पाकिस्तान में आत्मघाती हमला: 23 सैनिकों की मौत की जिम्मेदारी लेने वाला संगठन कौन है

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    • Author, अज़ीज़ुल्लाह खान
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू, पेशावर

पाकिस्तान की सेना के जनसंपर्क विभाग (आईएसपीआर) का कहना है कि ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत के डेरा इस्माइल ख़ान ज़िले के दराबान इलाके में सुरक्षा बलों पर आत्मघाती हमला हुआ जिसमें 23 सैनिक मारे गए.

आईएसपीआर के मुताबिक, "12 दिसंबर की सुबह छह आतंकवादियों ने दरबान में सुरक्षा बलों की चौकी पर आत्मघाती हमला किया. चौकी में घुसने की आतंकवादियों की कोशिश को नाकाम कर दिया गया, जिसके बाद आतंकवादियों ने विस्फोटकों से भरी गाड़ी को इमारत की दीवार से टकरा दिया."

आईएसपीआर ने बताया कि धमाके के कारण इमारत ढह गई और सेना के 23 जवानों की मौत हो गई, जबकि जवाबी कार्रवाई में सभी छह आतंकवादी मारे गए.

प्रतिबंधित संगठन तहरीक जिहाद-ए-पाकिस्तान ने हमले की जिम्मेदारी ली है. संगठन के प्रवक्ता ने सोशल मीडिया पर अपने बयान में कहा कि यह हमला 'मौलवी हसन गंडापुर' ने किया था. हमलावर उनके साथ पुलिस स्टेशन में दाखिल हुए थे.

इस बीच, आईएसपीआर के अनुसार, 12 दिसंबर को डेरा इस्माइल ख़ान ज़िले में सुरक्षा बलों के अलग-अलग अभियानों के दौरान कुल 27 आतंकवादी मारे गए हैं.

उधर, दरजंदाह में आतंकवादियों की मौजूदगी की सूचना पर खुफिया ऑपरेशन चलाया गया, जिसमें 17 आतंकी मारे गए. कलाची में एक अन्य खुफिया ऑपरेशन में चार आतंकवादी मारे गए हैं. जबकि गोलीबारी में दो सैन्यकर्मियों को जान से हाथ धोना पड़ा.

आईएसपीआर का कहना है कि "आतंकवादियों के पास से भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद बरामद हुआ है."

'हमलावरों ने पुलिस स्टेशन की इमारत में गाड़ी घुसा दी'

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दराबान के स्थानीय लोगों का कहना है कि ये चरमपंथी हमला रात के करीब ढाई-तीन बजे हुआ जब सभी लोग सो रहे थे और तभी अचानक एक जोरदार धमाका हुआ और गोलीबारी की आवाजें सुनाई दीं.

एक व्यक्ति ने कहा कि "हम डर और दहशत में थे और समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हुआ है."

एक स्थानीय निवासी गौहर ने बीबीसी को बताया कि गोलीबारी इतनी तेज़ थी कि उन्हें लगा कि यह उनके घर के करीब हो रहा है. हालांकि घटनास्थल से उनका घर दूरी पर था.

गोलीबारी का ये सिलसिला सुबह तक जारी रहा, जिसके कारण बच्चे स्कूल-कॉलेज नहीं जा सके.

गौहर ने कहा कि लोग डर के कारण अपने घरों से कम ही बाहर निकल रहे हैं. इस बीच एक सोशल मीडिया पर चल रहे एक संदेश में ये कहा गया है कि लोगों को अपने घरों पर ही रहना चाहिए.

घटना के बाद दराबान कलां के सभी शिक्षण संस्थान बंद कर दिए गए हैं.

दराबान के एक स्कूल के प्रिंसिपल मलिक शकील ने बताया कि कॉलेज और स्कूल आज बंद हैं, ये कल से खुलेंगे. स्कूलों में आज मासिक टेस्ट नहीं हो सका.

उन्होंने कहा कि इस घटना के बाद इलाके में गंभीर भय का माहौल है. लोगों को घर पर रहने के लिए कहा गया है.'

'विस्फोट से स्कूल की इमारत भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई'

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ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह में डेरा इस्माइल खान के दक्षिणी ज़िले से एक हाईवे पश्चिम की ओर बलूचिस्तान क्षेत्र में झोब की ओर जाती है. इसी हाईवे पर करीब 65 किमी दूर दराबान कलां है.

ये कबायली बहुल इलाका है जो दरज़ंदाह के पास स्थित है. स्थानीय लोगों ने बताया कि जहां हमला हुआ वह पुलिस स्टेशन हाईवे के पास है.

स्थानीय लोगों के मुताबिक, हमलावरों ने थाने के पीछे की तरफ से गाड़ी को बिल्डिंग से टकरा दिया.

इस थाने में आगे के हिस्से में पुलिस तैनात रहती है जबकि पीछे के कमरों में सुरक्षा बल के जवान तैनात रहते हैं.

पिछले कुछ महीनों से थाने में फोर्स के जवानों की तैनाती की गई है. पहले ये अधिकारी कॉलेज के एक हिस्से में तैनात थे. पुलिस स्टेशन भवन के कुछ हिस्से अभी भी निर्माणाधीन हैं.

इस पुलिस स्टेशन के बगल में स्थित स्कूल की इमारत भी विस्फोट से गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई है.

अतीत में, ये हाईवे बलूचिस्तान से ईरान और यूरोपीय देशों तक का मार्ग था.

इसलिए पाकिस्तान की स्थापना के काफी समय बाद तक, दराबान के पास दरजंदाह मोड़ पर एक मील का पत्थर था, जिस पर लिखा था 'लंदन 9600 किमी दूर' और यह मील का पत्थर कुछ साल पहले सड़कों और दुकानों के निर्माण के कारण खो गया था.

इस पुलिस स्टेशन और यहां मौजूद पुलिस और सुरक्षा बल के जवानों पर यह पहला हमला नहीं है.

साल 2015 में गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज दरबान की बिल्डिंग पर आत्मघाती हमला हुआ था, जिसके बाद से इस कॉलेज की बिल्डिंग काफी जर्जर हो गई है. कॉलेज का एडमिन ब्लॉक पूरी तरह से नष्ट हो गया था.

दराबान के पास तहसील कलाची में पिछले कुछ समय में पुलिस स्टेशनों और सुरक्षाकर्मियों पर कई हमले हुए हैं, जिसके बाद वहां तलाशी अभियान भी चलाया गया है.

मियांवाली एयरबेस पर हमला

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यह पहली बार नहीं है कि हाल ही में 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' या तथाकथित 'इस्लामिक स्टेट' के बजाय एक नए समूह 'तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान' ने किसी हमले की जिम्मेदारी ली है.

नवंबर में पाकिस्तान के मियांवाली शहर के हवाई अड्डे पर चरमपंथियों के हमले में तीन विमान क्षतिग्रस्त हो गए. जवाबी कार्रवाई के दौरान तीन आतंकवादी मारे गए थे. इस हमले का जिम्मा भी इसी संगठन ने लिया था.

पाकिस्तानी सेना के जनसंपर्क विभाग (आईएसपीआर) की ओर से जारी बयान में कहा गया, "आतंकवादियों की ओर से सुबह-सुबह पाकिस्तान वायुसेना के मियांवाली ट्रेनिंग एयर बेस पर हमला करने की कोशिश की गई, लेकिन सेना की समय पर और प्रभावी प्रतिक्रिया के कारण इस हमले को नाकाम कर दिया गया. असाधारण साहस और समय पर जवाबी कार्रवाई का प्रदर्शन करते हुए, तीन आतंकवादियों को बेस में प्रवेश करने से पहले ही मार दिया गया, जबकि शेष तीन हमलावर समय पर और प्रभावी कार्रवाई के कारण हमले के दौरान मारे गए."

पाकिस्तान में हाल के दिनों में कई चरमपंथी हमले हुए हैं, जिनकी जिम्मेदारी एक अज्ञात संगठन ने ली है. इसके बारे में अधिकारियों और यहां तक ​​कि प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के अधिकारियों को भी कुछ नहीं पता है या वे इसके बारे में बताने के लिए ज़्यादा इच्छुक नहीं लगते.

कई विश्लेषक इसे रहस्यमयी संगठन बता रहे हैं और उनका मानना ​​है कि इस संगठन के प्रवक्ता इन हमलों की ज़िम्मेदारी तो स्वीकार करते हैं लेकिन अपने संगठन की प्रकृति के बारे में कुछ नहीं बताते.

इस संगठन का नाम 'तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान' बताया जा रहा है और इससे पहले इसी संगठन ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के मुस्लिम बाग इलाके में एफसी कैंप पर हमले की जिम्मेदारी ली थी.

सेना के जनसंपर्क विभाग के मुताबिक, हमले के बाद तुरंत कार्रवाई की गई और इलाके को आतंकियों से मुक्त करा लिया गया. हमले में छह हमलावर मारे गए और शिविर में मौजूद छह सुरक्षाकर्मी भी मारे गए. आईएसपीआर के मुताबिक हमलावर आधुनिक हथियारों से लैस थे.

समूह ने पहले चमन, बोलान, स्वात के कबाल और लक्की मारवत में हमलों की जिम्मेदारी ली है, लेकिन कम से कम दो हमले ऐसे हैं जिनमें समूह की मौजूदगी का कोई सबूत नहीं मिला है.

यह संगठन कब और कैसे अस्तित्व में आया?

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इस संगठन का नाम कुछ महीने पहले तब सामने आया था जब इसने पहली बार बलूचिस्तान प्रांत के सीमावर्ती शहर चमन में सुरक्षा बलों पर हमले की जिम्मेदारी ली थी.

वरिष्ठ पत्रकार और खुरासान डायरी के समाचार निदेशक एहसानुल्लाह टीपू ने बीबीसी को बताया कि इस साल फरवरी में उन्हें टेलीफोन पर एक संदेश मिला जो किसी यूरोपीय देश के नंबर से आया हुआ मालूम देता था.

"कॉल करने वाले ने अपना नाम मुल्ला मुहम्मद कासिम बताया और कहा कि उसने 'तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान' नामक एक संगठन की स्थापना की है, लेकिन संगठन के बारे में कोई और जानकारी नहीं दी."

उन्होंने कहा कि दो दिन बाद उनके मोबाइल फोन पर एक संदेश मिला, जिसमें कहा गया कि उन्होंने अपने संगठन की ओर से बलूचिस्तान के सीमावर्ती शहर चमन में सुरक्षा बलों के जवानों पर हमले की जिम्मेदारी स्वीकार कर ली है. इस हमले में दो सुरक्षाकर्मी मारे गए थे.

पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया में चरमपंथ और संबंधित मुद्दों पर व्यापक शोध करने वाले विश्लेषक अब्दुल सईद का कहना है कि तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान अभी भी एक रहस्यमय संगठन है जिसके नेतृत्व, सदस्यों या अस्तित्व का कोई सबूत नहीं है.

इस संगठन के गठन की घोषणा कुछ पत्रकारों को भेजे गए संक्षिप्त संदेशों के माध्यम से की गई थी और सोशल मीडिया अकाउंट या कुछ पत्रकारों को भेजे गए संदेशों में चरमपंथी हमलों की जिम्मेदारी लेने का दावा किया गया था. अभी तक इस संगठन के प्रमुख और प्रवक्ताओं के नाम तो पेश किए गए हैं लेकिन उनके अतीत या वास्तविक चरित्र के बारे में कोई सबूत नहीं है.

इस संगठन के प्रवक्ता अपना नाम मुल्ला मुहम्मद क़ासिम लिखते हैं, जिन्होंने पत्रकारों के अनुरोध और प्रयासों के बावजूद किसी से बात नहीं की है और केवल लिखित संदेश भेजे हैं.

हमलों की ज़िम्मेदारी में कितनी सच्चाई, कितनी अस्पष्टता?

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पाकिस्तान में अब तक छह ऐसे हमले हो चुके हैं जिनकी जिम्मेदारी इस संगठन के प्रवक्ता ने ली है. इन पांच हमलों में से दो ऐसे हमले थे जिनमें संगठन की संलिप्तता का कोई सबूत नहीं मिला.

इनमें इसी साल मार्च में बोलान में एक पुलिस वाहन के पास हमला हुआ था, जिसमें एक नागरिक समेत नौ अधिकारी मारे गए थे. तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान ने जिम्मेदारी ली लेकिन कोई विवरण नहीं दिया.

इसके बाद खुद को 'इस्लामिक स्टेट' कहने वाले चरमपंथी संगठन दाएश ने अपने वेब पैच 'अमाक़' पर इस हमले का विवरण जारी करके जिम्मेदारी ली.

इसके बाद अप्रैल में ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह के स्वात ज़िले के कबल में एक आतंकवाद विरोधी पुलिस स्टेशन पर विस्फोट हुआ, जिसमें 17 लोग मारे गए.

तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान ने भी एक संदेश के माध्यम से हमले की जिम्मेदारी ली, लेकिन बाद में जांच से पता चला कि विस्फोट पुलिस स्टेशन के अंदर विस्फोटकों के कारण हुए थे और किसी हमलावर के बाहर से आने का कोई सबूत नहीं था.

इसके अलावा अप्रैल में ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह के लक्की मारवत जिले में एक पोस्ट-ग्रैजुएट कॉलेज पर हमला किया गया था, जिसमें आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया था. इस हमले की जिम्मेदारी 'तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान' के प्रवक्ता मुल्ला मुहम्मद कासिम ने भी स्वीकार की और कहा कि यह हमला उनके कमांडर अबुजर ने कराया था.

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का नज़रिया

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इसे लेकर सरकारी स्तर पर पूरी तरह चुप्पी है. कुछ महीने पहले भी जब आतंकवाद निरोधक विभाग के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उन्होंने इस संगठन के बारे में कुछ नहीं बताया.

आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि संभव है कि इस संगठन का संबंध प्रतिबंधित संगठन 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' या 'अल-कायदा' आदि से हो.

उनका कहना है कि इस संगठन में कौन लोग हैं, इसकी जानकारी ज़्यादा लोगों को नहीं है.

प्रतिबंधित संगठन 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' के प्रवक्ता मोहम्मद खोरासानी ने भी कहा कि उन्हें इस संगठन के बारे में कोई जानकारी नहीं है और वह खुद इस संगठन के लोगों से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं.

इस संबंध में खुद को टीटीपी झोब क्षेत्र का अधिकारी बताने वाले खालिद सिरबकफ मोहमंद ने बीबीसी को बताया कि ऐसा कोई संगठन मौजूद नहीं है, बल्कि यह केवल सोशल मीडिया (फेसबुक) तक ही मौजूद है.

उन्होंने कहा कि "अगर कोई संगठन होता तो उसके पास अधिकारी होते, एक प्रमुख होता, एक संगठनात्मक ढांचा होता, केवल हमलों की जिम्मेदारी लेने से कोई संगठन नहीं बनता."

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