इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी और पाकिस्तान का अंतहीन सियासी थ्रिलर

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- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद
पिछले कई महीनों से पाकिस्तान की सियासत, दिल की धड़कनें रोक देने वाली थ्रिलर फिल्म की तरह चल रही है.
कहां तो ये उम्मीद थी कि जब मौजूदा हुकूमत का कार्यकाल ख़त्म होगा, तो शायद ये मुसीबत भी दूर हो जाएगी.
नए चुनाव, नई संसद और विधानसभाओं के साथ साथ मुल्क में नई सरकार बनेगी, तो वो एक नयी शुरुआत करेगी, और पाकिस्तान को उसके मौजूदा राजनीतिक दलदल और आर्थिक उथल-पुथल से बाहर निकालेगी.
लेकिन, अब जबकि शहबाज़ शरीफ़ की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है, तो ऐसा लगता है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र का एक और इम्तिहान शुरू होने जा रहा है.
महीनों की अटकलबाज़ी और सियासी दांव-पेंचों के बाद, अब एक बात तो बिल्कुल साफ़ है कि पाकिस्तान में इस साल आम चुनाव नहीं होने जा रहे हैं. पाकिस्तान के संविधान में ये शर्त है कि संसद (नेशनल असेंबली) और राज्य की विधानसभाओं के विघटन के 90 दिनों के भीतर चुनाव करा लिए जाने चाहिए.

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चुनाव टालने का क़ानूनी रास्ता
ऐसे में उम्मीद तो ये लगाई जा रही थी कि पाकिस्तान में नवंबर में आम चुनाव होंगे. लेकिन, नेशनल असेंबली भंग होने से पहले ही चुनाव में देर होने की अफ़वाहें गर्म हो चुकी थीं.
और, आख़िर में शहबाज़ शरीफ़ की अगुवाई वाली मौजूदा सरकार ने अपना कार्यकाल ख़त्म होने के ठीक एक हफ़्ते पहले, चुनावों को कुछ हफ़्तों के लिए और टाल देने का क़ानूनी रास्ता तलाश कर लिया है.
पाकिस्तान के सीनियर एंकर आदिल शाहज़ेब ने चुनाव को लेकर अविश्वास और अटकलबाज़ी के बारे में बीबीसी से कहा कि सत्ता के गलियारों में अफ़वाहों का बाज़ार तो लंबे समय से गर्म है.
शाहज़ेब ने कहा कि, "यहां तक कि कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्री हम पत्रकारों और एंकर्स से पूछ रहे हैं कि इंतिख़ाब वक़्त पर होंगे या नहीं. ये तो दीवार पर लिखी हुई इबारत सरीखा था कि आम चुनाव अपने तय समय पर नहीं होंगे."
"किसी को भी इस बात का भरोसा नहीं था कि चुनाव, 90 दिनों की संवैधानिक सीमा के दायरे में कराए जाएंगे. हालांकि, अब इस बारे में तस्वीर थोड़ी साफ़ हो गई है. अब हमको पता है कि चुनावों को अगले पांच से छह महीनों के लिए आगे बढ़ा दिया गया है."

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आदिल शाहज़ेब की ये भविष्यवाणी हाल ही में हुई कुछ घटनाओं पर आधारित है.
सत्ता से विदा लेने से कुछ दिनों पहले शहबाज़ शरीफ़ की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार ने हाल ही में कराई गई डिजिटल मर्दुमशुमारी (जनगणना) को मंज़ूरी दे दी है.
इसका मतलब ये है कि अब चुनाव कराने से पहले देश में आबादी के नए आंकड़ों के हिसाब से चुनाव क्षेत्रों का पुनर्गठन करना होगा.
और, नई मतदाता सूचियों को भी तैयार करना होगा. तो, एक तरह से सरकार ने नवंबर में होने वाले चुनावों को कुछ और हफ़्तों तक टाल सकने का क़ानूनी रास्ता निकाल लिया है.
लेकिन, अगर पाकिस्तान के चुनाव उससे भी ज़्यादा समय के लिए टाले जाते हैं, तो मुल्क की सियासत, उथल-पुथल भरे एक नए दौर में दाख़िल हो जाएगी. और, डर इस बात का है कि हालात राजनेताओं के हाथ से निकल भी सकते हैं.

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क्या अनिश्चितकाल के लिए टाला जा सकता है चुनाव?
अगर हम पाकिस्तान के उठा-पटक भरे इतिहास पर नज़र डालें, तो चुनावों को अनिश्चित वक़्त के लिए टालने की आशंका को पूरी तरह से ख़ारिज नहीं किया जा सकता है.
जब 1979 में फ़ौजी तानाशाह ज़िया उल हक़ और 1999 में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने चुनी हुई सरकारों का तख़्तापलट किया था, तब दोनों ही जनरलों ने वादा किया था कि वो जल्दी से जल्दी चुनाव कराएंगे और हुकूमत की बागडोर, जनता के चुने हुए नेताओं के हाथ में दे देंगे.
लेकिन, चुनाव कराने और सत्ता की कमान जल्दी से जल्दी आम लोगों के नुमाइंदों सौंपने का ये वादा, अधूरा ही रहा. दोनों ही फ़ौजी शासक लंबे समय तक ख़ुद सत्ता में बने रहे.
हालांकि, वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर की राय ये है कि इस बार चुनावों को फ़रवरी/मार्च 2024 से आगे नहीं टाला जा सकता.

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हामिद मीर कहते हैं, "इसकी एक तकनीकी वजह है. मार्च महीने में पाकिस्तान की संसद के उच्च सदन यानी सीनेट के आधे सदस्यों का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है. इनमें सीनेट के चेयरमैन और उपाध्यक्ष भी शामिल हैं. पाकिस्तान के मौजूदा राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी का कार्यकाल भी अगले महीने ख़त्म हो रहा है."
"चूंकि, सीनेट के सदस्यों का चुनाव नेशनल असेंबली के सदस्य और सूबों के विधायक मिलकर करते हैं. ऐसे में मार्च के बाद भी चुनाव को टालने अस्थिरता पैदा हो सकती है. इससे कार्यवाहक सरकार के लिए हुकूमत करना दुश्वार हो जाएगा. ये सभी नियुक्तियां उचित ढंग से चुनी हुई सरकार ही कर सकती है. ऐसे में चुनावों के फ़रवरी मार्च से आगे तक टलने की आशंका लगभग न के बराबर है."
जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान के मौजूदा हालात में इमरान विरोधी, पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) तो खुलकर चुनावों को टालने की अपनी ख़्वाहिश जता रही थी.
वहीं, पाकिस्तान की ताक़तवर फ़ौज भी इशारों में ऐसी राय जता रही थी. पीडीएम में शामिल दल तो इसलिए चुनाव टालना चाहते हैं, क्योंकि उनकी सरकार का आर्थिक रिकॉर्ड बेहद ख़राब रहा है.

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जनता के बीच इमरान ख़ान की लोकप्रियता
कमर तोड़ देने वाली महंगाई की वजह से जनता, पीडीएम और इसमें शामिल दलों से बेहद नाराज़ है. ऐसे में इनके नेताओं को लगता है कि चुनाव अगर तय वक़्त पर हुए, तो जनता अपना ग़ुस्सा उन पर निकालेगी.
इसका उनके चुनाव अभियान पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. और, वो अपनी बची-खुची सियासी ज़मीन भी गंवा बैठेंगे.
वहीं दूसरी तरफ़, पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अभी भी जनता के बीच लोकप्रिय बने हुए हैं. इसमें कमी ज़रूर आई है. मगर, अब क़ैद की सज़ा होना इमरान ख़ान के लिए हमदर्दी पैदा कर सकता है.
अगर, चुनाव तय वक़्त पर होते हैं, तो इमरान के प्रति ये हमदर्दी वोटों में तब्दील होकर उनकी पार्टी, तहरीक-ए-इंसाफ़ को दोबारा सत्ता में ला सकती है.
पाकिस्तान के सियासी जानकार ये मानते हैं कि इमरान की सत्ता में वापसी, न तो सत्ताधारी पीडीएम को क़ुबूल है, और न ही ताक़तवर फ़ौज को. हालांकि, एक ज़माने में फ़ौजी जनरल इमरान ख़ान के कट्टर समर्थक हुआ करते थे. लेकिन, अब फौज और इमरान ख़ान के रिश्ते बेहद ख़राब हो चुके हैं.

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नवाज़ शरीफ़ की वतन वापसी?
प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़, एक और वजह से भी चुनावों को टालना चाहती है. पार्टी चाहती है कि उसको अपने निर्वासित नेता नवाज़ शरीफ़ को मुल्क वापस लाने के लिए पर्याप्त मौक़ा मिल जाए.
नवाज़ शरीफ़ इस समय लंदन में रह रहे हैं. उन्हें अदालतों ने सज़ा सुनाई थी, जिसके बाद नवाज़ के सियासत करने पर उम्र भर के लिए पाबंदी लगा दी गई थी.
और, चूंकि मुस्लिम लीग-नवाज़ खुलकर मौजूदा चीफ जस्टिस उमर अता बंदियाल पर इमरान ख़ान का समर्थक होने का इलज़ाम लगाती है. इसलिए, पार्टी जस्टिस बंदियाल के रिटायर होने का इंतज़ार कर रही है.
उनका कार्यकाल भी सितंबर में ख़त्म हो रहा है. जिसके बाद, मुस्लिम लीग, नवाज़ शरीफ़ की वतन वापसी का क़ानूनी रास्ता खोलने की शुरुआत करेगी.
जनगणना को मंज़ूरी देकर, पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ ने संविधान के दायरे में रहते हुए थोड़ी रियायत और हासिल कर ली है. लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि क्या उसके गठबंधन में शामिल दूसरी पार्टियां भी, चुनावों को अनिश्चित वक़्त के लिए टाले के लिए राज़ी होंगी?

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आदिल शाहज़ेब कहते हैं कि पीडीएम में शामिल दूसरी पार्टियां इसके लिए तैयार नहीं होंगी.
वो कहते हैं, "मेरे हिसाब से चुनावों को फ़रवरी/मार्च से आगे नहीं टाला जा सकता है. क्योंकि, अगर ऐसा होता है, तो इससे फ़ौज और दूसरे सियासी दलों के रिश्तों में तनाव बढ़ जाएगा. पाकिस्तान की फौज, इमरान ख़ान और उनकी पार्टी के रूप में अपने एक दुश्मन को तो झेल सकती है."
"लेकिन, वो मुल्क के सभी सियासी भागीदारों के ख़िलाफ़ जंग का एलान नहीं कर सकते हैं. इसीलिए, अगर फ़ौज चुनावों को और टालती है, तो इससे वो इमरान ख़ान के सियासी विरोधियों की हमदर्दी गवां बैठेगी. सारे सियासतदानों को अपना दुश्मन बनाना फ़ौज के हित में नहीं है. और, उनको ये बात अच्छे से पता है."

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कार्यवाहक सरकार को और अधिकार
शहबाज़ शरीफ़ सरकार ने जाते जाते एक और ऐसा काम कर दिया, जिससे कार्यवाहक सरकार की व्यवस्था और फ़ौज की नीयत पर शक पैदा हो गया. क्योंकि, पाकिस्तान में माना यही जाता है कि पर्दे के पीछे से फ़ौज ही फ़ैसले लेती है. शहबाज़ सरकार ने एक नया क़ानून बनाकर कार्यवाहक सरकार को और अधिकार दे दिए हैं.
पाकिस्तान में जब सरकार और संसद को भंग किया जाता है, तो उनकी जगह एक कार्यवाहक सरकार लेती है. इस हुकूमत का सिर्फ़ एक काम होता है कि, वो समय पर आम चुनाव कराए.
इससे पहले कार्यवाहक सरकारों को दूसरे अधिकार नहीं थे. हालांकि, शहबाज़ सरकार ने क़ानून में बदलाव करके कार्यवाहक सरकार को अंतरराष्ट्रीय द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय समझौतों और व्यवस्थाओं के बारे में फ़ैसले लेने का अधिकार भी दे दिया है.
सरकार के इस क़दम की चौतरफ़ा आलोचना हुई. शहबाज़ सरकार के क़ानून मंत्री आज़म नज़ीर तारड़ ने इन हमलों को शांत करने की कोशिश की. उन्होंने संसद को बताया कि कार्यवाहक सरकार के अधिकार बदलने का फ़ैसला, राष्ट्र के हित को ध्यान में रखते हुए लिया गया है.

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उन्होंने कहा, "ये अधिकार उन वित्तीय समझौतों के बारे में हैं, जिनको मौजूदा हुकूमत ने पहले ही मंज़ूरी दे है. कार्यवाहक सरकार आती तो इन समझौतों को लागू करने के लिए उन्हें कुछ अहम क़दम उठाने पड़ते. हमने उन्हें ज़्यादा अधिकार इसीलिए दिए हैं, जिससे उस काम में कोई बाधा न आए."
वैसे तो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी, पीडीएम गठबंधन का हिस्सा है. और, उसने जनगणना और कार्यवाहक हुकूमत को और ताक़तवर बनाने के फ़ैसलों पर नवाज़ शरीफ़ की पार्टी का समर्थन भी किया. लेकिन, ऐसा लगता है कि इन फ़ैसलों को लेकर पीपुल्स पार्टी को भी शहबाज़ सरकार की नीयत पर शक है.
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की प्रवक्ता शेरी रहमान ने दो-टूक लफ़्ज़ों में कहा कि उनकी पार्टी, चुनाव कराने की संवैधानिक सीमा का उल्लंघन नहीं होने देगी.
शेरी रहमान ने स्पष्ट किया, "हमने बार-बार मांग की है कि आम चुनाव तय समय पर होने चाहिए, और हमारा ये मानना है कि मुल्क की बेहतरी और स्थिरता के लिए यही इकलौता रास्ता है. चेयरमैन बिलावल भुट्टो हों, या फिर आसिफ़ ज़रदारी, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेतृत्व ने हमेशा क़ानून और संविधान के दायरे में जल्दी से जल्दी चुनाव कराने की वकालत की है. हम चाहते हैं कि उस संवैधानिक लक्ष्मण रेखा का सम्मान बना रहे."
पीपुल्स पार्टी के एक और वरिष्ठ नेता ख़ुर्शीद शाह तो शेरी रहमान से एक क़दम और आगे चले गए.
उन्होंने कहा कि "अगर, चुनाव तय समय-सीमा के भीतर नहीं होते, तो पीपुल्स पार्टी कड़ा फ़ैसला लेगी. उनका मतलब यही था कि अगर पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़, चुनाव कराने में और देर करती है, तो पीपुल्स पार्टी इसका विरोध करेगी."

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पीडीएम हुकूमत की विरासत
सियासी टिप्पणीकार एज़ाज़ सैयद का मानना है कि अगर पिछले डेढ़ साल में पाकिस्तान के आर्थिक हालात बेहद ख़राब हो गए हैं, तो इसकी ज़िम्मेदारी मुस्लिम लीग-नवाज़ की है. क्योंकि, जब इमरान ख़ान सत्ता में थे, तो मुस्लिम लीग-नवाज़, उनकी आर्थिक नीतियों की सबसे कट्टर आलोचक रही थी. लेकिन, बात सिर्फ़ यही नहीं है. पीडीएम सरकार ने कई मोर्चों पर निराश किया है.
एज़ाज़ सैयद कहते हैं, "मेरी नज़र में शहबाज़ शरीफ़ सरकार का सबसे ख़राब प्रशासनिक फ़ैसला तो ये था कि उन्होंने सरकारी अधिकारियों की तैनाती को हरी झंडी दिखाने की ज़िम्मेदारी आईएसआई के हवाले कर दी."
वो कहते हैं, "सरकारी अधिकारियों के बैकग्राउंड की जांच करना, उनका वेरिफिकेशन करना और अहम पदों पर तैनाती और तबादले से पहले उनकी लिस्ट तैयार करना हुकूमत की एक अहम ज़िम्मेदारी है."
एज़ाज़ सैयद मानते हैं कि अपने ये अधिकार, मुल्क की सबसे बड़ी जासूसी एजेंसी को सौंपना अक़्लमंदी भरा फ़ैसला तो बिल्कुल नहीं था.

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एज़ाज़ सैयद कहते हैं, "आईएसआई के पास पहले से ही बहुत ताक़त है. उसके ऊपर राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी साज़िश के मामलों पर नज़र रखने का बोझ है. आईएसआई पर सियासत में भी दख़लंदाज़ी करने के इल्ज़ाम लगते रहे हैं."
"लेकिन, शहबाज़ शरीफ़ की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार ने अब सरकारी अधिकारियों की पड़ताल और उनकी तैनाती का ज़िम्मा भी आईएसआई को देकर, एजेंसी की ताक़त और भी बढ़ा दी है. इससे फ़ौज और सरकार के बीच सत्ता का असंतुलन और बढ़ जाएगा. अब अफ़सरशाही का झुकाव भी फ़ौजी तंत्र की तरफ़ हो जाएगा."
एज़ाज़ कहते हैं कि पीडीएम के पिछले सोलह महीनों के कार्यकाल के दौरान, न्यायपालिका के साथ भी उसके रिश्ते बेहद ख़राब हो गए हैं. मुल्क में इमरान ख़ान ने जो ध्रुवीकरण पैदा किया है, उसकी वजह से सीनियर जजों के ऊपर इल्ज़ाम लगे हैं कि वो इमरान ख़ान के प्रति हमदर्दी रखते हैं. इसके अलावा, सरकार के मंत्रियों ने जिस तरह खुलकर अदालतों पर हमला बोला है, जजों पर जो गंभीर इल्ज़ाम लगाए हैं, उनसे एक शर्मनाक मिसाल क़ायम हुई है.
हालांकि, शहबाज़ शरीफ़ सरकार को एज़ाज़ सैयद एक बात का श्रेय ज़रूर देते हैं. उनके मुताबिक़, शहबाज़ शरीफ़ ने पाकिस्तान को दिवालिया होने से बचा लिया.
एज़ाज़ ने कहा कि शहबाज़ शरीफ़ आसमान छूती महंगाई की मार से जूझ रहे अवाम को भले ही कोई राहत नहीं दे सके. लेकिन, पाकिस्तान को दिवालिया होने से बचाकर उन्होंने अर्थव्यवस्था को राहत की सांस लेने का मौक़ा ज़रूर दिया है.
इमरान ख़ान के लिए क़ानूनी लड़ाई
शहबाज़ शरीफ़ की सरकार सत्ता से हटती, उससे एक हफ़्ते पहले पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को तोशाखाना मामले में सज़ा हो गई, और उनको गिरफ़्तार कर लिया गया. इमरान पर ये जुर्म साबित हुआ कि उन्होंने सरकारी तोहफ़ों का सही हिसाब-किताब नहीं दिया था.
हालांकि, इमरान खान की पार्टी, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ये मानती है कि इमरान ख़ान को उनके सियासी दुश्मनों के इशारे पर सियासी मैदान से बेदख़ल किया गया है. वहीं, सियासी विरोधी कहते हैं कि इमरान ख़ान को तो अपने कर्मों की सज़ा मिली है.
साल 2018 में हुए पिछले आम चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ हिस्सा नहीं ले सके थे, और वो अपनी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ की अगुवाई नहीं कर सके थे. क्योंकि, उन्हें सज़ा देकर सियासत के अयोग्य क़रार दे दिया गया था. अब ऐसा लग रहा है कि पांच साल बाद इतिहास ख़ुद को दोहरा रहा है.
इमरान ख़ान के लिए आगे की क़ानूनी लड़ाई बेहद पेचीदा और लंबी है. उनके ऊपर लगभग दो सौ मुक़दमे दर्ज किए जा चुके हैं. और, अब एक मामले में सज़ा भी हो गई है.
बहुत से अन्य विश्लेषकों की तरह आदिल शाहज़ेब को भी लगता है कि इमरान ख़ान, अगले चुनावों की रेस से बाहर हो चुके हैं.
वो कहते हैं, "तोशाखाना के अलावा भी इमरान के ऊपर बहुत से मामले दर्ज हैं. चुनाव चाहे जब भी हों, मुझे नहीं लगता कि इमरान उनमें शामिल हों सकेंगे. सज़ा होने के बाद इमरान अपनी पार्टी की अगुवाई नहीं कर सकते. हो सकता है कि पार्टी का चुनाव चिह्न भी उनके हाथ से निकल जाए."
पाकिस्तान के मौजूदा हालात का निचोड़ निकालते हुए, जाने-माने विश्लेषक ज़ाहिद हुसैन ने अंग्रेज़ी अख़बार डॉन में अपने विश्लेषण में लिखा, "चूंकि हुकूमत पर सुरक्षा तंत्र और कुछ मुट्ठी भर कुलीन तबक़ा हावी है. ऐसे में पाकिस्तान के सियासी और आर्थिक स्थिरता हासिल कर पाने की कोई ख़ास उम्मीद नहीं है."
"आज सत्ता पर क़ाबिज़ होने के लिए जिस तरह के खेल खेले जा रहे हैं, उनको देखते हुए, ख़तरा इस बात का है कि चुनाव के बाद पाकिस्तान, अस्थिरता के और गहरे दलदल में धंस जाएगा."
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