इमरान ख़ान को लेकर पाकिस्तानी फ़ौज में क्या सोच है?

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- Author, फ़रहत जावेद
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, इस्लामाबाद
मंगलवार की शाम सामान्य दिनों की तरह ही थी. संवेदनशील इलाक़े में तैनात एक पाकिस्तानी अफ़सर की पत्नी कोमल डिनर की तैयारी कर रही थीं जबकि उनकी दो बेटियां टीवी देख रही थीं.
लेकिन पाकिस्तान में सबसे सुरक्षित समझे जाने वाला उनका सैन्य परिसर जल्द ही सबसे असुरक्षित बनने वाला था.
कोमल को आश्चर्य हुआ जब, उनके पति ने अचानक कॉल किया. उन्होंने दरवाज़ों को बंद रखने की नसीहत दी क्योंकि पूरे देश में फौजी ठिकानों पर पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के समर्थक हमले कर रहे थे.
लाहौर में लेफ़्टिनेंट जनरल का आवास पहले ही आग के हवाले किया जा चुका था.
अपना वास्तविक नाम ज़ाहिर किए बिना कोमल ने बताया, "जब वे खुलेआम एक जनरल के घर पर हमला बोल सकते हैं तो क्या अगला नंबर हमारा है? ये सोच कर मैं सिहर गई."
उन्होंने तुरंत अपने दरवाज़ों और खिड़कियों को बंद कर दिया और खाने को छिपा कर स्टोर रूम में रख दिए.
उन्होंने यहाँ तक सोच लिया कि अगर घर को आग लगाई गई तो वो कैसे निकलेंगी...क्या वो अपनी बेटियों के साथ दूसरे माले की खिड़की से नीचे कूद सकती थीं?
कोमल कहती हैं, "प्रदर्शन के वीडियो देखने के बाद मैंने कभी इतना असुरक्षित और ख़तरे से घिरा नहीं महसूस किया."
लेकिन उन्हें बहुत दुख हुआ क्योंकि वो ख़ान की कट्टर समर्थक थीं और अब उन्हें शर्मिंदगी महसूस हो रही थी.
वह कहती हैं, "बदलाव की उम्मीद में मैंने और बहुत सारे लोगों ने इमरान ख़ान का समर्थन किया था, लेकिन अब जिस शख़्स को मैंने हीरो माना था, उसी से मुझे विश्वासघात जैसा महसूस होता है."
"उनके ग़ैर ज़िम्मेदाराना और उकसाऊ भाषणों ने नफ़रत और हिंसा को भड़काया, जिसकी चपेट में पूरा देश आया."

जड़ें जमा चुकीं धारणाएं
प्रदर्शनों ने पाकिस्तान की सबसे ताक़तवर फ़ौज के सामने अभूतपूर्व चुनौती खड़ी कर दी थी. ये वही फौज है, जिसने कई दशकों तक देश पर राज किया और 1947 में आज़ादी मिलने के बाद तीन बार सैन्य तख़्तापलट किया था.
हालांकि आधिकारिक रूप से फ़ौजी शासन का अंत 2008 में हुआ, लेकिन बहुत से लोग मानते हैं कि राजनेताओं के पीछे फ़ौज अभी भी किंगमेकर बनी हुई है.
और ये भी माना जाता रहा है कि ख़ान को फ़ौज की कृपा हासिल थी.
यहाँ तक कि उनकी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) पार्टी के 2018 में सत्ता में आने से पहले ही ख़ान को "मिलीटरी के लाडले" के रूप में जाना जाता था.
उनके आलोचकों का कहना है कि फ़ौज की सोशल मीडिया टीम की ओर से उन्हें पाकिस्तान के रक्षक और वंशवादी राजनेताओं और भ्रष्ट सत्ताधारियों के ख़िलाफ़ खड़ा होने वाले इकलौते नेता के रूप में पेश किया गया.
ये नैरेटिव इतनी गहरी जड़ जमा चुका था कि ख़ान और शक्तिशाली फ़ौजी सत्ता के संबंध टूटने और पिछले साल सत्ता से उनकी विदाई के बाद भी फ़ौज में अधिकारी से लेकर सैनिक तक उनके समर्थक उनके पक्ष में खड़े रहे.
फ़ौज के मेडिकल अफ़सर गुल (बदला हुआ नाम) अराजनीतिक हैं लेकिन अब वो ख़ान के समर्थकों पर ग़ुस्से में हैं. हिंसा की रात वो ड्यूटी पर थीं और घर पर उनके मां-बाप और बच्चे थे.
वो कहती हैं, "उस समय लगा, काश मैं उनके साथ होती. मैंने सोचा क्या होगा अगर उन पर हमला हो या वे घायल हों या मारे जाएं. मैं बता नहीं सकती उस समय मेरे दिमाग़ में क्या चल रहा था. मैं पूरी रात सो नहीं पाई. ये बहुत सदमे वाला था, ख़ासकर एक माँ के लिए जो अपने बच्चों से दूर है."
लेकिन फ़ौज में बहुत सारे लोग फिर भी ख़ान के समर्थक बने हुए हैं क्योंकि सिविलियन के साथ साथ फ़ौज में भी बहुत सारे लोगों में वो सबसे लोकप्रिय राजनीतिक शख़्सियत बने हुए हैं.
नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर एक अफ़सर ने कहा, "अगर विकल्प दिया जाए तो मौजूदा राजनेताओं में मैं सिर्फ़ इमरान ख़ान को वोट करूंगा."
एक अन्य महिला अफ़सर भी पूर्व प्रधानमंत्री की मुरीद हैं.
वो कहती हैं, "लाहौर में जनरल के आवास पर जो कुछ हुआ, उसका मुझे वाक़ई अफ़सोस है, लेकिन हम नहीं जानते कि ये किसने किया, इमरान ख़ान का कहना है कि उनके पार्टी वर्करों ने हमले की शुरुआत नहीं की. लेकिन इससे इमरान ख़ान के प्रति मेरा नज़रिया नहीं बदला है. मैं उनका अब भी समर्थन करती हूं. मेरे लिए वो मार्गदर्शक और सच्चे नेता हैं."
एक सिक्यॉरिटी एजेंसी के वरिष्ठ अफ़सर ने बिना नाम ज़ाहिर किए कहा कि वो अपने कर्मचारियों से राजनीतिक सवाल करते रहते हैं जबकि उन कर्मचारियों का नज़रिया भी इंटरनेट और सोशल मीडिया से बना होता है और देश के चलने में फ़ौज के प्रभाव पर वे भी सवाल खड़ा करते हैं.
वो कहते हैं, "फ़ौज राजनीति में दखल नहीं देती है, इसका वे ठोस सबूत चाहते हैं. वे इसकी भूमिका के बारे में सवाल करते हैं और हमें उन्हें समझाने वाले अंदाज़ में उत्तर देने पड़ते हैं."
फ़ौज की छवि बनाने में बड़ी भूमिका निभाने वाले रिटायर्ड अफ़सर भी ख़ान के धुर समर्थक हैं. फ़ौज के पूर्व अफ़सर राजा शहरयार 15 साल पहले रिटायर हुए थे, उन्होंने 2018 में पहली बार किसी को वोट दिया था और वो थे इमरान ख़ान.
वो कहते हैं, "मेरा नज़रिया बदला नहीं है बल्कि पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने मुझे आक्रोशित ज़रूर किया है क्योंकि पीटीआई नेतृत्व सरकारी संस्थानों और संपत्तियों पर हमला करने से अपने समर्थकों को रोक नहीं पाया. उन्हें बाकियों से थोड़ा बेहतर बर्ताव करना चाहिए था."
हमलों के बाद फ़ौज ने बहुत तेज़ी से एकजुटता का परिचय दिया. पाकिस्तानी टीवी चैनल जियो न्यूज़ पर फ़ौज का एक प्रवक्ता आया और ऐलान किया कि फ़ौज और उसके मुखिया लोकतंत्र में भरोसा रखते हैं.
प्रवक्ता ने कहा, "देश के भीतर और बाहर मौजूद चरमपंथियों और दुश्मनों के प्रोपेगैंडा के बावजूद फ़ौज एकजुट है."

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फ़ौज के ख़िलाफ़ असंतोष
लेकिन देश इस मसले पर विभाजित है. शहरयार का कहना है कि उन्होंने "कभी इस स्तर का राजनीतिक ध्रुवीकरण और फ़ौज के ख़िलाफ असंतोष का इज़हार नहीं देखा था. "
हालांकि फौज के बहुत से परिवारों को लगता है कि उनके कैंटोनमेंट पर हमला कर हद पार की गई, जिसमें कई अधिकारी जख़्मी भी हुए. लेकिन पीटीआई समर्थकों को लगता है कि क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों ने भी ज़्यादती की.
नौ मई को प्रदर्शनों के दौरान 10 से अधिक प्रदर्शनकारी मारे गए.
तारिक़ नासिर को अपने भाई उमर को क्वेटा अस्पताल में खोजने में एक घंटा लगा. 26 साल के उमर मिलीटरी कैंटोनमेंट के बाहर प्रदर्शन करने गए थे और वहीं मारे गए.
नासिर पूछते हैं, "उस समय बहुत सारे आंसू गैस के गोले दागे गए. उमर आंसू गैस से प्रभावित लोगों को नमक और पानी दे रहे थे. उसके पास कोई हथियार नहीं था. वे केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे. लेकिन उन्होंने उसके सिर में गोली मारी. हथियारबंद न होने के बावजूद उसे क्यों गोली मारी गई?"
ख़ान और अन्य दूसरों की तरह ही नासिर ने दावा किया कि जिन लोगों ने पुलिस पर पत्थर फेंके या फ़ौजी ठिकानों को निशाना बनाया वे पीटीआई समर्थक नहीं थे. उन्होंने किसी साज़िश की आशंका जताई.
फ़ौज ने ऐलान किया है कि जो लोग हमले में शामिल रहे उनके ख़िलाफ़ फ़ौजी और आतंक निरोधी अदालतों में मुक़दमा चलेगा.
कुछ लोगों के वीडियो पुलिस प्रसारित कर रही है, जिसमें वे कबूल रहे हैं कि पीटीआई के नेताओं के कहने पर ये हमले किए गए. लेकिन बहुत से लोगों को इस पर भरोसा नहीं है और वे इसे दबाव में कबूल कराया समझते हैं.
इमरान ख़ान ने कहा है कि उनके समर्थकों ने फ़ौजी प्रतिष्ठानों पर हमले नहीं किए और इस मामले में जांच के लिए एक न्यायिक समिति बनानी चाहिए.
हालांकि उनकी पार्टी के दर्जनों नेताओं और सहयोगियों ने उनका साथ छोड़ दिया है, जिनमें से कुछ को गिरफ़्तार किया गया था. उन्होंने जनरल के आवास और अन्य सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमले की निंदा की.
नासिर कहते हैं, "एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हुए मेरा भाई मारा गया. जब उसकी मौत हुई, उसके गर्दन पर ख़ान की पार्टी का झंडा लिपटा था. वो उन्हीं के लिए जिया और उन्हीं के लिए मरा. वो एक बेहतर पाकिस्तान चाहता था और ख़ान ही उसकी उम्मीद थे. एक दिन उसका सपना सच होगा. और तभी हमें इंसाफ़ मिलेगा."
पाकिस्तानी फ़ौज पर राजनीति में दखल देने, सरकारें बनवाने और उन्हें हटाने का आरोप लगता रहा है. सत्ताधारी पार्टी पर भी विपक्ष को हिंसात्मक तरीक़े से दबाने का आरोप लगता रहा है.
क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों में भी फ़ौज और नेताओं को लेकर असंतोष बढ़ रहा है. इमरान ख़ान के समर्थकों और पुलिस के बीच की झड़प
एक पुलिस अफ़सर ने कहा, "उन्हीं की तरह मैं भी वर्दी पहनता हूं. मैं उन सभी को जानता हूं. वे सोचते हैं कि वे क़ानून से ऊपर हैं. केवल ख़ान ही उन्हें सीधा कर सकते हैं."
"और हम इन राजनेताओं से क्या उम्मीद करें? अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए हर महीने ठीक-ठाक सैलरी. क्या इतना चाहना भी बहुत ज़्यादा है. उन्होंने हमें निराश किया है. फ़ौज और नेता एक दूसरे से लड़ने में ही व्यस्त हैं और मुल्क का बेड़ा गर्क हो रहा है."
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