पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर पाबंदी के बावजूद प्रदर्शन क्यों नहीं थम सके?

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- Author, फ्रांसेस माओ
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
पाकिस्तान में इमरान ख़ान के समर्थकों और देश की सत्ता के बीच लड़ाई दो मोर्चों पर जारी रही- पहली, सड़कों पर और दूसरी, सोशल मीडिया पर. और इनमें से एक मैदान-ए-जंग में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान का पलड़ा भारी रहा.
मंगलवार को इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी के कुछ घंटों के अंदर ही पाकिस्तान की सरकार ने विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए इंटरनेट पर प्रतिबंध लगा दिया. लेकिन इसके बावजूद देश के उनकी गिरफ़्तारी के तुरंत बाद देशव्यापी प्रदर्शन शुरू हो गए.
लाहौर में निगहत दाद ने जैसे ही यह ख़बर सुनी उन्होंने घर लौटने का फ़ैसला किया. शहर के बीच स्थित अपने ऑफ़िस से निकलते हुए उनके स्टाफ़ का पहले ही हिंसक प्रदर्शनकारियों से सामना हो रहा था.
निगहत दाद ने बीबीसी को बताया कि एक भीड़ ने उनकी गाड़ियों पर हमला करने और उनको रोकने की कोशिश की.
निगहत दाद पाकिस्तान में डिजिटल अधिकारों पर काम करती हैं. वोडिजिटल राइट्स फ़ाउंडेशन की प्रमुख हैं. उन्होंने इस दौरान उस बहस पर भी नज़र रखी जो ज़ोर-शोर से ऑनलाइन सोशल मीडिया पर जारी थी.
सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप पर आंसू गैस के धुएं और पथराव करने वाले प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें पोस्ट की जा रही थीं. अर्द्धसैनिक बलों के हाथों इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी के वीडियो वायरल हो चुके थे. उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) अपने ट्विटर पेज पर तेज़ी से सभी अपडेट्स दे रही थी.
ऐसे में ख़राब होती हुई स्थिति पर क़ाबू पाने के लिए सरकार ने इंटरनेट का स्विच ही ऑफ़ कर दिया. पूरे देश में सोशल मीडिया साइट्स बंद हो गईं. लोगों को फ़ेसबुक, यूट्यूब और ट्विटर तक पहुंच हासिल करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा.
कुछ जगहों पर मोबाइल नेटवर्क भी ब्लॉक हो गए जबकि कई जगहों पर इंटरनेट की स्पीड एकदम कम हो गई.
इस तरह के इंटरनेट ब्लैकआउट के लिए पाकिस्तानियों की बड़ी संख्या तैयार नहीं थी. जिनके लिए संभव हुआ उन्होंने वीपीएन का इस्तेमाल किया. (उपभोक्ता बिना रोकटोक के इंटरनेट का इस्तेमाल कर सके इसके लिए वीपीएन ऐसी सर्विस है जो इंटरनेट एक्सेस के स्थान को बदल सकती है.) बीबीसी को ट्रैकर्स ने बताया कि ऐसी सेवाओं की मांग में 1300 फ़ीसदी इज़ाफ़ा हुआ.

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"असली ख़बर ऑनलाइन"
दक्षिण एशिया के देशों में हाल के सालों के दौरान इंटरनेट बंद करना सरकारों के लिए एक अहम हथियार बनता जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार जानकारी पर कंट्रोल रखने, प्रदर्शन और असहमति को दबाने के लिए एक तरह से देश को ऑफ़लाइन करती है.
सिंगापुर में मौजूद दक्षिण एशिया मामलों के जानकार काथक नाचयापन कहते हैं कि इंटरनेट को एक कील की तरह समझिए और ये जानिए कि सरकारों के पास एक हथौड़ा होता है जिसे वो जब ज़रूरी लगे कील पर मार देती है.
पाकिस्तान में इस पाबंदी का प्रभाव इसलिए भी अधिक हो गया क्योंकि यहां के लोग मानते हैं कि यहां 'असली ख़बर' सुनने के लिए इंटरनेट पर ही भरोसा किया जा सकता है.

अमेरिका के 'द अटलांटिक काउंसिल' नाम के थिंकटैंक के उज़ैर यूनुस बताते हैं कि यहां लोग मानते हैं कि, "टीवी देखना फ़ायदेमंद नहीं क्योंकि जो जानकारी लोगों तक पहुंचती है उसे इस्टैब्लिशमेंट कंट्रोल कर रही है."
इसलिए जब इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी जैसी ब्रेकिंग ख़बर का मामला हो तो लोग ऑनलाइन जाते हैं. या तो वो जानेमाने पत्रकारों और यूट्यूब चैनलों का सहारा लेते हैं या फिर सोशल मीडिया का रुख़ करते हैं.
उज़ैर कहते हैं, "मैं जियो न्यूज़ देख रहा था जो देश का एक जानामाना ब्रॉडकास्टर है लेकिन मुझे प्रदर्शनों के बारे में अधिक जानकारी मुझे ट्विटर और व्हाट्सऐप पर मिल रही थी. वहां से मुझे पता चल रहा था कि कहां आंसू गैस के गोले छोड़े जा रहे हैं, कहां कौन घायल हुआ. जियो यह सब नहीं दिखा रहा था."
लेकिन सोशल मीडिया पर ख़बरों के लिए भरोसा करने की अपनी समस्याएं होती हैं. पाकिस्तान की पेचीदा सियासत की वजह से ग़लत सूचना, झूठी जानकारी और साज़िशी सोच सोशल मीडिया पर काफ़ी हद तक मौजूद रहती हैं. इस तरह की जानकारी अधिकतर विभिन्न राजनीतिक अदाकार ही दूसरों को भेजा करते हैं.

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निगहत दाद का कहना है कि लोग जिस भी तरह की जानकारी क्यों न ले रहे हों, उनकी ऑनलाइन मौजूदगी को सीमित करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है.
उनका कहना है कि जब आप इंटरनेट बंद कर देते हैं तो लोगों के पास जानकारी लेने का अधिकार नहीं रह जाता.
उनका मानना है कि ऐसी पाबंदी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जानकारी तक पहुंच के आपके मौलिक अधिकारों को छीन लेती. ध्यान रहे कि इंटरनेट तक पहुंच का अधिकार संयुक्त राष्ट्र भी स्वीकार करता है.

"अब तक की सबसे सख़्त सेंसरशिप"
पिछले साल अप्रैल में इमरान ख़ान की सरकार के सत्ता से बाहर जाने के बाद से पाकिस्तान में इंटरनेट सेंसरशिप आम होती जा रही है.
अपनी राजनीतिक वापसी की यात्रा में इमरान ख़ान अपनी सरकार के गिरने को ग़ैर-क़ानूनी कहते रहे हैं. उनकी रैलियों में हज़ारों लोग शामिल होते हैं जो उनकी बातें सुनते हैं.
ब्रिटेन में इंटरनेट मॉनिटर करने वाली कंपनी 'नेट ब्लॉक्स' के अनुसार इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी से पहले उनकी तीन रैलियों के दौरान इंटरनेट बंद हुआ लेकिन इस बार की पाबंदी सबसे सख़्त थी.
नेट ब्लॉक्स के एलप तूकर ने बीबीसी को बताया कि हाल के समय में यह पाकिस्तान की सबसे सख़्त इंटरनेट पाबंदी थी.
उन्होंने कहा इस बार पाबंदी के अलग-अलग तरीक़े व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल किए गए. मोबाइल नेटवर्क और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म- दोनों को निशाना बनाया गया जो नैरेटिव पर नियंत्रण की साफ़ कोशिश लगती है.
नेट ब्लॉक्स के अनुसार जिन-जिन इलाकों में मोबाइल नेटवर्क प्रभावित हुआ उनमें से अधिकांश जगहें पंजाब में थीं. ये पाकिस्तान का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और मौजूदा वक्त में इमरान ख़ान का मज़बूत गढ़ बन रहा है.
टेलीकॉम अथॉरिटी ने बाद में इस बात की पुष्टि की कि उन्होंने ही गृह मंत्रालय के निर्देश पर इंटरनेट पर पाबंदी की व्यवस्था की.

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पाकिस्तान की वर्तमान सरकार के लिए इंटरनेट ब्लैकआउट एक अहम क़दम था जिसने स्वास्थ्य, इमर्जेंसी और आर्थिक सुविधाओं तक आम लोगों की पहुंच में मुश्किलें पैदा कीं.
दूसरी और पाकिस्तान की पहले से ही कमज़ोर अर्थव्यवस्था पर भी इसका गहरा असर पड़ा. सामान लाने- ले जाने से संबंधित क्षेत्र के साथ-साथ टेक कम्यूनिटी समेत लाखों पाकिस्तानी रोज़गार के लिए इंटरनेट पर निर्भर हैं.
बुधवार के दिन सैकड़ों पाकिस्तानी कारोबारी नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इंटरनेट पर पाबंदी की निंदा की और एक पत्र के द्वारा यह आशंका जताई कि इससे देश के सक्रिय तकनीकी क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा जो देश में विदेशी पूंजी लाने के कुछ स्रोतों में से एक है.

इमरान ख़ान की ऑनलाइन लोकप्रियता
तहरीक़-ए-इंसाफ़ के लिहाज़ से देखा जाए तो उसके लिए ये उसके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर साफ़ बढ़त दिखता है. ये बताता है कि युवा और टेक्नोलॉजी इस्तेमाल कर रहे वोटरों की सबसे बड़ी संख्या उनके साथ है. पार्टी की सोशल मीडिया मशीन इस मामले में दूसरे दलों से मीलों आगे है.
असफ़ंदयार मीर, यूनाइटेड स्टेटस इंस्टीट्यूट फ़ॉर पीस से जुड़े हैं. वह कहते हैं कि इस्टैब्लिशमेंट और सरकार सेना विरोधी राजनीतिक आंदोलन के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल से परेशान हैं.
उनका कहना है कि फ़ौज ट्विटर पर इस बात पर नज़र रखती है कि किस ट्वीट को कितनी बार शेयर किया गया और किसको कितना पसंद किया गया. इसी से अंदाज़ा लगाया जाता है कि राजनीतिक तौर पर किस बात को जनता को एकजुट करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद से पीटीआई ट्विटर पर अपने 90 लाख फ़ॉलोवर्स को समय-समय पर औपचारिक जानकारी उपलब्ध करा रही थी. ख़ुद इमरान ख़ान के ट्विटर पर एक करोड़ 90 लाख फ़ॉलोअर्स हैं जबकि सेना के 60 लाख और वर्तमान प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के 60 लाख से अधिक फ़ॉलोअर्स हैं.
सैन्य प्रतिष्ठान के लिए अधिक परेशानी की बात यह है कि जब सेना और इमरान ख़ान के रास्ते अलग हुए तो पीटीआई ऑनलाइन सेना का समर्थन करने वालों को भी अपने साथ ही ले उड़ी.
उज़ैर यूनुस कहते हैं कि तबसे सैन्य प्रतिष्ठान को ऑनलाइन मोर्चे पर हार का सामना करना पड़ रहा है और नैरेटिव पर नियंत्रण में उसे मुश्किलों का सामना है.
वह कहते हैं, "सैन्य प्रतिष्ठान के पास वह क्षमता नहीं है जो सोशल मीडिया पर पीटीआई के पास है. इसलिए उसे बंद करना ही आसान उपाय था."

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लेकिन सोशल मीडिया को बंद करना हाल की इंटरनेट पर पाबंदी का केवल एक पहलू था. प्रदर्शनकारियों को एकत्रित व संगठित करने में व्हाट्सऐप भी काफी महत्व रखता है. राजनीतिक मोर्चे पर दोनों ओर से अपना संदेश व्हाट्सऐप के ज़रिए फैलाने की कोशिश की जाती रही लेकिन यहां भी पीटीआई का पलड़ा ही भारी दिखता है.
उज़ैर यूनुस का कहना है कि तहरीक़-ए-इंसाफ़ ने बेहतरीन ढंग से ऐसी कम्यूनिटीज़ और ग्रुप्स बनाए हैं जिनके ज़रिए वो अपना नैरेटिव या जानकारी फैलाते हैं.
इमरान ख़ान की रिहाई के बाद इंटरनेट पर लगी पाबंदी धीरे-धीरे ख़त्म हुई लेकिन राजनीतिक गर्मागर्मी और ऑनलाइन बहस अब तक जारी है.
निगहत दाद कहती हैं कि लोग केवल इमरान ख़ान के साथ जो हुआ उसकी वजह से ही नहीं बल्कि आर्थिक स्थिति के कारण भी सरकार से बेहद नाराज़ हैं.
वो कहती हैं, "ग़ुस्सा और निराशा का ये ज्वालामुखी अब फटने के क़रीब पहुंच चुका है. हर कोई कुछ न कुछ कहना चाहता है."
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