथ अपने अपेक्षाकृत क़रीबी रिश्तों के चलते ब्रिटेन की भूमिका बेहद अहम होगी.
लेकिन यूरोप के नेता अपने घरेलू राजनीतिक दबावों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो वे सही समझते हैं, उसके बीच फंसे हुए हैं. अगर पूरी तरह से ट्रांस अटलांटिक व्यापार युद्ध छिड़ गया, तो उसकी चोट सीधे उनके मतदाताओं पर पड़ेगी.
ग्रीनलैंड के मुद्दे पर लंबे समय तक सबका एक सी सोच और एक सी आवाज़ बनाए रखना, आसान नहीं होने वाला.
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