तुर्की को सीपेक में शामिल कर क्या हासिल करना चाहता है पाकिस्तान, भारत पर क्या होगा असर ?

शहबाज़ शरीफ़ और राष्ट्रपति अर्दोआन

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    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पाकिस्तान ने एक बार फिर तुर्की को अपने महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट सीपीईसी यानी चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर में शामिल होने का न्योता दिया है.

कराची स्थित शिपयार्ड में बुधवार को एक समारोह के दौरान ये तीसरा मौका था जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ सीपीईसी का हिस्सा बनने का प्रस्ताव तुर्की के सामने रख रहे थे.

ये समारोह तुर्की के एमआईएलजीईएम के उस प्रोजक्ट से जुड़ा था, जिसके तहत तुर्की पाकिस्तानी नौसेना के लिए कोर्वेट यानी वारशिप बना रहा है.

समारोह में तुर्की के उपराष्ट्रपति सेवडेट यिलमाज और देश के दूसरे वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की भी मौजूदगी थी.

इससे पहले पिछले साल नवंबर महीने में अपनी तुर्की यात्रा के दौरान भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन को सीपीईसी में शामिल होने का न्योता दिया था.

पाकिस्तान

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थोड़ा और पीछे जाएं तो पिछले साल यानी साल 2022 के मई महीने में भी पाकिस्तान ने तुर्की के सामने सीपीईसी प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने और चीन, पाकिस्तान और तुर्की के बीच त्रिआयामी व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव रखा था.

लेकिन तुर्की ने पाकिस्तान के इन प्रस्तावों पर अब तक कोई फैसला नहीं सुनाया है.

तुर्की और पाकिस्तान दोनों देशों के एक-दूसरे के साथ गहरे संबंध हैं.

दोनों इस्लामिक दुनिया के सुन्नी प्रभुत्व वाले मुल्क हैं और एक दूसरे को अच्छा मित्र मानते हैं.

तुर्की

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तुर्की को क्यों शामिल करना चाहता है पाकिस्तान?

दोनों देशों के बीच सियासी और आर्थिक ताल्लुकात हैं. तुर्की पाकिस्तान में कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है.

बीबीसी उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार सक़लैन इमाम कहते हैं कि इन्हीं पुराने संबंधों की बुनियाद पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बार-बार तुर्की से सीपेक में शामिल होने का प्रस्ताव रखते हैं. शहबाज़ शरीफ के ख़ुद तुर्की में कई व्यापारिक संपर्क हैं.

वो कहते हैं, "पाकिस्तान फिलहाल हर वो कोशिश कर रहा है जिससे देश में निवेश हो ताकि देश की बैलेंस शीट बेहतर हो सके. पाकिस्तान कर्ज़ के जाल में फंसा है और तुर्की के निवेश से उसे एक बड़ी राहत मिल सकती है."

हालांकि इन वजहों के इतर वो चीन को इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण मानते हैं.

शी जिनपिंग

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चीन की दिलचस्पी क्यों?

इमाम बताते हैं, ''चीन खुद चाहता है कि सीपेक का विस्तार हो. चीन के लिए सीपेक मध्य और पश्चिम एशिया में अपना आधिपत्य स्थापित करने का एक अहम साधन है.''

भारत की संयुक्त खुफिया समिति के पूर्व अध्यक्ष रह चुके एसडी प्रधान टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए लिखे एक पुराने लेख में तुर्की में चीन की दिलचस्पी के पीछे की पांच वजहें गिनाते हैं.

वो लिखते हैं कि तुर्की यूरोप और एशिया के बीच बसा हुआ एक देश है और चीन अपनी महत्वकांक्षी बेल्ट रोड इनीशिएटिव प्रोजेक्ट के लिए तुर्की की इस भू-रणनीतिक स्थिति को अमूल्य मानता है.

तुर्की के इस्तांबुल शहर को एशिया और यूरोप के बीच का पुल माना जाता है. चीन इसका उपयोग करके यूरोप, पश्चिम और मध्य एशिया में आसानी से अपने विस्तार की उम्मीद करता है.

वीडियो कैप्शन, ईरान-तुर्की सीमा पर अपहरण और फ़िरौती की मजबूरी

दूसरा, चीन को लगता है कि सीपीईसी में तुर्की के शामिल होने से इसे एक अंतरराष्ट्रीय परियोजना की छवि हासिल हो जाएगी और इससे जुड़ी भारत की आपत्तियां कमजोर पड़ जाएंगी.

तीसरा, चीन तुर्की के सहारे शिनजियांग प्रांत में वीगर मुसलमानों के अलगाववादी संगठन ईटीआईएम (ईस्ट तुर्केस्तान इस्लामिक मूवमेंट) से जुड़े लोगों को नियंत्रित करने का इरादा रखता है.

चौथा, इससे तीनों देश (तुर्की,पाकिस्तान और चीन) के त्रिपक्षीय संबंध मजबूत होंगे. दोनों देशों के माध्यम से चीन को पश्चिम टेक्नोलॉजी प्राप्त करने में सुविधा होगी.

पांचवां, तुर्की और चीन दोनों का ही पूर्वी लद्दाख पर एक समान स्टैंड है, जिससे भारत पर दबाव बनाने में मदद मिल सकती है.

लेकिन तुर्की इन प्रस्तावों पर कोई फ़ैसला क्यों नहीं लेता?

अर्दोआन

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तुर्की बार-बार क्यों ठुकराता है पाकिस्तान का न्योता?

इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स में सीनियर रिसर्च फेलो डॉ. फ़ज़्ज़ुर रहमान सिद्दीकी कहते हैं कि पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक स्थिति जगजाहिर है. दोनों ही मोर्चों पर देश अस्थिर है. ऐसे में किसी भी देश के लिए एक लॉन्ग टर्म प्रोजेक्ट में शामिल होने का फैसला लेना खुदकुशी करने के समान है.

पिछले दो सालों में पाकिस्तान के वैश्विक कद को बड़ा झटका लगा है. अमेरिका ने भी पाकिस्तान से दूरी बना ली है. देश की अस्थिर स्थिति को देखते हुए एक शुद्ध रूप से आर्थिक प्रोजेक्ट में हिस्सेदारी निभाना तुर्की के लिए सुरक्षित कदम नहीं होगा.

फज्ज़ुर रहमान सीपेक प्रोजेक्ट के बारे में बात करते हुए कहते हैं जब तक पाकिस्तान राजनीतिक रूप से स्थिर नहीं हो जाता, तब तक इस प्रोजेक्ट की भी निश्चितता नहीं है.

वीडियो कैप्शन, रेचेप तैय्यप अर्दोआन 20 साल से तुर्की की सत्ता पर क़ाबिज़ हैं.

वो कहते हैं, "इस प्रोजेक्ट का बड़ा हिस्सा बलूचिस्तान में है और बलूच अलगाववादी इसके ख़िलाफ़ हैं."

असल में बलूच अलगाववादियों को लगता है कि सीपीईसी से पाकिस्तान की संघीय सरकार या फिर दूसरे समृद्ध प्रांत जैसे पंजाब को फ़ायदा मिलेगा.

वहीं, यहां के स्थानी लोग ये मानते हैं कि सीपेक के सहारे चीन बलूचिस्तान के संसाधनों पर कब्ज़ा करेगा और बलोच लोगों को अपने ही प्राकृतिक और अन्य संसाधनों को इस्तेमाल करने का मौक़ा नहीं मिलेगा.

दूसरी तरफ़ तुर्की की कूटनीतिक रणनीति भी उसे सीपेक में शामिल होने से रोक रही है.

फ़ज्ज़ुर रहमान बताते हैं कि तुर्की ने काफ़ी मशक्कत के बाद खाड़ी के देशों के साथ अपने संबंधों को सुधारा है. ऐसे में फिलहाल पाकिस्तान के प्रस्ताव को स्वीकार कर तुर्की कतई ये संदेश नहीं देना चाहेगा कि वो पाकिस्तान के ज़्यादा क़रीब है.

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क्या तुर्की को होगा कोई फ़ायदा?

इस सवाल के जवाब में बीबीसी उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार सक़लैन इमाम कहते हैं कि मौजूदा परिस्थिति में तुर्की को इससे कोई बड़ा फ़ायदा नहीं होगा.

"केवल ये हो सकता है कि तुर्की की प्राइवेट कंपनियों को सस्ते मज़दूर और सस्ती उत्पादन लागत मिल जाएगी."

भारत

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भारत का रुख़

भारत ने हमेशा से इस प्रोजेक्ट का विरोध किया है और इस विरोध की असल वजह है सीपीईसी का पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से होकर गुज़रना.

भारत इसे देश की संप्रभुता के ख़िलाफ़ बताता है.

साल 2022, मई महीने में जब पाकिस्तान ने तुर्की को सीपीईसी में शामिल होने का न्योता दिया था, तब भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि ऐसा कोई भी कदम सीधे तौर पर भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता में दखल होगा.

लेकिन अगर तुर्की पाकिस्तान के आमंत्रण को स्वीकार कर लेता है और सीपेक प्रोजेक्ट का हिस्सा बन जाता है, तो भारत के लिए इसके क्या मायने होंगे?

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तुर्की ने न्योता स्वीकारा तो भारत पर क्या होगा असर?

साल 2020 में अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन ने कहा था कि उनका देश सीपेक के विकास में भागीदार बनने के लिए तैयार है.

लेकिन बीते एक साल में तीन बार पाकिस्तान के तरफ़ से आए प्रस्ताव के बावजूद तुर्की ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की है.

फ़ज्ज़ुर रहमान कहते हैं कि इस बात की संभावना अब न के बराबर है कि तुर्की सीपेक में शामिल हो.

फिर भी अगर ऐसे हालात पैदा होते हैं तो भारत के लिए ये एक झटका साबित हो सकता है.

वजह ज़ाहिर है कि कश्मीर और पूर्वी लद्दाख के मसले पर तुर्की का रुख़ भारत विरोधी रहा है.

पाकिस्तान, चीन और तुर्की इन तीनों ही देशों का साथ आना भारत के लिए चुनौती साबित हो सकती है.

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चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर क्या है?

जैसा कि नाम से जॉाहिर है ये चीन और पाकिस्तान के बीच आर्थिक गलियारे के निर्माण से जुड़ा प्रोजेक्ट है.

इस इकोनॉमिक कॉरिडोर का एलान साल 2013 में हुआ था और ये चीन की महत्वकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव का अहम अंग है.

इस प्रोजेक्‍ट के तहत चीन के उत्‍तर-पश्चिम में स्थित शिनजियांग से पाकिस्‍तान के बलूचिस्‍तान में ग्‍वादर तक 3000 किलोमीटर लंबे रास्‍ते पर इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर प्रोजेक्‍ट्स चलाए जा रहे हैं.

चीन ने इस प्रोजेक्ट में 62 अरब डॉलर का निवेश किया है.

'सीपेक' से संबंधित पाकिस्तान सरकार की वेबसाइट ये दावा करती है कि इस प्रोजेक्ट से न केवल चीन और पाकिस्तान को फ़ायदा होगा बल्कि ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशियाई गणराज्य और पूरे क्षेत्र पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

सीपेक

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इस समय सीपेक के तहत ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्वादर, औद्योगिक सहयोग और सामाजिक एवं आर्थिक विकास के तहत कई प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं.

ऊर्जा ज़रूरतों के लिए कुल 21 परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमें से 14 परियोजनाओं का काम पूरा हो चुका है. जबकि दो प्रोजेक्ट्स पर काम जारी है और पांच प्रोजेक्ट्स विचाराधीन हैं.

ग्वादर पोर्ट पर 10 परियोजनाओं का काम पूरा हो गया है, वहीं 4 पाइपलाइन में हैं.

ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कुल 24 प्रोजेक्ट्स हैं - 6 पूरे हो गए हैं. बल्कि 5 निर्माणाधीन, 8 पाइपलाइन में और पांच लॉन्ग टर्म प्रोजेक्ट्स हैं.

औद्योगिक सहयोग से जुड़ा कोई भी प्रोजक्ट अब तक पूरा नहीं हुआ है. वहीं सामाजिक-आर्थिक विकास से जुड़े 5 प्रोजेक्ट्स पूरे हो चुके हैं.

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विवादों में रहा है चीन का वन बेल्ट वन रोड इनीशिएटिव

बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव या 'वन बेल्ट, वन रोड' चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना है.

चीन इस विशाल परियोजना को ऐतिहासिक 'सिल्क रूट' का आधुनिक अवतार बताता है.

सिल्क रूट मध्य युग में वो रास्ता था, जो चीन को यूरोप और एशिया के बाक़ी देशों से जोड़ता था.

इसके ज़रिए तमाम देशों का कारोबार होता था.

वर्तमान में चीन इसी तर्ज़ पर पूरी दुनिया में सड़कों, रेलवे लाइनों और समुद्री रास्तों का जाल बुनना चाहता है, जिसके ज़रिए वो पूरी दुनिया से आसानी से कारोबार कर सके.

चीन

कितने देश साथ-कितने विरोध में?

चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना में अब तक 130 देश शामिल हैं.

इसमें सब-सहारा अफ़्रीका इलाक़े के 38 देश, यूरोप और मध्य एशिया से 34 देश, पूर्वी एशिया और पेसिफ़िक से 25 देश, मध्यपूर्व और उत्तर अफ़्रीका से 17 देश, लातिन अमेरिका और कैरिबीयाई क्षेत्र से 18 देश और दक्षिण पूर्व एशिया के 6 देश शामिल हैं.

वहीं भारत के अमूमन सभी पड़ोसी देश जैसे नेपाल, बांग्लादेश, थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका, फिलीपींस, अफ़ग़ानिस्तान भी इसमें शामिल हैं.

वहीं भारत समेत कई देशों के जानकार, ओबीओआर को चीन की गहरी साज़िश का हिस्सा बताते हैं.

वो कहते हैं कि आधुनिक सिल्क रूट की आड़ में चीन अपनी महत्वाकांक्षाओं का विस्तार कर रहा है और छोटे देशों को कर्ज़ के जाल में फंसा रहा है.

हाल ही इटली के रक्षा मंत्री ने अपने एक बयान में कहा था कि चीन के बेल्ट एंड रोड परियोजना (बीआरआई) प्रोजेक्ट में शामिल होना "जल्दबाज़ी में लिया गया और तबाह करने वाला" फ़ैसला था.

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