बिलावल की कश्मीर पर टिप्पणी से भारत ग़ुस्सा, क्या पाकिस्तान की सुनेगी दुनिया?

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- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
कश्मीर में जी-20 की बैठक को लेकर भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों के बयान पर नया विवाद पैदा हो गया है.
श्रीनगर में जी-20 की बैठक करने के फ़ैसले को लेकर पिछले सप्ताह पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ने जो कहा, उसकी भारत में कड़ी प्रतिक्रिया हुई है.
बिलावल भुट्टो ने कहा था, ''हम (श्रीनगर में जी-20 की बैठक) इसकी निंदा करते हैं. हम वक़्त पर एक ऐसा जवाब देंगे जो उन्हें याद रहेगा.''
बिलावल भुट्टो शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ की विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने गोवा आए थे.
पिछले सप्ताह बिलावल के इस बयान पर भारत में अब ख़ासी नाराज़गी दिख रही है.
उन्होंने ये टिप्पणी गोवा में पाकिस्तान के एक पत्रकार के सवाल के जवाब में की.
उन्होंने कश्मीर में जी-20 की बैठक कराने के भारत के फ़ैसले के बारे में सवाल पूछा था.
पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने वहाँ के पत्रकारों से कहा कि कश्मीर में जी-20 में बैठक कराने का फ़ैसला उनके 'छोटेपन और अहंकार' को दिखाता है.
बिलावल भुट्टों का कहना था कि भारत को इस मामले में अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की परवाह नहीं है.
उन्होंने कहा भारत का रवैया कुछ इस तरह है,''भाड़ में जाए अंतरराष्ट्रीय क़ानून और भाड़ में जाए सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव. द्विपीक्षय समझौते भी भाड़ में जाएँ. भारत को इनकी परवाह नहीं है. वो कश्मीर में कार्यक्रम करने पर अड़ा हुआ है.''
''लेकिन उन्हें पता नहीं है कि वहाँ 100 फ़ीसदी उपस्थिति नहीं होगी, क्योंकि दूसरे लोग अपनी नैतिकता से समझौता नहीं करेंगे.''
ज़ुबानी जंग
पाकिस्तानी विदेश मंत्री के इस बयान से भारत में नाराज़गी है.
ख़ास कर गोवा में एससीओ बैठक के बाद दिए गए बिलावल के इस बयान से भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ख़फ़ा दिखे.
उन्होंने बिलावल भुट्टो को 'चरमपंथी उद्योग का प्रवक्ता' करार दिया.
बिलावल के इस बयान के बाद जयशंकर ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस की.
इसमें उन्होंने कहा, ''पाकिस्तान का जी-20 से कोई लेना-देना नहीं है. इससे भी ज़्यादा उनका श्रीनगर से कोई लेना-देना नहीं है.''
कश्मीर के बारे में तो सिर्फ एक ही मुद्दे पर बातचीत होनी है और वो ये कि पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर से वापस कब जाएगा. सिर्फ यही एक मुद्दा है जिस पर चर्चा होनी है.
एस जयशंकर ने कहा, ''जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है और आगे भी रहेगा.''

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जी-20 की बैठक के लिए क्यों चुना गया श्रीनगर
जी-20 दुनिया के नौ देशों और यूरोपीय संघ का संगठन है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था, जलवायु परिवर्तन और विकास के मुद्दों पर बातचीत के लिए बना है.
इसके सदस्य देशों में चीन, तुर्की, सऊदी अरब, इंडोनेशिया और भारत जैसे देश शमिल हैं. पाकिस्तान इस संगठन का सदस्य नहीं है.
हर साल इसकी अध्यक्षता किसी एक देश के हिस्से में आती है.
इस बार भारत की बारी है. दिसंबर में उसे यह ज़िम्मेदारी मिली थी. अब इसके तहत भारत अपने यहाँ सितंबर की शुरुआत में जी-20 देशों की बैठक की मेज़बानी करेगा.
इस शिखर सम्मेलन की तैयारी के सिलसिले में वह अपने अलग-अलग राज्यों और केंद्रित शासित प्रदेशों में इससे जुड़ी बैठकें कर रहा हैं.
ऐसी कई बैठकें साल भर चलती रहेंगी. कार्यक्रम के मुताबिक़ पर्यटन और युवाओं के विकास से जुड़ी जी-20 की कुछ बैठकें श्रीनगर और लेह (लद्दाख) में होंगी.
मोदी सरकार को ओर से अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म कर दिए जाने के बाद भारत में ये पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय आयोजन है.
पाकिस्तान जी-20 की बैठकें कश्मीर में कराने की योजना से बेहद ख़फ़ा है.
उसका मानना है कि कश्मीर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक विवादित क्षेत्र है. ऐसा करके भारत इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ा रहा है.
जयशंकर के इस बयान पर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया कि भारत का ये ग़ैर ज़िम्मेदाराना क़दम जम्मू-कश्मीर पर अपने अवैध क़ब्ज़े को बरकरार रखने की उसकी मुहिम की नई कड़ी है.

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देखा जाए तो बिलावल भुट्टो का ये बयान कश्मीर पर पाकिस्तान के पारंपरिक नज़रिए को सामने रखता है. लेकिन हंगामा उनके शब्दों को लेकर हुआ.
कहा जा रहा है कि बिलावल ने भारत की निंदा के लिए जिन शब्दों का चयन किया, वो पाकिस्तान में अपने समर्थकों को ख़ुश करने के लिए था.
लेकिन भारत में उनके बयान को हिंसा की धमकी मानी गई.
इसे लेकर मीडिया में जिस तरह का शोर-शराबा हुआ, उसने पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय को सामने आकर स्पष्टीकरण देने के लिए बाध्य किया.
इस बयान में कहा गया, ''विदेश मंत्री के इस बयान को हिंसा की धमकी समझ कर उकसावे की कोई भी कार्रवाई न सिर्फ़ शरारतपूर्ण है बल्कि ये निहायत ही ग़ैर ज़िम्मेदाराना भी है. ये किसी विवादित जगह के शांतिपूर्ण समाधान के लिए विदेश मंत्री की ओर से दिए गए बयान से ध्यान भी भटकाना है.''

भारत क्या देना चाहता है संदेश?
अज़ीज़ अहमद ख़ान पूर्व राजनयिक हैं. वे भारत में पाकिस्तान की राजदूत रह चुके हैं.
उनका मानना है कि भारत श्रीनगर में जी-20 की बैठक आयोजित कर यह संदेश देना चाहता है कि कश्मीर में हालात सामान्य हैं.
उन्होंने कहा, ''भारत अप्रत्यक्ष तौर पर कश्मीर की मौजूदा स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मान्यता हासिल करना चाहता है. वो उनके सामने ये साबित करना चाहता है कि कश्मीर भारत का हिस्सा है. लेकिन दुनिया बेवकूफ़ नहीं है. कश्मीर एक ऐसा विवाद है, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय मानता है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस पर प्रस्ताव पारित हो चुके हैं."
उन्होंने आगे कहा, ''जी-20 की बैठकें अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के ख़िलाफ़ हैं. ये संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है. भारत इसका बेधड़क होकर उल्लंघन कर रहा है. लेकिन भारत कश्मीर पर अपने कब्जे को मान्यता नहीं दिला सकता."
श्रीनगर में भारत की जी-20 बैठकों को लेकर पाकिस्तान के दूसरे हलकों में एक ही जैसी राय है.
महीन शफीक़ इस्लामाबाद स्थित थिंक टैंक इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रेटजिक स्टडीजट में इंडिया एक्सपर्ट हैं.
वो कहती हैं, ''अगर आप देखें तो जी-20 की बैठकों में जिस तरह के मुद्दे उठाए जा रहे हैं, वे काफ़ी हद तक युवाओं के रुझान वाले हैं. जैसे- जलवायु परिवर्तन और साइबर सिक्योरिटी. उनका एजेंडा भू-रणनीतिक नहीं है लेकिन मकसद यही है.''
हालाँकि महीन का मानना है कि ये दाँव भारत पर उल्टा पड़ सकता है.
वो कहती हैं, ''दुनिया भर में आज युवा मानवाधिकारों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हैं. वो वैश्विक मुद्दों पर काफ़ी नैतिकता भरा रुख़ अपनाते हैं. इसलिए श्रीनगर की यात्रा करते हुए युवा शिष्टमंडल कश्मीर विवाद को समझना चाहेगा. वे इस क्षेत्र के इतिहास के बारे में भी जानना चाहेंगे. इस तरह से भारत अनजाने ही इस मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण कर देगा."

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पाकिस्तान में राजनयिकों की क्या है राय?
भारत में काम कर चुके पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक अब्दुल बासित ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो ब्लॉग में कहा, ''पाकिस्तान को इस मामले में जी-20 देशों के सामने आपत्ति दर्ज करते हुए कहना चाहिए कि कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है. लिहाजा उन्हें इस बैठक में नहीं आना चाहिए. जी-20 में तीन मुस्लिम देश है. इंडोनेशिया, तुर्की और सऊदी अरब. वो ओआईसी के भी सदस्य हैं. पाकिस्तान को इस मुद्दे पर चीन और इस ग्रुप में शामिल तीन मुस्लिम देशों के साथ मिलकर काम करना चाहिए."
वो आगे कहते हैं, ''वो देश भले ही इस पर राजी न हों. लेकिन पाकिस्तान को इस मुद्दे पर अपना रुख़ ज़ाहिर करने और इसे पूरे दुनिया के सामने रखने का मौक़ा मिल जाएगा."
पाकिस्तान को जी-20 देशों के सामने आपत्ति दर्ज करते हुए कहना चाहिए कि कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है.
कॉलमनिस्ट इमरान मलिक ने 'द नेशन' में लिखा कि इन बैठकों को कश्मीर पर भारत के दावे को अंतरराष्ट्रीय मान्यता के तौर पर देखा जाएगा.
वो लिखते हैं, ''अगर ऐसा हो, तो जी-20 को भारत की ओर दिए जाने वाले किसी भी कूटनीतिक झाँसे में आने से बचना होगा. इस तरह की बैठक पहले से तनावपूर्ण, संवेदनशील मुद्दे को और उलझाएगी. इससे सामरिक माहौल और भड़केगा."
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने विदेश मंत्रालय को लिखा है कि वो इसके पीछे भारत की छिपे और नापाक मंसूबों का पर्दाफ़ाश करे.
ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (पाकिस्तान चैप्टर) के महमूद अहमद सागर की एक चिट्ठी को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि विदेश मंत्रालय में इस संबंध में क़दम उठाए.
सागर ने राष्ट्रपति को लिखी चिट्ठी में दावा किया था कि श्रीनगर में जी-20 की बैठक कर भारत कश्मीर के अंतरराष्ट्रीय और क़ानूनी स्थिति को हल्का करना चाहता है.
जेल में बंद कश्मीरी नेता यासीन मलिक की पत्नी मुशाल मलिक कश्मीर में जी-20 की बैठक के ख़िलाफ़ अभियान चला रही हैं.
उन्होंने ट्वीट किया, ''जी-20 देशों को भारत की छिपी हुई मंशा को समझना चाहिए. भारत ने जिस क्रूरता से कश्मीर पर क़ब्ज़ा कर रखा है, वो जी-20 के देशों की ओर से इस बैठक के बहिष्कार का पर्याप्त आधार बनाता है.''

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'पाकिस्तान की कश्मीर नीति में नई गिरावट'
डॉक्टर मोहम्मद अली अहसान ने 'डेली एक्सप्रेस' ट्रिब्यून में लिखा, ''भारत के क़ब्ज़े वाले जम्मू और कश्मीर में जी-20 शिखर सम्मेलन हमारी कश्मीर नीति का नया निचला स्तर है. कश्मीर का भू-राजनीतिक महत्व भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए काफ़ी ज़्यादा है. दोनों ने इस मुद्दे पर कई युद्ध लड़े हैं.''
हालाँकि, उन्होंने लिखा कि यह उनके दिल को चोट पहुँचाता है कि कैसे भारत ने अपनी कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन करते हुए 20 शीर्ष देशों को कश्मीर में अपने कारोबार के लिए बुला लिया और इस तरह उसने कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन के मामले को पृष्ठभूमि में धकेल दिया.
उन्होंने लिखा, ''असली बात तो ये है कि जी-20 का मुख्य हिस्सा यानी जी-20 इकोनॉमिक फ़ोरम को एक विवादित क्षेत्र में बैठक करने से कोई गुरेज नहीं है. ये बताता है कि मोदी सरकार दुनिया के सामने कश्मीर को ढँक-छिपा कर पेश करने में कितना आगे बढ़ गई है. ये बैठक एक ऐसी क्षेत्र में होगी, जहाँ हर दिन मानवाधिकार का उल्लंघन हो रहा है. मोदी सरकार इसे एक ऐसे क्षेत्र के तौर पर पेश करेगी, जहाँ ऐसा कुछ नहीं हो रहा है.''
भारतीय अधिकारी मीडिया से बातचीत में इस मुद्दे पर पाकिस्तान के रवैए की आलोचना कर रहे हैं.
भारतीय अधिकारियों को लगता है कि पर्यटन पर बैठक के लिए श्रीनगर बिल्कुल सही जगह है. यहाँ जी-20 देशों की बैठक में लगभग 50 सदस्यों का दल हिस्सा ले सकता है.

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कुछ जानकारों का कहना है कि जी-20 बैठकों के ज़रिए भारत दुनिया को अपनी विविधता दिखाना चाहता है.
लेकिन जहाँ तक बैठक के लिए जम्मू-कश्मीर का चुनाव है, तो निश्चित तौर पर इसमें एक भू-राजनीतिक संदेश छिपा है.
वो यही कि 2019 में विशेष दर्जा ख़त्म करने को लेकर मचे बवाल के बाद ये क्षेत्र दुनिया के साथ काम करने के लिए तैयार है.
विल्सन सेंटर में साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर माइकल कगलमैन ने 'फ़ॉरेन पॉलिसी' में लिखा,'' सीधे तौर पर देखें तो हाल की की कुछ घटनाएँ बताती हैं कि कश्मीर में सामान्य हालात लौट रहे हैं. हालाँकि दूसरे लिहाज से देखें, तो वहाँ काफ़ी कम परिवर्तन हुआ है."
वो कहते हैं, ''मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में भारत से नाराज़गी फैली हुई है. इस इलाक़े में काफ़ी सेना है और विरोध प्रदर्शनों पर सख़्ती जारी है. मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ सरकार की सख़्ती है.''
जी-20 के टूरिज्म वर्किंग ग्रुप की मीटिंग श्रीनगर में 22 से 24 मई तक होगी. इसके लिए शहर को ख़ूब सजाया जा रहा है.
जी-20 का कमल वाला लोगो हर जगह दिख रहा है. लेकिन सुरक्षा भी काफ़ी कड़ी की जा रही है.
इस बीच पिछले सप्ताहों के दौरान पुंछ और रजौरी में दो चरमपंथी हमले हो चुके हैं.

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अंतरराष्ट्रीय बिरादरी कश्मीर मुद्दे को लगभग भूल गई है, जो कई संघर्षों और बदलावों से जूझ रहा है.
क्या जी-20 की बैठक से भारत कश्मीर को लेकर अपना पक्ष और मज़बूत करेगा या फिर इससे कश्मीर मुद्दे का ज़्यादा अंतरराष्ट्रीयकरण होगा.
ये तो आने वाले समय में ही पता चलेगा.
लेकिन जहाँ तक पाकिस्तान का सवाल है, तो यह सिर्फ़ उसके लिए कूटनीतिक शोर-शराबा पैदा कर सकता है, लेकिन क्या दुनिया सुनेगी?
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