पाकिस्तान में बिना हिंसा के चुनाव करवाना कितना मुश्किल?

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- Author, फ़रहत जावेद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पैंतीस साल की शाह मीना अपना परंपरागत पख़्तून बुर्क़ा ओढ़े परेशानी में डूबी हुई अस्पताल के एक वॉर्ड से दूसरे वॉर्ड के बीच भाग रही थीं.
अस्पताल में उनके साथ उनकी माँ भी मौजूद थीं जो थोड़ी-थोड़ी देर में तेज़ आवाज़ के साथ बिलखने लगती थीं.
ऐसे में शाह मीना पहले अपनी मां को तसल्ली देतीं और जब उनकी मां चुप हो जातीं तो परेशान होकर वह दोबारा वार्ड में पड़े घायलों को पहचानने के काम में लग जातीं.
पाकिस्तान के क़बायली ज़िले बाजौड़ में कुछ घंटे पहले ही एक बड़ा आत्मघाती हमला हुआ था और शाह मीना परेशान थीं कि उनके दस साल के बेटे अबूज़र का कुछ पता नहीं चल रहा था.
इस घटना के एक हफ़्ते बाद बाजौड़ में अपने छोटे से घर के आंगन में बैठी शाह मीना ने कहा, "वह क़यामत का दिन था."
उनका बेटा अबूज़र पास के एक मदरसे और वहीं से उस जगह पर गया था जहां जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम (फ़ज़लुर्रहमान) का समारोह चल रहा था.
अबूज़र के पिता बताते हैं कि वह सभा स्थल के बाहर चिप्स बेचने गया था.
"मेरी छह बेटियां हैं और केवल एक बेटा था. हम सबका लाडला. अल्लाह… वह दिन क़यामत था", यह कहते हुए शाह मीना के हाथ कांप रहे थे.
वह बताती हैं कि धमाके की ख़बर मिलने के कुछ देर बाद वह अपनी मां के साथ अस्पताल गईं और इस दौरान उनके पति और भाई भी वहां पहुंच गए.
वह बताती हैं, "मुझे उस वक़्त कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. मुझे होश नहीं था. मेरे हाथ-पांव कांप रहे थे. मैं रोना चाहती थी मगर मैं रो नहीं सकती थी. अस्पताल में लोग पूछ रहे थे, किसको ढूंढ रही हो? फिर मेरे शौहर ने कहा- जो भी होगा, ख़ुदा की तरफ़ से होगा."
उनके पति ने कुछ देर बाद अपने बेटे की लाश पहचान ली. मगर पहचानने का यह काम शाह मीना के लिए एक और इम्तिहान था.
वह बताती हैं कि उनके बेटे की पहचान कमर में पहने कमरबंद से हुई थी जो उन्होंने ही अपने बेटे के लिए बनाया था.
वह कहती हैं, "मेरे शौहर ने अपनी जेब से कमरबंद निकाला. मैंने उसे पहचान लिया. मेरी आवाज़ बंद हो गई थी, मैं चीख़ नहीं सकी. मैंने अपनी मां को बुलाया और कहा, आ जाओ, अबूज़र मिल गया है. मेरे शौहर ने कहा, हमारा बेटा शहीद हो गया है."
इस्लामिक स्टेट का हमला

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उस दिन बाजौड़ के मुख्यालय ख़ार के उस सरकारी अस्पताल में केवल शाह मीना ही इस परेशानी से दो चार नहीं थीं, दर्जनों मय्यत की पहचान के लिए सैकड़ों लोग अस्पताल में जमा थे.
जमीयत की सभा पर होने वाले इस हमले में साठ से अधिक लोग मारे गए थे जबकि घायलों की संख्या डेढ़ सौ तक थी.
अधिकारियों ने इसे एक आत्मघाती हमला बताया और इसकी ज़िम्मेदारी चरमपंथी संगठन दाएश के दक्षिण एशियाई चैप्टर आईएसकेपी (आईएस ख़ुरासान) ने ली थी.
यह इस साल होने वाले बड़े चरमपंथी हमलों में से एक था और आम चुनाव से पहले किसी भी राजनीतिक दल (जेयूआईएफ़) पर होने वाला पहला हमला था.
अब केंद्र, ख़ैबर पख़्तूनख़्वा और पंजाब में कार्यवाहक सरकार सत्ता में आ चुकी है और संविधान के अनुसार कार्यवाहक सरकारों की मूल ज़िम्मेदारी देश व राज्य में शांति व्यवस्था की स्थिति सही रखकर पारदर्शी चुनाव आयोजित करना है ताकि जनता और राजनीतिक दलों को चुनावी अभियान चलाने और वोट डालने में कोई दिक़्क़त न हो.
मगर पाकिस्तान में शांति व्यवस्था की स्थिति और हाल के दिनों में होने वाली चरमपंथी कार्रवाइयों के बाद सवाल यह उठ रहा है कि क्या शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव का आयोजन हो पाएगा?
हालांकि, पाकिस्तान में यह कोई नई बात नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो दशकों में हर चुनावी साल पिछले के मुक़ाबले अधिक हिंसक रहा है.
चुनावी सालों में बढ़ता अपराध

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पाकिस्तान में साल 2013 में हुए आम चुनाव को दुनिया भर के अख़बारों ने पाकिस्तान का "सर्वाधिक घातक चुनाव" घोषित किया था.
2013 में चुनाव से पहले दर्जनों धमाके और हमले हुए जिनमें सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवा दी.
इन धमाकों का परिणाम यह भी निकला कि ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में कुछ राजनीतिक दलों, जैसे कि आवामी नेशनल पार्टी को अपना चुनावी अभियान ही रोकना पड़ा, और इस तरह उन्हें चुनाव में नाकामी मिली जबकि आम लोगों में भारी डर फैल गया.
'साउथ एशिया टेररिज़्म पोर्टल' के आंकड़ों के अनुसार सन 2013 में पाकिस्तान में आतंकवाद की दो हज़ार से अधिक छोटी बड़ी घटनाएं हुईं जिनमें पांच हज़ार से अधिक लोग मारे गए, जिनमें से अधिकतर चुनावी सभाओं में शामिल आम लोग और सुरक्षा बल के अधिकारी थे.
साल 2018 का चुनावी साल 2013 की तुलना में बेहतर रहा मगर टारगेट किलिंग और आत्मघाती धमाकों का सिलसिला इस साल भी जारी रहा.

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साल 2018 में देखा गया कि राजनीतिक दलों की सभाओं की बजाय उम्मीदवारों और नेताओं को निशाना बनाया गया.
साल 2018 में कुल मिलाकर देश भर में 164 बड़े हमले हुए जिनमें 600 से अधिक सुरक्षा बल के अधिकारी, आम नागरिक और दूसरे लोग मारे गए.
अब 2023 के अंत या 2024 की शुरुआत को चुनाव का सीज़न बताया जा रहा है और अगर आंकड़ों का ही जायज़ा लिया जाए तो यह साफ़ संकेत दे रहे हैं कि सरकार शांति व्यवस्था बनाए रखने में अगर नाकाम ना सही पर मुश्किलों का सामना ज़रूर कर रही है.
साल 2023 के पहले छह महीने में होने वाली चरमपंथी घटनाओं और इसमें मरने वालों की संख्या 2018 के पूरे साल में हुई ऐसी घटनाओं से अधिक है, इस साल के पहले छह महीनों में 230 से अधिक छोटे बड़े चरमपंथी हमले हुए जिनमें मरने वालों की कुल संख्या 500 से अधिक है.
अतीत और बदलते हालात

विशेषज्ञों का मानना है कि जमीयत-ए-उलेमा-ए-इस्लाम (फ़ज़लुर्रहमान) जैसे धार्मिक राजनीतिक दल को निशाना बनाना इन घटनाओं को एक नया मोड़ दे रहा है.
एएनपी यानी अवामी नेशनल पार्टी के वरिष्ठ नेता मियां इफ़्तिख़ार इस बात से सहमति जताते हैं.
अवामी नेशनल पार्टी पर 2008 और 2013 में किसी भी दूसरे राजनीतिक दलों की तुलना में सबसे अधिक हमले हुए थे, यहां तक कि इस दल को चुनाव से ठीक पहले अपनी गतिविधियां रोकनी पड़ी थीं.
मियां इफ़्तिख़ार याद करते हुए कहते हैं, "हमारा वर्कर पार्टी का झंडा नहीं लगा सकता था. अगर एएनपी का झंडा लहराने की कोशिश की जाती तो जान से मारने की धमकियां मिलतीं."
मियां इफ़्तिख़ार ने ख़ैबर पख़्तूनख़्वा की राजधानी पेशावर में बाचा (बादशाह) ख़ान मर्कज़ के नाम से मशहूर एएनपी के मुख्य कार्यालय में हमें अपने चुनावी अभियान का हाल सुनाया.
वह कहते हैं, "साल 2013 में भी मेरा यही दफ़्तर था. उस समय जब दूसरे दलों के नेता और उम्मीदवार बाहर निकल कर अपनी ज़ोरदार चुनावी मुहिम चला रहे थे तो मैं यहां दफ़्तर में बैठने पर मजबूर था. हालात इस हद तक ख़राब हो चुके थे कि हम बाहर नहीं निकल सकते थे."
"मुझे बताया जाता कि आप को ख़तरा है. जान का ख़तरा है. कभी कहा जाता कि एक आत्मघाती महिला आपको निशाना बनाएगी, कभी बताया जाता कि एक बच्चा शरीर के साथ बम बांधकर आपको मारने आएगा. मैं पूछता था कि अगर उन्हें यानी सिक्योरिटी एजेंसियों को यह पता था कि हमें मारने कौन आएगा या कौन साज़िश कर रहा है तो हमें बताने की बजाय उन्हें पकड़ा क्यों नहीं जाता था?"
मियां इफ़्तिख़ार अपने दल के उन नेताओं में से एक हैं जिनकी राजनीति और उनके राजनीतिक दृष्टिकोण के कारण उनके घर वालों को भी चरमपंथी समूहों की ओर से निशाना बनाया गया.

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उसी दफ़्तर की एक दीवार पर उनके युवा बेटे मियां राशिद हुसैन का स्केच एक सादे से फ़्रेम में लगा हुआ है.
उन्होंने वह तस्वीर दीवार से उतारी और हमें दिखाते हुए बताया कि उनके बेटे की उनके घर के बाहर गोलियां मारकर हत्या कर दी गई थी.
उनके हत्यारे को बाद में पुलिस ने गिरफ़्तार किया और यह पुष्टि की कि इस हमले में तहरीक़-ए-तालिबान पाकिस्तान शामिल था, जिन्होंने इसकी ज़िम्मेदारी भी ली थी.
वह कहते हैं, "मेरा बेटा अपने कज़न के साथ था. आतंकवादी आए और पूछा कि तुम ही मियां इफ़्तिख़ार के बेटे हो? मेरे बेटे ने जवाब दिया, हां, मैं हूं. फिर उन्होंने चार गोलियां सीने में और चार सिर में मार दीं. मैं उस समय राज्य का सूचना मंत्री था. एक मंत्री के बेटे पर हमला यह संदेश था कि कोई भी सुरक्षित नहीं है. तीसरे दिन मेरे घर के बाहर आत्मघाती धमाका किया गया."
"समझ में नहीं आता कि यह लड़ाई कब तक चलेगी. क्या इस देश से आतंकवाद ख़त्म नहीं हो सकता? सवाल यह है कि इस क्षेत्र में यह आतंकवाद अफ़ग़ान सीमा पर मौजूद देशों में से केवल पाकिस्तान में ही क्यों? भारत, ईरान या चीन में क्यों नहीं है? हमें अपनी नीतियों पर विचार करना होगा. हमारी आंतरिक और बाहरी नीति केवल राष्ट्रहित में होनी चाहिए, किसी के व्यक्तिगत स्वार्थ में नहीं."
मियां इफ़्तिख़ार कहते हैं कि इस समय पूरे ख़ैबर पख़्तूनख़्वा राज्य में आतंकवाद का ख़तरा मौजूद है.
"यह ख़तरनाक बात है. आतंकवादियों के भी समूह हैं. कोई (सत्ता के लिए) अच्छा है, कोई बुरा. मगर आतंकवादी समूह में कोई अंतर नहीं करना चाहिए. आतंकवादी तो आतंकवादी है, चाहे वह किसी भी रूप में हो. अब अगर इस क्षेत्र पर नियंत्रण पा लिया गया तो चुनाव में शांति होगी, वरना इस बार हालात इस हद तक ख़राब हो जाएंगे कि अतीत के चुनावी सालों की चरमपंथी गतिविधि बहुत कम लगेगी."
कितने मजबूत हैं आतंकी संगठन

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पेशावर के ही क़िस्साख़्वानी बाज़ार में चहलक़दमी करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक महमूद जान बाबर मियां इफ़्तिख़ार से सहमत नहीं हैं.
वह समझते हैं कि इस बार चुनाव में आतंकवादी संगठन "न तो पहले की तरह संगठित हैं और न ही उनमें इतनी ताक़त है कि वह बड़े शहरों और बड़े राजनीतिक दलों को निशाना बना सकें."
हालांकि यह दावा करते हुए उन्होंने हमें इस बाज़ार में भारत के मशहूर फ़िल्मी ख़ानदान कपूर परिवार की पैतृक हवेली के पास एक स्कूल की ओर इशारा करते हुए बताया कि यह वह जगह है जहां 2013 में चुनावी बैठक पूरी करके उस समय के वरिष्ठ नेता बशीर बिलौर बाहर निकले थे. गली के एक कोने पर उनके इंतज़ार में खड़े एक आत्मघाती बमबार ने उन पर हमला किया और उनकी मौत हो गई.
बिलौर परिवार के कई राजनेता ऐसे ही हमलों की भेंट चढ़ गए हैं और इसकी वजह उनका उन फ़ौजी ऑपरेशनों का समर्थन करना है जो पाकिस्तानी फ़ौज ने तालिबान के ख़िलाफ़ ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के विभिन्न क्षेत्रों में चलाए हैं.
महमूद जान बाबर बताते हैं, "अतीत के दो तीन चुनावों में उन लोगों को इसलिए निशाना बनाया जाता था कि वे असेंबलियों में न पहुंच सकें. जब भी ऐसे हमले होते हैं, राजनीतिक दल नुक़सान उठाता है. लोग डर जाते हैं, भय फैल जाता है. जनसभाओं में आना बंद कर देते हैं."
"राजनीतिक उम्मीदवार अपनी मुहिम नहीं चला सकते, लोगों से मिल नहीं सकते और इस तरह उनका संदेश जनता तक नहीं पहुंच पाता. उनका वोटर भी डर जाता है कि इस दल के पक्ष में वोट दिया या उनकी मुहिम का हिस्सा बने तो वह आतंकवादी गतिविधियों का निशाना बन सकते हैं."

यही डर और भय बाजौड़ के क्षेत्र ख़ार में स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है.
जुनैद की उम्र 17 साल है और वह उस दिन अपने भाई के साथ उस सभास्थल में मौजूद थे जहां जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम के कार्यकर्ताओं को दाएश के आत्मघाती बमबार ने निशाना बनाया.
उनके भाई ज़ियाउल्लाह ख़ान जमीयत के स्थानीय अमीर (अध्यक्ष) थे और कई महीनों से उन्हें धमकियां मिल रही थीं.
जुनैद ने बताया, "उन्हें यह तो बताया जाता था कि तुम्हें निशाना बनाया जा सकता है मगर सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई गई. हमने पेशावर में घर लिया कि भाई वहीं रहें और बाजौड़ न आएं क्योंकि उनकी जान को ख़तरा था. मगर वह तो राजनीति करते थे, लोगों की सेवा करते थे, इसलिए वह बाजौड़ आते थे."
यह बताते हुए जुनैद की आंखें भर आईं. और वह अपने भाई की क़ब्र पर रोने लगते हैं.
उस क़ब्रिस्तान में उनके भाई के अलावा उसी धमाके में मरने वाले चार और लोग भी दफ़न थे.
उनकी क़ब्रों की मिट्टी ताज़ा थी जिस पर प्लास्टिक की शीट डाली गई थी ताकि बारिश और जंगली जानवरों को दूर रखा जा सके.
जुनैद कहते हैं, "मेरे भाई की सांस मेरी गोद में निकली. मैं उन्हें नहीं बचा सका."
जुनैद ख़ान उस हमले के दौरान स्टेज के पास थे मगर वह बाल बाल बच गए.
उन्होंने सवाल किया, "मैं अपने नेताओं से भी दरख़्वास्त करता हूं कि वह पूछें कि ये लोग क्यों शहीद हो रहे हैं. और पार्टियों के लोग तो नहीं मारे जा रहे हैं! हमें बताएं कि हमारा क्या क़सूर है? हमें बताएं ताकि हम वह ग़लती न करें."
दूसरी ओर हसरत भरी निगाहों से शाह मीना भी इस बात के जवाब का इंतज़ार कर रही हैं कि यह धमाके यहां क्यों होते हैं?
वह कहती हैं, "मेरे बेटे का क्या क़सूर था? वह तो दस बारह साल का छोटा सा बच्चा था जिसने कभी किसी को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाया था."
बीबीसी से बात करते हुए विश्लेषक आमिर ज़िया कहते हैं कि अगले आम चुनाव के दौरान अशांति फैलाने वाली चरमपंथी गतिविधियों का ख़तरा मौजूद है और इस तरह के ख़तरे चुनाव के साल में आमतौर पर होते हैं क्योंकि चरमपंथियों के लिए टारगेट करना आसान होता है.
वह कहते हैं, "मेरे ख़्याल में स्थिति ख़राब हो सकती है मगर शायद इस बार सुरक्षा की समस्या वैसी न हो जैसी 2008 और 2013 में हुई थी. वह सबसे ख़राब हालात थे. इस समय सत्ता की पकड़ सभी क्षेत्रों पर है मगर 2008 और 2013 में यह स्थिति नहीं थी. हां, यह ज़रूर संभव है कि सीमा पार से चरमपंथी आएं, हमले करें और दोबारा फ़रार हो जाएं, जैसा कि हाल की घटनाओं में देखा गया है."
उन्होंने कहा कि सुरक्षा एजेंसियां "बीसियों हमले नाकाम बना भी लें तब भी एक हमला कामयाब हो ही जाता है. लेकिन इस समय पाकिस्तान में कोई 'नो गो एरिया' नहीं हैं इसलिए सिक्योरिटी एजेंसियां और सरकार बेहतर रणनीति से इस स्थिति पर नियंत्रण पा सकती हैं."
उन्होंने कहा कि देश में आम चुनाव से पहले पाकिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान में सत्ताधारी तालिबान सरकार के साथ कठोर रुख़ अपनाने से बचना चाहिए था और एक समाधान की बात करनी चाहिए.
उन्होंने कहा कि अफ़ग़ान तालिबान के लिए भी स्थिति मुश्किल है. "एक ओर टीटीपी (तहरीक-तालिबान पाकिस्तान) है जिसने उनके साथ मिलकर अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग लड़ी है, और दूसरा उन्हें यह डर भी है कि अगर वह अपनी धरती पर टीटीपी के विरुद्ध एक्शन लेंगे तो हो सकता है कि प्रतिक्रिया में पाकिस्तानी तालिबान दाएश के साथ जा बैठे जो इस समय अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार के ख़िलाफ़ सक्रिय है."
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