पाकिस्तान: फ़ौज और सियासतदानों के बीच जंग में जीत हमेशा सेना की ही क्यों?

इमरान ख़ान

इमेज स्रोत, ISPR

    • Author, अहमद एजाज़
    • पदनाम, पत्रकार

पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और सेना के बीच विवाद की शुरुआत तो उनके प्रधानमंत्री रहते ही हो गई थी लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की राय में इस 9 मई को होने वाली हिंसक घटनाओं के बाद निकट भविष्य में दोनों पक्षों के बीच संबंध बेहतर होने की कोई ख़ास संभावना नज़र नहीं आ रही है.

17 मई को एक वीडियो बयान में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के अध्यक्ष इमरान ख़ान का कहना था, "देश में चुनाव करवाए जाएं और इसे बचाया जाए. मैं कब से इंतज़ार कर रहा हूं कि कोई हमसे बात करे."

लेकिन विश्लेषकों के अनुसार संबंध जिस मोड़ पर आगे बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए इमरान ख़ान की बातचीत का प्रस्ताव इस समय स्वीकार होने वाला नहीं है.

पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास पर अगर नज़र दौड़ाई जाए तो अतीत में राजनेताओं और सेना के बीच लड़ाई, दोतरफ़ा दूरियों की खाई को बढ़ा कर राजनीतिक शासकों को सत्ता से वंचित करने का कारण बनती रही है.

इसकी शुरुआत पाकिस्तान की स्थापना के कुछ समय बाद से ही हो गई थी.

पाकिस्तान के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जिनसे साबित होता है कि सेना से मोर्चाबंदी का अंजाम कभी न तो राजनीति और न ही राजनेताओं के पक्ष में सामने आया.

ख़्वाजा नाज़िमुद्दीन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, ख़्वाजा नाज़िमुद्दीन

पाकिस्तान की स्थापना से शीर्ष सत्ता में अधिकारों पर खींचातान

यह अप्रैल 1953 की घटना है जब उस समय के प्रधानमंत्री ख़्वाजा नाज़िमुद्दीन को गवर्नर जनरल ग़ुलाम मोहम्मद ने अय्यूब ख़ान की सहायता से प्रधानमंत्री के पद से हटा दिया था.

उन्हें एक ऐसे समय में हटाया गया था जब उन्हें न केवल असेंबली का विश्वास प्राप्त था बल्कि कुछ ही समय पहले वह असेंबली से बजट भी पास करवा चुके थे.

क़य्यूम निज़ामी अपनी किताब 'जरनैल और सियासतदान: तारीख़ (इतिहास) की अदालत में' में लिखते हैं कि कुछ इतिहासकारों के अनुसार ख़्वाजा निज़ामुद्दीन जो संविधान तैयार करवा रहे थे उसमें गवर्नर जनरल के अधिकारों को कम कर दिया गया था.

उनके मुताबिक, "नाज़िमुद्दीन अय्यूब ख़ान के कार्यकाल को विस्तार देने और सेना के आकार को राष्ट्रीय संसाधनों से अधिक बढ़ाने के विरोधी थे."

ख्वाज़ा

इमेज स्रोत, Getty Images

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

पाकिस्तान की स्थापना के ठीक 11 साल बाद सन 1958 में देश में पहला मार्शल लॉ लगा दिया गया.

क़ुदरतुल्लाह शहाब 'शहाबनामा' में लिखते हैं अक्टूबर 1958 में संविधान को किनारे करने का कोई कारण नहीं था. उस समय पाकिस्तान किसी असामान्य विदेशी ख़तरे से दो-चार नहीं था. आंतरिक ख़तरा केवल यह था कि अगर चुनाव हो जाए तो शायद इस्कंदर मिर्ज़ा को राष्ट्रपति की कुर्सी से हाथ धोना पड़े."

अब यह देखिए कि इस्कंदर मिर्ज़ा के साथ क्या हुआ? क़य्यूम निज़ामी अपनी किताब में लिखते हैं, "मिलिट्री इंटेलिजेंस ने सैयद अमजद अली और इस्कंदर मिर्ज़ा के बीच टेलीफ़ोन बातचीत सुनी. सैयद अमजद अली के बेटे की शादी इस्कंदर मिर्ज़ा की बेटी से होनी थी."

"सैयद अमजद अली ने उन्हें शादी की तारीख़ तय करने को कहा तो इस्कंदर मिर्ज़ा ने जवाब दिया कि वह अगले कुछ दिनों तक बहुत व्यस्त हैं. 'हालात सामान्य हो जाएंगे तो तारीख़ तय हो जाएगी.'

कहा जाता है कि अमजद अली ने पूछा कि परिस्थितियां सामान्य होने में बहुत समय लगेगा? तो इस्कंदर मिर्ज़ा ने उसका जवाब दिया कि कुछ दिन में मैं अय्यूब ख़ान को सीधा कर दूंगा."

वह आगे चलकर लिखते हैं, "अय्यूब ख़ान को टेलीफ़ोन पर होने वाली इस बातचीत के बारे में बताया गया लेकिन इस पर 27 अक्टूबर तक कोई कार्रवाई न की गई क्योंकि अमेरिकी रक्षा सचिव को पाकिस्तान की फ़ौजी मदद की ज़रूरतों पर वार्ता के लिए पाकिस्तान आना था. 27 अक्टूबर को अमेरिकी रक्षा सचिव के दौरे का कार्यक्रम पूरा होने के बाद याहया ख़ान और उनकी टीम ने अपने एक्शन प्लान के दूसरे हिस्से पर कार्रवाई शुरू कर दी जिसके बाद अय्यूब ख़ान ने रात दस बजे इस्कंदर मिर्ज़ा को राष्ट्रपति पद से हटा दिया."

जुल्फिकार अली भुट्टो सेना और नौकरशाही में सुधार चाहते थे

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, जुल्फ़िकार अली भुट्टो सेना और नौकरशाही में सुधार चाहते थे

मार्शल लॉ को दफ़न करने वाला कैसे मार्शल लॉ का निशाना बन गया?

एम. ए. चौधरी अपनी किताब 'मार्शल लॉ का सियासी अंदाज़' में लिखते हैं, "पाकिस्तान के निर्वाचित प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने संविधान निर्माण के बारे में एक बार यह दावा किया था कि वह इस देश में मार्शल लॉ को हमेशा के लिए दफ़न कर देंगे. यह समय की कितनी बड़ी विडंबना है कि मार्शल लॉ ही की सरकार ने उन्हें फांसी दी और दफ़न किया."

विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में इस्टैब्लिशमेंट और राजनीतिक शासकों के बीच विवाद का नतीजा कभी भी राजनीतिक शासकों के लिए अच्छा नहीं रहा.

फिर वो ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो हों या जुनेजो, मियां नवाज़ शरीफ़ हों या बेनज़ीर और यूसुफ़ रज़ा गिलानी हों या फिर इमरान ख़ान…

ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो फ़ौज और प्रशासन में सुधारों के इच्छुक थे और लोकतांत्रिक वर्चस्व को स्थापित करना चाहते थे.

उन्होंने सत्ता संभालते ही कई ऊंचे दर्जे के फ़ौजी अफ़सरों को सेवा से मुक्त कर दिया जिनमें लेफ़्टिनेंट गुल हसन ख़ान भी शामिल थे.

इसी तरह सेनाओं के प्रमुख के पद की अवधि भी एक साल कम कर दी. साथ ही 1972 में फ़ेडरल सिक्योरिटी फ़ोर्स (एफ़एसएफ़) की स्थापना भी हुई.

ज़ुल्फीकार

इमेज स्रोत, Getty Images

डॉक्टर मोहम्मद आज़म चौधरी ने अपनी किताब 'पाकिस्तान का संविधान' में लिखा है, "एफ़एसएफ़ की स्थापना से सैन्य अधिकारी चौकन्ने हो गए. उन्हें पेशेवर पारंपरिक सेना की जगह नागरिक सेना का वह नारा याद आने लगा जो भुट्टो ने बहुत पहले अपने राजनीतिक आंदोलन के दौरान लगाया था. जनरल ज़िया ने सत्ता में आने के बाद अपने शुरुआती एक्शन में एफ़एसएफ़ को तोड़ दिया."

राजनीतिक टीकाकार डॉक्टर रसूल बख़्श रईस एफ़एसएफ़ को सेना के समानांतर नहीं मानते.

उनके अनुसार, "एफ़एसएफ़ सेना के समानांतर सेना नहीं थी बल्कि यह केवल भुट्टो के राजनीतिक विरोधियों को नियंत्रण में करने के लिए बनाई गई थी. इस फ़ोर्स में अधिकतर पीपुल्स पार्टी के अपने वर्कर्स थे जिनका काम भुट्टो के विरोधियों को डराना, धमकाना और क़ाबू में रखना था."

ताहिर कामरान भुट्टो की ओर से 43 सैन्य अधिकारियों को सेवा मुक्त करने की पृष्ठभूमि में अपनी किताब 'पाकिस्तान में जम्हूरियत और गवर्नेंस' में लिखते हैं, "यह फ़ौज पर सिविलियन वर्चस्व की ओर स्पष्ट इशारा था. संविधान के आर्टिकल 271 में किसी भी संभावित सैन्य हस्तक्षेप या सेना की ओर से सत्ता पर क़ब्ज़ा करने की कार्रवाई को हतोत्साहित करने के लिए मौत की सज़ा तय की गई थी."

जनरल के. एम. आरिफ़ 'ख़ाकी के साए में' लिखते हैं, "भिंडारा ने मुझे बताया कि उन्होंने एक बार ज़िया से सवाल किया था कि आपने भुट्टो सरकार को क्यों गिराया था? ज़िया ने इसका सीधा जवाब देते हुए कहा था, 'किसी दिन मैं आपको भुट्टो के बारे में ऐसी जानकारी दूंगा कि आपकी हैरत का ठिकाना नहीं रहेगा.'

ज़िया ने भिंडारा को बताया कि उन्हें पाकिस्तान आर्मी की हार व बर्बादी क़बूल नहीं थी."

जुनेजो का भोलापन भी बर्दाश्त न कर सके ज़िया

जनरल ज़िया ने 1985 में दल-विहीन चुनाव करवाए थे. चुनाव के बाद प्रधानमंत्री के तौर पर मोहम्मद ख़ान जुनेजो को चुना गया और अधिकतर इतिहासकारों के अनुसार इस चुनाव का मूल आधार जुनेजो का भोलापन माना जाता था क्योंकि ज़िया किसी ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहते थे जो बाद में उनकी सत्ता को किसी तरह चैलेंज करने की हैसियत रखता हो.

मगर जुनेजो और ज़िया के बीच संबंध कुछ ही दिन बाद ख़राब होते चले गए. आख़िकार मई 1988 में राष्ट्रपति ज़िया ने जुनेजो को पद से हटा दिया और राष्ट्रीय असेंबली को भंग कर दिया.

ताहिर कामरान अपनी किताब में लिखते हैं "ज़िया की ओर से जुनेजो को हटाने के कारणों में जुनेजो का जनरल ज़िया की इच्छा के विरुद्ध जेनेवा समझौते पर दस्तख़त करना था जो उन्हें अपदस्थ करने का बड़ा सबब बन गया."

"इसके अलावा रावलपिंडी में ओजड़ी कैंप की घटना के ज़िम्मेदार फ़ौजी अफ़सरों को मुल्ज़िम ठहराना ज़ियाउल हक़ और जुनेजो के बीच विवाद का बड़ा कारण बना था."

क़य्यूम निज़ामी अपनी किताब में लिखते हैं सेना सिंध में पनूं आक़िल और तीन दूसरी जगहों पर छावनी बनाना चाहती थी. सिंध के जातीय नेता इसका विरोध कर रहे थे. जुनेजो ने ज़िया की इच्छा के विरुद्ध छावनियों की स्थापना के लिए खुलेआम समर्थन से गुरेज़ किया."

जनरल ज़िया उल हक़

इमेज स्रोत, Getty Images

बेनज़ीर की दो बार की सत्ता और इस्टैब्लिशमेंट की भूमिका

भुट्टो

इमेज स्रोत, Getty Images

बेनजीर भुट्टो पहली बार 1988 के चुनाव में प्रधानमंत्री बनीं मगर वह अपने कार्यकाल को पूरा न कर सकीं.

ताहिर कामरान अपनी किताब में सईद शफ़क़त का उल्लेख करते हुए लिखते हैं, "सबसे ताक़तवर संस्था के साथ बेनज़ीर के संबंध की ख़राबी की चार वजहें थीं जो उनकी सरकार के पतन का कारण बनीं."

"उनमें एक वजह यह थी कि 1990 में बेनज़ीर ने आर्मी के सेलेक्शन बोर्ड के मामले में प्रभाव डालने की कोशिश की जो उन्हें अपदस्थ करने का सबसे मज़बूत कारण बना."

सत्ता से टकराव के बावजूद नवाज शरीफ 2013 में हुए आम चुनाव के नतीजे में तीसरी बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन वे तीसरी बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके

इमेज स्रोत, AFP

"डिक्टेशन नहीं लूंगा" से डॉन लीक्स तक: नवाज़ शरीफ़ और इस्टैब्लिशमेंट का संघर्ष

"मैं डिक्टेशन नहीं लूंगा." मियां नवाज़ शरीफ़ का यह जुमला हालांकि उस समय के राष्ट्रपति इसहाक़ ख़ान के ख़िलाफ़ दिए जाने वाले भाषण का हिस्सा है मगर इसके पीछे जो वजह थी वह सत्ता से हटाने की थी.

मियां नवाज़ शरीफ़ की सत्ता का पहला दौर उसी संघर्ष और मोर्चाबंदी की भेंट चढ़ जाता है मगर जब वह दूसरी बार प्रधानमंत्री बनते हैं तो जनता के बहुमत का विश्वास लेकर बनते हैं, फिर भी अपना कार्यकाल पूरा करने से वंचित रह जाते हैं और जनरल मुशर्रफ़ उन्हें हटाकर सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं.

आयशा सिद्दीक़ा ने अपनी किताब 'पाकिस्तान आर्म्स प्रोक्योरमेंट एंड मिलिट्री बिल्ड अप' में लिखा है, "नवाज़ शरीफ़ की नीतियों के उलट सेना ने अपनी संस्था को सुरक्षित रखने में पाई जाने वाली आशंकाओं के कारण सत्ता पर क़ब्ज़ा किया. सेना को आशंका थी कि नवाज़ शरीफ़ सेना को अपने कंट्रोल में लाकर उसका आकार छोटा करना चाहते हैं. इसके साथ सेना ने नवाज़ शरीफ़ की ओर से सैन्य मामलों में हस्तक्षेप को भी अच्छी नज़र से नहीं देखा."

मियां नवाज़ शरीफ़

इमेज स्रोत, Getty Images

जबकि रसूल बख़्श रईस का विचार है कि जब नवाज़ शरीफ़ के पास 1997 के चुनाव के बाद दो तिहाई बहुमत आ गया था तो वह सेना के काबू में न रहे और उन्होंने भुट्टो की तरह 'सिविल सुपरेमैसी' लागू करने की कोशिश की.

इस्टैब्लिशमेंट से अपने संघर्ष के बावजूद सन 2013 में नवाज़ शरीफ़ आम चुनाव के नतीजे में तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए मगर तीसरी बार भी अपने सेवाकाल को पूरा नहीं कर पाए.

सन 2016 में एक ख़बर सामने आई जो बाद में 'डॉन लीक्स' के नाम से मशहूर हुई. कहा जाता है कि नवाज़ शरीफ़ की आजीवन अयोग्यता के पीछे 'डॉन लीक्स' एक बड़ी वजह बनी.

इस ख़बर को रुकवाने में नाकामी की वजह से परवेज़ रशीद को, जो उस समय सूचना मंत्री थे, पद से हटा दिया गया था.

इस मामले की गंभीरता उस समय खुलकर सामने आई जब पाकिस्तानी सेना के जनसंपर्क विभाग (आईएसपीआर) के प्रमुख मेजर जनरल आसिफ़ ग़फ़ूर ने प्रधानमंत्री भवन की ओर से 'डॉन लीक्स' के संबंध मैं जारी विज्ञप्ति को नकारते हुए ट्वीट किया था, "यह नोटिफ़िकेशन रद्द किया जाता है." हालांकि बाद में सरकारी नोटिफ़िकेशन रद्द करने वाली ट्वीट वापस ले ली गई थी.

यूसुफ़ रज़ा गिलानी

इमेज स्रोत, Getty Images

'सत्ता के अंदर सत्ता' का बयान देने वाले यूसुफ़ रज़ा गिलानी

22 दिसंबर 2011 को उस समय के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने राष्ट्रीय असेंबली में चौधरी निसार अली ख़ान के आपत्ति के बिंदु के जवाब में कहा था, "सत्ता के अंदर सत्ता स्थापित करने की इजाज़त नहीं देंगे. अगर सेना और संबंधित संस्थाएं रक्षा मंत्रालय के मातहत नहीं हैं और अविभाजित भारत से अलग होने के बाद अगर यहां शासित (ग़ुलाम) ही रहना है तो इस संसद और लोकतंत्र का कोई अर्थ और लाभ नहीं."

उस समय के आर्मी चीफ़ जनरल अशफ़ाक़ परवेज कियानी ने महमंद और कुर्रम एजेंसियों की चौकियों के दौरे पर फ़ौजी जवानों से कहा था, "पाकिस्तानी फ़ौज लोकतंत्र का समर्थन करती है और करती रहेगी, सेना सत्ता पर क़ब्ज़ा नहीं कर रही."

इमरान ख़ान

इमेज स्रोत, Getty Images

"रेड लाइन क्रॉस हो चुकी"

पाकिस्तान के इतिहास में कई प्रधानमंत्री अपना सत्ताकाल पूरा ना कर सके जिसकी बड़ी वजह सैनिक और नागरिक नेतृत्व में विवाद बताई जाती है.

इस संबंध में ज़ैग़म ख़ान का कहना था कि हमें इस्टैब्लिशमेंट को एक पॉलिटिकल इलीट ग्रुप के तौर पर भी देखना चाहिए. "पाकिस्तान में शक्तिशाली उच्च वर्ग के जो समूह हैं उनमें एक और राजनीतिक पक्ष है और एक राज्य का पक्ष है और पाकिस्तान में जो शक्तिशाली उच्च वर्ग का बड़ा समूह है वह पाकिस्तान की फ़ौज है."

"यह दुनिया का इतिहास है कि जब भी सत्ता के उच्च वर्ग को कोई चुनौती मिलती है तो वह अपनी हैसियत को बरक़रार रखने के लिए शक्ति का प्रदर्शन करता है."

पाकिस्तान

इमेज स्रोत, Getty Images

वर्तमान परिस्थितियों के बारे में बात करते हुए ज़ैग़म ख़ान का कहना है इस समय रेड लाइन क्रॉस हो चुकी है. रेड लाइन सिर्फ फ़ौज की नहीं होती बल्कि राज्य की भी होती है और फ़ौज के संयंत्रों और ठिकानों पर हमला किसी भी देश के सेना के लिए स्वीकार्य नहीं.

वह कहते हैं, "राज्यसत्ता इसे नज़रअंदाज़ नहीं करेगी."

पत्रकार व एंकर फ़रीहा इदरीस के अनुसार "9 मई की घटनाएं राज्यसत्ता की रेड लाइन क्रॉस करने जैसी हैं. मामला कुछ पुरानी इमारतों का नहीं, बल्कि मेरे नज़दीक यह कुछ क्षेत्रों की पवित्रता के हनन का है."

वह कहती हैं, "हम सबकी सुरक्षा को सुनिश्चित बनाने के लिए 9 मई की घटनाओं का जवाब देना ज़रूरी हो चुका है लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि आप महिलाओं को घरों से उठा लें?"

"एक राजनीतिक दल को निशाना बनाने की यह परंपरा अनुकरणीय नहीं और लग ऐसा रहा है कि संस्थाओं को इस्तेमाल करके राजनीतिक लाभ उठाया जा रहा है.