मार्क टली को जब अयोध्या में कारसेवकों ने बना लिया था बंदी, अगले दिन वो फिर उनके बीच पहुंच गए

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- Author, रामदत्त त्रिपाठी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
मार्क टली मेरे लिए केवल एक सहयोगी नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक एक मित्र रहे हैं.
सादगी, सरलता और संतुलन उनके व्यक्तित्व की स्थायी विशेषताएँ रही हैं. काम और जीवन दोनों में वो अनावश्यक दिखावे से दूर रहते थे.
बात 1991 की है. तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने अपनी पार्टी जनता दल (एस) का राष्ट्रीय सम्मेलन उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के ग्रामीण अंचल में आयोजित किया था. यह सम्मेलन शहर से दूर, खुले ग्रामीण परिवेश में हुआ था.
इस सम्मेलन के दौरान मार्क टली ने शहर के होटलों में ठहरने के बजाय वहीं टेंट में रहना पसंद किया. लखनऊ और दिल्ली से आए ज़्यादातर पत्रकार बलिया शहर में रुके थे, लेकिन मैं भी मार्क टली के बगल में उसी अस्थायी टेंट में ठहरा.
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उन दिनों मैं संडे मेल के लिए काम करता था. सुबह कच्ची सड़क के किनारे ठेलिया पर चाय पीना, बाटी-चोखा खाना और मीडिया सेंटर से ख़बरें भेजना, उस प्रवास का हिस्सा था.
लखनऊ वापसी के दौरान एक जगह हमारी कार को एक ट्रक चालक रास्ता नहीं दे रहा था.
उस मौके पर मैंने मार्क टली का तीखा, लेकिन क्षणिक ग़ुस्सा भी देखा, जो उनके स्वभाव में कम ही दिखता था. और जब कभी कोई असहज स्थिति सामने आती, तो वो बहुत सहजता से हनुमान चालीसा का पाठ करने लगते थे.
इसके बाद झाँसी से कानपुर तक राजीव गांधी की यात्रा का कवरेज हमने साथ-साथ किया. राजीव गांधी रात करीब तीन बजे हमीरपुर पहुँचे थे. बस थोड़ी देर सोने के बाद हम सुबह सात बजे उनका इंटरव्यू लेने पहुँच गए.
पहले मार्क ने अपना इंटरव्यू रिकॉर्ड किया. जब मैं इंटरव्यू लेने लगा, तो मार्क ने बड़ी विनम्रता से पूछा कि क्या वो इसे बीबीसी हिंदी के लिए रिकॉर्ड कर सकते हैं. मुझे इसमें भला क्या आपत्ति हो सकती थी.
यह प्रसंग इस बात को रेखांकित करता है कि मार्क मूलतः बीबीसी की अंग्रेज़ी सेवा के पत्रकार थे, लेकिन वो हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे कि उनके डिस्पैच समय पर फ़ाइल हों, ताकि बीबीसी की भारतीय भाषाओं के लिए उन्हें समय रहते उपलब्ध कराया जा सके.
हमेशा फ़ील्ड में जाने में था यक़ीन

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उनके डिस्पैच अनुवाद होकर बीबीसी बांग्ला, हिंदी, उर्दू, तमिल और नेपाली सेवा में प्रसारित होते थे. इसी वजह से मार्क टली दक्षिण एशिया में घर-घर सुने जाते थे. यह शोहरत बीबीसी के बहुत कम पत्रकारों को नसीब हुई.
मार्क टली ने भारतीय राजनीति के अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रमों का कवरेज किया. संपर्क सूत्र बनाने में वो माहिर थे, इसलिए कई बार ख़बरें स्वयं उनके पास चलकर पहुँच जाती थीं. इसके बावजूद वो हमेशा फ़ील्ड में जाकर, संबंधित लोगों से मिलकर ही रिपोर्टिंग करना पसंद करते थे.
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी उन्हें गिरफ़्तार करना चाहती थीं. तब वो कुछ समय के लिए भारत छोड़कर लंदन चले गए थे. वर्ष 1978 में उन्होंने प्रयागराज कुंभ का व्यापक कवरेज किया और बाद में अपनी पुस्तक 'नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया' में कुंभ पर एक पूरा अध्याय लिखा.
बीबीसी की रिपोर्टिंग में तथ्यात्मक प्रामाणिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक संवेदनशीलता पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है. इसी कारण कुंभ मेला वाला अध्याय विशेष रूप से मुझे पढ़ने के लिए भेजा गया था.
उस समय बीबीसी के दिल्ली ब्यूरो के डिप्टी ब्यूरो चीफ़ सतीश जैकब के साथ मार्क टली की बहुत अच्छी ट्यूनिंग थी. दोनों ने मिलकर ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, असम का नेल्ली नरसंहार, राजीव गांधी की हत्या जैसी घटनाओं के अलावा भारतीय राजनीति में आई उथल-पुथल का तथ्यात्मक कवरेज किया.
अनेक नौकरशाहों, सैन्य अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं से उनके व्यक्तिगत संबंध रहे. इन संबंधों से उनकी पत्रकारिता और समृद्ध हुई.
अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन की कवरेज

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जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्मभूमि विवाद तेज़ हो गया और उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय खबरों का प्रमुख केंद्र बन गया, तो मार्क टली ने मुझे औपचारिक रूप से बीबीसी नेटवर्क में जोड़ लिया.
छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना का हमने साथ रहकर कवरेज किया.
देश-दुनिया के मीडिया की भारी मौजूदगी के बावजूद, मस्जिद टूटने की ही नहीं बल्कि दो दिन बाद पुलिस-प्रशासन द्वारा विवादित स्थल पर दोबारा क़ब्ज़ा किए जाने की ख़बर सबसे पहले हमने दी.
उसी छह दिसंबर 1992 को दोपहर 12 बजे जब सैकड़ों कारसेवक बाबरी मस्जिद पर चढ़कर तोड़फोड़ करने लगे तो मार्क टली को तुरंत ख़बर देने की चिंता हुई, उस ज़माने में मोबाइल फ़ोन नहीं थे और इंटरनेशनल कॉल करना भी मुश्किल था.
एक दिन पहले विश्व हिंदू परिषद नेता अशोक सिंघल ने बीबीसी की टीवी कवरेज (जिसमें 1990 में बल प्रयोग के कुछ पुराने विजुअल शामिल थे) की खुले मंच से आलोचना कर दी थी, इसलिए न केवल मार्क टली बल्कि सभी गोरे पत्रकार कारसेवकों के निशाने पर थे. इसलिए हमें रिपोर्टिंग के साथ अपनी और मार्क की सुरक्षा भी करनी थी.
कारसेवकों ने मस्जिद पर प्रहार के साथ ही अयोध्या के सारे तार तोड़ दिये जिससे ख़बरें न जाएं. हमको कारसेवकों से बचते हुए फ़ैज़ाबाद के ग्रामीण इलाक़ों से होते हुए केंद्रीय तारघर आना पड़ा. ख़बर फ़ाइल करने के बाद मार्क ने मुझे लखनऊ में क्या हो रहा है, पता करने को कहा.
इस बीच वह कुछ पत्रकारों के साथ फिर अयोध्या चले गये. इस समय तक कारसेवक और बेख़ौफ़ हो गये थे. कारसेवकों के एक जत्थे ने मार्क व अन्य पत्रकारों को दशरथ महल के पास घेरकर बंधक बना लिया. ग़नीमत थी कि दशरथ महल के महंत मार्क को जानते थे और उन्होंने कारसेवकों को समझाया.
इस बीच वहाँ तैनात तत्कालीन एडीएम तिवारी को मार्क के बंधक बनाने की सूचना मिली. वह भी फौरन पहुँच गये और किसी तरह मार्क व अन्य पत्रकारों को छुड़ाकर होटल पहुंचाया. कारसेवकों का मन इतना बढ़ा हुआ था कि वे हमारे होटल के बाहर आकर नारे लगा रहे थे, लेकिन अंदर नहीं आये.
मार्क रात भर बीबीसी के तमाम आउटलेट्स को ख़बर देते रहे. मार्क की आदत थी कि वो कभी संपादक या डेस्क को मना नहीं करते थे. दूसरे दिन लंदन से एक मांग यह आयी कि कारसेवकों की बाइट्स दें. हम लोगों को बाहर कारसेवकों के बीच जाने में ख़तरा था फिर भी मार्क रेलवे स्टेशन गये और वापस जा रहे कारसेवकों से बातचीत करके लंदन भेजा.
बाद के वर्षों में लंदन में बीबीसी के नए डायरेक्टर जनरल द्वारा मैनेजमेंट में किए गए बदलावों से मार्क टली और कई अन्य वरिष्ठ पत्रकार असहमत थे. इसी क्रम में मार्क को ब्रिटेन के बर्मिंघम शहर में रेडियो फेस्टिवल के एक प्रतिष्ठित कार्यक्रम में भाषण के लिए आमंत्रित किया गया.

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उन्होंने बीबीसी के डायरेक्टर जनरल जॉन बर्ट के मैनेजमेंट स्टाइल की आलोचना करते हुए जो भाषण तैयार किया, उसे मुझे भी दिखाया था.
वह भाषण लंदन के अख़बारों में प्रमुखता से छपा और बीबीसी के समाचारों में भी व्यापक रूप से कवर किया गया. इसी वैचारिक असहमति के चलते 1994 में मार्क टली ने भारत में बीबीसी के ब्यूरो चीफ़ पद से इस्तीफ़ा दे दिया. हालाँकि इसके बाद भी वो बीबीसी के लिए लिखते और बोलते रहे.
मार्क मूलतः एक आध्यात्मिक व्यक्ति थे. जैसा कि उन्होंने बताया वो आरंभ में पादरी बनना चाहते थे, लेकिन पादरी नहीं, पत्रकार बने. सेवानिवृत्ति के बाद कई सालों तक उन्होंने अंग्रेज़ी में 'समथिंग अंडरस्टुड' कार्यक्रम प्रस्तुत किया.
मार्क के साथ आख़िरी बार मैंने साल 2013 के प्रयागराज कुंभ में फील्ड में काम किया. उन्होंने एक लंबी रेडियो डॉक्यूमेंट्री तैयार की थी. कुंभ में शाही स्नान का कवरेज बेहद चुनौतीपूर्ण होता है. इसके बावजूद 78 वर्ष की उम्र में वो तड़के ही तैयार हो गए थे.
भीड़ में घाट तक पहुँचने में कठिनाई न हो, इसलिए वो बांध पार कर एक टेंट में ठहरे. एक बार तो लगा कि कहीं धक्का-मुक्की में वो कुचल न जाएँ, लेकिन किसी तरह वो सकुशल बाहर निकल आए.
दक्षिण एशिया की राजनीति के अच्छे जानकार

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अक्सर जब किसी को कोई झूठी बात फैलानी होती है, तो कहा जाता है, "बीबीसी पर सुना है" या "मार्क टली ने लिखा है." हाल के वर्षों में सोशल मीडिया पर कई बार उनके नाम से भ्रामक बातें भी फैलाई गईं. मार्क टली ने कई बार स्पष्टीकरण दिया, लेकिन हर बार सुनने वाले मिलें, यह ज़रूरी नहीं होता.
बाद के वर्षों में जब भी मैं दिल्ली गया या वो लखनऊ आए, मुलाक़ात ज़रूर होती थी. वो काफ़ी समय से अस्वस्थ चल रहे थे. पिछले साल अक्तूबर में, उनके नब्बे वर्ष पूरे होने पर, फ़ोन पर उनसे बात हुई थी. लेकिन यह अंदाज़ा नहीं था कि यह बातचीत इतनी जल्दी स्मृति बन जाएगी.
मार्क ने पाकिस्तान और बांग्लादेश का भी व्यापक कवरेज किया था. इसीलिए उन्हें दक्षिण एशिया की अच्छी समझ थी. यह भी संयोग है कि भारत के कोलकाता शहर में 1935 में जन्में मार्क टली का नाता आख़िरी सांस तक भारत से बना रहा.
मार्क टली की भारत और दक्षिण एशिया को लेकर समझ केवल राजनीतिक या प्रशासनिक नहीं थी. उन्होंने इस क्षेत्र को उसकी सामाजिक बनावट, सांस्कृतिक परंपराओं और आम लोगों के अनुभवों के साथ समझने की कोशिश की.
सत्ता के केंद्रों तक उनकी पहुँच थी, लेकिन यह नज़दीकी कभी उनकी रिपोर्टिंग की निष्पक्षता के आड़े नहीं आई. वो सत्ता में बैठे लोगों से संवाद रखते थे, पर ख़बर के स्तर पर दूरी बनाए रखते थे.
उनके व्यक्तित्व में कोई अहंकार नहीं था, लेकिन अपने बुनियादी उसूलों पर वो कभी समझौता करते नहीं दिखे. शायद यही कारण है कि मार्क टली को केवल एक विदेशी संवाददाता के रूप में नहीं, बल्कि इस भूभाग को समझने वाले एक संवेदनशील और भरोसेमंद पत्रकार के रूप में याद किया जाता है.
सादगी की मिसाल थे टली

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उनकी सादगी की मिसाल इस घटना से मिल सकती है. लंदन के ऑक्सफ़र्ड स्ट्रीट के एक बड़े क्लब में अंदर जाने के लिए टाई लगानी ज़रूरी होती है. हमलोगों के लंदन प्रवास के दौरान वह बिना टाई लगाये ही पहुँच गये थे. याद आया तो बेहिचक रिसेप्शन पर गये और एक टाई उधार ली, तब हम अंदर डिनर के लिए जा सके.
दूसरा वाक़या बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के पुराने मुख्यालय बुश हाउस के पास का है. वहाँ लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के बगल में चाय की दुकान थी. मार्क के साथ मैं, उनकी मित्र जिलियन राइट और बीबीसी उर्दू के एक सहयोगी थे.
चाय दुकान की मालकिन ने समझा कि मार्क कोई प्रोफ़ेसर हैं जो एक कप चाय पर घंटों अपने स्टूडेंट्स के साथ बैठते हैं. उन्होंने काफ़ी देर तक हुज्जत की कि हम लोग कहीं और जायें. लेकिन मार्क ने मुस्कुराते हुए समझा लिया कि हम लोग बस बीबीसी के पत्रकार हैं बस थोड़ी देर बैठकर चले जायेंगे.
मार्क स्वयं तो पक्के क्रिश्चियन थे, लेकिन मानते थे कि ईश्वर तक जाने के लिए अनेक रास्ते हैं और वह हर धर्म या संस्कृति का आदर करते थे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















