दाऊद की पैदाइश पर दावत देने वाले डॉन करीम लाला की कहानी

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
अफ़ग़ानिस्तान से 1936 में मुंबई पहुंचे करीम की कहानी किसी फ़िल्मी कहानी से कहीं ज़्यादा दिलचस्प है. करीम ने शुरू में मुंबई के बंदरगाह में कुली के तौर पर काम करना शुरू किया.
1940 के दशक के अंतिम सालों की बात है, एक दिन वह अपने अफ़गान साथियों के साथ बैठा हुआ था कि मलाबारियों के एक गैंग लीडर ने उनसे काम करने के बदले रिश्वत मांगनी शुरू कर दी.
मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे राकेश मारिया अपनी किताब 'व्हेन इट ऑल बिगेन' में लिखते हैं, "करीम ने आगे बढ़कर मलाबारी से कहा, 'हम मेहनत करता है. तुम मेहनत करता है. कोई फ़र्क नहीं है हममें, हम पैसा नहीं देगा. अब से वसूली बंद'!"
मारिया ने घटना का दिलचस्प विवरण दिया है, "मलाबारी ने करीम पर हमला करना चाहा. लेकिन दोनों के बीच कोई मुकाबला नहीं था. करीम ने उसकी जमकर पिटाई की. तब तक उसके दूसरे पठान दोस्त भी वहां पहुंच गए. ये देखते ही मलाबारी कुलियों का दल वहां से भाग निकला. यहां से करीम ख़ां पठान 'करीम लाला' बन गया."
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कुछ ही सालों के भीतर उसने बंदरगाह से सामान चुराकर बाज़ार में बेचना शुरू कर दिया. जब उसके पास पैसे आने लगे तो वह ब्याज़ पर पैसे उधार देने लगा.

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सूद का धंधा बढ़ता गया
जुए में हारने वाले लोग अपने रोज़मर्रा का सामान ख़रीदने के लिए करीम से ब्याज़ पर उधार लिया करते थे. करीम ने नियम बनाया कि हर महीने की दस तारीख़ को उससे लिए गए उधार का ब्याज़ चुका दिया जाए.
नतीजा यह हुआ कि हर दस तारीख को उसकी तिजोरी भरने लगी. पैसा उधार देने के अलावा उसने लोगों के झगड़े सुलझाना और किराएदारों से ज़बरदस्ती खोली ख़ाली कराने का काम भी शुरू कर दिया था.
1950 के दशक में वह हर रविवार को अपने घर की छत पर लोगों के झगड़े सुलझाने के लिए दरबार लगाने लगा था. जल्द ही दक्षिण मुंबई में घर-घर में करीम लाला का नाम जाना जाने लगा था.
शीला रावल अपनी किताब 'गॉडफ़ादर्स ऑफ़ क्राइम' में लिखती हैं, "करीम लाला एक अच्छे जीवन की तलाश में मुंबई आया था. पढ़े-लिखे न होने की वजह से उसने शुरू में अमीर व्यापारियों और कपड़े के उद्योगपतियों के लिए काम करना शुरू कर दिया था. उन्होंने पैसा वसूली के लिए उसकी सेवाएं लेनी शुरू कर दी थीं. यहां से पठान गैंग की शुरुआत हुई थी."
समय और मौक़े के मुताबिक़, करीम ने अवैध शराब का धंधा, जुआ, वेश्यावृत्ति और नशीली दवाओं की तस्करी में अपना हाथ आज़माना शुरू कर दिया था.
धीरे-धीरे वह ग़रीबों, बेरोज़गारों और मुस्लिम युवाओं के बीच गॉडफ़ादर बन गया था.

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वॉकिंग स्टिक का कमाल
धीरे-धीरे वह इतना कुख्यात हो चला था कि उसका नाम भर ले देने से किराएदार घर ख़ाली कर देते थे.
एस हुसैन ज़ैदी अपनी किताब 'डोंगरी टु दुबई, सिक्स डिकेड्स ऑफ़ द मुंबई माफ़िया' में लिखते हैं, "जैसे ही मकान मालिक कहता, 'अब तो लाला को बुलाना पड़ेगा', किराएदार घर छोड़ देते. उसने पठानी सूट पहनना छोड़ सफ़ेद रंग का सफ़ारी सूट पहनना शुरू कर दिया था. वह काले रंग का चश्मा लगाने का शौकीन था और उसे अक्सर महंगे सिगार और पाइप पीते देखा जाता था."
उसकी पचासवीं सालगिरह पर किसी ने उसे एक मंहगी वाकिंग स्टिक भेंट की थी. उसको ये भेंट पसंद नहीं आई थी. उसने कहा भी वह शारीरिक रूप से अब भी मज़बूत है और उसे चलने के लिए किसी स्टिक की ज़रूरत नहीं है लेकिन जब उसके साथियों ने कहा कि इस स्टिक से उसका व्यक्तित्व और निखर जाएगा तो उसने वह स्टिक ले ली थी. फिर तो वह स्टिक करीम लाला का पर्याय बन गई थी.
ज़ैदी लिखते हैं, "अगर वह मस्जिद में अपनी स्टिक छोड़ कर वज़ू करने भी चला जाता तो मस्जिद खचाखच भरी होने के बावजूद किसी की हिम्मत नहीं पड़ती कि वह उसकी जगह बैठ जाए."

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पठानों का नेता बना
धीरे-धीरे उसके साथी उसकी छड़ी का दूसरा इस्तेमाल भी करने लगे थे. जब करीम लाला पर पुलिस और सीआईडी का शिकंजा बढ़ने लगा तो उसके साथियों ने उसे सलाह दी कि मकान खाली करवाने के काम में वह न तो खुद जाए और न ही अपने लोगों को भेजे.
हुसैन ज़ैदी लिखते हैं, "यह सलाह सुनकर करीम लाला बोला, तो खोली कैसा खाली करवाएगा? उसके साथियों ने कहा, 'हमारा खोपड़ी में एक कमाल का आइडिया है जिससे सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगा'."
"इसके बाद से जब भी कोई मकान खाली करवाना होता, लाला के लोग उस जगह पर करीम लाला की छड़ी छोड़ आते. जैसे ही किराएदार उस छड़ी को देखते, वह तुरंत घर ख़ाली कर देते. इससे पहले किसी भी गैंगस्टर का मुंबई में इस तरह का रसूख और दबदबा नहीं था."
मकान या ज़मीन ख़ाली कराने के करीम लाला के बहुत सारे क़िस्से हैं, उनमें से एक क़िस्सा मशहूर अभिनेत्री हेलेन का मकान ख़ाली कराने का भी है.

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गफ़्फ़ार ख़ान से प्रभावित
सन् 1911 में अफ़गानिस्तान के कुनड़ प्रांत में जन्मे अब्दुल करीम ख़ां उर्फ़ करीम लाला का क़द करीब सात फ़ीट ऊंचा था.
अपने शुरुआती जीवन में वह सरहदी गांधी ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां से बहुत प्रभावित था.
23 अप्रैल, 1930 को पेशावर के क़िस्साख़्वानी बाज़ार में जब सरहदी गांधी कहे जाने वाले गफ़्फ़ार ख़ां के कार्यकर्ताओं पर गोली चलाई गई थी तो करीम वहां पर मौजूद था.
सन् 1936 में उसने कलकत्ता से बंबई आने के लिए इंपीरियल इंडियन मेल ट्रेन पकड़ी थी. भारत के विभाजन के बाद बहुत सारे पठानों ने भारत में ही बस जाने का फ़ैसला किया, करीम भी उन्हीं लोगों में शामिल था.
आज़ादी के बाद मुंबई पुलिस में विदेशियों के रजिस्ट्रेशन और उनके परमिट के नवीनीकरण करने के लिए एक दफ़्तर हुआ करता था. इस दफ़्तर में एक पठान ब्रांच भी होती थी.
1950 के दशक में करीम लाला अक्सर इस ब्रांच में जाने लगा और पठानों के सामने आने वाली मुश्किलों को हल करने लगा.
जल्द ही मुंबई में रहने वाले पठान अपनी समस्याओं के हल के लिए करीम लाला के पास आने लगे. करीम बेरोज़गारी से लेकर उनके वित्तीय मामलों और यहां तक उनके पारिवारिक मामलों में भी हस्तक्षेप करने लगा.

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करीम लाला और हाजी मस्तान की जुगलबंदी
धीरे-धीरे करीम लाला की चर्चा मुंबई अंडरवर्ल्ड के एक और कुख्यात शख़्स हाजी मस्तान तक पहुंचने लगी.
मस्तान को हमेशा से एक ऐसे शख़्स की ज़रूरत थी जो उसके पेचीदा कामों को अंजाम दे सके. यह 1970 का दशक था जब उसने करीम लाला से मिलने की इच्छा प्रकट की.
हुसैन ज़ैदी लिखते हैं, "ग्रांट रोड मस्जिद में जुमे की नमाज़ के बाद इन दोनों की मुलाकात हुई. इसके बाद करीम उसे अपने घर ताहेर मंज़िल ले गया. मस्तान ने करीम से कहा, 'बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट के डॉक पर मेरा बहुत सारा सामान उतरता है. मुझे उसे उतरवा कर गोदाम में रखवाना होता है और फिर उसे बाहर भेजना होता है. मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे लोग तब तक हिफ़ाज़त करें जब तक सामान बाज़ार में बिक नहीं जाता."
करीम लाला ने मस्तान से पूछा, "क्या इस पूरे मामले में कुछ हिंसा होने की भी उम्मीद है?' मस्तान ने मुस्करा कर कहा, 'ख़ां साब, अगर आप के लोग आसपास रहेंगे तो किसी में हमारे पास फटकने की जुर्रत नहीं होगी."
इस तरह बंबई अंडरवर्ल्ड की एक बहुत बड़ी डील को अंतिम रूप दिया गया. इसके साथ ही करीम लाला का मुंबई के बड़े डॉनों की टोली में शुमार हो गया.

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पठान गैंग की नींव
जब करीम लाला मुंबई का डॉन बनने की तरफ़ क़दम उठा रहा था उसके गैंग के लोगों की संख्या बढ़ती जा रही थी.
उस गैंग में शामिल था माजिद दीवाना. उसका एक और साथी था नवाब ख़ां जो पहले डॉक्स पर सुरक्षा गार्ड का काम करता था.
बाद में करीम ने उसे इसराएली मोहल्ले में शराब के अड्डों की ज़िम्मेदारी दे दी थी. उसके करीब के एक और वफ़ादार साथी का नाम था नासिर ख़ां. उसको 'सफ़ेद हाथी' कह कर पुकारा जाता था क्योंकि उसका रंग गोरा था और उसका शरीर हाथी की तरह भारी-भरकम था.
करीम के गैंग में हीरो लाला, बशरीन मामा, करम ख़ां और लाल ख़ां भी शामिल थे. ये लोग करीम लाला के लिए बिना पलक झपकाए अपनी जान तक देने के लिए तैयार रहते थे.
इन लोगों ने ही मिलकर मुंबई के कुख्यात पठान गैंग की नींव रखी थी. इस तरह अफ़निस्तान के पहाड़ी इलाके कुनड़ के इस किशोर ने न सिर्फ़ हज़ारों मील दूर मुंबई को अपना घर बनाया बल्कि इस महानगर का एक तरह से पहला 'डॉन' भी बन गया था.

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करीम और इंदिरा गांधी की मुलाक़ात
करीम लाला की मौत के कई सालों बाद एक तस्वीर बहुत वायरल हुई जिसमें उसे इंदिरा गांधी से बात करते हुए दिखाया गया था.
इस तस्वीर में उसके साथ पद्मभूषण पुरस्कार विजेता कलाकार हरींद्रनाथ चट्टोपाध्याय भी खड़े थे. चट्टोपाध्याय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सरोजिनी नायडू के भाई थे.
बाद में एक पत्रकार बलजीत परमार ने लिखा था, "करीम लाला ने ही उन्हें (चट्टोपाध्याय को) बताया था कि वह कभी भी राष्ट्रपति भवन नहीं गया था इसलिए जब सन् 1973 में हरींद्रनाथ को पद्म पुरस्कार मिला तो उसने उनके साथ राष्ट्पति भवन जाने की इच्छा प्रकट की. वहां हरींद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने ये कहकर इंदिरा गांधी ने उसकी मुलाकात कराई थी कि यह मुंबई के पठानों के नेता हैं."
ये करीम और इंदिरा गांधी की पहली और आखिरी मुलाकात थी.

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दाऊद के पिता इब्राहिम से करीम लाला की दोस्ती
1975 से 1977 के बीच, इमरजेंसी के दौरान जब हाजी मस्तान, यूसुफ़ पटेल और सुकुर नारायण बखिया को तस्करी के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था तो करीम लाला को हाथ नहीं लगाया गया था.
लेकिन बाद में कुछ दूसरे मामलों में उसकी गिरफ़्तारी ज़रूर हुई.
मुंबई में केवल एक पुलिसवाले के लिए करीम लाला के मन में इज़्ज़त थी वह था हवलदार इब्राहिम कासकर. कासकर माफ़िया डॉन दाऊद इब्राहिम का पिता था.
उसने करीम से न कभी पैसा मांगा और न ही उसकी जी-हज़ूरी की. इब्राहिम ने अपनी 75 रुपए महीने की नौकरी में ही अपने परिवार का गुज़ारा किया और करीम से कभी भी एक पैसा भी नहीं लिया जबकि करीम लाला मुंबई पुलिस में बहुत सारे लोगों की जेबें भर रहा था.
करीम ने इब्राहिम को हमेशा 'इब्राहिम भाई' कहकर संबोधित किया जबकि वह उससे दस साल छोटा था.

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राकेश मारिया लिखते हैं, "करीम के मन में इब्राहिम के लिए इसलिए इज़्ज़त थी क्योंकि वह भ्रष्ट नहीं था. जब दाऊद पैदा हुआ तो इब्राहिम के पास दावत देने के पैसे नहीं थे. तब करीम लाला ने इब्राहिम की ओर से लड़का पैदा होने की ख़ुशी में दावत दी थी. इसके लिए इब्राहिम उसे मना नहीं कर सका था."
दाऊद की पैदाइश की दावत साल 1955 के दिसंबर महीने में हुई थी, लेकिन 1980 आने तक मुंबई अंडरवर्ल्ड में दाऊद इब्राहिम की जड़ें जमती चली गईं, करीम लाला और उसके बीच दूरी भी बढ़ती चली गई. दोनों एक दूसरे के परिवार के लोगों के दुश्मन हो गए.
1980 के दशक के पहले पांच सालों में दाऊद और पठान गैंग के बीच हत्याओं का जो दौर शुरू हुआ तो उसने रुकने का नाम नहीं लिया. दाऊद ने अपना भाई शब्बीर खोया तो करीम लाला को भी अपने भाई रहीम लाला से हाथ धोना पड़ा.
इस गैंगवार के बाद दाऊद इब्राहिम ने मुंबई को छोड़कर दुबई को अपना ठिकाना बना लिया.

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करीम लाला की चमक फीकी पड़ी
1980 के दशक का मध्य आते-आते करीम लाला की चमक फीकी पड़ने लगी. करीम ने कहना शुरू कर दिया कि अब वह रिटायर हो गया है. अब वह एक सामाजिक कार्यकर्ता और मुंबई में रहने वाले अफ़गान लोगों का नेता भर रह गया है.
यह अलग बात है कि उसके गुर्गे हमेशा दावा करते रहे कि डोंगरी में एक जेब भी करीम लाला की जानकारी के बग़ैर नहीं कटती.
पठान गैंग के युवा लोगों को हिंसा करने और हिंसा का जवाब देने से रोकने में नाकाम होने पर करीम लाला ने पृष्ठभूमि में जाना ज़्यादा मुनासिब समझा. पठान गैंग का नेतृत्व उसके भतीजे समद ख़ां के पास चला गया.
राकेश मारिया लिखते हैं, "उसने अपने अतीत से अपने-आप को अलग करने की भरसक कोशिश की लेकिन वह एक ऐसी संस्कृति से आता था जहां अपने विरोधी से शांति की पेशकश करना सम्मान के ख़िलाफ़ समझा जाता था."
"लेकिन इसके बावजूद उसने दाऊद इब्राहिम से शांति स्थापित करने के लिए ख़ास तौर से सितंबर, 1987 में मक्का जाकर उससे मुलाकात की. करीम ने आंसू भरी आँखों से दाऊद को गले लगाया. उसने दोनों पक्षों को समझाया कि अब बहुत ख़ून बह चुका है. मुझे अब शांति से मरने दो."

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90 साल की उम्र में मौत
जैसे-जैसे उम्र बढ़ी करीम लाला की निज़ी ज़रूरतें कम होने लगीं. एक ज़माने में सड़क पर चारपाई पर बैठ कर लोगों की लड़ाइयां सुलझाने वाला करीम सादा जीवन बिताने में यकीन करता था.
जैसे-जैसे वह समृद्ध होता गया उसने देशी शराब की जगह महंगी स्कॉच व्हिस्की पीनी शुरू कर दी लेकिन आखिरी समय में उसने शराब पीनी भी बंद कर दी.
करीम जैसे डॉन आलीशान घरों में रहने लगे थे लेकिन करीम लाला ने आख़िर तक नॉवल्टी सिनेमा के पीछे अपने पुराने घर को नहीं छोड़ा.
18 फ़रवरी, 2002 को 90 साल की उम्र में मुंबई अंडरवर्ल्ड के इस पहले डॉन ने अंतिम सांस ली.
किसी छुरे, गोली, बदले या षड्यंत्र से उसका अंत नहीं हुआ. उसके सीने में अचानक दर्द हुआ और वही उसकी मौत का कारण बना.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
















