पाकिस्तान: इमरान ख़ान और सेना के बयान अलग-अलग क्यों हुए?

इमेज स्रोत, Reuters
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने 31 मार्च को राष्ट्र के नाम लाइव संबोधन में अमेरिका का नाम लेकर कहा था कि उनकी सरकार के ख़िलाफ़ वह साज़िश कर रहा है.
अमेरिका का नाम लेने के बाद इमरान ख़ान को शायद लगा कि वह ग़लती कर बैठे हैं, तब उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि एक बाहरी मुल्क है. रविवार को पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को जब स्पीकर ने ख़ारिज कर दिया तो इमरान ख़ान ने इसका स्वागात करते हुए कहा कि विदेशी एजेंडा नाकाम हो गया है.
इमरान ख़ान की सरकार के ख़िलाफ़ जब से विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाने का फ़ैसला किया और उनके अपने सहयोगी दलों ने साथ छोड़ा तब से पाकिस्तानी पीएम कह रहे हैं कि उनकी सरकार को गिराने के लिए पश्चिम से साज़िश रची जा रही है. हालांकि अमेरिका इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर चुका है.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 1
31 मार्च को इमरान ख़ान ने अमेरिका पर साज़िश रचने का आरोप लगाया और दो अप्रैल को पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने इस्लामाबाद सिक्यॉरिटी डायलॉग में कहा कि अमेरिका के साथ पाकिस्तान के बेहतरीन संबंधों का पुराना इतिहास रहा है. जनरल बाजवा ने कहा कि अमेरिका अब भी पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात मार्केट है.
पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने कहा कि ब्रिटेन और यूरोपीय संघ पाकिस्तान के हितों के लिए बेहद अहम हैं. जनरल बाजवा ने यहाँ तक कह दिया कि यूक्रेन पर रूसी आक्रामकता दुर्भाग्यपूर्ण और बड़ी त्रासदी है.
इमरान ख़ान अमेरिका और पश्चिम को लेकर जो कुछ भी कह रहे थे, उससे बिल्कुल उलट बात जनरल बाजवा ने कही. ऐसे में माना जा रहा है कि इमरान ख़ान जो कुछ भी कर रहे हैं, उससे पाकिस्तान की सेना सहमत नहीं है.
इमरान ख़ान फ़रवरी के आख़िरी हफ़्ते में रूस के दौरे पर गए थे. 24 फ़रवरी को इमरान ख़ान रूस पहुँचे थे और उसी दिन राष्ट्रपति पुतिन ने यूक्रेन में रूसी सैन्य अभियान की घोषणा की थी.
तब कहा गया कि इमरान ख़ान ने रूस दौरे का ग़लत समय चुना है क्योंकि एक संदेश जाएगा कि जब पूरा पश्चिम रूस के ख़िलाफ़ है, तब पाकिस्तानी पीएम पुतिन से मुलाक़ात करने जा रहे हैं. पाकिस्तान शीत युद्ध में अमेरिकी खेमे में था लेकिन अब वक़्त करवट ले चुका है.
इमरान ख़ान की सरकार की ओर से सार्वजनिक रूप से कहा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने सत्ता में आने के बाद पाकिस्तानी पीएम को एक फ़ोन तक नहीं किया है. पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोईद यूसुफ़ तक ने फ़ोन नहीं करने की शिकायत की थी.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 2

इमेज स्रोत, Getty Images
इस शिकायत के बाद भी राष्ट्रपति बाइडन का इमरान ख़ान के पास फ़ोन नहीं आया और अब इमरान ख़ान आरोप लगा रहे हैं, अमेरिका उनके ख़िलाफ़ साज़िश रच रहा है.
क्या इमरान ख़ान के फ़ैसले के साथ सेना है? पाकिस्तान के जाने-माने अर्थशास्त्री कैसर बंगाली ने बीबीसी से कहा, "इमरान ख़ान ने अमेरिका का नाम लेकर बता दिया है कि वह राष्ट्रहित से ऊपर अपनी कुर्सी रखते हैं. इस तरह का बयान एक अपरिपक्व नेता ही दे सकता है. पाकिस्तान के लिए अमेरिका अहम है और पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने इसे बता दिया है."
कैसर बंगाली कहते हैं कि सेना प्रमुख का बयान ही पाकिस्तान का आधिकारिक बयान है न कि इमरान ख़ान का. कैसर बंगाली कहते हैं, "इन्हीं बयानों के कारण विदेशी नेता सेना को ज़्यादा तवज्जो देते हैं. विदेशी नेताओं को लगता है कि पाकिस्तान के नेता कुछ भी बोल सकते हैं, इसलिए जो भी बात करनी है, सेना से करो. इमरान ख़ान ने अमेरिका का नाम अपने मन से लिया होगा. मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि विदेश मंत्रालय से उन्होंने संपर्क नहीं किया होगा."
क्या इमरान ख़ान अपनी कुर्सी बचाने के लिए इस्लाम और अमेरिका विरोधी भावना का दोहन कर रहे हैं? इसके जवाब में कैसर बंगाली कहते हैं, "सत्ता पाने के लिए मज़हब का इस्तेमाल पाकिस्तानी नेता लंबे समय से करते आ रहे हैं. लेकिन इमरान ख़ान ने इस्लामिक दुनिया में नेतृत्व करने की कोशिश की. लेकिन सच्चाई यह है कि इस्लामिक दुनिया के नेता इमरान ख़ान को बिल्कुल तवज्जो नहीं देते हैं. इमरान ख़ान को भाषणबाज़ी से बाज आना चाहिए. जहाँ तक पाकिस्तान में अमेरिका विरोधी भावना की बात है तो यह समय 1980 के दशक का नहीं है. इस आधार पर इमरान ख़ान अपनी सत्ता नहीं बचा सकते हैं."

इमेज स्रोत, Getty Images
कथित अमेरिकी साज़िशों के सवाल से पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी को भी सामना करना पड़ा. क़ुरैशी से एक पत्रकार ने पूछा- आपकी सरकार कह रही है कि अमेरिका साज़िश रच रहा है क्या आप भी अमेरिका मुर्दाबाद के नारे लगाएंगे? इस सवाल के जवाब में क़ुरैशी ने कहा, "मैं एक ज़िम्मेदार पद पर हूँ और इस तरह का ग़ैर-ज़िम्मेदार बयान नहीं दूंगा."
क़ुरैशी के जवाब का वीडियो ट्विटर पर पोस्ट करते हुए पाकिस्तानी पत्रकार हसन ज़ैदी ने पूछा है कि क्या प्रधानमंत्री का पद ज़िम्मेदारी वाला नहीं है? इससे पहले इमरान ख़ान कहते रहे हैं कि पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार सेना और सरकार एक ही चेप्टर पर हैं. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बयानों में ऐसा नहीं लग रहा है कि सेना और सरकार एक ही चेप्टर पर हैं.
इमरान ख़ान क्या पाकिस्तान का नुक़सान कर रहे हैं?
भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने पूरे मामले पर जर्मन प्रसारक डीडब्ल्यू से कहा है, "विदेश नीति को इस तरह से पब्लिक में लाना विनाशकारी साबित हो सकता है. सरकार के इस रुख़ से पाकिस्तान का नुक़सान हो रहा है. राजनयिक नियम तो यही हैं कि किसी देश और सरकार के ख़िलाफ़ इस तरह से नहीं बोला जाना चाहिए."

इमेज स्रोत, AFP
कई विश्लेषकों का मानना है कि इमरान ख़ान अमेरिका विरोधी भावना की नाव पर सवार होकर दोबारा सत्ता हासिल करना चाहते हैं. पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक मुशर्रफ़ ज़ैदी ने लिखा है, "डिप्लोमैटिक केबल का इस्तेमाल राजनीतिक उपकरण के तौर पर किया जा रहा है. अगले चुनाव के लिए प्रधानमंत्री ने पश्चिम विरोधी लाइन चुनी है."
इमरान ख़ान को विपक्षी पार्टियाँ सिलेक्टेड प्रधानमंत्री कहती रही हैं. विपक्षी पार्टियों का आरोप रहा है कि उन्होंने सेना की मदद से सत्ता हासिल की थी. पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के उपाध्यक्ष क़ासिम सुरी ने जून 2019 में संसद में कहा था कि प्रधानमंत्री के लिए सिलेक्टेड शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाए.
बिलावल भुट्टो इमरान ख़ान को सिलेक्टेड पीएम कहते रहे हैं. आज यानी तीन अप्रैल को यही क़ासिम सुरी ने विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया.
पिछले साल नवंबर महीने में लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम को आईएसआई प्रमुख बनाने पर भी सेना और सरकार में विवाद की ख़बरें आई थीं. ऐसा कहा जाता है कि इमरान ख़ान अंजुम को आईएसआई की ज़िम्मेदारी देने के पक्ष में नहीं थे. हालांकि बाद में इमरान ख़ान ने लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम को देश की ताक़तवर ख़ुफ़िया एजेंसी के नए प्रमुख के रूप में मंजूरी दे दी थी. लेकिन इसकी मंज़ूरी में काफ़ी वक़्त लगा था.
पाकिस्तान की सेना ने 6 अक्टूबर को लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम को आईएसआई का प्रमुख बनाए जाने की घोषणा कर दी. लेकिन उनकी नियुक्ति का नोटिफ़िकेशन तीन सप्ताह बाद आया था. इस बीच आईएसआई प्रमुख की नियुक्त पर मीडिया में ख़ूब टिप्पणियाँ होती रहीं. इस बात को लेकर भी बहस हुई की इस पद पर नियुक्ति करने का अधिकार किसके पास है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















