ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होगा पाकिस्तान पर भारत ने क्यों नहीं लिया कोई फ़ैसला

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- Author, रौनक भैड़ा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग़ज़ा के लिए 'बोर्ड ऑफ पीस' नाम का संगठन बनाया है. यह बोर्ड ग़ज़ा में व्यापक शांति पहल के तहत शासन, पुनर्निर्माण और निवेश की निगरानी के लिए बनाया गया है.
भारत, पाकिस्तान, जॉर्डन, हंगरी, तुर्की, मिस्र और अर्जेंटीना समेत कई देशों के नेताओं को इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता भेज दिया गया है.
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने पुष्टि कर दी है कि पाकिस्तान ग़ज़ा के पुनर्निर्माण और स्थाई युद्ध विराम के लिए 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होगा. वहीं तुर्की ने बताया है कि वो इसमें शामिल होने के लिए गुरुवार को स्विट्ज़रलैंड में समझौते पर हस्ताक्षर करेगा.
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने एक्स पर लिखा, "मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ग़ज़ा में स्थायी शांति लाने वाले शांति बोर्ड में भाग लेने का निमंत्रण दिया है. यह बोर्ड स्थिरता और समृद्धि प्राप्त करने के लिए प्रभावी शासन का समर्थन करेगा."
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भारत को भले ही अमेरिका ने 'बोर्ड ऑफ़ पीस' से जुड़ने का न्योता दिया हो, लेकिन यह भारत के लिए असमंजस की स्थिति है. भारत ने अभी तक अमेरिका के न्योते को स्वीकार या अस्वीकार नहीं किया है.
विश्लेषकों का मानना है कि भारत का किसी फ़ैसले पर पहुंचना इतना आसान नहीं है.
'बोर्ड ऑफ़ पीस' में क्या दिक़्क़तें हैं?

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टाइम्स ऑफ इसराइल के मुताबिक़, "बोर्ड ऑफ पीस के ड्राफ्ट चार्टर में ग़ज़ा का नाम तक नहीं है. इसमें लिखा है कि उन पुरानी संस्थाओं और तरीक़ों से हटकर चलने की हिम्मत दिखानी होगी, जो पहले नाकाम हुए हैं. चार्टर में एक तेज़ और असरदार अंतरराष्ट्रीय शांति संस्था की ज़रूरत बताई गई है."
चार्टर में लिखा है कि बोर्ड 'स्थायी शांति' लाने के लिए काम करेगा. उन इलाक़ों में तो सक्रिय रहेगा ही जहां संघर्ष चल रहा है, बल्कि जिन इलाक़ों में 'संघर्ष होने का ख़तरा' है, वहां भी बोर्ड काम करेगा. इसमें यह परिभाषित नहीं किया गया कि संघर्ष होने के ख़तरे से क्या आशय है.

इसके अलावा, बोर्ड डोनाल्ड ट्रंप की व्यक्तिगत अध्यक्षता में काम करेगा. भले ट्रंप राष्ट्रपति रहें या न रहें, वह इस बोर्ड के अध्यक्ष रहेंगे. अध्यक्ष को तभी हटाया जा सकता है जब वह ख़ुद इस्तीफ़ा दें या कार्यकारी बोर्ड के सभी सदस्य उन्हें अयोग्य घोषित करें. हालांकि, कार्यकारी बोर्ड में ज़्यादातर ट्रंप द्वारा चुने हुए लोग हैं.
इसराइल को अमेरिका के इस 'बोर्ड ऑफ़ पीस' के सदस्यों पर आपत्ति थी. इसराइल ने कहा है कि बोर्ड के गठन से जुड़ी शुरुआती बातचीत में उसे शामिल नहीं किया गया. इसका गठन इसराइल के अधिकारियों से बगैर समन्वय किए हुआ है. हालांकि, बाद में इसराइल ने बोर्ड में शामिल होने के न्योते को स्वीकार कर लिया.
ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और जिंदल सेंटर फ़ॉर इसराइल स्टडीज़ के डायरेक्टर खींवराज जांगिड़ कहते हैं, "इसराइल बोर्ड ऑफ़ पीस के गठन से सहमत नहीं था, क्योंकि इसमें तुर्की और क़तर जैसे देश भी हैं. हालांकि, इसराइल इस परिस्थिति में नहीं है कि वह अमेरिका के इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दे. मुमकिन है कि वह बाद में इसकी मांग कर सकता है कि बोर्ड में किसकी बात को तवज्जो दी जाएगी."
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ की प्रोफ़ेसर सुजाता ऐश्वर्या कहती हैं, "डोनाल्ड ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' आइडिया की पूरी जानकारी स्पष्ट नहीं हो पाई है कि ग़ज़ा के पुनर्निर्माण के लिए उनकी योजना क्या होगी. इसके अलावा, यह बोर्ड फ़लस्तीन के लिए बनाया जा रहा है और इसमें उनके किसी प्रतिनिधि को शामिल नहीं किया गया, यह अपने आप में अजीब है. यह औपनिवेशिक विचार जैसा है, जहां बाहर का देश आकर पुनर्निर्माण कर रहा है."
ट्रंप के नेतृत्व में बन रहा 'बोर्ड ऑफ पीस' संगठन यूरोपीय राजनयिकों में चिंता पैदा कर रहा है. उनको डर है कि अगर बोर्ड को ग़ज़ा से आगे बढ़ाकर और जगहों पर फैलाया गया, तो संयुक्त राष्ट्र कमज़ोर हो सकता है.
एक राजनयिक ने रॉयटर्स को बताया, "यह एक 'ट्रंप संयुक्त राष्ट्र' जैसा है, जो संयुक्त राष्ट्र के मूल नियमों को नज़रअंदाज़ करता है." तीन अन्य पश्चिमी राजनयिकों ने कहा कि अगर यह योजना आगे बढ़ी तो संयुक्त राष्ट्र को कमज़ोर कर देगी.
एक इसराइली सूत्र के मुताबिक़, "ट्रंप चाहते हैं कि 'पीस बोर्ड' बाद में सिर्फ ग़ज़ा तक सीमित न रहे, बल्कि उसकी ज़िम्मेदारी बढ़कर उन सभी संघर्षों पर नज़र रखने की हो जाए जिन्हें ट्रंप ने सुलझाने का दावा किया है."
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के प्रवक्ता ने कहा, "सदस्य देश अलग-अलग समूह बना सकते हैं. संयुक्त राष्ट्र अपना तय काम जारी रखेगा."
एक वरिष्ठ यूएन अधिकारी का कहना है कि सिर्फ संयुक्त राष्ट्र ही हर देश को साथ ला सकता है, चाहे बड़ा हो या छोटा, अगर इसे संदेह की नज़र से देखेंगे तो 'डार्क टाइम' आ जाएगा."
भारत में विपक्ष ने क्या प्रतिक्रिया दी?

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भारत के पाँच वाम दलों ने एक संयुक्त बयान जारी किया है, "हम भारत सरकार से मज़बूती से कहते हैं कि वह अमेरिका की तरफ़ से दिए गए 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होने का प्रस्ताव न स्वीकार करे. यह बोर्ड 'ग़ज़ा पीस प्लान' को लागू करने के लिए बनाया जा रहा है. इस बोर्ड में भारत का शामिल होना फ़लस्तीन के अधिकारों का सम्मान नहीं करता, इसलिए यह फ़लस्तीनी मुद्दे के साथ बड़ा धोखा होगा."
"यह बोर्ड अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रस्तावित किया है. यह संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार करके एक नया अंतरराष्ट्रीय ढांचा बनाना चाहता है, जिस पर अमेरिका का पूरा नियंत्रण हो. अमेरिका की कोशिश है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को कमज़ोर कर दे. इसका मज़बूती से विरोध होना चाहिए." यह साझा बयान सीपीआई(एम), सीपीआई, सीपीआई(एमएल)-लिबरेशन, आरएसपी और एआईएफबी पार्टी का है.
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने न्यूज़ एजेंसी आईएएनएस से कहा, यह भारत सरकार को ही तय करना है कि बोर्ड ऑफ़ पीस में शामिल होना चाहिए या नहीं. यह निमंत्रण भारत में नियुक्त हुए नए अमेरिकी राजदूत द्वारा सार्वजनिक रूप से साझा किया गया है. इसलिए, पहले भारत सरकार की ओर से उचित प्रतिक्रिया आनी चाहिए, और उसके बाद ही दूसरों के लिए इस पर टिप्पणी करना उचित होगा."
सीपीआई(एम) के महासचिव और पूर्व राज्यसभा सांसद एमए बेबी ने एक्स पर लिखा, "अमेरिका ने ग़ज़ा के लिए 'बोर्ड ऑफ पीस' बनाने की घोषणा की है और डोनाल्ड ट्रंप ने ने भारत को इसमें शामिल होने के लिए न्योता दिया है. यह बोर्ड ग़ज़ा के पुनर्निर्माण के लिए नहीं है, बल्कि फ़लस्तीन की ज़मीन के बर्बाद होने का फ़ायदा उठाकर मुनाफ़ा कमाने के मक़सद से बनाया जा रहा है. शांति योजना में इसराइल द्वारा फ़लस्तीनी इलाकों पर क़ब्ज़ा खत्म करने के बारे में कुछ भी साफ़ नहीं कहा गया है."
"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस न्योते को ठुकरा देना चाहिए और इसराइल द्वारा ग़ज़ा में हो रहे नरसंहार की निंदा करनी चाहिए. साथ ही अमेरिका को भी बताना चाहिए कि वह इस नरसंहार में साथ दे रहा है. भारत को अपनी पुरानी परंपरा के मुताबिक क़ब्ज़ा करने वालों और उपनिवेशवादियों का विरोध करना चाहिए और फ़लस्तीन के लोगों के साथ एकजुटता दिखानी चाहिए."
शिवसेना (यूबीटी) से राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर लिखा, "ग़ज़ा शांति बोर्ड का न्योता पाकिस्तान को भी भेजा गया है. यह हास्यास्पद है कि ऐसे देश को शामिल किया जा रहा है, जिसने कभी अपने देश में पड़ोस में या दुनिया में शांति को बढ़ावा नहीं दिया. उम्मीद है भारत इस आमंत्रण के लिए 'धन्यवाद' कहते हुए 'नो थैंक्यू' कहकर ठुकरा देगा."
भारत को 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होना चाहिए?

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इस मामले पर पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल का मानना है कि ग़ज़ा अरब देशों का मुद्दा है और भारत को इसमें नहीं पड़ना चाहिए.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "अगर यह ख़बर सही है, तो जवाब होना चाहिए 'नो थैंक्यू'. भारत को ऐसे सेटअप में नहीं शामिल होना चाहिए जो बिना संयुक्त राष्ट्र की मंज़ूरी के मनमाने ढंग से बनाया गया हो, जिसमें ढेर सारी मुश्किलें छिपी हों और निजी कंपनियों के व्यापारिक हित भी इसमें शामिल हों. इस बेहद जटिल अरब मुद्दे को मुख्य रूप से अरब देशों को ही संभालने दें."

जेएनयू में स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर राजन कुमार ने कहा, "भारत के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है. बोर्ड ऑफ़ पीस के प्रस्ताव को स्वीकार करने और ख़ारिज करने, दोनों ही स्थितियों में भारत को कुछ जोखिम उठाने पड़ सकते हैं. अगर भारत इस प्रस्ताव को अस्वीकार करता है तो डोनाल्ड ट्रंप नाराज़ हो सकते हैं. साथ ही वैश्विक मंच पर अपनी छाप छोड़ने के मौके़ को हाथ से गंवा सकता है."
उन्होंने आगे कहा, "बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के प्रस्ताव को स्वीकार करने पर भारत पर ट्रंप के निजी हितों के लिए काम करने का आरोप लग सकता है. ट्रंप के पास इस बोर्ड में हद से ज़्यादा अधिकार हैं, उन्हीं के अधिकतर लोग इसका हिस्सा हैं. इसकी संभावना कम है कि डोनाल्ड ट्रंप लोकतांत्रिक तरीके़ से बोर्ड को चलाएंगे और दूसरे देशों की राय को अपने लोगों की राय से ऊपर रखेंगे."
मध्य पूर्व मामलों के जानकार और आईसीडब्ल्यूए के सीनियर फेलो डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर रहमान ने कहा, "इसराइल भले इस बात से नाख़ुश था कि ट्रंप ने बोर्ड ऑफ़ पीस के सदस्य नियुक्त करने के लिए इसराइल से चर्चा नहीं की. लेकिन देर-सवेर इसराइल मान ही गया. भारत इस बोर्ड का हिस्सा बनता है तो दोनों देशों के संबंध अच्छे होंगे. इसके अलावा, डोनाल्ड ट्रंप को भी यह सकारात्मक संदेश जाएगा कि भारत ने उनकी पहल की ख़िलाफ़त नहीं की."

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प्रोफ़ेसर सुजाता ऐश्वर्या कहती हैं, "अगर भारत इसमें शामिल होता है तो उसे अमेरिका से तीन चीज़ें पहले ही स्पष्ट कर लेनी चाहिए. पहली यह कि कितने समय तक ग़ज़ा में अस्थायी शासन रहेगा. दूसरी यह कि वैध फ़लस्तीन शासन के लिए क्या क़दम उठाए जाएंगे. तीसरी बात यह पुख़्ता करनी चाहिए कि मानवीय सुरक्षा हो और पुनर्निर्माण के दौरान फंडिंग कहां से आ रही होगी और कान्ट्रैक्ट किसे मिल रहे होंगे, यह पारदर्शी हो."
भारत की विदेश नीति इसराइल और फ़लस्तीन को लेकर 'टू स्टेट सॉल्यूशन' की रही है. इसके तहत फ़लस्तीन और इसराइल दो अलग-अलग राष्ट्र होंगे. इससे दो अलग-अलग संस्कृति और धर्म को मानने वाले लोग शांतिपूर्वक रह सकेंगे. लेकिन कहा जा रहा है कि बोर्ड ऑफ़ पीस में शामिल होने से भारत अपनी पारंपरिक विदेश नीति से अलग हो जाएगा.
इस पर मध्य पूर्व मामलों के जानकार डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर रहमान ने कहा, "फ़िलहाल डोनाल्ड ट्रंप ने ग़ज़ा के पुनर्निर्माण की बात कही है, ऐसा नहीं कहा गया कि वेस्ट बैंक पर इसराइल का क़ब्ज़ा होगा. इसका मतलब देखें तो बोर्ड ऑफ पीस 'टू स्टेट सॉल्यूशन' के ख़िलाफ़ नहीं है. तुर्की जैसे देश भी इस बोर्ड का हिस्सा हो सकते हैं, जो ग़ज़ा के पक्षधर रहे हैं."
पूर्व भारतीय राजनयिक केपी फ़ैबियन ने एएनआई से कहा, "भारत को ट्रंप के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करना चाहिए, लेकिन अस्वीकृति को कूटनीतिक रूप से व्यक्त किया जाना चाहिए. हमें अपनी कार्रवाई तय करने से पहले देखना चाहिए कि अन्य देश क्या प्रतिक्रिया देते हैं."
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