इमरान ख़ान: सत्ता फिसली पर पाकिस्तान की सियासत में मजबूत ताक़त बने रहेंगे

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    • Author, सिकंदर किरमानी
    • पदनाम, बीबीसी पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान संवाददाता

पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया गया है.

साथ ही इमरान ख़ान की सिफारिश पर राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी ने नेशनल असेंबली को भंग कर दिया है.

पिछले कुछ दिनों से इमरान ख़ान गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. लेकिन ये इमरान ख़ान के सियासी सफ़र का अंत नहीं है.

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इस्लामाबाद के एक इलाक़े में 32 साल के मुजाहिद अली नाई की दुकान चलाते हैं. हर रोज़ की तरह वो अपने पारंपरिक ड्रेस सलवार कुर्ते में तैयार हैं और अपने काम में जुटे हैं. वो कहते हैं कि इमरान ख़ान को अगर प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटाया जाता है तो उन्हें दुख नहीं होगा. वो नाराज़गी में कहते हैं, "उनके दौर में मुझे मज़ा नहीं आया."

क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान ख़ान ने साल 2018 में इस निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की थी. मुजाहिद ने भी उन्हें वोट दिया था, उम्मीद थी कि पाकिस्तान की राजनीति में नया बदलाव आएगा. जिस पाकिस्तान में दो प्रतिद्वंद्वी परिवारों की सत्ता लंबे समय तक रही है, उसकी जगह तीसरी ताक़त उभर सकेगी.

लेकिन अब मुजाहिद, इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ को महंगाई का ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

वो बीबीसी से कहते हैं, "पूरे दिन आप काम करते हैं तो 500 रुपये कमा पाते हैं, दूसरी तरफ़ एक किलो बटर ही 500 रुपये में मिलता है. पहले ये 180 रुपये का था."

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'हमें इमरान ख़ान के साथ खड़ा होना चाहिए'

प्रधानमंत्री के तौर पर इमरान ख़ान अगर सत्ता से जाते हैं तो उनकी जगह शहबाज़ शरीफ़ लेंगे. शहबाज़, नवाज़ शरीफ़ के भाई हैं, जो तीन बार देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं और अब भ्रष्टाचार के आरोपों में दोषी ठहराए जा चुके हैं. हालांकि, नवाज़ इसे राजनीति से प्रेरित बताते आए हैं.

शहबाज़ शरीफ़ को भी आरोपों का सामना करना पड़ा है, वो भी इन आरोपों को ख़ारिज़ करते आए हैं. मुजाहिद कहते हैं, "वो (नवाज़, शहबाज़) भले ही भ्रष्ट हो सकते हैं, लेकिन वो गरीबों की मदद करते हैं."

बाल कटवाने का इंतज़ार कर रहे 27 साल के अली मलिक जूनियर अकाउंटेंट हैं. उन्होंने भी साल 2018 में इमरान ख़ान को वोट दिया था और वो अब भी इमरान ख़ान का समर्थन करते हैं. आर्थिक हालातों पर मलिक कहते हैं, "हमें इस कठिन हालात से जूझना होगा. इमरान ख़ान ने एक रुख़ अपनाया है और हमें उनके साथ खड़ा होना चाहिए."

इमरान ख़ान भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ खासा मुखर रहे हैं. उन्होंने विपक्षी दलों पर उनके ख़िलाफ़ मतदान करने के लिए सांसदों को पैसे देने का आरोप लगाया है, हालांकि विपक्षी नेता इन आरोपों से इनकार करते हैं.

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इस निर्वाचन क्षेत्र में हमने कई लोगों से बात की. रोज़मर्रा की चीजों की क़ीमतों में इज़ाफ़ा एक ऐसी शिकायत थी, जिसे ज़्यादातर लोग कर रहे थे.

नाई की दुकान के मालिक की नाराज़गी साफ़ दिख रही थी, वो भावुक होकर लगभग चिल्लाते हुए कहते हैं, "इस देश के गरीबों को बर्बाद कर दिया गया है."

हेयरबैंड की एक दुकान पर अपने लिए समान देख रही इरम और नोरेन कहती हैं, "कीमतें हर जगह बढ़ रही हैं, सिर्फ़ पाकिस्तान में ही नहीं."

हालांकि, इन दोनों के साथ आई इनकी दोस्त इस बात से सहमत नहीं दिखतीं.

वास्तविकता ये है कि पाकिस्तान के पड़ोसी देशों की तुलना में पाकिस्तान में कीमतों में वृद्धि तेज़ी से हो रही है. लेकिन इमरान ख़ान की नीतियों से कई लोगों के असंतुष्ट होने के बावजूद भी उनको हटाने की योजना किसी जनभावना की वजह से नहीं बनी है. इसके पीछे राजनीतिक पैंतरेबाज़ी ही है.

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विदेशी साजिश का आरोप लगा रहे हैं इमरान ख़ान

ऐसे माना जाता है कि इमरान ख़ान पाकिस्तान की सेना की मदद से सत्ता में आए लेकिन अब पर्यवेक्षकों का कहना है कि ऐसा समर्थन अब नहीं है. इमरान ख़ान के राजनीतिक विरोधी उन पर हमला कर रहे हैं. कई गठबंधन के सहयोगी भी इमरान ख़ान का साथ छोड़कर विपक्ष की तरफ़ जा चुके हैं.

वहीं इमरान ख़ान के पास अपनी राजनीतिक चुनौतियों के लिए एक अलग ही तरह की और विचित्र व्याख्या है. उनका कहना है कि पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन कराने की कोशिश के पीछे विदेशी साजिश है. वो कहते हैं कि इस विदेशी साजिश के वो पीड़ित हैं.

इमरान ख़ान का दावा है कि उनकी विदेशी नीतियां को वजह से अमेरिका नाराज़ है. इमरान दावा करते हैं कि अमेरिकी अधिकारियों ने पाकिस्तानी राजनयिकों को चेताया था कि उनकी विदेश नीतियों जैसे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिलने के लिए मॉस्को का दौरान करना और अमेरिका की आलोचना करने की वजह से उन्हें सत्ता से हटाने की ज़रूरत है.

इन आरोपों का विपक्ष के नेता मज़ाक उड़ा रहे हैं और अमेरिका ने आरोपों को ख़ारिज़ किया है, उसका कहना है कि आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है.

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पश्चिमी विरोध का नैरेटिव

ऐसा दिखता है कि इमरान ख़ान पश्चिमी विरोध का एक ऐसा नैरेटिव गढ़ रहे हैं जिसका समर्थन उनके उत्साही समर्थक भी कर रहे हैं.

मार्केटिंग का काम करने वाले 25 साल के सोहेल अख़्तर एक छोटे से रेस्टोरेंट में बैठे हैं और वो अपने दोस्तों से बात कर रहे हैं.

इन सभी ने 2018 में इमरान ख़ान को वोट दिया था और अब भी वो इमरान ख़ान का समर्थन करते हैं. सोहेल कहते हैं, "मैं चाहता था कि वैश्विक मंच पर पाकिस्तान की इज्जत की जाए और अब ऐसे हुआ है."

मोहम्मद एक सिविल सर्वेंट हैं. वो कहते हैं, "देखिए उन्होंने कैसे इस्लामोफोबिया के ख़िलाफ़ बात की है, पहले तो हम गुलामों की तरह हुआ करते थे."

जब बात इमरान ख़ान और पाकिस्तानी सेना के रिश्तों पर शुरू हुई कि क्या पाकिस्तानी सेना, इमरान ख़ान के लिए हो रहे बदलाव की ज़िम्मेदार है तो इस समूह में थोड़ी झिझक देखने को मिली.

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कुछ वक्त पहले तक इमरान ख़ान ये गर्व से कहते थे कि उनका और सेना का रुख़ एक ही जैसा है. इमरान ख़ान के कई समर्थक ख़ुद को "देशभक्त" के तौर पर देखते हैं जो सेना का मजबूती से समर्थन करते हैं.

25 साल के शफ़क़त मानते हैं, ''आप उनके (सेना) समर्थन के बिना सरकार नहीं बना सकते हैं.'' शफ़क़त, इमरान ख़ान के विदेशी साजिश वाले आरोपों पर भरोसा करते हैं.

बहरहाल, अब तक किसी भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है और इमरान ख़ान भी ऐसा नहीं कर सके हैं.

अर्थव्यवस्था की ख़राब स्थिति ने निस्संदेह इमरान ख़ान की लोकप्रियता को कम कर दिया है, लेकिन ख़ान देश की राजनीति में एक मजबूत ताकत के तौर पर बने रहेंगे.

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