भारत और ईयू की ट्रेड डील को क्यों माना जा रहा है ट्रंप के टैरिफ़ का जवाब?

उर्सुला वॉन डेर लेयेन और पीएम मोदी

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इमेज कैप्शन, यूरोपीय संघ और भारत के बीच फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट पर बीते दो दशकों से बातचीत चल रही है.
    • Author, निखिल ईनामदार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष एंतोनियो लुईस सांतोस दा कोस्टा और यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन सोमवार को भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगे.

स्टेट डिनर और औपचारिक कार्यक्रमों के साथ-साथ दोनों नेताओं के एजेंडे में एक अहम मुद्दा होगा. एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत के साथ मुक्त व्यापार वार्ता को आगे बढ़ाना.

यह ऐसे समय हो रहा है जब यूरोप एक मुश्किल दौर से गुजर रहा है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण के विरोध को लेकर यूरोपीय सहयोगियों के ख़िलाफ़ ट्रेड वॉर तेज़ करने की धमकी दी और बाद में पीछे हट गए.

मुख्य अतिथियों का चयन भारत की कूटनीतिक सोच का भी संकेत देता है. भारत दुनिया के दूसरे हिस्सों के साथ अपने रणनीतिक और व्यापारिक रिश्ते तेज़ कर रहा है.

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अमेरिका की ओर से भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ़ को लेकर बनी गतिरोध की स्थिति नए साल तक खिंचती दिख रही है.

लंदन स्थित थिंक टैंक चैटम हाउस के क्षितिज बाजपेयी ने बीबीसी से कहा, "यह संकेत देता है कि भारत की विदेश नीति विविध है और वह ट्रंप प्रशासन की इच्छाओं पर निर्भर नहीं है."

कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि दोनों पक्षों के नेता 27 जनवरी को एक उच्च स्तरीय शिखर सम्मेलन में जब मिलेंगे तो यह समझौता घोषित हो सकता है.

वॉन डेर लेयेन और भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल दोनों ने इसे "मदर ऑफ ऑल डील्स" कहा है.

इससे साफ़ है कि लगभग दो दशक की लंबी और कठिन बातचीत के बाद इस समझौते को पूरा करने को कितनी अहमियत दी जा रही है.

चार सालों में भारत ने किए नौ एफ़टीए

भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल

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इमेज कैप्शन, भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने ईयू के साथ व्यापार समझौते को ऐतिहासिक बताया है.
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यह समझौता पिछले चार सालों में भारत का नौवां फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफ़टीए) होगा. इससे पहले भारत ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड और दूसरे देशों के साथ समझौते कर चुका है.

ब्रसेल्स के लिए यह मर्कोसुर व्यापार समूह (दक्षिण अमेरिकी ट्रेडिंग ब्लॉक) के साथ हुए हालिया समझौते के बाद अगला बड़ा क़दम होगा.

यूरोपीय संघ पहले जापान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम के साथ भी ऐसे समझौते कर चुका है.

इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की वरिष्ठ विश्लेषक सुमेधा दासगुप्ता कहती हैं, "दोनों पक्ष अब भरोसेमंद व्यापार साझेदार चाहते हैं, क्योंकि भू-राजनीति से जुड़े ख़तरों ने कारोबार के माहौल को अस्थिर बना दिया है. भारत अमेरिका के टैरिफ़ दबाव से राहत चाहता है और यूरोपीय संघ चीन पर व्यापारिक निर्भरता कम करना चाहता है, क्योंकि वो उसे अविश्वसनीय मानता है."

दासगुप्ता के मुताबिक़, यह समझौता भारत की लंबे समय से चली आ रही संरक्षणवादी सोच से बाहर निकलने की एक अहम और लगातार कोशिश भी दिखाता है.

कूटनीतिक संकेतों के अलावा सवाल यह भी है कि इस समझौते से दोनों पक्षों को क्या मिलेगा.

यूरोपीय संघ के लिए भारत के साथ क़रीबी व्यापारिक रिश्ते इसलिए अहम हैं क्योंकि भारत की आर्थिक ताक़त तेज़ी से बढ़ रही है.

भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी और सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है. इस साल उसकी जीडीपी 4 ट्रिलियन डॉलर को पार करने की राह पर है और वह जापान को पीछे छोड़ सकता है.

भारत को इस समझौते से क्या मिलेगा

व्यापार

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इमेज कैप्शन, इस साल भारत चार ट्रिलियन जीडीपी के साथ जापान को पीछे छोड़ सकता है.

दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के मंच से वॉन डेर लेयेन ने कहा था कि यूरोपीय संघ और भारत साथ आते हैं तो दो अरब लोगों का एक विशाल मुक्त बाज़ार बनेगा, जो वैश्विक जीडीपी का एक चौथाई हिस्सा होगा.

भारत के लिए यूरोपीय संघ पहले से ही उसका सबसे बड़ा व्यापारिक समूह है. यह समझौता जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज यानी जीएसपी की बहाली भी करेगा, जिसके तहत विकासशील देशों से यूरोपीय बाज़ार में आने वाले कई उत्पादों पर आयात शुल्क नहीं लगता.

दिल्ली स्थित ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अजय श्रीवास्तव के मुताबिक़, "भारत ने यूरोपीय संघ को करीब 76 अरब डॉलर का निर्यात किया और वहां से 61 अरब डॉलर का आयात किया. इससे भारत को व्यापार सरप्लस मिला. लेकिन 2023 में यूरोपीय संघ की ओर से जीएसपी लाभ हटाए जाने से कई भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा कमज़ोर हुई है."

श्रीवास्तव कहते हैं, "मुक्त व्यापार समझौता खोई हुई बाज़ार पहुंच को बहाल करेगा. इससे कपड़ा, दवाएं, इस्पात, पेट्रोलियम उत्पाद और मशीनरी जैसे प्रमुख निर्यात पर टैरिफ़ कम होंगे और अमेरिकी टैरिफ़ बढ़ने से पैदा हुए झटकों को झेलने में भारतीय कंपनियों को मदद मिलेगी."

हालांकि भारत कृषि और डेयरी जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को समझौते से बाहर रखने की कोशिश करेगा. कार, वाइन और स्पिरिट जैसे क्षेत्रों में शुल्क धीरे-धीरे घटाए जा सकते हैं.

यह वही तरीका है जो भारत ने ब्रिटेन जैसे देशों के साथ पिछले समझौतों में अपनाया है.

क्षितिज बाजपेई कहते हैं, "भारत आम तौर पर व्यापार वार्ताओं में चरणबद्ध तरीक़ा अपनाता है और ज़्यादा संवेदनशील मुद्दों को बाद के दौर के लिए छोड़ देता है. इस वजह से इस समझौते का भू-राजनीतिक संदेश उसकी आर्थिक शर्तों जितना ही अहम है."

प्रगति के बावजूद कुछ गहरे मतभेद अब भी बने हुए हैं.

मतभेद के बिंदु

कार्बन उत्सर्जन

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इमेज कैप्शन, कार्बन उत्सर्जन को लेकर यूरोपीय संघ के कड़े नियमों को व्यापार बाधाओं में से एक माना जा रहा है.

यूरोप के लिए बौद्धिक संपदा संरक्षण (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी प्रोटेक्शन) एक बड़ा मुद्दा है. वह बेहतर डेटा सुरक्षा और सख़्त पेटेंट नियम चाहता है.

भारत के लिए यूरोप की ओर से इस साल लागू किया गया नया कार्बन टैक्स, जिसे सीबीएएम कहा जाता है, भी बातचीत में एक बड़ी अड़चन है.

जीटीआरआई के अजय श्रीवास्तव कहते हैं, "सीबीएएम भारतीय निर्यात पर एक नए सीमा शुल्क की तरह काम करता है, भले ही मुक्त व्यापार समझौते के तहत आयात शुल्क ख़त्म कर दिए जाएं. इसका सबसे ज़्यादा असर एमएसएमई (माइक्रो, छोटे और मझोले आकार के उद्योगों) पर पड़ेगा, जिन्हें ऊंची अनुपालन लागत, जटिल रिपोर्टिंग और बढ़ा-चढ़ाकर तय किए गए उत्सर्जन मानकों पर शुल्क का ख़तरा झेलना पड़ सकता है."

श्रीवास्तव के मुताबिक यह समझौता विकास को बढ़ावा देने वाली साझेदारी बनेगा या रणनीतिक रूप से असंतुलित सौदा, यह इन आख़िरी मुद्दों के समाधान पर निर्भर करेगा.

विश्लेषकों का मानना है कि लंबी अवधि में यह दोनों पक्षों के लिए फ़ायदेमंद होगा.

सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी के एलेक्स कैप्री कहते हैं, "आखिरकार यह अमेरिका और दूसरे अविश्वसनीय साझेदारों से व्यापारिक निर्भरता कम करने की प्रक्रिया को तेज़ कर सकता है. इसका मतलब है ट्रंप के अमेरिका या चीन पर निर्भरता घटाना और बार-बार बदलने वाले टैरिफ़, निर्यात नियंत्रण और सप्लाई चेन के राजनीतिक इस्तेमाल से पैदा होने वाले ख़तरे को कम करना."

कैप्री के मुताबिक़, भारत के उच्च कार्बन उत्सर्जन और मानवाधिकार रिकॉर्ड को लेकर यूरोप में इस समझौते का कुछ विरोध हुआ है.

लेकिन नवंबर 2025 से रूस के कच्चे तेल की ख़रीद में भारत की कटौती यूरोपीय संसद में इस समझौते के रास्ते को आसान बना सकती है.

इस समझौते के लागू होने के लिए यूरोपीय संसद की मंज़ूरी ज़रूरी होगी.

दासगुप्ता कहती हैं, "2026 की शुरुआत से अमेरिका के साथ राजनीतिक तनाव बढ़ने का मतलब यह है कि यूरोपीय नेता अब इस व्यापार समझौते के प्रति पहले से ज़्यादा सकारात्मक रुख़ अपना सकते हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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