पाकिस्तान: इमरान ख़ान सरकार और डिप्टी स्पीकर के कदम पर संविधान के जानकार क्या कहते हैं

पाकिस्तान

इमेज स्रोत, FAROOQ NAEEM/AFP via Getty Images

इमेज कैप्शन, इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के समर्थक
    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए राष्ट्रपति डॉ आरिफ़ अल्वी ने नेशनल असेंबली को भंग कर दिया है. रविवार को इमरान ख़ान ने हैरान करने वाला क़दम उठाते हुए राष्ट्रपति को संसद भंग करने की सलाह दी थी.

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के खिलाफ़ वोटिंग से पहले ही नेशनल एसेंबली के डिप्टी स्पीकर क़ासिम सूरी ने अविश्वास प्रस्ताव को असंवैधानिक बताते हुए ख़ारिज़ कर दिया. डिप्टी स्पीकर सूरी ने कहा कि ये अविश्वास प्रस्ताव संविधान के अनुच्छेद 5 के ख़िलाफ़ है.

पाकिस्तान के राष्ट्रपति के कार्यालय से जारी बयान में कहा गया है, "पाकिस्तान के राष्ट्रपति डॉ आरिफ़ अल्वी ने प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के नेशनल असेंबली भंग करने की सलाह को मंज़ूरी दे दी है. ऐसा पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 58 (1) और 48 (1) के तहत किया गया है."

विपक्षी नेता सरकार के इस कदम से खासे नाराज़ हैं. शहबाज़ शरीफ़ ने विधानसभा भंग करने के प्रस्ताव को लेकर इमरान ख़ान पर ''गंभीर राजद्रोह'' का आरोप लगाया है.

इमरान ख़ान का आरोप है कि प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए विपक्ष अमरीका से मिला है. इस बारे में उन्होंने कथित चिट्ठी एक रैली में दिखाई थी और उसे सुबूत बताया था.

अमेरिका ने इन आरोपों से इनकार किया. सरकार के एक पूर्व मंत्री के मुताबिक़, चुनाव अगले 90 दिनों में होंगे.

बीबीसी ने डिप्टी स्पीकर और इमरान ख़ान के नेतृत्व वाली सरकार के कदम पर पाकिस्तान में संविधान के जानकारों से बात की.

वीडियो कैप्शन, ‘संसद में इमरान को विरोधी चोर-डाकू क्यों दिख रहे’ - वुसत का व्लॉग

शेर मोहम्मद खान, एडवोकेट पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट, पूर्व पेशावर हाईकोर्ट जज

ये बिल्कुल ग़ैर-संवैधानिक कदम है और ये इस मुल्क के लिए बहुत ज़्यादा नुकसानदेह होगा.

सवाल ये है कि अगर इनको ये पता था कि इन्हें ये चिट्ठी सात मार्च को मिली थी, तो सात मार्च से लेकर 27 मार्च तक जब उन्होंने जलसे में इसे जेब से निकाला, तब तक क्यों नहीं दिखाया कि इसमें क्या लिखा है.

जिस मुल्क़ के ख़िलाफ़ ये बात कर रहे हैं उसने साफ़तौर पर इससे इनकार किया है. ये बिल्कुल बेहूदा किस्म की हरकत है जिससे इस मुल्क़ को फायदे की जगह बहुत नुकसान पहुंचेगा.

पाकिस्तान के 75 साल के इतिहास में आज तक ऐस कदम नहीं लिया गया. जिसके खिलाफ़ नो-कॉन्फ़िडेंस की मोशन पेश की जाती है, उसका इख़्तियार ख़त्म हो जाता है, उस वक्त तक जब तक वो कॉन्फ़िडेंस बहाल न कर ले.

पाकिस्तान

इमेज स्रोत, Anadolu Agency/ Getty Images

उन्हें यकीन था कि उन्हें असेंबली का कॉन्फ़िडेंस नहीं है, तो इस वजह से उन्होंने वो कदम उठाया जो एक आम आदमी भी नहीं उठाता.

पूरी दुनिया के साथ हमारे रिश्ते हैं, ताल्लुकात हैं. उस पर इसका असर पड़ेगा.

ये एक यूनिक तरह का कदम है. जिन मुल्क़ों में लोकतंत्र है, संविधान का ज़ोर है, ऐसे मुल्कों में मैंने इस तरह की बात नहीं सुनी.

मुझे यकीन है कि सुप्रीम कोर्ट इस कदम को ग़ैर-संवैधानिक करार दे देगा.

अगर ऐसा न हुआ तो आम लोग सड़कों पर निकलेंगे जिससे इस मुल्क को बहुत ज़्यादा नुकसान पहुंचेगा. इस मुल्क में जो अस्थिरता है, वो और बढ़ेगी.

वीडियो कैप्शन, इमरान ने अपने भाषण में क्यों किया भारत और अमेरिका का ज़िक्र?

आबिद साक़ी, पूर्व वाइस चेयरमैन, पाकिस्तान बार काउंसिल

डिप्टी स्पीकर का कदम पूरी तरह से ग़ैर-संवैधानिक है. उसकी ज़रूरत नहीं थी और वो अन्यायपूर्ण है. ये कदम लोकतंत्र के सभी कायदों के ख़िलाफ़ है.

इस कदम से उन्होंने (इमरान ख़ान ने) देश को संवैधानिक संकट में डाल दिया है. मामला बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है और ये अदालत में जाएगा.

प्रधानमंत्री ने असेंबली को भंग किए जाने की सलाह दे दी है. हालांकि, आर्टिकल 58 के तहत वो ऐसी सलाह नहीं दे सकते क्योंकि उनके खिलाफ़ नो-कॉन्फिडेंस की मोशन मूव हो चुका था.

और उसकी मौजूदगी में उनकी सिफ़ारिश संवैधानिक तौर पर अनुचित है. आर्टिकल 58 ये कहता है.

लेकिन अगर ऐसा हो जाए और राष्ट्रपति का आदेश आ जाए कि आर्टिकल 58 के तहत सब चीज़ें भंग कर दी गई हैं तो फिर ज़ाहिर है चीज़ें अलग दिशा में जाएंगी और आख़िरकार संविधान के संरक्षक के तौर पर सुप्रीम कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ेगा. मेरे ख्याल से इसके अलावा कोई विकल्प रह नहीं जाता.

वीडियो कैप्शन, पाकिस्तान में बढ़ी राजनीतिक हलचल

मोहम्मद शोएब शाहीन, सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट, प्रेसिडेंट इस्लामाबाद बार एसोसिएशन

अब चूंकि संवैधानिक संकट खड़ा हो चुका है, सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की ओर होंगी.

एक तरफ़ स्पीकर की रूलिंग है, उसमें आमतौर पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को जुडिशियल रिव्यू का इख़्तियार हासिल है.

जहां भी ऐसी स्थिति हो, आख़िरी फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट का होता है.

कुछ चीज़ें बेहद महत्वपूर्ण हैं. क्या नो-कॉन्फ़िडेंस मोशन लाने के बाद, क्या वो असेंबली को भंग करने की सलाह दे सकते हैं?

दूसरा सवाल ये कि जब नो-कॉन्फ़िडेंस मोशन का दिन था, या वोटिंग होने वाली थी, उस स्टेज पर बिनी किसी वजह के या किसी और बुनियाद के क्या तहरीर को खत्म किया जा सकता था?

सैद्धांतिक तौर पर, जो इमरान खान ने किया, उसका कोई भी संवैधानिक आधार नहीं है. जब नो-कॉन्फ़िडेंस मोशन का प्रोसेस शुरू हो जाए, तो उसे अपने अंजाम तक पहुंचने देना चाहिए था.

पाकिस्तान

इमेज स्रोत, Anadolu Agency/ Getty Images

इमेज कैप्शन, विपक्ष के नेता

आएशा सिद्दीका, लेखक, लंदन

जो उन्होंने किया वो संवैधानिक तौर पर गलत है. विपक्ष सुप्रीम कोर्ट गई है. सुप्रीम कोर्ट को फ़ैसला लेना है.

मामला संवैधानिक तौर पर संगीन है. क्या डिप्टी स्पीकर नो-कॉन्फ़िडेंस वोट को इस तरह निरस्त कर सकते हैं या नहीं, मेरे ख़्याल से ये मामला सुलझना चाहिए.

जो बात समझ में आ रही है वो ये है कि असेंबली स्पीकर ने कहा कि ये नहीं होना चाहिए , तो उन्होंने ये सेशन डिप्टी-स्पीकर से करवाया है.

केपीके में जो चुनावी नतीजे आए हैं, उसे देखकर वो (इमरान) चाह रहे हैं कि चुनाव जल्द हों.

ऐसा लग रहा है कि इमरान खान चाह रहे हैं कि स्थिति का फ़ायदा उठाकर चुनाव में जाएं.

वो इतना संकट पैदा कर चुके हैं कि उन्हें उम्मीद बढ़ गई है कि लोग उन्हें वोट करेंगे, और मुझे ऐसा लगता है कि उनके इस प्रोपोगैंडा का थोड़ा कुछ असर पड़ेगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)