पाकिस्तान: इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी का सेना और सियासत पर क्या होगा असर?

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- Author, अहमद एजाज़
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद की सेशन अदालत की ओर से तोशाख़ाना केस में पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) के चेयरमैन और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को तीन साल क़ैद की सज़ा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर के ज़मान पार्क स्थित घर से उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया.
हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी का फ़ैसला कोई अचंभे की बात नहीं थी. 9 मई के बाद यह आम राय थी कि उनकी गिरफ़्तारी किसी भी समय हो सकती है.
इस संदर्भ में ख़ुद इमरान ख़ान बार-बार कह चुके थे कि उनको गिरफ़्तार किया जा सकता है. वो इसके लिए तैयार थे, मगर सेशन अदालत के फ़ैसले के बाद मीडिया में आईं इमरान ख़ान की तत्काल गिरफ़्तारी की ख़बरों ने लोगों को ज़रूर चौंका दिया.
ऐसा लग रहा था कि जैसे कोर्ट का फ़ैसला और गिरफ़्तारी एक ही समय में हुई है लेकिन उनकी गिरफ़्तारी के बाद देश की राजनीतिक स्थिति के बारे में कई सवालों ने जन्म लिया है.
सवाल ये उठ रहा है कि अब आगे क्या होगा? इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी, ख़ुद इमरान ख़ान की राजनीति और उनकी पार्टी के भविष्य पर क्या असर डालेगी? इस गिरफ़्तारी का पीडीएम यानी पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट के दलों को क्या लाभ होगा?
क्या पीडीएम के दलों को पीटीआई के वोटर और समर्थकों की ओर से प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ेगा? और क्या इस गिरफ़्तारी से इस्टैब्लिशमेंट (सेना) पर भी उंगलियां उठने की आशंका है?
पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली की अवधि समाप्त होने में कुछ दिन बाक़ी हैं और इस तरह आम चुनाव के लिए मैदान सजने वाला है.
ऐसे में हमने यह जानने की कोशिश की है कि इन पहलुओं पर विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों की राय क्या है.

अब आगे क्या होगा?
वरिष्ठ विश्लेषक रसूल बख़्श रईस ने इमरान ख़ान की अचानक और अदालती फ़ैसले के तुरंत बाद की गई गिरफ़्तारी पर हैरानी जताई.
वो कहते हैं, "ऐसा लग रहा है कि गिरफ़्तारी पहले हुई और फ़ैसला बाद में आया. यानी इतनी जल्दबाज़ी का प्रदर्शन किया गया है."
रसूल बख़्श रईस ने कहा, "इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी से इतिहास और दुनियाभर में किसका मज़ाक़ बनता है? यह वह सवाल है जिसका हर बंदे को जवाब तलाश करना चाहिए."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक सलमान ग़नी कहते हैं "इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी दीवार पर लिखी नज़र आ रही थी."
उनका कहना है कि इमरान ख़ान का मामला यह था कि वह राजनीतिक दांव पेंच अपनाने को तैयार नहीं थे जिसका ख़ामियाज़ा उनको भुगतना पड़ रहा है.

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इमरान ख़ान के राजनीतिक भविष्य पर सवाल
यह गिरफ़्तारी इमरान ख़ान के व्यक्तित्व और उनकी सियासत को किस हद तक प्रभावित करेगी?
इस सवाल के जवाब में रसूल बख़्श रईस कहते हैं आज की गिरफ़्तारी से इमरान ख़ान की लोकप्रियता और बढ़ेगी. वो कहते हैं, "वह और ताक़तवर होंगे और वोटर्स उनके साथ और जुड़ जाएंगे."
दूसरी और सलमान ग़नी की राय अलग है. वह कहते हैं कि इमरान ख़ान ने केवल दो दिन पहले अपने एक इंटरव्यू में अपने विरोधी राजनेताओं को चोर और डाकू बताया था.
वो कहते हैं, "अब इस अदालती फ़ैसले के बाद वह ख़ुद उसी पंक्ति में खड़े हो चुके हैं. वह अदालती सतह पर अयोग्य घोषित किए जा चुके हैं."
उनका कहना है वह अब आगे पार्टी का नेतृत्व भी नहीं संभाल पाएंगे. वो कहते हैं, "यह गिरफ़्तारी कोई नई बात नहीं, उनसे पहले भी प्रधानमंत्री गिरफ़्तार हो चुके हैं."
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ज़ैग़म ख़ान समझाते हैं कि इमरान ख़ान की राजनीति का दायरा आने वाले समय में और सिकुड़ता चला जाएगा.
वो कहते है, "इमरान ख़ान और पीटीआई वैसी ही क़ानूनी मुश्किलों में फंस चुके हैं जिस तरह की मुश्किलों का सामना दूसरे राजनीतिक दल पहले कर चुके हैं."
"इमरान ख़ान ख़ुद भी दूसरे दलों को क़ानूनी मामलों में फंसाते रहे हैं. अब वही मामले पलट कर उनकी तरफ़ वापस आए हैं."
उन्होंने कहा कि अगर हम अतीत की बात न करें और आगे की ओर देखें तो एक ऐसे समय में जब चुनाव पास आ रहे हैं, नौ मई के बाद से पीटीआई पर ज़मीन लगातार तंग होती जा रही है.

पीटीआई का नेतृत्व कौन संभालेगा?
क्या इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी पीटीआई के कार्यकर्ताओं को सड़कों पर निकाल लाएगी?
इसके अलावा इमरान ख़ान की अनुपस्थिति में पार्टी का नेतृत्व कौन संभालेगा और क्या उस पर पार्टी के कार्यकर्ता वैसा भरोसा करेंगे जैसा इमरान ख़ान पर करते हैं?
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक आमिर ज़िया इन सवालों के जवाब में कहते हैं, "पीटीआई की प्रतिक्रिया देखनी होगी. जब तक इमरान ख़ान जेल में हैं क्या शाह महमूद क़ुरैशी उनकी जगह पार्टी नेतृत्व संभालेंगे और क्या उन्हें इमरान ख़ान की अनुपस्थिति में आम-अवाम और पीटीआई समर्थक का सहयोग मिलेगा. पार्टी का भविष्य इन्हीं बातों पर निर्भर करेगा."
आमिर ज़िया का कहना है, "यह भी देखना होगा कि इस फ़ैसले के बाद ऊपर की अदालतों से इमरान ख़ान को कोई राहत मिल सकती है या नहीं? अगर वहां से भी राहत नहीं मिलती है तो फिर स्थिति गंभीर हो जाएगी."
"जहां तक इस बात का सवाल है कि लोग घरों से निकलेंगे या नहीं, प्रदर्शन करेंगे या नहीं? मुझे ऐसा नहीं लगता."
उन्होंने कहा कि इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी से लोग नाराज़ होंगे, दुखी होंगे मगर प्रदर्शन के लिए सड़कों पर नहीं आएंगे. इसकी एक बड़ी वजह पीटीआई का संगठनात्मक ढांचा टूटना है.

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अगर चुनाव समय पर होते हैं तो?
इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी एक ऐसे समय में हुई है जब देश चुनावों की तरफ बढ़ रहा है.
सरकार की ओर से सामने आने वाले बयानों से यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि राष्ट्रीय असेंबली पूर्ण कार्यकाल से पहले भंग हो जाएगी.
अगर चुनाव 90 दिनों के भीतर होते हैं और इमरान ख़ान भी गिरफ़्तार रहते हैं तो चुनाव में पीटीआई का प्रदर्शन कैसा रहेगा और पीडीएम की राजनीति को इसका क्या लाभ मिल सकता है?
प्रोफ़ेसर रसूल बख़्श रईस चुनाव पर सवाल उठाते हुए कहते हैं "यह इलेक्शन तो नहीं, एक राजनीतिक दल को तोड़ा जा रहा है और उम्मीदवारों को परेशान किया जा रहा है. चाहें आप दुनिया को बताएं कि चुनाव पारदर्शी तरीक़े से आयोजित होने जा रहा है, मगर दुनिया देख रही है."

ज़ैग़म ख़ान के मुताबिक, पाकिस्तान में राजनीतिक दल के प्रमुख और परिवार का बड़ा महत्व होता है. वो कहते हैं, "अगर अध्यक्ष मौजूद न हो तो राजनीतिक दल मुश्किलों का शिकार हो जाता है."
वो समझाते हैं, "ऐसे कई उदाहरण हैं. मुस्लिम लीग नवाज़ और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का नेतृत्व मुश्किलों के कारण जब देश से बाहर था तो वैकल्पिक नेतृत्व परिवार के सदस्यों के रूप में मौजूद था जिस पर पार्टी कार्यकर्ता विश्वास जताते थे और इसे अपने नेता का विकल्प समझते थे. इसके उलट पीटीआई का एक अलग संकट यह है कि पार्टी में कोई ऐसा लीडर नहीं है जिसे इमरान ख़ान के विकल्प के तौर पर देखा जा सके या जिस पर कार्यकर्ता भरोसा कर सकें."
आमिर ज़िया का विचार है कि इलेक्शन में 'बल्ला' (पीटीआई का चुनाव चिन्ह) होगा या नहीं, यह महत्व रखता है.
वो कहते हैं, "अगर इलेक्शन 90 दिन के अंदर होते हैं तो क्या वोटर पीटीआई के समर्थन में निकलेगा. अगर नहीं निकलता तो किस और जाएगा? मेरा विचार है कि वोटर कम निकलेगा और मतदान भी कम होगा."
सलमान ग़नी कहते हैं राष्ट्रीय राजनीति में एक नए खेल की शुरुआत हुई है. अब देखना यह है कि राजनीतिक सुदृढ़ता आएगी या और उथल-पुथल की राजनीति जारी रहेगी.

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क्या सेना की भूमिका पर सवाल उठेंगे?
हालांकि इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी तोशाख़ाना मामले में हुई है मगर 9 मई की घटनाओं के संदर्भ में इस गिरफ़्तारी के इस्टैब्लिशमेंट (सेना) के लिए क्या मायने है?"
इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर रसूल बख़्श रईस कहते हैं, "तेरह दलों का गठबंधन और इस्टैब्लिशमेंट इस समय एक पेज पर हैं. इमरान ख़ान के साथ जो हो रहा है, जनता यह समझती है कि वह सब इसी कारण हो रहा है. इसमें मौलाना फ़ज़लुर्रहमान को भी शामिल किया जा सकता है."
इस बारे में ज़ैग़म ख़ान कहते हैं, "9 मई की घटनाओं के बाद इस्टैब्लिशमेंट की पकड़ सख़्त हो गई है. राजनीति पर इस्टैब्लिशमेंट की छाया बहुत गहरी हो गई है."
"नए क़ानूनों से यह ज़ाहिर होता है कि इस्टैब्लिशमेंट के दायरे को बहुत बढ़ा दिया गया है. इस तरह आने वाले कुछ महीनों में इस्टैब्लिशमेंट की भूमिका बहुत निर्णायक होने जा रही है."
दूसरी और आमिर ज़िया कहते हैं, "सभी दल इस्टैब्लिशमेंट की छतरी चाहते हैं. अगर यह देखा जाए कि इस गिरफ़्तारी से संस्था की लोकप्रियता पर कोई प्रभाव पड़ेगा तो मेरा विचार है कि सैनिक संस्थाएं लोकप्रियता के लिए नहीं होतीं."
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