जी 20 सम्मेलन में श्रीनगर क्यों नहीं पहुँचे तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र

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- Author, इक़बाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता

- कश्मीर में जी-20 सम्मेलन, कई देशों के प्रतिनिधि जुटे
- पर चीन, तुर्की और सऊदी अरब ने सम्मेलन में शामिल होने से किया इंकार
- चीन का रवैया प्रत्याशित लेकिन सऊदी अरब और तुर्की के शामिल न होने की क्या है वजह?
- पढ़िए क्या हैं इन देशों के बायकॉट के कारण

भारत प्रशासित कश्मीर के श्रीनगर में सोमवार से जी-20 टूरिज़्म वर्किंग ग्रुप की बैठक शुरू हो रही है. भारत इस साल जी-20 की अध्यक्षता कर रहा है और अब तक दर्जनों बैठकें हो चुकी हैं.
लेकिन श्रीनगर में होने वाली बैठक की ख़ास चर्चा हो रही है. कश्मीर में अगस्त 2019 के बाद पहला कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय आयोजन हो रहा है.
नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार ने अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया था. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा हासिल था.
इसके अलावा केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से राज्य का दर्जा भी छीन लिया था और इसे दो केंद्र शासित प्रदेश में विभाजित कर दिया था. भारत श्रीनगर में जी-20 की बैठक के ज़रिए दुनिया को शायद यह संदेश देना चाहता है कि वहां सब कुछ सामान्य है.
पाकिस्तान ने श्रीनगर में होने वाली बैठक का विरोध किया था लेकिन अब चीन, तुर्की और सऊदी अरब ने इस सम्मेलन में शामिल होने से मना कर दिया है. मिस्र को विशेष अतिथि के तौर पर बुलाया गया था लेकिन मिस्र भी बैठक में शामिल होने नहीं आया है.
जबकि इंडोनेशिया ने दिल्ली स्थित अपने दूतावास के एक अधिकारी को बैठक में शामिल होने के लिए भेजा है.
श्रीनगर में आयोजन
अर्दोआन की पूरी कोशिश है कि वो यूरोप के विरोध में या इस्लाम और पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा दिखकर, राष्ट्रपति चुनाव में फ़ायदा उठाएं.
ऐसे में सवाल उठता है कि श्रीनगर में बैठक का आयोजन कर भारत क्या हासिल करना चाहता है और जिन देशों ने इस बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया है उसे किस तरह से देखा जाए?
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ा चुके कश्मीर मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर अमिताभ मट्टू कहते हैं कि श्रीनगर में टूरिज़्म वर्किंग ग्रुप की बैठक कर भारत दुनिया को दिखाना चाहता है कि 2019 के बाद से कश्मीर में बहुत विकास हुआ है और वहां शांति का माहौल बना है.
प्रोफ़ेसर मट्टू के अनुसार अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इस तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं और इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है.
श्रीनगर से ही जुड़े एक उदाहरण का ज़िक्र करते हुए प्रोफ़ेसर मट्टो कहते हैं, "1955 में कश्मीर का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाया हुआ था. भारत ने सोवियत संघ के प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गानिन और कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव निकिता ख्रुश्चेव को श्रीनगर बुलाया और उन्हें एक ओपरा दिखाया. सोवियत संघ के दोनों नेताओं ने वहां बयान दिया कि कश्मीर भारत का अटूट अंग है."
चीन ने कश्मीर को एक 'विवादित क्षेत्र' क़रार देते हुए श्रीनगर में होने वाली बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया है.
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने शुक्रवार को एक बयान जारी कर कहा था, "चीन विवादित क्षेत्रों में किसी भी रूप में जी-20 बैठक आयोजित करने का दृढ़ता से विरोध करता है और ऐसी बैठकों में शामिल नहीं होगा."
सऊदी अरब और तुर्की की तरफ़ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है लेकिन दोनों ने बैठक में शामिल होने से मना कर दिया है.
प्रोफ़ेसर अमिताभ मट्टू के अनुसार हर एक देश को अलग-अलग नज़रिये से देखना चाहिए.
चीन

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बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "चीन सचमुच में एक दुश्मन देश है. चीन जिस तरह पाकिस्तान का समर्थन करता है, ज़ाहिर है वो कश्मीर में होने वाली किसी मीटिंग में शामिल नहीं होगा."
चीन ने इससे पहले अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख़ में होने वाली बैठकों में शामिल होने से मना कर दिया था.
आईसीडब्लयूए से जुड़े सीनियर फ़ेलो डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं कि चीन ने इस फ़ैसले से दो संदेश दिए हैं, एक यह कि वो भारत का विरोधी है और दूसरा यह कि वो पाकिस्तान का समर्थक है.
तुर्की

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तुर्की के बारे में प्रोफ़ेसर मट्टू कहते हैं कि राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन का पाकिस्तान के साथ बहुत पुराना और गहरा रिश्ता है.
उनके अनुसार इस्लामी देशों के संगठन ओआईसी में भी तुर्की कश्मीर के मामले में पाकिस्तान की नीतियों का समर्थन करता है, इसलिए इस पर भी कोई आश्चर्य नहीं है.
डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर्रहमान के अनुसार पिछले सात-आठ सालों में अर्दोआन के दौर में तुर्की की विदेश नीति का एक ख़ास वैचारिक पहलू रहा है जिसके केंद्र में इस्लाम है.
डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर्रहमान के अनुसार पिछले चार-पांच साल में तुर्की ने कश्मीर के मुद्दे को अपनी विदेश नीति का अहम हिस्सा बनाया है.
अर्दोआन जब भी इस्लामी दुनिया को संबोधित करते हैं तो कश्मीर की तुलना फ़लस्तीन से करते हैं.
अर्दोआन ने कश्मीर के मुद्दे पर संसदीय समीति का भी गठन किया है जिसका भारत ने जमकर विरोध किया है.

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अगस्त 2019 में भारत के फ़ैसले का तुर्की ने विरोध किया था. उन्होंने ओआईसी में भी कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया है और फ़रवरी 2020 में उन्होंने पाकिस्तान की संसद को संबोधित किया था. उस संबोधन में भी उन्होंने कश्मीर का ज़िक्र किया था.
डॉक्टर रहमान के अनुसार विदेश नीति के अलावा अर्दोआन ने अपने समर्थकों और मतदाताओं को भी कश्मीर के मुद्दे पर लुभाने की कोशिश की है. तुर्की में चुनाव हो रहे हैं जिसमें पहला राउंड हो चुका है और दूसरा राउंड 28 मई को है.
डॉक्टर रहमान कहते हैं, "अर्दोआन अपने राजनीतिक करियर के सबसे मुश्किल चुनाव का सामना कर रहे हैं. इस समय अर्दोआन की पूरी कोशिश है कि चाहे यूरोप और पश्चिम विरोध हो, या इस्लाम या पाकिस्तान के पक्ष में हो ऐसे तमाम मुद्दों को वो अपने चुनावी फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया जा सके."
डॉक्टर रहमान के अनुसार इस स्थिति में सवाल ही पैदा नहीं होता कि तुर्की कश्मीर के मुद्दे पर कोई नरमी दिखाएंगे.
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सऊदी अरब

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सऊदी अरब के बारे में प्रोफ़ेसर मट्टू कहते हैं कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सऊदी अरब में सुधारवादी नीति को अपनाया है लेकिन अब देखना है कि वो सऊदी अरब की कंज़र्वेटिव ताक़तों और सुधारवादी ताक़तों के बीच कैसे संतुलन बैठाते हैं.
लेकिन डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर्रहमान सऊदी अरब के मामले को अलग तरह से देखते हैं.
वो कहते हैं कि भारत और सऊदी अरब के संबंध पिछले कुछ सालों में ख़ासकर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बहुत बेहतर हुए हैं. उनके अनुसार यूक्रेन युद्ध के बाद सऊदी अरब की सोच में बदलाव आया है.
वो कहते हैं, "यूक्रेन युद्ध के बाद एक नया मल्टीपोलर वर्ल्ड आया. इस दौरान सऊदी अरब ने यह बताने की कोशिश की है कि हम किसी भी गुट में नहीं हैं."
उसका एक उदाहरण देते हुए डॉक्टर रहमान कहते हैं कि हाल ही में हुई अरब लीग की बैठक में उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेन्सकी को बुलाया था. ज़ेलेन्सकी ऐसे पहले ग़ैर-अरब लीग के नेता हैं जिन्होंने अरब लीग की बैठक को संबोधित किया.
वो कहते हैं कि सऊदी अरब यह संदेश देना चाहता है कि वो रणनीतिक स्वायत्ता और राजनीतिक व्यवहारिकता की तरफ़ जा रहा है और उसका अपना राष्ट्रीय हित सबसे महत्वपूर्ण है.
डॉक्टर रहमान के अनुसार सऊदी अरब के श्रीनगर की बैठक में शामिल नहीं होने को पाकिस्तान और चीन से जोड़कर देखने के बजाए, इस संदर्भ में देखना चाहिए.
मिस्र

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मिस्र के शामिल नहीं होने का फ़ैसला सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला है. सिर्फ़ चार महीने पहले मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फ़तल अल-सीसी 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर मुख्य अतिथि थे.
भारत ने मिस्र को जी-20 की बैठक में विशेष अतिथि के रूप में बुलाया था. मिस्र ने इसे स्वीकार भी किया लेकिन आख़िरी समय में बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया है.
मिस्र के अलावा बांग्लादेश, मॉरीशस, नीदरलैंड्स, नाइजीरिया, ओमान, सिंगापुर, स्पेन और यूएई समेत कुल नौ देशों को अतिथि के तौर पर बुलाया गया है.
मिस्र के मामले में प्रोफ़ेसर अमिताभ मट्टू भी आश्चर्य जताते हुए पूछते हैं कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने ऐसा फ़ैसला क्यों किया?
इसकी वजह को समझाने की कोशिश करते हुए प्रोफ़ेसर मट्टू कहते हैं, "मिस्र में भी सत्ता का एक संतुलन बना रहता है. मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड भी है, जमाल नासिर और अनवर सादात भी मिस्र में रहे हैं, अरब स्प्रिंग भी वहां हुआ है."
लेकिन इन सबके बावजूद वो कहते हैं कि इस बात पर ग़ौर करने की ज़रूरत है कि मिस्र ने ऐसा क्यों किया.
डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर्रहमान इसको एक दम अलग तरह से देखते हैं.
वो कहते हैं, "शुक्रवार को हुई अरब लीग की बैठक में एक ज़माने के बाद अरब दुनिया में एक नई तरह की एकता देखी गई है. सीरिया की अरब लीग में वापसी हुई है. फ़लस्तीन, लीबिया, यमन और सूडान के मुद्दे पर सभी सदस्य एकमत हैं."
डॉक्टर रहमान के अनुसार मिस्र अरब लीग का संस्थापक सदस्य रहा है इसलिए ऐसे समय में जब अरब लीग में एकता झलक रही है तो वो लीग से हटकर कोई रास्ता नहीं अपनाना चाहता है.
एक दूसरी वजह बताते हुए डॉक्टर रहमान कहते हैं, "हाल के वर्षों में मिस्र की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ख़स्ताहाल हो गई है और सऊदी अरब ने मिस्र की ख़ूब मदद की है. ऐसे में मिस्र के लिए सऊदी अरब से हटकर कोई फ़ैसला करना आसान नहीं है."
जी-20 में कौन देश हैं
भारत, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कनाडा, चीन, फ़्रांस, जर्मनी, इंडोनेशिया, इटली, जापान, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ़्रीका, तुर्की, यूके, अमेरिका, यूरोपीय संघ जी-20 के सदस्य देश हैं.
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