नवाज़ शरीफ़ की वापसी से पाकिस्तान में कितना बदलाव होगा?

4 साल बाद वतन लौटे नवाज़ शरीफ़ ने लाहौर में सभा को संबोधित किया

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    • Author, शुमाइला ज़ाफ़री
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लाहौर से

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ चार साल के बाद पाकिस्तान लौट आए हैं.

उन्होंने अपनी वापसी के पहले ही दिन लाहौर में अपने समर्थकों की एक बड़ी रैली को संबोधित किया. लाहौर कभी पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज़ गुट का गढ़ माना जाता था, लेकिन बाद में इमरान ख़ान के समर्थन में दिखने लगा था.

नवाज़ शरीफ़ की रैली से उनके राजनीतिक भविष्य का संकेत मिलता है. अनुमान लगाया जा रहा था कि वे आने वाले दिनों में होने वाले चुनाव को देखते हुए अपनी पार्टी के रुख़ को स्पष्ट करेंगे.

अपने भाषण में उन्होंने स्पष्टता से कहा कि उनका बदले की राजनीति में कोई भरोसा नहीं है और वे देश को आर्थिक विकास की राह पर आगे बढ़ाना चाहते हैं.

पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक उनके नज़रिए की तारीफ़ कर रहे हैं, वहीं कुछ विश्लेषकों का मानना है कि उन्होंने अपने संबोधन से देश के सैन्य प्रतिष्ठान को कड़ा संदेश दे दिया है.

नवाज़ शरीफ़ का मानना रहा है कि सेना ने उन्हें सत्ता से हटाने में अहम भूमिका अदा की थी. वहीं कुछ आलोचकों का कहना है कि वे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का कोई रोडमैप पेश नहीं कर सके.

सबसे पहले बात नवाज़ शरीफ़ के संबोधन के ख़ास बिंदुओं की.

नवाज़ शरीफ़ लाहौर के ग्रेटर इक़बाल पार्क में अपने समर्थकों से मिले. कई सालों के बाद वे पहली बार अपने समर्थकों से मुख़ातिब थे. यहां पूरे पाकिस्तान से उनके समर्थक जुटे थे.

समर्थकों में नवाज़ शरीफ़ की झलक पाने का उत्साह साफ़ दिख रहा था, जब नवाज़ शरीफ़ स्टेज़ पर पहुंचे तो उनकी आंखों में भी आंसू दिखाई दिए.

नवाज़ शरीफ़ ने अपने समर्थकों के साथ प्यार और अटूट रिश्ते के बारे में बताते हुए कहा कि ''आप लोगों को देखने के बाद मैं अपना सब दुख और दर्द भूल चूका हूं. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि 2017 के बाद मिले कुछ ज़ख़्म कभी नहीं भर पाएंगे. उन्होंने ग़ालिब के शेर को याद करते हुए कहा, “ज़िंदगी अपनी कुछ इस शक्ल से गुजरी ग़ालिब, हम भी क्या करेंगे कि ख़ुदा रखते थे.”

लाहौर की सभा में जुटी समर्थकों की भीड़
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नवाज़ शरीफ़ के समर्थकों की भीड़ उनकी आवाज़ पर मंत्रमुग्ध दिखी. इसके बाद कांपती हुई आवाज़ में उन्होंने बताया कि निर्वासन में होने के चलते वे अपने पिता, माँ और पत्नी के पार्थिव शरीर को कब्र में उतार नहीं पाए.

उन्होंने बताया कि उनके राजनीति की क़ीमत उनके परिवार वालों को चुकानी पड़ी.

उन्होंने ये भी बताया कि जेल से उन्हें उनकी मर रही पत्नी से बात करने की अनुमति नहीं मिली और यह भी बताया है कि किस तरह से उनकी बेटी को उनके सामने हिरासत में लिया गया.

लेकिन उन्होंने अपने संबोधन में बार-बार यह दोहराया कि वे इन सबका कोई बदला नहीं चाहते हैं.

उन्होंने ना तो सेना और ना ही न्यायाधीशों के प्रति किसी कटु शब्द का इस्तेमाल किया, हालांकि उन्होंने माना कि सेना और न्यायाधीशों की साजिशों के वे शिकार हुए थे.

उन्होंने राजनीति में अपने चालीस साल के अनुभवों का जिक्र करते हुए कहा कि इसका सार यही है कि संवैधानिक दायरे में सभी हिस्सेदारों के एकजुट होकर काम करने पर ही कोई भी देश प्रगति कर सकता है.

उन्होंने कहा, “हमें एक नयी शुरुआत करनी होगी.”

हालांकि कुछ विश्लेषकों के मुताबिक उन्होंने ग़ालिब की शायरी के सहारे, सूक्ष्मता से संदेश दे दिया है कि भविष्य में उनके साथ साज़िशों से सैन्य प्रतिष्ठान परहेज़ करें. नवाज़ शरीफ़ ने ग़ालिब का ये शेर पढ़ा, “ग़ालिब हमें ना छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से, बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफां किए हुए.”

उन्होंने अपने संबोधन में धुर प्रतिद्वंद्वी इमरान ख़ान का नाम केवल एक बार लिया और कहा कि वे अपने प्रतिद्वंद्वियों का नाम लेकर उनके जैसी अशिष्टता नहीं दिखाना चाहते हैं.

अपने संबोधन के तीसरे हिस्से में उन्होंने पाकिस्तान के आर्थिक स्थिति में सुधार पर बात की.

उन्होंने अपने शासन के दिनों के विकास संबंधी योजनाओं का ज़िक्र किया और उस दौर में खाद्यान्न और पेट्रोल की क़ीमतों की तुलना आज की क़ीमतों से की और कहा कि वे अपने देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं.

भारत का ज़िक्र किए बिना नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि पाकिस्तान को अपने पड़ोसियों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध रखने चाहिए और कश्मीर के मुद्दे पर बुद्धिमता से आगे बढ़ना चाहिए. उन्होंने फ़लीस्तीन के लोगों के प्रति भी समर्थन ज़ाहिर किया.

नवाज़ शरीफ़ के संबोधन को किस तरह से देखा जा रहा है?

वापसी के बाद पाकिस्तान की सुर्खियों में नवाज़ शरीफ़
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राजनीतिक विश्लेषक नवाज़ शरीफ़ के संबोधन को संतुलित और पॉज़िटिव बता रहे हैं.

पाकिस्तान के शीर्ष न्यूज़ एंकर शाहज़ेब खानज़ादा ने नवाज़ की रैली पर कहा, “अच्छा शो रहा, नवाज़ शरीफ़ ने अपनी तकलीफ़ों का जिक्र करके अपने समर्थकों को भावुकता के साथ जोड़ लिया.”

उन्होंने अपनी पिछली योजनाओं का जिक्र किया और पाकिस्तान की मौजूदा समस्याओं की नब्ज़ भी पकड़ी लेकिन अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का कोई रोडमैप वे पेश नहीं कर सके.

शाहज़ेब के मुताबिक़ ऐसे लोग हैं जो नवाज़ शरीफ़ के साथ सहानुभूति रखते हैं. लेकिन इन लोगों को ये भी लगता है कि आज इमरान ख़ान के साथ भी यही सब हो रहा है, जो ठीक नहीं है.

दो ग़लतियां मिलकर एक ठीक बात नहीं हो सकती. इसलिए अगर नवाज़ शरीफ़ की पार्टी सत्ता में लौटती है तो इमरान ख़ान के साथ उनके व्यवहार पर सवाल उठाए जाएंगे.

वहीं पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हामिद मीर के मुताबिक़ यह रैली पाकिस्तान मुस्लीम लीग-नवाज़ गुट की लोकप्रियता और ताक़त के हिसाब से बहुत ही प्रभावशाली साबित हुई है. लेकिन यह पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ की बड़ी रैलियों की तुलना में बड़ी नहीं थीं.

हालांकि हामिद मीर का मानना है कि पाकिस्तान आकर उन्होंने उन लोगों को ग़लत साबित किया है जो ये दावा कर रहे थे कि नवाज़ लौट कर नहीं आएंगे या फिर राजनीतिक तौर पर वे अप्रसांगिक हो चुके हैं.

हामिद मीर कहते हैं, “नवाज़ शरीफ़ ने ग़ालिब के शेर के ज़रिए कई महत्वपूर्ण सवालों की तरफ़ इशारा किया. उदाहरण के लिए, उन्होंने अपने समर्थकों से कहा आप लोग जानते हैं कि धरना प्रदर्शन के पीछे कौन थे, आप सब लोग जानते हैं कि नवाज़ शरीफ़ को उनके समर्थकों से किसने अलग किया.”

हामिद मीर ये भी मानते हैं कि उन्होंने राजनीति में सेना की भूमिका पर भी सवाल उठाए. हामिद कहते हैं, “अंत में, नवाज़ शरीफ़ ग़ालिब के बहाने ये भी कह दिया कि अगर अब नवाज़ शरीफ़ को निशाना बनाया गया तो लोगों का सैलाब निकलेगा.”

राजनीतिक विश्लेषक हफ़ीज़ उल्लाह नियाज़ी के मुताबिक नवाज़ शरीफ़ ने अपने विपक्षियों को भला बुरा कहने की संस्कृति को ख़ारिज़ कर दिया है.

नियाज़ी इमरान ख़ान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी की संस्कृति की ओर संकेत करते हैं.

नियाज़ी के मुताबिक़ नवाज़ शरीफ़ किसी से कोई टकराव मोल लेना नहीं चाहते हैं लेकिन साजिश करने वाले शक्तिशाली तबकों को उन्होंने भविष्य के लिए चेतावनी ज़रूर दे दी है.

हालांकि पाकिस्तान के तहरीक-ए-इंसाफ़ के नेता ओवैस अहमद के मुताबिक़ नवाज़ शरीफ़ की रैली बहुत ख़ास नहीं थी.

अहमद के मुताबिक़ पार्टी ने जितना पैसा और संसाधन रैली पर ख़र्च किया, उस हिसाब से भीड़ नहीं जुटी थी. अहमद ने नवाज़ शरीफ़ की रैली की तुलना इमरान ख़ान की पार्टी की रैलियों से भी की.

उन्होंने कहा, “ज़्यादातर लोग दूसरे शहरों से जुटाए गए थे. नवाज़ शरीफ़ पाकिस्तान की मौजूदा समस्याओं का कोई हल देने में भी नाकाम रहे. उन्होंने अपनी पार्टी और अपने भाई की 16 महीने पुरानी सरकार से दूरी बनाए रखी.

वो लोगों को ये बताने में नाकाम रहे कि उनके भाई की सरकार महंगाई और पाकिस्तानी रुपये की क़ीमत को स्थिर क्यों नहीं रख पा रही है?”

क्या कह रहे हैं राजनीतिक विरोधी?

लाहौर की सभा की एक तस्वीर
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पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ के मुख्य प्रतिद्वंद्वी, इमरान ख़ान के पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़, रैली को कमतर बताने के लिए सोशल मीडिया कैंपेन चला रही है.

सोशल मीडिया पर कई क्लिप और रैली की आलोचना करने वाले साउंड बाइट पोस्ट किए गए हैं.

बाद में इमरान ख़ान की एक पुरानी क्लिप को उनके एक्स हैंडल पर फिर से पोस्ट किया गया. इस पोस्ट में कहा गया कि इमरान ख़ान ने देश को "लंदन योजना" के बारे में चेतावनी दी थी.

पोस्ट में लिखा गया है, "अब तक फ़रार चल रहे नवाज़ शरीफ़ की वापसी के साथ, लंदन योजना स्पष्टता से दिख रही है."

पोस्ट में ये भी लिखा है, "देश की सरकार सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल एक दोषी को सुविधा देने के लिए कर रही है, लेकिन इससे जनता की राय को प्रभावित नहीं किया जा सकता है. आम जनता तत्काल, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव से कम कुछ नहीं चाहती है."

पाकिस्तान पीपल्स पार्टी जैसे अन्य राजनीतिक दलों ने नवाज़ शरीफ़ की वापसी का स्वागत किया है लेकिन उन्होंने कुछ आपत्तियां भी जताई हैं.

नवाज़ शरीफ़ की वापसी से ठीक एक दिन पहले पीपीपी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने कहा कि पाकिस्तान का संविधान, लोकतंत्र और चुनाव, "एक व्यक्ति की वापसी के लिए" रोक दिए गए थे.

कराची में एक सभा को संबोधित करते हुए, बिलावल ने नवाज़ का नाम लिए बिना कहा, "पिछली सरकार के 16 महीने के कार्यकाल ने दिखाया है कि देश को लंदन से नहीं चलाया जा सकता है और हर किसी के लिए लोगों के बीच शारीरिक रूप से उपस्थित होना और उनके प्रति जवाबदेह होना अनिवार्य है."

पाकिस्तान पीपल्स पार्टी का मानना है कि नवाज़ शरीफ़ के साथ अन्याय हुआ है और उन्हें निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया का लाभ मिलना चाहिए, लेकिन वह आगामी चुनावों में एक समान अवसर नहीं मिलने की भी शिकायत कर रही है.

बिलावल भुट्टो सहित कई पीपीपी नेताओं ने कहा है कि नवाज़ शरीफ़ सैन्य प्रतिष्ठान से समझौते और आश्वासन के साथ देश लौटे हैं और यह हमारे जैसे राजनीतिक दलों को स्वीकार नहीं है.

मौलाना फ़ज़ल-उर-रहमान की जेयूआई-एफ़ ने नवाज़ शरीफ़ की वापसी का स्वागत किया है. जेयूआई-एफ़ के मीडिया सेल की ओर से जारी एक बयान में देश को वित्तीय संकट से बाहर निकालने के लिए राजनीतिक दलों के बीच एकता पर ज़ोर दिया गया है और कहा गया कि आपसी मतभेद देश में लोकतंत्र के लिए हानिकारक हैं.

समर्थकों में दिखा भारी उत्साह

नवाज़ को सुनने हज़ारों की तादाद में पहुंचे समर्थक
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नवाज़ शरीफ़ की वापसी ने उनके समर्थकों को उत्साह से भर दिया है. पाकिस्तान के सभी हिस्सों से नवाज़ समर्थक अपने नेता का स्वागत करने के लिए ट्रेनों, बसों और कारों में लदकर आए थे.

नवाज़ शरीफ़ की एक झलक देखने के लिए सिंध के अमरकोट से आए हिंदू समर्थकों के एक समूह ने बीबीसी को बताया कि प्रिय नेता का आगमन दिवाली के शुभ अवसर के साथ ही हो रहा है.

इन्होंने कहा, "हमारे लिए यह दिवाली से पहले की दिवाली है. नवाज़ शरीफ़ हमारे और देश के लिए समृद्धि और रोशनी लाएंगे."

लाहौर के एक समर्थक मुहम्मद इशाक़ ने कहा कि नवाज़ शरीफ़ की वापसी पाकिस्तान के लिए विकास और प्रगति के रास्ते खोलेगा.

उन्होंने कहा, "जब भारत ने परमाणु हथियारों का परीक्षण किया, तो नवाज़ शरीफ़ ने अगले दिन परमाणु बम का परीक्षण करके जवाब दिया. भारत अब चांद पर पहुंच गया है अगर नवाज़ शरीफ़ आसपास होते तो पाकिस्तान भी ऐसा ही करता."

कोहाट के मुहम्मद निसार ने उम्मीद जताई कि नवाज़ शरीफ़ देश में महंगाई पर अंकुश लगाएंगे.

राजनीतिक विश्लेषक हफ़ीज़ुल्ला नियाज़ी ने कहा कि रैली के दौरान नवाज़ शरीफ़ के भाषण और उनके हाव-भाव ने पीएमएल-एन के भीतर अंदरूनी कलह के बारे में फुसफुसाहट को भी शांत कर दिया है, ख़ासकर उनकी बेटी मरियम नवाज़ और शाहबाज़ शरीफ़ के बेटे हमज़ा शाहबाज़ के बीच नेतृत्व के उत्तराधिकार को लेकर चल रहे कथित मनमुटाव को ख़त्म कर दिया है.

नियाज़ी कहते हैं, "नवाज़ शरीफ़ ने पूरी रैली में अपने भाई और भतीजे को सबसे आगे रखकर इसे नाजुक ढंग से संभाला. इसने एकता का संदेश दिया है; यह पार्टी को भीतर से मजबूत करेगा और आगामी चुनावों में इसकी संभावनाओं को बेहतर करेगा."

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