चीन के क़र्ज़ों की वापसी में सुविधा क्या पाकिस्तान के लिए लाइफ़लाइन बन गई है?

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    • Author, मोहम्मद सुहैब
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम

चीन के क़र्ज़ों की वापसी पर पुनर्विचार और इस संदर्भ में सुविधा प्राप्त करने के लिहाज़ से अमेरिका की ओर से पहले बयान दिए जाते रहे हैं. लेकिन हाल ही में पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो के एक बयान ने एक बार फिर इस ओर ध्यान आकर्षित कराया है.

'डॉन' समाचार पत्र के अनुसार, बिलावल भुट्टो ने 'फ़ॉरन अफ़ेयर्स' पत्रिका को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा है कि पाकिस्तान ने चीन से क़र्ज़ों की वापसी को पुनर्नियोजित करने, स्थगित करने या इसकी अदला-बदली करने के बारे में बात नहीं की और अगर ऐसा होगा भी तो यह पाकिस्तान की शर्तों पर होगा.

बाढ़ से प्रभावित पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को वर्तमान संकट से निकालने के लिए पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की दरकार है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, 2010 की बाढ़ के विपरीत इस बार अधिक व्यापक पैमाने पर होने वाली तबाही के बाद पाकिस्तान को अमेरिका और चीन दोनों से ही वह सहायता नहीं मिल सकी जिसकी उसे ज़रूरत है.

अमेरिका की ओर से तो इस बारे में यह कारण बताया गया है कि 2010 में उसके पास जो संसाधन मौजूद थे वह विभिन्न कारणों की वजह से इस बार मौजूद नहीं हैं, लेकिन साथ ही पाकिस्तान पर ज़ोर दिया गया है कि वह चीन से क़र्ज़ों की छूट और उनकी रिस्ट्रक्चरिंग कराने की कोशिश करे.

इसकी प्रतिक्रिया में चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की ओर से एक बयान में कहा गया था कि अमेरिका को बाढ़ से प्रभावित पाकिस्तान के लिए "कुछ वास्तविक और लाभकारी" काम करना चाहिए और उन्होंने अमेरिका की "पाकिस्तान चीन सहयोग पर अनावश्यक आलोचना करने पर" भर्त्सना भी की है.

पाकिस्तान में चीन के राजदूत की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि पाकिस्तान में विनाशकारी बाढ़ आने के बाद चीन ने लगभग 90 मिलियन डॉलर की सहायता की घोषणा की है जो पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी मदद है.

ग़ौरतलब है कि शुक्रवार को अमेरिका की ओर से पाकिस्तान को 13 करोड़ 20 लाख डॉलर के ऋण की वापसी को स्थगित करने की सुविधा दी गई है और कहा गया है कि उनकी प्राथमिकता में पाकिस्तान को संसाधन उपलब्ध कराना है.

इससे पहले क़र्ज़ों की अदला-बदली और स्वरूप बदलने के बारे में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश की ओर से पाकिस्तान के दौरे के दौरान प्रस्ताव दिया गया था.

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बीते कई दिनों से पाकिस्तान भीषण बाढ़ के असर से जूझ रहा है. इस कारण वहां सैकड़ों जानें गई हैं और हज़ारों लोग प्रभावित हुए हैं.

चीन ने पाकिस्तान के लिए लगभग 90 मिलियन डॉलर की सहायता की घोषणा की है.

अमेरिका ने पाकिस्तान को दिए 13 करोड़ 20 लाख डॉलर के क़र्ज़ की वापसी को स्थगित करने की सुविधा दी है.

आईएमएफ़ के अनुसार, पाकिस्तान ने चीन से 30 अरब डॉलर का क़र्ज़ लिया है.

ये उसके कुल विदेशी क़र्ज़ों का एक तिहाई हिस्सा है.

पेरिस क्लब के अलावा पाकिस्तान ने चीन, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से भी क़र्ज़ लिया है.

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अमेरिकी दूतावास का ट्वीट

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इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र ने बीते सप्ताह एक पेपर में कहा कि पाकिस्तान से विदेशी क़र्ज़ों की वापसी की प्रक्रिया को तत्काल स्थगित करते हुए क़र्ज़ देने वाले देश और संस्थाएं उन्हें पुनर्नियोजित करें.

तो क्या इसका मतलब यह है कि अब पाकिस्तान के पास इस आर्थिक संकट और बाढ़ से होने वाले नुक़सानों की भरपाई के लिए चीन से क़र्ज़ों की छूट लेने के अलावा कोई चारा नहीं है? और क्या पाकिस्तान ऐसा करने में हिचकिचा रहा है?

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पाकिस्तान ने चीन से कितना क़र्ज़ लिया है?

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पाकिस्तान की ओर से लिए गए विदेशी क़र्ज़ों पर नज़र डाली जाए तो इस महीने की शुरुआत में आईएमएफ़ की ओर से जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, कुल मिलाकर पाकिस्तान ने चीन से 30 अरब डॉलर का क़र्ज़ ले रखा है जो उसके कुल विदेशी क़र्ज़े का एक तिहाई हिस्सा है.

आर्थिक मामलों पर नज़र रखने वाले पत्रकार ख़ुर्रम हुसैन इस बारे में कहते हैं कि चीन से ऋण के मामले में पाकिस्तान का संकट गंभीर है.

उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि "इसका कारण यह है कि यह कोई एक क़र्ज़ नहीं है जो पाकिस्तान ने चीन से लिया हो बल्कि यह विभिन्न रूपों में है."

"इसमें आपकी रिज़र्व एक्सटेंशन सुविधा है, डिपॉज़िट्स हैं, व्यावसायिक ऋण हैं और परियोजनाओं के लिए वित्त और इससे संबंधित अन्य क़र्ज़ हैं तो अगर रिस्ट्रक्चरिंग की बात होती है तो यह बहुत पेचीदा है."

इस संदर्भ में थिंक टैंक एसडीपीआई के प्रमुख आबिद क़य्यूम ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि पाकिस्तान के विदेशी क़र्ज़ों में पहले पेरिस क्लब के सदस्यों से लिया गया क़र्ज़ आता है, इसके बाद चीन की बारी आती है.

उन्होंने कहा कि यह राय ग़लत है कि "चीन पाकिस्तान को सबसे अधिक क़र्ज़ देता है और चीन के क़र्ज़ दीर्घकालिक होते हैं और उनकी जल्दी वापसी ज़रूरी नहीं है."

हालांकि उनका यह भी कहना था कि "यह एक आम-सी बात है कि जब भी कोई संस्था या देश आपको क़र्ज़ देता है तो वह ऐसा करने से पहले आप की ओर से लिए गए दूसरे क़र्ज़ों के बारे में पूछता है."

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क़र्ज़ वापसी से संबंधित सुविधा प्राप्त करना इतना मुश्किल क्यों है?

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यहां यह सवाल पैदा होता है कि पाकिस्तान के लिए क़र्ज़ वापसी के मामले में सुविधा लेना इतना मुश्किल क्यों हो गया है.

ख़ुर्रम हुसैन के अनुसार, इसका कारण यह है कि क़र्ज़ देने की क्षमता रखने वाले देशों की संख्या में वृद्धि हुई है.

वो कहते हैं कि "पाकिस्तान ने पहले भी क़र्ज़ के मद में रिस्ट्रक्चरिंग की है, लेकिन इस समय आपको एक सिंगल विंडो पर जाकर बात करनी होती थी यानी इस पर क्लब से क़र्ज़ के लिए बात करनी होती थी क्योंकि जिनसे आपको क़र्ज़ लेना होता था, उनका प्रतिनिधित्व वहां होता था."

उन्होंने इसका उदाहरण देते हुए कहा, "जैसे साल 2002 के बाद पाकिस्तान को बड़े क़र्ज़ों की रिस्ट्रक्चरिंग मिली थी जो अफ़ग़ानिस्तान के युद्ध के संदर्भ में दी गई थी और पाकिस्तान को उस समय 10 या 12 अरब डालर मिले थे."

लेकिन अब परिस्थिति अलग है और क़र्ज़ देने वाले देशों में पेरिस क्लब के अलावा चीन, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल हैं.

वो कहते हैं कि "जब आप पेरिस क्लब के पास जाते हैं तो वह कहते हैं कि पहले चीन से बात करें. जब चीन के पास जाते हैं तो वह कहते हैं कि पहले पेरिस क्लब से हमें यह विश्वास दिलवा दें."

"जब आप सऊदी अरब के पास जाते हैं तो वह कहते हैं कि हमें आईएमएफ़ से यह विश्वास दिलवा दें. इस तरह यह रिस्ट्रक्चरिंग बहुत मुश्किल हो जाती है. तो आप शुरू कहां से करेंगे, पहले कहां जाएंगे जब आपको चार जगहों पर जाना पड़े."

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क्या चीन पाकिस्तान को क़र्ज़ वापसी में सुविधा देगा?

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इस मुश्किल घड़ी में क्या चीन पाकिस्तान को क़र्ज़ों की वापसी के लिए सुविधा देगा? इस बारे में ख़ुर्रम हुसैन कहते हैं, ''इस बात की संभावना तो है, लेकिन यह एक जटिल प्रक्रिया है."

ख़ुर्रम हुसैन का कहना था, "आज बिलावल कह रहे हैं कि हमने चीन से क़र्ज़ों की रिस्ट्रक्चरिंग की बात नहीं की, उन्हें मालूम है कि जब वह चीन के पास जाएंगे तो वहां से नाराज़गी जताई जाएगी. क्योंकि चीन पाकिस्तान से बहुत पहले से व्यवस्था ठीक करने के बारे में बात करता आया है, इसलिए अब रिस्ट्रक्चरिंग की बात करने पर पाकिस्तान को चीन की ओर से सवालों का सामना करना पड़ सकता है."

उन्होंने कहा "लेकिन पाकिस्तान को इस मुश्किल घड़ी से गुज़रना पड़ेगा और चीन के पास जाना पड़ेगा, वो अपनी शर्त लगाएंगे और शायद अंततः इसमें छूट मिल जाएगी, लेकिन यह एक जटिल प्रक्रिया होगी जिसमें समय लगेगा."

ख़ुर्रम हुसैन के अनुसार, यह पाकिस्तान की 'लाइफ़लाइन' बन गई है और यह क़र्ज़ "न सिर्फ चीन रिस्ट्रक्चर करे, पेरिस क्लब रिस्ट्रक्चर करे बल्कि सभी ऐसा करें, लेकिन सब एक-दूसरे से इस मामले को शर्तों में बांध रहे हैं. तो आपको हर दरवाज़े पर जाने के अपमान का सामना करना पड़ेगा, लेकिन इसके अलावा कोई चारा नहीं है."

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क़र्ज़ों की सुविधाएं किस प्रकार की होती हैं और डेट स्वैप क्या है?

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थिंक टैंक एसडीपीआई के आबिद ने इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहा, "एक होता है डेट वेवर यानी क़र्ज़ बिल्कुल माफ़ कर दिया जाए. एक होता है डेट डेफ़र्मेंट यानी आप क़र्ज़ वापस करने के लिए और समय मांग लेते हैं. तीसरा डेट स्वैप होता है जिसमें क़र्ज़ लेने वाला और देने वाला एक फ़ंड बना लेते हैं और जो राशि वापस करनी होती है वह उस फ़ंड में चली जाती है. फिर जिस उद्देश्य के लिए वह फ़ंड बना होता है सिर्फ़ उसके लिए वह राशि ख़र्च की जाती है.

उदाहरण के लिए अगर वह फ़ंड बाढ़ के लिए तय किया जाता है तो उसे सिर्फ उस मद में ही इस्तेमाल किया जाएगा. फिर क़र्ज़ देने वाले देश या संस्थाएं आपसे हिसाब मांग सकते हैं कि यह पैसे कहां लगाए गए हैं."

ध्यान रहे कि पाकिस्तान को हाल तक डेट स्वैप की किसी देश ने सुविधा नहीं दी है. इसलिए अगर आने वाले दिनों में ऐसा किया जाता है तो इसकी शर्तें उस समय स्पष्ट होंगी."

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