क्या है पाकिस्तान में चरमपंथी हमलों की ज़िम्मेदारी लेने वाले गुट तहरीके जिहाद की हक़ीक़त?

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- Author, अज़ीज़ुल्लाह ख़ान
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, पेशावर
पाकिस्तान में चरमपंथ से जुड़े हाल में कुछ ऐसे हमले हुए हैं जिनकी ज़िम्मेदारी एक ऐसे अनजान से संगठन ने क़बूल की है जिसके बारे में सरकारी अधिकारी और यहां तक कि अवैध घोषित संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के पदाधिकारी भी कुछ नहीं जानते या शायद बताने से बच रहे हैं.
विश्लेषक इसे एक रहस्यमय संगठन क़रार दे रहे हैं और उनका मानना है कि इस संगठन के प्रवक्ता इन हमलों की ज़िम्मेदारियां तो क़बूल करते हैं लेकिन वह अपने संगठन की संरचना के बारे में कुछ नहीं बताते.
इस संगठन का नाम तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान बताया जा रहा है और कुछ दिन पहले पाकिस्तान के बलूचिस्तान राज्य के मुस्लिम बाग़ इलाक़े में एफ़सी (फ़्रंटियर कांसटेबुलरी) कैंप पर हमले की ज़िम्मेदारी इसी संगठन ने क़बूल की थी.
सेना के जनसंपर्क विभाग (आईएसपीआर) के अनुसार इस हमले के बाद तुरंत कार्रवाई की गई और पूरे क्षेत्र को चरमपंथियों से साफ़ कर दिया गया. इस हमले में छह हमलावरों को मार दिया गया था और इस दौरान कैंप में मौजूद छह सुरक्षा अधिकारी भी मारे गए थे. आईएसपीआर के अनुसार हमलावर आधुनिक हथियारों से लैस थे.
यह संगठन इससे पहले चमन, बोलान, स्वात के क्षेत्र कबल और लकी मरूत में हमलों की ज़िम्मेदारियां भी क़बूल कर चुका है लेकिन इनमें कम से कम दो हमले ऐसे हैं जिनमें इस संगठन के मौजूद होने के साक्ष्य नहीं मिले थे.

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यह संगठन कब और कैसे सामने आया?
कुछ महीने पहले ही इस संगठन ने बलूचिस्तान राज्य के सीमावर्ती शहर चमन में सुरक्षाबलों पर हमले की ज़िम्मेदारी पहली बार क़बूल की थी.
वरिष्ठ पत्रकार और ख़ुरासान डायरी के डायरेक्टर, न्यूज़ एहसानुल्लाह टीपू ने बीबीसी को बताया कि इस साल फ़रवरी में उन्हें टेलीफ़ोन पर संदेश मिला था, जो लगता है कि किसी यूरोपीय देश के नंबर से था.
उन्होंने कहा, "कॉल करने वाले व्यक्ति ने अपना नाम मुल्ला मोहम्मद क़ासिम बताया और कहा कि उन्होंने तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान के नाम से संगठन बनाया है लेकिन इस संगठन के बारे में कोई और जानकारी नहीं दी गई."
उनका कहना था कि उसके दो दिन बाद मोबाइल फ़ोन पर एक मैसेज आया जिसमें कहा गया कि बलूचिस्तान के सीमावर्ती शहर चमन में सुरक्षा बलों के अधिकारियों पर हमले की ज़िम्मेदारी वह अपने संगठन की ओर से क़बूल करते हैं. इस हमले में दो सुरक्षा अधिकारी मारे गए थे.
पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया में चरमपंथ और इससे जुड़ी समस्याओं पर गहरा शोध करने वाले विश्लेषक अब्दुल सैय्यद ने बीबीसी को बताया के तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान अब तक एक रहस्यमय संगठन है जिसके नेतृत्व, सदस्यों और अस्तित्व का कोई साक्ष्य नहीं है.
कुछ पत्रकारों को भेजे गए छोटे से लिखित संदेश के ज़रिए इस संगठन की स्थापना की घोषणा की गई और एक सोशल मीडिया अकाउंट पर या कुछ पत्रकारों को लिखित संदेश भेजकर चरमपंथी हमलों की ज़िम्मेदारियां क़बूल की गई हैं.
अब तक इस संगठन के प्रमुख और प्रवक्ता के नाम बताए गए हैं लेकिन उनके अतीत या वास्तविक में मौजूद होने से संबंधित कोई साक्ष्य नहीं.
इस संगठन के प्रवक्ता अपना नाम मुल्ला मोहम्मद क़ासिम लिखते हैं जिन्होंने पत्रकारों के अनुरोध और कोशिश के बावजूद अब तक किसी से बात नहीं की और केवल लिखित संदेश भिजवाए हैं.

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हमलों की ज़िम्मेदारी में कितना सच, कितना संदेह?
पाकिस्तान में अब तक पांच ऐसे हमले हुए हैं जिनकी ज़िम्मेदारी इस संगठन के प्रवक्ता ने ली है. इन पांच हमलों में से दो हमले ऐसे हैं जिसमें इस संगठन के शामिल होने के साक्ष्य नहीं मिले थे.
उनमें एक हमला बोलान में इस साल मार्च के महीने में पुलिस की गाड़ी के पास हुआ था. इसमें एक नागरिक समेत नौ अधिकारी मारे गए थे. तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान ने इसकी ज़िम्मेदारी क़बूल की लेकिन कोई और जानकारी नहीं दी.
इसके बाद दाएश (आईएस) ने अपने वेबपेज 'एमाक़' पर इस हमले की विस्तृत जानकारी देते हुए ज़िम्मेदारी क़बूल की थी.
दूसरी ओर केंद्रीय गृह मंत्री राना सनाउल्लाह ने कहा था कि इस हमले की ज़िम्मेदारी किसी संगठन ने क़बूल नहीं की. इसके बाद अप्रैल में ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के ज़िले स्वात के कबल में आतंकवाद निरोधी थाने में धमाके हुए थे जिसमें 17 लोग मारे गए थे.
इस हमले की ज़िम्मेदारी भी तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान ने एक संदेश के ज़रिए क़बूल की थी लेकिन इसके बाद जांच-पड़ताल से मालूम हुआ कि ये धमाके थाने के अंदर पड़ी हुई बारूदी सामग्री से हुए थे और बाहर से किसी हमलावर के आने के साक्ष्य नहीं मिले थे.
इसके अलावा पिछले माह ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के ज़िले लकी मरूत में पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज पर हमला हुआ था जिसमें आधुनिक हथियार इस्तेमाल किए गए थे. इस हमले की ज़िम्मेदारी भी तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान के प्रवक्ता मुल्ला मोहम्मद क़ासिम ने क़बूल की थी और कहा था कि यह हमला उनके कमांडर अबूज़र ने किया था.

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संगठन के बारे में तालिबान की राय
इस बारे में सरकारी स्तर पर पूरी चुप्पी है. आतंकवाद विरोधी मंत्रालय के अफ़सरों से इस बारे में संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उन्होंने इस संगठन के बारे में कुछ नहीं बताया.
सरकारी सूत्रों का कहना है कि संभव है कि संगठन का अवैध घोषित संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान या अल-क़ायदा आदि से संबंध हो. सूत्रों ने बताया कि इस संगठन में कौन लोग हैं, यह किसी को नहीं बताया गया.
अवैध घोषित संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के प्रवक्ता मोहम्मद ख़ुरासानी ने भी इस बारे में बताया कि उन्हें इस संगठन के बारे में कोई जानकारी नहीं और वह ख़ुद इस संगठन के लोगों से संपर्क की कोशिश कर रहे हैं.
इस बारे में अपने आप को टीटीपी, ज़ोब के इलाक़े का पदाधिकारी बताने वाले ख़ालिद सर बकफ़ महमंद ने बीबीसी को बताया कि इस तरह का कोई संगठन अस्तित्व में नहीं, बल्कि यह केवल सोशल मीडिया (फ़ेसबुक) पर मौजूद है.
उनका कहना था कि अगर कोई संगठन होता तो उसके पदाधिकारी होते, कोई प्रमुख होता और संगठन का कोई ढांचा होता. "केवल हमलों की ज़िम्मेदारी लेने से कोई संगठन नहीं बन जाता."

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विश्लेषकों के लिए अस्पष्ट स्थिति
पेशावर में वरिष्ठ पत्रकार मुश्ताक़ यूसुफ़ज़ई का कहना था कि इस संगठन के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी तो नहीं लेकिन उनकी जानकारी और मिलने वाली सूचना के अनुसार ये तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान से ही जुड़े लोग हैं और उसी संगठन का दूसरा नाम हो सकता है.
"तालिबान जिन हमलों की ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहते हो वह इस संगठन के नाम से क़बूल करा लेते हैं. इस क्षेत्र में किसी दूसरे संगठन के होने की निशानी नहीं मिलती और उन क्षेत्रों में जिस तरह की कार्रवाई की जा रही है उसका तरीक़ा भी टीटीपी से ही मिलता जुलता है."
शोधकर्ता और पत्रकार अब्दुल सैयद का कहना है कि इस संगठन के हमलों की ज़िम्मेदारी से यह अंदाजा होता है कि यह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का कोई सहायक समूह है या इसका कोई ख़ुफ़िया विंग.
"उदाहरण के लिए उसने अब तक ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के ज़िले लकी मरूत और बलूचिस्तान के ज़ोब डिविज़न में दो बड़े हमलों का दावा किया है जहां पर तहरीक-ए-तालिबान का ऑपरेशनल नेटवर्क मौजूद है मगर तहरीक-ए-तालिबान ने उस संगठन या उसकी कार्रवाइयों पर कोई चिंता या प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. हालांकि यह उसके लिए ख़तरा समझा जा सकता है क्योंकि उन संगठनों का इतिहास व राजनीति बताती है कि वे अपने किसी प्रतिद्वंद्वी को आसानी से बर्दाश्त नहीं करते."
"इसी तरह दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ये बड़े हमले थे, जो निश्चित रूप से किसी बड़े संगठन की ही कार्रवाई मालूम होती है."
शोधकर्ता अब्दुल सैय्यद का कहना था कि दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है के तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान के प्रतिद्वंद्वी अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी संगठन तथाकथित दौलत-ए-इस्लामिया की पाकिस्तानी शाखा या 'दाएश' पाकिस्तान के आत्मघाती हमले की ज़िम्मेदारी क़बूल की जिसका ज़ाहिरी मक़सद 'दाएश' के दावे को कमज़ोर दिखाना था मगर अब तक तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान ने तहरीक-ए-तालिबान के किसी ऐसे हमले के संबंध में ज़िम्मेदारी क़बूल नहीं की.
एहसानुल्लाह टीपू महसूद का कहना है कि उनकी नज़र में अब तक इस संगठन के नाम से जो ज़िम्मेदारियां क़बूल की गई हैं उनमें अस्पष्टता पाई जाती है और इसके लिए संदेश की हद तक इस संगठन से जो संपर्क हुआ उससे कोई ठोस जवाब अब तक नहीं मिला.
अब्दुल सैय्यद का मानना है कि निकट भविष्य में इस बात का अंदाज़ा हो जाएगा कि तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान की वास्तविकता क्या है, क्योंकि अगर यह तहरीक-ए-तालिबान का ख़ुफ़िया संगठन है तो निश्चित रूप से यह संबंध अधिक समय तक छिपा नहीं रह सकता और यह अगर तहरीक-ए-तालिबान के अंदर से ही कोई बग़ावत है या कोई प्रतिस्पर्धी नया गिरोह है तो वह भी जल्द स्पष्ट हो जाएगा.
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